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Rahul Dangi
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।
"शुक्रिया आदरणीय समर जी..स्नेह बनाये रखें.."
Dec 22, 2018
Samar kabeer commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।
"// "वे बयाँ के घौसले वे जुगनुओं की रोशनी" इस शे'र में वे शब्द की जगह वो का इस्तेमान कैसा रहेगा? "// सहमत हूँ आपसे,बृजेश जी ।"
Dec 22, 2018
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।
"बढ़िया आदरणीय राहुल जी...मैं आपसे और आदरणीय समर कबीर जी से राय चाहता हूँ.."वे बयाँ के घौसले वे जुगनुओं की रोशनी" इस शे'र में वे शब्द की जगह वो का इस्तेमान कैसा रहेगा? ""
Dec 22, 2018
राज़ नवादवी commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।
"आदरणीय राहुल दांगी जी, आदाब. ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें. बाक़ी आदरणीय समर कबीर साहब ने अपनी बहुमूल्य प्रक्रिया दे दी है. सादर "
Dec 21, 2018
राज़ नवादवी commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।
"आदरणीय राहुल दांगी जी, आदाब. ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें. बाक़ी आदरणीय समर कबीर साहब ने अपनी बहुमूल्य प्रक्रिया दे दी है. सादर "
Dec 21, 2018
Rahul Dangi posted a blog post

ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

2122 2122 2122 212 काँच के टुकडों में दे दे ज्यों कोई बच्चा मणी आधुनिकता में कहीं खोया तो है कुछ कीमती।हुस्न की हर सू नुमाइश़ चल रही है जिस तरह बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।ताश, कन्चें, गुड्डा, गुड़िया छीन के घर मिट्टी के लाद दी हैं मासुमों पर रद्दियों की टोकरी।अब कहाँ हैं गाँव में वें पेड़ मीठे आम के वे बया के घोसलें, वे जुगनुओं की रौशनी।ले गयी सारी हया पश्चिम से आती ये हवा घाघरा, कुर्ती, दुपट्टा, लहंगा, साड़ी, ओढ़नी।मौलिक व अप्रकाशित ।See More
Dec 19, 2018
डॉ छोटेलाल सिंह commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।
"आदरणीय राहुल डांगी जी सुंदर रचना के लिए बधाई"
Dec 19, 2018
Samar kabeer commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।
"जनाब राहुल डांगी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । ' काँच के टुकडों में दे दें ज्यों कोई बच्चा मणी' इस मिसरे में 'दे दें' को "दे दे" कर लें । ' हुस्न की हर सू नुमाइश़ चल रही हैं जिस…"
Dec 18, 2018
PHOOL SINGH commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।
"वक्त की स्थिति को उजागर करती खुबसुरत रचना, बधाई स्वीकारे"
Dec 18, 2018
Rahul Dangi posted blog posts
Dec 18, 2018
Samar kabeer commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।
"जनाब राहुल डांगी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया' पहली बात,ये मिसरा बह्र में नहीं है,दूसरी बात ये कि "तौबा" शब्द स्त्रीलिंग है । ' छोडकर टेशन सनम को लब तो…"
Dec 17, 2018
PHOOL SINGH commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।
"वक्त की सच्चाई को उजागर करती सुंदर रचना बधाई स्वीकारे"
Dec 17, 2018
Rahul Dangi posted a blog post

ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।

2122 2122 2122 212 रोज के झगड़े, कलह से दिल अब उकता सा गया। प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया। दफ़्न कर दी हर तमन्ना, हर दफ़ा,जब भी उठी बारहा इस हादसे में रब्त पिसता सा गया। रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया रफ़्ता रफ़्ता हमसे वो ऐसे बिछड़ता सा गया।चाहकर भी कुछ न कर पाये अना के सामने हाथ से दोनों ही के रिश्ता फिसलता सा गया। छोडकर टेशन सनम को लब तो मुस्काते रहें प्यार का मारा हमारा दिल तड़पता सा गया।जाने किसकी बददुआ थी दरमियां हम दोनों के जितना समझाया उसे उतना बिगडता सा गया।खुदकुशी तो…See More
Dec 17, 2018
Rahul Dangi commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास
"बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है भाई जी"
Dec 5, 2018
Rahul Dangi commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल-खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से
"शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण जी"
Dec 5, 2018
Rahul Dangi commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल -14( खुदा की सारी रहमत इश्क के आँचल में रहती है)
"बहुत सुन्दर "
Dec 5, 2018

Profile Information

Gender
Male
City State
Baraut(UP)
Native Place
Ranchhar
Profession
Delhi police
About me
muje duniya m rahne ke taur tarike nh aate! pta ni kyu?

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At 12:12pm on January 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
आदरणीय राहुल दांगी जी, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन के अवसर पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें।
At 5:02pm on July 28, 2015, Harash Mahajan said…

आदरणीय Rahul Dangi जी आपका  बहुत बहुत शुक्रिया |उम्मीद है आप सभी का साथ यूँ ही बना रहेगा |

At 11:13pm on November 20, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

आदरणीय राहुलजी, आपका प्रश्न एक दम समीचीन और सही है. प्रथम दृष्ट्या आत और आथ क़ाफ़िया नहीं बन सकते. लेकिन हो सकता है कि राहत इन्दौरी के जिस मतले पर आपने शेर उद्धृत किया है वह किसी और ग़ज़ल का शेर हो. या, उर्दू के हिसाब से उन अक्षरों की वर्तनी अलग ढंग की हो. और वहाँ मान्य हो. जो हिन्दी में वैसी नहीं है.
सादर

At 12:36pm on November 9, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

भाई राहुल दांगीजी, आपसे मेरा अनुरोध है, कि आप पहले गीत-नवगीत/ गेय कवितायें पढ़ें.
इस पटल पर भी प्रबुद्ध रचनाकारों के अनेक गीत-नवगीत उपलब्ध हैं. उसके बाद आप कुछ नया लिख कर दिखायें.

शुभेच्छायें...

At 9:47am on November 9, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

आदरणीय राहुल दांगीजी,  आप गीतों से सम्बन्धित अक्सर प्रश्न करते हैं. आप अपनी शंकाओं के समाधान के लिए उत्सुक हैं यह जानना इस तथ्य से आश्वस्त करता है कि आप अपनी जानकारियों को लेकर आग्रही हैं. यह एक शुभ संकेत है. क्यों कि आपने गीत नहीं लिखे हैं तो आपके अंदर का रचनाकार / गीतकार गीतकर्म को लेकर उपयुक्त वातावरण बना रहा है. आप अवश्य अच्छे मनोनुकूल गीत प्रस्तुतकर पायेंगे.
इस संदर्भ में आपके प्रश्नों पर कुछ कहने के पूर्व मेरा विनम्र सुझाव यही होगा है कि सर्वप्रथम आप गीत और गेय कविताओं को खूब पढ़ें. गीतों के मात्रिक या वैधानिक विन्यास को समझने के पूर्व आप साहित्य में उपलब्ध गीतों और गेय रचनाओं के मर्म को समझने का प्रयास करें. उसके बाद, आप गीतकर्म करें. उन गीतों को पटल पर प्रस्तुत करें. स्वीकृत हो गयी रचनाओं पर टिप्पणियाँ आयेंगी. वे आपके रचनाकर्म के लिए मार्गदर्शन का काम करेंगी.
गीत रचना शिल्प और कोमल भावनाओं के संप्रेषण का अद्भुत तथा अद्वितीय साहित्यिक कर्म है.
विश्वास है, मेरा कहना आपकीउत्सुकता को कुछ आधार दे पायेगा.
शुभेच्छायें

At 8:07pm on November 7, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…
दांगी जी
आपने गीत के बारे में जानकारी चाही है i पर गीत को चंद शब्दो में बता पाना संभव नहीं है i इसके लिए एक लम्बे लेख की आवश्यकता है i फिर भी संक्षेप में जान ले कि गीत में एक पंक्ति टेक की होती है जो बार बार हर परवर्ती स्टेंजा के बाद दोहराई जाती है i गीत में कोई बंधन नहीं होता आप अपने हिसाब से मुक्त छंद बना सकते है iपर गीत का आवश्यक तत्व यह है कि इसमें गेयता होनी चाहिये i जितना सुन्दर गान होगा उतनी ही सुन्दर रचना होगी i गजल की तरह गीत में किसी बह्र या बंधन की अपेक्षा नहीं है i आप् पूर्ण स्वतंत्र है पर जो भी मुक्त छान्द आप रचते है सभी छंद उसी तरह के हों i सादर i
At 6:57pm on November 7, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…
Rahul jee
welcome . Sir.
At 1:14pm on November 7, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…
आदरणीय राहुल डांगी साहब, आपका फ्रेण्ड रिक्वेस्ट मिला. आप अपने प्रोफ़ाइल में अपना हालिया फोटो लगा दें आदरणीय.
सादर
At 7:17pm on October 27, 2014, Rahul Dangi said…
आदरणीय addmin जी विन्रम निवेदन है!

मै पहले की तरह गजल की क्लाश के शुरुआती प्रष्ठ नहीं पढ़ पा रहा हुँ !
आदरणीय मेरी समस्या का समाधान करें!
पुलिस की नौकरी होने की वजह से मैं चर्चा में समय देने से विवश हो जाता हुँ!

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ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

2122 2122 2122 212



काँच के टुकडों में दे दे ज्यों कोई बच्चा मणी

आधुनिकता में कहीं खोया तो है कुछ कीमती।

हुस्न की हर सू नुमाइश़ चल रही है जिस तरह

बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

ताश, कन्चें, गुड्डा, गुड़िया छीन के घर मिट्टी के

लाद दी हैं मासुमों पर रद्दियों की टोकरी।

अब कहाँ हैं गाँव में वें पेड़ मीठे आम के

वे बया के घोसलें, वे जुगनुओं की रौशनी।

ले गयी सारी हया पश्चिम से आती ये हवा…

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Posted on December 17, 2018 at 9:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।

2122 2122 2122 212



रोज के झगड़े, कलह से दिल अब उकता सा गया।

प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।



दफ़्न कर दी हर तमन्ना, हर दफ़ा,जब भी उठी

बारहा इस हादसे में रब्त पिसता सा गया।



रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया

रफ़्ता रफ़्ता हमसे वो ऐसे बिछड़ता सा गया।

चाहकर भी कुछ न कर पाये अना के सामने

हाथ से दोनों ही के रिश्ता फिसलता सा गया।



छोडकर टेशन सनम को लब तो मुस्काते रहें

प्यार का मारा हमारा दिल तड़पता…

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Posted on December 16, 2018 at 8:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल-खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

2122 2122 2122 212

खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

चाहो मत बढकर किसी को चाह की औकात से।

जिसकी ख़ातिर छोड़ दी दुनिया की सारी दौलतें

रख न पाया मन भी मेरा वो दो मीठी बात से ।

दे रहा है तुहमतें उल्टा मुझे ही बेवफ़ा 

बेहया से क्या कहूँ मैं, क्या कहूँ इस जात से।

मैं समझता था मुहब्बत की सभी को हैं तलब

उसको तो मतलब है लेकिन और कोई बात से।

हैं मुसलसल शिद्दतें कुछ यूँ जुदाई की…

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Posted on December 1, 2018 at 3:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल- बूँद भर जल के लिए लिपटा हूँ काँटों की कली से।

2122 2122 2122 2122


इस कदर बेबस हूँ मैं, लाचार हूँ इस ज़िन्दगी से
दोस्तों, मर भी नहीं सकता अभी, अपनी खुशी से।

क्या कहूँ, अपने लिए कुछ, दूसरों के वास्ते कुछ
कायदे तुमने लिखे है सोच बेहद दोगली से।

वक्त उन माँ-बाप को भी दे जरा, तेरे लिए
जो उभर पाये नहीं ताउम्र अपनी मुफ़लिसी से।

इश्क़ के सहरा में 'राहुल' प्यास से बदहाल यूँ हूँ
बूँद भर जल के लिए लिपटा हूँ काँटों की कली से।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Posted on November 25, 2018 at 12:00pm — 6 Comments

 
 
 

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