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सूखे होठों की चलो प्यास बुझाई जाए (एक ग़ज़ल)......//डॉ.प्राची

2122 1122 1122 22



सारे धर्मों की सही बात उठाई जाए,

उसकी इक बूँद हर इन्साँ को पिलाई जाए।



है समंदर ही समंदर मगर इन्साँ प्यासा

सूखे होठों की चलो कहाँ प्यास बुझाई जाए।



आज तक माफ़ किया जिनको समझ कर नादाँ

अब जरूरत है उन्हें आँख दिखाई जाए।



जेठ की गर्म हवाओं में भी बरसे सावन

मेहंदी प्यार की प्यार की मेहंदी जो हाथों में रचाई जाए।…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 21, 2016 at 2:30pm — 40 Comments

ग़ज़ल प्रयास 6......डॉ. प्राची

2122 1212 22/112

फाइलातुन मुफ़ाइलुन फैलुन



वो जुनूँ है वो दिल की राहत है

हर घड़ी वो मेरी ज़रूरत है



इश्क ही कलमा इश्क ही रोज़ा

इश्क ही अब मेरी इबादत है



ज़र्रे-ज़र्रे में है महक उसकी

उसने हरसू बिखेरी जन्नत है



अब्र बन कर कभी तो बरसे वो

तर-बतर कर दे बस ये चाहत है



उसको पढ़ती हूँ बंद आँखों से

मन के मंदिर में उसकी मूरत है



वो ही दिखता मुझे जहाँ देखूँ

ये करिश्मा है या मुहब्बत है



वो शहंशाह है फकीरी… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 17, 2016 at 12:27pm — 4 Comments

सूफी शैली में एक गीत ............//डॉ० प्राची सिंह

माही मुझे चुरा ले मुझसे, मेरी प्याली खाली कर दे।

रम जा या फिर मुझमे ऐसे, छलके प्याली इतना भर दे।



मैं बदरी तू फैला अम्बर

मैं नदिया तू मेरा सागर,

बूँद-बूँद कर प्यास बुझा दे

रीती अब तक मन की गागर,

लहर-लहर तुझमें मिल जाऊँ, अपनी लय भीतर-बाहर दे।

रम जा या फिर मुझमे ऐसे, छलके प्याली इतना भर दे।



शब्द तू ही मैं केवल आखर

तू तरंग, मैं हूँ केवल स्वर,

रोम-रोम कर झंकृत ऐसे

तेरी ध्वनि से गूँजे अंतर,

माही दिल में मुझे बसा कर, कण-कण आज तरंगित…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 16, 2016 at 1:37pm — 3 Comments

ग़ज़ल प्रयास 5.....डॉ. प्राची

212 212 212 212



मेरा आँगन गुँजाती है नन्ही परी ।

पंछी बन चहचहाती है नन्ही परी ।



उसकी मुस्कान से फूल सारे खिले

हँस के गुलशन सजाती है नन्ही परी ।



पंखुड़ी सी नज़ाकत को ओढ़े हुए

मेरा मन गुदगुदाती है नन्ही परी ।



सुबह की गुनगुनी धूप जैसी निखर

पूरा घर जगमगाती है नन्ही परी ।



अपनी आँखों में झिलमिल सितारे लिए

स्वप्न अनगिन जगाती है नन्ही परी ।



बाँसुरी की मधुर तान सी लोरियाँ

मेरे होठों पे लाती है नन्ही परी… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 15, 2016 at 1:22pm — 17 Comments

ग़ज़ल प्रयास 4.....डॉ. प्राची

1222 1222 122

मुफाईलुन मुफाईलुन फऊलुन



कहा जो सच तुम्हें दिल में चुभा क्या ?

बनी ये दोस्ती अब आइना क्या ?



कहो इस दिल में कोई आ बसा क्या ?

उसे तुम कर रहे हो अनसुना क्या ?



बुरा सपना समझ भूले जिसे थे

अचानक मोड़ पर वो फिर मिला क्या ?



सहन करती है बेटी त्रासदी जो

कभी उसका थमेगा सिलसिला क्या ?



परों को काट बेड़ी डाल दी क्यों

मेरी चाहत का है ये ही सिला क्या ?



बहुत गुमसुम हो, क्यों हो तुम रुआँसे ?

तुम्हें भी… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 15, 2016 at 1:19pm — 3 Comments

ग़ज़ल प्रयास 3 ....// डॉ. प्राची



212 212 212 212

संग सुख-दुख सहेंगे ये वादा रहा।

साथ हर वक्त देंगे ये वादा रहा।

चाँदनी रात में ओढ़ कर चाँदनी

तुम जो चाहो, जगेंगे ये वादा रहा।

हाथ सर पर दुआओं का बस चाहिए

हम भी ऊँचा उढ़ेंगे ये वादा रहा।

राह काँटो भरी ये पता है हमें

हौसलों पर बढ़ेंगे ये वादा रहा।

दीप बाती से हम, जब भी मिल कर जले

हर अँधेरा हरेंगे ये वादा रहा।

देह के पार जो चेतना द्वार है

हम वहाँ पर मिलेंगे…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 14, 2016 at 11:30am — 5 Comments

ग़ज़ल प्रयास 2....//डॉ. प्राची

2122 2122 2122 212



हाय दिल में बस गयी एक गीत गाती सी नज़र ।

कुछ बताती सी नज़र और कुछ छुपाती सी नज़र ।



उसकी आहट से सिहर उठते हैं मेरे जिस्मो-जाँ

बाँचती है मुझको उसकी सनसनाती सी नज़र ।



ज़िन्दगी के फलसफे को पंक्ति दर पंक्ति पढ़ा

क्या गहनता नाप पाती सरसराती सी नज़र ?



आज फिर खामोश सहमा सा कहीं आँगन कोई

सूँघ ली क्या बच्चियों ने बजबजाती सी नज़र ?



कतरा कतरा हो रही है रूह जैसे अजनबी

मुझको मुझसे छीनती है हक़ जताती सी नज़र।…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 10, 2016 at 4:00pm — 9 Comments

सिर्फ तुम्हारी ......अतुकांत // डॉ. प्राची

मेरा,

तुम्हारी होने का बोध-

घुला है संदल सा

मेरी चेतना में,

कि विस्तारित होती ही जाती है

प्रेम सुगंधि

चहुँदिश.....

ये बोध-

स्पंदन स्पंदन सा

अंकित है

संवेदी कोषों की स्मृतियों में,

कि आईना भी अब मुझमें

सिर्फ तुम्ही को तो पाता है.....

गूँजती हैं

सिर्फ तुम्हारी स्वर लहरियाँ

अस्तित्व की अतल गहराइयों में,

जब ख़ामोशी की चादर ओढ़

डूबने लगती हूँ मैं अक्सर अकेली.....

प्रेमअगन में तप-तप,

यों गेरुआ हुई जाती है… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 8, 2016 at 12:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल प्रयास 1....//डॉ. प्राची

2122 2122 2122 2122



बत्तियाँ सारी बुझा कर द्वार पर साँकल चढ़ा कर

मस्त वो अपनी ही धुन में मुझको मुझसे ही चुरा कर



साँस हर मदहोश करती हाथ में खुशबू बची बस

फूल सब मुरझा चुके हैं राह में काँटे बिछा कर



क्या उसे एहसास भी है उस सुलगती सी तपिश का

जिस सुलगती राख में वो चल दिया मुझको दबा कर



सींच कर अपने लहू से ख्वाब की मिट्टी पे मिलजुल

जो लिखी थी दास्तां वो क्यों गया उसको मिटा कर



मेरी पलकों पर सजाए उसने ही सपने सुनहरे

जब कहा…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 6, 2016 at 8:00pm — 13 Comments

यशोधरा.......अतुकांत // डॉ० प्राची

सुधि-बुधि बिसराई

व्याकुल पनीली आँखें,

अधखुले केश, बेसुध आँचल

अस्त-व्यस्त आभूषण...

कराहती सिसकती चीत्कारती

पल-पल जमती जाती करुण वाणी से

कहाँ-कहाँ नहीं पुकारा-

पर,

लौट-लौट आती थी

हर पुकार की कर्णपटों को बेधती

हृदय विदारक प्रतिध्वनि...

लिख चुकी थी नियति

यशोधरा के भाग्य में

अंतहीन  निष्ठुर विरह...

कितनी प्रबल रही होगी

सत्यान्वेषण को आतुर

अंतरात्मा की वो पुकार,

कि नहीं थम…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 2, 2016 at 11:30pm — 4 Comments

कुछ दोहे .....( प्राची )

नहीं इतर इससे कभी, ना कम ना अतिरिक्त

जीवन प्रभु की प्रीत से, रहे सदा संसिक्त



मन के कञ्चन भाव सब, आँके ना निर्मोल

सौदागर की लो प्रथम, नीयत ज़रा टटोल



पंछी उड़ उन्मुक्त अब, अपने पंख पसार

खींच लकीरें आज नव, अम्बर के उस पार



दृढ़ इच्छित पग थाप पर, पर्वत देंगे राह

मूर्त ढले हर कामना, प्रबल रहे जो चाह



बन जाओ दिनमान के, स्वतः एक पर्याय

उज्वल स्वर्णिम तेजमय, लिख दो हर अध्याय



सरल सहज व्यक्तित्व हो, बातें सब हों गूढ़

मन अंतर… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on January 31, 2016 at 2:46pm — 9 Comments

कुछ दोहे-प्रीत पर ..........डॉ० प्राची सिंह

मृग छाया सी प्रीत बस, दे समीप्य का भास

मधुर मोहिनी बन करे, बैरी खुद की श्वास

बाह्य प्राप्ति से पूर्णता, मिलती कब पर्याप्त 

मिले न कुछ वो भी मिटे, जो भी हो निज व्याप्त

नहीं एक भी वायदा, नहीं बंध से युक्त 

प्रीत प्रखर निभती तभी, मन हों जब उन्मुक्त

प्रीत न कलुषित कर कभी, आरोपित कर चाह

मन इच्छित हर कामना, लीले सलिल प्रवाह

अकथ मौन सुन सब करें, मन ही मन संवाद

जैसी जिसकी वासना, वैसा ही…

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Added by Dr.Prachi Singh on January 7, 2016 at 1:00pm — 11 Comments

हौंसलों के पंख (गीत).......डॉ0 प्राची



हौसलों के पंख ओढ़े

स्वप्न फिर थिरके सभी,

चूम कर अपना धरातल

उड़ चले विस्तार को...

क्या हुआ गत वक्त की यदि बेड़ियाँ थीं क्रूरतम

क्या हुआ जख्मी हृदय यदि दर्द से होते थे नम

स्वप्न में कण भर धड़कते प्राण जब तक शेष हैं

जीतती है आस तब तक, हारते विद्वेष हैं

हर विगत की आँच पर रख

नर्म भावों की छुअन,

बढ़ चले हैं स्वप्न फिर

युग के नवल शृंगार को...

हो निशा चाहे घनेरी ये चलेंगे पार तक

राह नित गढ़ते बढ़ेंगे रौशनी केे द्वार तक…

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Added by Dr.Prachi Singh on December 27, 2015 at 1:00am — 13 Comments

चाँद वरदान दे.... करवाचौथ पर ख़ास ( डॉ० प्राची सिंह)

ओढ़नी ओढ़ कर मैं पिया प्रेम की

प्रार्थना कर रही, चाँद वरदान दे

 

मन महकता रहे प्रीत की गंध से

दो हृदय एक हों प्रेम के बंध से

प्रीत अक्षय सदा भाग्य अनुपम मिले

जिस्म दो हैं मगर एक ही जान दे...

ओढ़नी ओढ़ कर...

 

मैं पिया के हृदय में सदा ही रहूँ

वो ही सागर मेरे, मैं नदी सी बहूँ

चाँद, हर इक नज़र से बचाना उन्हें

दीर्घ आयु सदा मान-सम्मान दे

ओढ़नी ओढ़ कर...

 

मेंहदी हाथ में रच महकती रहे

और लाली…

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Added by Dr.Prachi Singh on October 30, 2015 at 2:30pm — 18 Comments

मूक अंतर्वेदना............... (डॉ० प्राची सिंह)

मूक अंतर्वेदना स्वर को तरसती रह गयी

आँख सागर आँसुओं का सोख पीड़ा सह गयी

 

मानकर जीवन तपस्या अनवरत की साधना

यज्ञ की वेदी समझ आहूत की हर चाहना

मन हिमालय सा अडिग दावा निरा ये झूठ था 

उफ़! प्रलय में ज़िंदगी तिनके सरीखी बह गयी

मूक अंतर्वेदना....

 

खोज कस्तूरी निकाली रेडियम की गंध में

स्वप्न का आकाश भी ढूँढा कँटीले बंध में

दिख रही थी ठोस अपने पाँव के नीचे ज़मीं

राख की ढेरी मगर थी भरभरा कर ढह गयी

मूक…

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Added by Dr.Prachi Singh on October 26, 2015 at 9:30am — 11 Comments

मत कहो! कि सत्य फिर विचार लूँ ज़रा.................(डॉ० प्राची सिंह)

बादलों की ओट से उधार लूँ ज़रा

चाँद आज तुझको मैं निहार लूँ ज़रा..

कँपकँपा रहे अधर नयन मुँदे मुँदे

साँस की छुअन से ही पुकार लूँ ज़रा..

शब्द शून्य सी फिज़ा हुई है पुरअसर 

सिहरनों से रूह को सँवार लूँ ज़रा..

चाँद भी पिघल के कह रहा मचल मचल 

चाँदनी में प्यार का निखार लूँ ज़रा..

अब महक उठे बहक उठे प्रणय के पल

इन पलों में ज़िन्दगी…

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Added by Dr.Prachi Singh on September 27, 2015 at 1:00am — 24 Comments

श्रावणी तीझ के अवसर पर कुछ महकती कह-मुकरियाँ

बन सौभाग्य सँवारे मुझको

सावन घिरे पुकारे मुझको

हाथ पकड़ झट कर ले बंदी

क्या सखि साजन?न सखि मेहंदी

 

उसने हाय! शृंगार निखारा  

प्रेम रचा मन भाव उभारा  

प्रेम राह पर गढ़ी बुलंदी

क्या सखि साजन? न सखि मेहंदी

 

अंग लगे तो मन खिल जाए

खुशबू साँसों को महकाए

प्यारी उसकी घेराबंदी

क्या सखि साजन? न सखि मेहंदी

 

उसमें महक दुआओं की है

उसमें चहक फिजाओं की है

हिमशीतल निर्झर कालिंदी

क्या…

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Added by Dr.Prachi Singh on August 17, 2015 at 8:15am — 14 Comments

सपनों के झिलमिल से जुगनू (एक गीत).............डॉ० प्राची सिंह

सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे...

 

नन्हें पर हैं, पर भोला मन

नभ छू ले करता अभिलाषा,

कंटीले तारों की जकड़न

देगी केवल हाथ हताशा,

अन्धकार नें बरबस नोचे परियों के भी पंख सुनहरे...

सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे...

 

सपनों को मंज़ूर हुआ कब 

ढुलक आँख से झरझर बहना,

हँसकर स्वीकृत किया उन्होंने 

सीपी में मोती बन रहना,

सागर ने अपने सीने में राज़ छुपाए हैं कुछ गहरे...

सपनों के…

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Added by Dr.Prachi Singh on June 4, 2015 at 9:30pm — 15 Comments

रे पथिक, रुक जा! ठहर जा!....................एक गीत (डॉ० प्राची)

रे पथिक, रुक जा! ठहर जा! आज कर कुछ आकलन

बाँच गठरी कर्म की औ’ झाँक अपना संचयन

 

हैं यहाँ साथी बहुत जो संग में तेरे चले

स्वप्न बन सुन्दर सलोने कोर में दृग की पले,

प्रीतिमय उल्लास ले सम्बन्ध संजोता रहा  

या कपट,छल,तंज से निर्मल हृदय तूने छले ?

 

ऊर्ध्वरेता बन चला क्या मुस्कुराहट बाँटता ?

छोड़ आया ग्रंथियों में या सिसकता सा रुदन ?.......रे पथिक..

 

कर्मपथ होता कठिन, तप साधता क्या तू रहा ?

या नियतिवश संग…

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Added by Dr.Prachi Singh on April 29, 2015 at 5:00pm — 22 Comments

प्रेम भाव को समर्पित कुछ दोहे ..........(डॉ० प्राची)

स्वेच्छा से बिंधता रहा, बिना किसी प्रतिकार 

हिय से हिय की प्रीत को, शूलदंश स्वीकार 

ईश्वर प्रेम स्वरूप है, प्रियवर ईश्वर रूप 

हृदय लगे प्रिय लाग तो, बिसरे ईश अनूप 

कब चाहा है प्रेम ने, प्रेम मिले प्रतिदान 

प्रेमबोध ही प्रेम का, तृप्त-प्राप्य प्रतिमान 

भिक्षुक बन कर क्यों करें, प्रेम मणिक की चाह ?

सत्य न विस्मृत हो कभी, 'नृप हम, कोष अथाह' !

प्रवहमान निर्मल चपल, उर पाटन…

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Added by Dr.Prachi Singh on April 26, 2015 at 11:30am — 19 Comments

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