For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

जाने कब के बिखर गये होते....

= ग़ज़ल =

जाने कब के बिखर गये होते.

ग़म न होता,तो मर गये होते.



काश अपने शहर में गर होते,

दिन ढले हम भी घर गये होते.



इक ख़लिश उम्र भर रही, वर्ना -

सारे नासूर भर गये होते.



दूरियाँ उनसे जो रक्खी होतीं,

क्यूँ अबस बालो-पर गये होते.



ग़र्क़ अपनी ख़ुदी ने हमको किया,

पार वरना उतर गये होते.



कुछ तो होना था इश्क़बाज़ी में,

दिल न जाते, तो सर गये होते.



बाँध रक्खा हमें तुमने, वरना

ख़्वाब…

Continue

Added by डॉ. नमन दत्त on June 19, 2011 at 8:30am — 5 Comments

मै निराश हूँ……………….

कभी तो मेरा प्यार तुम्हे याद आयेगा ,

कभी तो तुम्हारा दिल मेरे लिए तड़पेगा ,

जैसे की आज मै तड़पता हूँ, ,

सुबह को न सही, दोपहर को न सही ,

शाम को न सही ,रात को न सही ,

अपने मिलन की कोइ घडी तो याद आएगी ?

जब कोइ तुम्हारा दिल दुखायेगा ,

तब मेरा प्यार याद आयेगा ,

कभी तो तुम्हारा दिल तड़पेगा ?

जैसे आज मै तड़पता हूँ, ,

तुम मेरे बेगैर एक पल भी नहीं रह पाते थे ,

मुझे न देखने पर बेचैन हो जाते थे ,

अब ओ प्यार कहाँ गया…

Continue

Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on June 18, 2011 at 4:00pm — 4 Comments

रिश्ता-ए-गम





गम तो ग़म हैं ग़म का क्या ग़म आते जाते हैं
किसी को देते तन्हाई किसी को रुलाते हैं
दीपक 'कुल्लुवी' पत्थर दिल है लोग यह कहते हैं
उसको तो यह ग़म भी अक्सर रास आ जाते…
Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on June 18, 2011 at 1:00pm — No Comments

हम भी मुस्कुराएंगे

तुम जो कहते थे दोस्ती है,

हमने सोचा था आजमाएंगे;



तुम हमेशा आसरा दिखाते थे,

सोचा हम भी आशियाँ लुटाएंगे;



तुम किनारे पर मगर कैसे पहुंचे,

हमने सोचा था, दोनों डूब जायेंगे;



तुम जिस गली में रहते हो,

हम वहां अब गश्त न लगायेंगे;



तुम्हारा दामन पाक रहे हरदम,

हम गुनाहों का खाम्याज़ा पायेंगे;



तुमने तोड़े थे जो पेड़ों के पत्ते,

सूख गए हैं, हम उन्हें जलाएंगे;



तुम्हारी जिंदगी, जिंदगी रहे 'नीरज',

अज़ल से पर हम भी न… Continue

Added by neeraj tripathi on June 18, 2011 at 12:59pm — 2 Comments

खुशिओं के फूल

तलाशो तो दो जहाँ खुद में हैं ...

नहीं तो कायेनात भी झूठी है .. !!



भ्रम है कि खुशियाँ सामने किसी मोड़ पे खड़ी हैं

झांको ज़रा जो अपने दिल में ये कलियाँ तो वही खिली हैं



चाहते हो कोई आये और दामन मुस्कानों से भर दे ....

ज़रा गिरेबान में तो देखो ये करम तुमने कितनो पे किया है .....?



आकांक्षाएं अपेक्षाएं बहुत आसान राहें हैं दिल बहलाने कि

ज़रा इनपे उतर के तो देखो दिल से लहू निचोड़ लेती हैं



सुनते आये हैं बुजुर्गो से जो दोगे सो पाओगे

गर… Continue

Added by smriti yadein on June 17, 2011 at 11:30am — No Comments

दस्तक

आदरणीय सम्पादक जी,

सादर नमस्कार.

OBO हेतु मेरी स्वरचित,अप्रकाशित,अप्रसारित एक ताज़ा रचना आपकी सेवा में प्रेषित कर रहा हूँ.कृपया निर्णय से अवगत करावें.

भवदीय--

-- अशोक पुनमिया.

"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""

आहट है किसी की,

कोई दस्तक दे रहा है…

Continue

Added by अशोक पुनमिया on June 16, 2011 at 5:29pm — 6 Comments

जब इच्छा हो मदिरा पी लूँ, प्रतिपग मधुशालायें है.

जब इच्छा हो मदिरा पी लूँ, प्रतिपग मधुशालायें है,

किन्तु सुलभ सुरा का पान, मन का मद भी जाये है.

 

नैनो में प्राण बसे तू ही है मनमीत मेरा,

बनके बजती तू सरगम तू ही है संगीत मेरा,

तुझको दिवास्वप्न में देखूँ , देखूँ भोर के तारों में,

तेरी काया होती निर्मित, हिम पर्वत जलधारो में,

तू ही अतिथि अंर्तमन की दूजा कोई न भाये है

कथित चहुँ लोक में कोटि आकर्षक बालायें हैं

जब इच्छा हो मदिरा पी लूँ, प्रतिपग मधुशालायें हैं

किन्तु सुलभ सुरा…

Continue

Added by इमरान खान on June 16, 2011 at 1:33pm — No Comments

तेरी आँखों से लड़ गयीं आँखें !

तेरी आँखों से लड़ गयीं आँखें !

कितनी उलझन में पड़ गयीं आँखें !!



आँख से जब बिछड़ गयीं आँखें !

आंसुओ में जकड़ गयीं आँखें !!



तू जो आया बहार लौट आयी !

तू गया तो उजड़ गयीं आँखें !!



तेरे आने की इन्तेज़ारी में !

घर की चौखट पे जड़ गयीं आँखें !!



आज फिर ज़िक्र छिड गया उसका !

आज फिर से उमड़ गयीं आँखें !!



रौशनी… Continue

Added by Hilal Badayuni on June 15, 2011 at 10:30pm — 1 Comment

उसके लिए मैंने कई कलाम लिख दिए....

वसीयत मे इमरोज़-ओ-अय्याम लिख दिए,

उसके लिए मैंने कई कलाम लिख दिए.

 

न रंज ही होता न दर्द ओ अलम था,

वो आ गया होता तो बेज़ार कलम था,

एहसान, ये उसी के तमाम लिख दिए.

उसके लिए मैंने कई कलाम लिख दिए.

 

मेरी ख्वाहिशें मुलजिम मेरी रूह गिरफ्तार,

मशकूक कर दिया हालात ने किरदार,

झूटी दफा के दावे मिरे नाम लिख दिए,

उसके लिए मैंने कई कलाम लिख दिए.

 

लिखूं अगर ग़ज़ल तो वो जान-ए-ग़ज़ल है,

अलफ़ाज़-ओ-एहसास मे उसका ही दखल…

Continue

Added by इमरान खान on June 15, 2011 at 6:44pm — 2 Comments

व्यंग्य - बाबागिरी का कमाल

बाबागिरी का कमाल अभी चहुंओर छाया हुआ है। अब लोगों को समझ में आ गया है, गांधीगिरी में भलाई नहीं है, बल्कि बाबागिरी से ही तिजोरी भरी जा सकती है। गांधीगिरी से केवल आत्मा को संतुष्ट किया जा सकता है, मगर बाबागिरी में करोड़ों कमाए बगैर, मन की धनभूख शांत नहीं होती। जब से इस बात का खुलासा हुआ है कि देश का एक बड़ा बाबा महज कुछ बरसों में करोड़पति बन गया तथा अभी अरबों की संपत्ति का और राज खुलना बाकी है, उसके बाद तो हम जैसे लोग बाबागिरी की तिमारदारी में लगे हुए हैं। बरसों कलम खिसते रहो, लेकिन इतना तय है कि इन… Continue

Added by rajkumar sahu on June 15, 2011 at 4:37pm — No Comments

द्रोण दक्ष

जीर्ण है शीर्ण है

मंद है मलिग्न है

सोच से ओत प्रोत

सुस्त है

त्रस्त है

दुर्भिन है

दुर्भिक्ष है

अकाल जब

समक्ष है

कम्पशील

अशील

देह आज

प्राणहीन

रूपविहीन

रिक्त रिक्त कक्ष है

भयतीत

अन्तशील

शिला सम

भारी तन

पंख प्राण

पवन मन

घोर घोर घुर्र घुर्र

अंधकार

तेज़ रार

दीघर कृष्ण पक्ष है

अति दूर

स्वप्न पथ

डगर डगर

अग्नि पथ

समेट… Continue

Added by Raj on June 15, 2011 at 2:00pm — No Comments

नवगीत/दोहा गीत: पलाश... संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत/दोहा गीत:

पलाश...

संजीव वर्मा 'सलिल'

*

बाधा-संकट हँसकर झेलो

मत हो कभी हताश.

वीराने में खिल मुस्काकर

कहता यही पलाश...

*

समझौते करिए नहीं,

तजें नहीं सिद्धांत.

सब उसके सेवक सखे!

जो है सबका कांत..

परिवर्तन ही ज़िंदगी,

मत हो जड़-उद्भ्रांत.

आपद संकट में रहो-

सदा संतुलित-शांत..

 

शिवा चेतना रहित बने शिव

केवल जड़-शव लाश.

वीराने में खिल मुस्काकर

कहता…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 15, 2011 at 1:23pm — 2 Comments

टेसू तुम क्यों लाल हुए......संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत:-

टेसू तुम क्यों लाल हुए?

संजीव वर्मा 'सलिल'

*

टेसू तुम क्यों लाल हुए?

फर्क न कोई तुमको पड़ता

चाहे कोई तुम्हें छुए.....

*

आह कुटी की तुम्हें लगी क्या?

उजड़े दीन-गरीब.

मीरां को विष, ईसा को

इंसान चढ़ाये सलीब.

आदम का आदम ही है क्यों

रहा बिगाड़ नसीब?

नहीं किसी को रोटी

कोई खाए मालपुए...

*

खून बहाया सुर-असुरों ने.

ओबामा-ओसामा ने.

रिश्ते-नातों चचा-भतीजों…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 15, 2011 at 1:00pm — 4 Comments

पिता जी से सुनी एक कहानी.

पिता जी से सुनी एक कहानी.

 

प्राचीन काल में एक ब्रह्मण देवता थे जो अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे.एक दिन वे गंगा स्नान के लिए जा रहे थे , रास्ते में एक गिद्धिनी मिली जो गर्भिणी थी .उसने ब्राह्मण से कहा कृपया मेरा एक उपकार कर दीजिये. गंगा किनारे गिद्धराज एकांत में बैठे होंगें जो मेरे पति हैं, उनसे कह दीजियेगा की आपकी पत्नी आदमी का मांस खाना चाहती है. ब्राह्मण ने देखा गंगा किनारे बहुत सरे गिद्ध बैठे हुए हैं उसमें एक…

Continue

Added by R N Tiwari on June 15, 2011 at 9:18am — No Comments

यहां होता है तालाब का विवाह !

- 80 बरस बाद दोहराई गई परंपरा

- केरा गांव के लोगों का अनूठा कार्य

- तालाबों के अस्तित्व को बचाने की मुहिम

- जल संरक्षण की दिशा में ग्रामीणों का अहम योगदान

- ‘जल ही जीवन है’, ‘जल है तो कल है’ का संदेश

              

भारतीय संस्कृति में संस्कार का अपना एक अलग ही स्थान है। सोलह संस्कारों में से एक होता है, विवाह संस्कार। देश-दुनिया में चाहे कोई भी वर्ग या समाज हो, हर किसी के अपने विवाह के तरीके होते हैं। मानव जीवन में वंश वृद्धि के लिए भी विवाह का महत्व सदियों से कायम…

Continue

Added by rajkumar sahu on June 15, 2011 at 1:52am — 1 Comment

बरगद का इक बूढ़ा पेड़

 

खिड़की खुलते ही नज़र आता था सोसायटी के पीछे खड़ा 

बरगद का इक बूढ़ा पेड़  

हर मौसम में एक नयी पोशाक पहने |

 

शाखें हिलाकर हाथ की तरह  

जाने किस किसको बुला लिया करता था,

अनजान से चेहरे आते

और कुरेदकर लिख जाते

अपनी ख्वाहिशें और ग़म उसके तनों पर

चाँद जब परेड करता रात…

Continue

Added by Veerendra Jain on June 14, 2011 at 11:50pm — 7 Comments

पीने की और जिद न करो तुम नशे में हो !

पीने की और जिद न करो तुम नशे में हो !

अब मैकदे से घर भी चलो तुम नशे में हो ! !



ये क्या की सिर्फ मुझसे कहो तुम नशे में हो !

तुम भी मुझे पिलाके कहो तुम नशे में हो !!



पीते हो दस्ते ग़ैर से क्यों बज्मे ग़ैर में !

छोड़ो उठो यहाँ से चलो तुम नशे में हो !!



उतरेगा जब नशा तो मुझे भूल जाओगे !

मत वादा ऐ विसाल करो तुम नशे में हो… Continue

Added by Hilal Badayuni on June 14, 2011 at 10:00pm — 2 Comments

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - छग में नक्सली हमले में जवान शहीद हो रहे हैं।

पहारू - यही हाल रहा तो, धान का कटोरा, खून का कटोरा बनते देर नहीं लगेगी।





2. समारू - देश की मिनिस्ट्री पर छग के बाबू भारी पड़ रहे हैं।

पहारू - भारीपन का जलवा अभी दिखा कहां है।





3. समारू - दिल्ली में नक्सली समस्या पर मंथन हो रहा है।

पहारू - फिर दोहराया जाएगा, कड़े कदम उठाए जाएंगे।





4. समारू - बाबा रामदेव ने दो सौ बरस जीने का दावा किया था।

पहारू - नौ दिनों में तो दावे की हवा… Continue

Added by rajkumar sahu on June 14, 2011 at 3:00pm — No Comments

आंच में ही फूलता है

आज उमस में शरीर से कुछ यूँ पसीना बहता है,

जैसे तेरी आँखों से ऐतबार बहा करता था;

मुहं से कुछ न बोलते थे लफ़्ज़ों से लेकिन,

प्यार का इक हल्का सा इकरार बहा करता था;



आज बीती बातों की बूढी कहानी हो गयी है,

लफ़्ज़ों की मासूमियत भी लफ़्ज़ों में ही खो गयी है;

ये पसीना बहते बहते आज मुझसे कह रहा है,

तुम जिसे समझे मोहब्बत, मेहरबानी हो गयी है;



हमने कितना कुछ कहा था, तुमने कितना कुछ सुना था,

फिर भी क्यों पिछला दिखाने, तुमने लम्हा वो चुना था;

उँगलियों… Continue

Added by neeraj tripathi on June 14, 2011 at 11:15am — No Comments

कर दिये फौत ये अरमान हमारे तुमने.......

पंछी ए ख्वाब के पर काट के सारे तुमने,

कर दिये फौत ये अरमान हमारे तुमने।

बेकरारी में ये मदहोश मेरी धड़कन है,

अपना साथी तो फकत टूटा हुआ दरपन है,

बेसदा मेरा तराना हुये अल्फाज भी गुम,…

Continue

Added by इमरान खान on June 13, 2011 at 4:00pm — 1 Comment

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service