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GHAZAL - 6

 

 

                                     ग़ज़ल

 

मैंने  दुनिया  की  दुश्मनी  देखी,  दोस्त  तू  भी  मुझे  भुला देना |

तेरे दिल को ये हक है चाहे तो,  मेरा   नाचीज़  दिल  जला  देना ||



तुझको हमराज़-हमनशीं कर के, मैंने खुशियों के ख्वाब देखे थे,

मुझसे गर भर गया हो…

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Added by Abhay Kant Jha Deepraaj on December 9, 2010 at 12:30am — 2 Comments

इन्सान और फ़रिश्ता

जिसको करने में फ़रिश्ते भी शायद डरते हैं .
हम इन्सान उसको दिल लगाकर करते हैं.
हमको पता है ज़िन्दगी का मौत ही हासिल है.
फिर ज़िन्दगी के वास्ते हम क्यों गुनाह करते हैं?
किस्तों में मिट रही है पुरखों की मर्यादायें.
पर हम इसे विकास की एक नई सुब्ह कहते हैं .
किसने बदल दिया है इस मुल्क की आबोहवा?
लैला का नाम सुनकर जहाँ कैश सहमते हैं .
कायर के हाथ खंजर जब से लगा है पुरी.
परवरदिगार तब से हैरान से रहते हैं.
गीतकार - सतीश मापतपुरी
मोबाइल - 9334414611

Added by satish mapatpuri on December 8, 2010 at 3:00pm — 3 Comments

मेरा सपना तोड़ दिया

फूलों से थी चाहत मुझे

गुलदानों का सपना था

तूने बागों में छोड़ दिया

मेरा सपना तोड़ दिया



यादों से मैंने चुन चुन के

रिश्ते अपने सोचे थे

पल भर में तूने मेरा

दुनिया से नाता जोड़ दिया



खतरों से टकराकर में

आगे बढना चाहता था

देख के मेरे ज़ख्मों को

खतरों का रुख ही मोड़ दिया



प्रीत को अपनी लिख लिख के

में गीत बनाना चाहता था

बीच में मीत मिला कर के

मेरी प्रीत को मीत से जोड़ दिया



चारों ओर अँधियारा… Continue

Added by Bhasker Agrawal on December 8, 2010 at 12:00pm — No Comments

शरद पूर्णिमा विभा

शरद पूर्णिमा विभा



सम्पूर्ण कलाओं से परिपूरित,

आज कलानिधि दिखे गगन में

शीतल, शुभ्र ज्योत्स्ना फ़ैली,

अम्बर और अवनि आँगन में



शक्ति, शांति का सुधा कलश,

उलट दिया प्यासी धरती पर

मदहोश हुए जन जन के मन,

उल्लसित हुआ हर कण जगती पर



जब आ टकरायीं शुभ्र रश्मियाँ,

अद्भुत, दिव्य ताज मुख ऊपर

देदीप्यमान हो उठी मुखाभा,

जैसे, तरुणी प्रथम मिलन पर



कितना सुखमय क्षण था यह,

जब औषधेश सामीप्य निकटतम

दुःख और व्याधि…
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Added by Shriprakash shukla on December 7, 2010 at 9:00pm — 1 Comment

आखरी पन्नें (2) दीपक शर्मा 'कुल्लुवी '

आखरी पन्नें (2) दीपक शर्मा 'कुल्लुवी '



न देख ख्वाब यह साक़ी की कोई थाम लेगा तुझको

संभले हुए दिल तेरी महफ़िल में नहीं आते.........



ज़िन्दगी में इंसान बहुत कुछ जीतता है और बहुत कुछ हार जाता है लेकिन हार कभी नहीं माननी चाहिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए कभी तो मंजिल मिलेगी मंजिल कभी न भी मिले तो कम से कम उसके करीब तो पहुँच जाओगे









कमीं रह गयी



ज़िन्दगी में तुम्हारी कमीं रह गयी

अपनीं… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on December 7, 2010 at 3:25pm — 3 Comments

बात

कोई बात नहीं सुनता, सब अंदाज़ सुनते हैं
कल तक था जो अनसुना वो आज सुनते हैं

हकीकत ठुकरा देते हैं लोग पर राज़ सुनते हैं
मंजिल पर रहकर भी भीड़ की राह चुनते हैं

ज़हन में छुपी है कब से वही वो बात सुनते हैं
मनाते हैं वो खुद को, क्या खाक सुनते हैं

सब अमृत के प्यासे, जहर बेबाक चुनते हैं
कुछ सुन ले तू मेरी, तेरी तो लाख सुनते हैं

Added by Bhasker Agrawal on December 7, 2010 at 2:30pm — No Comments

एक मिसाल परोपकार की

भारत के लोगों में परोपकार की धारणा बरसों से कायम है। भले ही परोपकार के तरीकों में समय-समय पद बदलाव जरूर आए हों, लेकिन अंततः यही कहा जा सकता है कि लोगों के दिलों में अब भी परोपकार की भावना समाई हुई है। इस बात को एक बार फिर सिद्ध कर दिखाया है, बेंगलूर के आईटी क्षेत्र के दिग्गज अजीम प्रेमजी ने। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अपनी जानी-मानी कंपनी विप्रो की दौलत में से करीब 88 सौ करोड़ रूपये एक टस्ट को दिया है, जो काबिले तारीफ है। ऐसा कम देखने को मिलता है, जब कोई बड़ा उद्योगपति अपनी कमाई का एक बड़ा… Continue

Added by rajkumar sahu on December 7, 2010 at 12:15pm — 1 Comment

आखरी पन्नें (१) दीपक शर्मा 'कुल्लुवी '

आखरी पन्नें (१) दीपक शर्मा 'कुल्लुवी '



इन आखरी पन्नों में ज़िन्दगी का दर्द है

कुछ हमनें झेला है कुछ आप बाँट लेना

मेरे क़त्ल-ओ-गम में शामिल हैं कई नाम

ज़िक्र आपका आए न बस इतनी दुआ करना

.......

आखरी पन्नें मेरी ज़िंदगी की अंतिम किताब,अंतिम रचना,आखरी पैगाम कुछ भी हो सकता है हो सकता है यह केवल एक ही पन्नें में ख़त्म हो जाए य सैंकड़ों हजारों और पन्ने इसमें और जुड़ जाएँ क्योंकि कल किसनें देखा है खुदा ने मेरे लिए भी कोई न… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on December 7, 2010 at 11:55am — 2 Comments

जिंदगी..©



जिंदगी..©

जाने कितने रंग दिखावे है यह जिंदगी..

बिखेरने थे उसे जो हमसे चाहे ये जिंदगी..

माया फैला फँसा हमको देती है ये जिंदगी..

इशारों पर अपने है नाचती ये जिंदगी..

ना चाहें पर अपना बोझ लदाती है जिंदगी..

अनचाहे ही हम पर गहराती है ये जिंदगी..

कैसे पायें आज़ादी हम पे हावी है ये जिंदगी..



जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (07 दिसंबर 2010)



Photography for both pictures :- Jogendra… Continue

Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on December 7, 2010 at 11:26am — 1 Comment

मौन

अपना और पराया मौन:

अकुलाया अकुलाया मौन.

जीवन यज्ञ आहुति श्वास ;

धडकन मन्त्र बनाया मौन .

बोलना पीतल;यह सोना है ;

जो हम ने अपनाया मौन .

कभी सुहाग सेज पे लेटा;

शर्माया, सुकुचाया मौन.

कभी विरहाग्नि ने जी भर ;

तरसाया तरपाया मौन.

तिल तिल पलपल ही जीवनभर

देता साथ सुहाया मौन .

प्रेम पगी मीरा का मोहन ;

प्रेम गगन पर छाया मौन .

नाव की ठांव बना कबहूँ यह ;

कबहूँ पतवार बनाया मौन .

श्वासों की माला पे हमने ;

हर दिनरात फिराया… Continue

Added by DEEP ZIRVI on December 6, 2010 at 8:48pm — 4 Comments

आखरी पन्नें

आखरी पन्नें



ज़िंदगी अपनी यादों की इक खुली किताब है

समेटे हुए हैं जिसमें हम अपने आस पास का दर्द

इसको खोलने से पहले बस इतना ख्याल रखना

आपके अश्क ढल न जाएँ दर्द मेरा देखकर



आखरी पन्नें मेरी ज़िंदगी की अंतिम किताब,अंतिम रचना,आखरी पैगाम कुछ भी हो सकता है

क्योंकि कल किसनें देखा है खुदा ने मेरे लिए भी कोई न कोई दिन तो एसा निश्चित किया होगा जिसका कल कभी न आयेगा मैं एक लेखक हूँ जिसे हर रोज़ कुछ न कुछ नया लिखने की चाह रहती है ,प्यास रहती है और मैं कुछ न कुछ लिखता… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on December 6, 2010 at 7:35pm — No Comments

ग़ज़ल:-मैं ही रुसवा हुआ

ग़ज़ल:-मैं ही रुसवा हुआ

मैं ही रुसवा हुआ ज़माने में

नाम उसका नहीं फ़साने में |



उन चरागों को दुआएं दे दूं

खुद जला मैं जिन्हें जलाने में |



चोंच खाली लिए लौटे पंछी

बच्चे भूखे रहे ठिकाने में |



कैसे कह दूं कि यह घर छोटा है

उम्र गुजरी इसे बनाने में |



तुम कि गंगा का दर्द क्या सुनते

तुम तो मशगूल थे नहाने में |



एक भरम है चमन की रंगों-बू

है मज़ा तितलियाँ… Continue

Added by Abhinav Arun on December 6, 2010 at 4:16pm — 9 Comments

ग़ज़ल:-जिस रोज़ से आईना

ग़ज़ल:-जिस रोज़ से आईना



जिस रोज़ से आईना मेरे पास नहीं है

औरों को मेरी शक्ल का एहसास नहीं है |



उसको मैं अपने राज़ बताता भी किस तरह

बेहद अज़ीज़ है वो मेरा ख़ास नहीं है |



बूढ़े फ़कीर ने मुझे उड़ने की दुआ दी

फिर ये कहा तकदीर में आकाश नहीं है |



बेशक मेरे हैं पांव हुनर तेरा दिया है

तेरे बगैर चलने की अब आस नहीं है |



तालाब के करीब कहीं यक्ष तो नहीं

आकर क्यों लगा… Continue

Added by Abhinav Arun on December 6, 2010 at 3:57pm — 7 Comments

स्वप्निल सपने..



कुछ सशब्द,कुछ नि:शब्द सपने,



कुछ व्यक्त ,कुछ अव्यक्त सपने..



कुछ मौन कुछ कोलाहल पूर्ण..



कुछ सुंदर ,कुछ कुरूप सपने..





कुछ मधुर,कुछ कड़वे सपने..



कुछ तृप्त,कुछ अतृप्त सपने..



कुछ सजीव कुछ प्रस्तर खंड..



कुछ माने ,कुछ रूठे सपने..





कुछ शहनाई,कुछ बलि वेदी..



कुछ दुल्हन कुछ अरथी सपने..



कुछ ग्यान पूर्ण,कुछ अग्यानि..



क्च मानव कुछ… Continue

Added by Lata R.Ojha on December 6, 2010 at 12:30pm — 2 Comments

ले चल अपने देस पिया जी ..





ले चल अपने देस पिया जी , ये घर अब ना भाए..



जी चाहे,तेरी सुगंध ऐसे मुझ में बस जाए..



जो भी देखे मुझको ,मुझमें तेरी छाया पाए..





रोम रोम मेरा हर पल बस तेरी महिमा गाए..



मेरे होठों पे जब आएँ शब्द तेरे ही आएँ..





इस भौतिक जीवन में तो अब ना ये मनवा रम पाए..



दुनियादारी सोचने बैठूं, तुझमें सुध खो जाए..





ले चल अपने देस पिया जी ,ये घर अब ना भाए..



हर… Continue

Added by Lata R.Ojha on December 6, 2010 at 12:00pm — 3 Comments

तू है यहीं...



यूँ तो तू चला गया,

किंतु, जाकर भी है यहाँ !

ख्वाबों में,

फर्श पर पड़े कदमों के निशानों में,

है तेरी पायल की छमछम अब भी I

तेरी कोयल सी आवाज़,

आरती के स्वरों में गूँजती है अब भी I

तू नहीं है अब,

किंतु,

तेरी परछाई

चादर की सलवटों में है वहीं I

तू चला गया,

क्यूँ ?

ये राज़ बस तुझे ही पता I

फिर भी तेरे प्यार की कुछ यादें हैं,

जो छूट गईं

यहीं घर पर… Continue

Added by Veerendra Jain on December 6, 2010 at 11:26am — 15 Comments

अश्क

अनकहा बयाँ हैं अश्क तुम्हारे

अनसुनी दास्ताँ हैं अश्क तुम्हारे



आँखों से दिखती है दुनिया बाहर की

अन्दर का जहाँ हैं अश्क तुम्हारे



दर्द हो दिल में तो ही होता दीदार इनका

ऐसा कुछ कहते कहाँ हैं अश्क तुम्हारे



मोका है आज तो जान लो तुम इन्हें

वरना हमेशा रहते कहाँ हैं अश्क तुम्हारे



शायद खुशनुमा हैं मिजाज़ इनका

साथ रहकर दर्द सहते कहाँ हैं अश्क तुम्हारे



ये ठहरी जमीं नहीं जो जीत लोगे तुम इन्हें

बहता आसमां हैं अश्क… Continue

Added by Bhasker Agrawal on December 5, 2010 at 4:06pm — No Comments

कलम,विचार और भाव

मेरी कलम,विचार और भाव साथ काम नहीं करते।
कभी कुछ कलम साथ देती है तो विचारों की परछाईं भर ही ज़ाहिर हो पाती है ।
कभी देखने में आया के हमने बात को इतना कम लिखा, के बात का मतलब ही बदल गया ।
कभी भावनाओं को शब्दों में पुरोया तो भावनाएं नाजायज़ लगने लगीं ।
फिर भी हम लिखते गए उस उम्मीद की खातिर के कभी किसी और को नहीं तो खुद को ही कुछ बता सकें, कुछ समझा सकें ।

Added by Bhasker Agrawal on December 5, 2010 at 8:06am — No Comments

Ghazal

जमाने से चलती हवाओं का रूख मोड़ देंगे,

बदबू साफ़ कर उसमें सिर्फ सुगंध छोड़ देंगे.



मौसम भी अगर दगा दे हमसे रूठ जाता है,

बादल से हम अपने बाग़ को सीधे जोड़ देंगे.



कल तक जो मेरे राहों में कांटें बिछाती थी,

पलकें बिछाकर उसका गुरूर हम तोड़ देंगे.



औरों की मुस्कराहट ही हमारी ईमान होगी.

तुम्हें खुश रखने को, अपना जख्म छोड़ देंगे.



जमाना साथ देने के बजाय टांग खिंचेगी,

प्रेम का रस पिलाने को पत्थर निचोड़ देंगे.



दौड़ रही है जितनी गाड़ी… Continue

Added by Ghulam Kundanam on December 5, 2010 at 1:18am — 1 Comment

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