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जरुरी नहीं वो भला हो
अगर सच भी जो बोलता हो

रहे गुण सभी आदमी में
मुसीबत में तो काम का हो

बहुत जानता तो अच्छा
नहीं जानता क्या बुरा हो

हमेशा ही सच्चाई जीते
है कोई जो ना जानता हो

जो मारे है अंदर का रावण
उसी का ही बस दशहरा हो

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by dandpani nahak on October 20, 2019 at 4:53pm
परम आदरणीय समर कबीर साहब , प्रणाम! बहुत शुक्रिया समय निकाल कर आप ने मार्गदर्शन किया ह्रदय से आभारी हूँ! आपकी कृपा सदैव बनी रहे! आप स्वस्थ रहें दुआ करता हूँ!
Comment by Samar kabeer on October 20, 2019 at 2:32pm

जनाब नाहक़ जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

'बहुत जानता तो अच्छा'

ये मिसरा बह्र में नहीं है,इसे यूँ कर लें:-

'बहुत जानता हो तो अच्छा'

Comment by dandpani nahak on October 19, 2019 at 8:27pm
परम आदरणीय समर कबीर साहब प्रणाम , मेरी भूल है !अरकान 122 122 122 पर कोशिश की है कृपा कर मार्गदर्शन दें
Comment by Samar kabeer on October 19, 2019 at 2:57pm

जनाब नाहक़ जी आदाब,कृपया ग़ज़ल के साथ अरकान भी लिखा करें,ताकि कुछ कहने में आसानी हो ।

कृपया ध्यान दे...

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