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जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - कामनवेल्थ गुरू सुरेश कलमाड़ी, जांच एजेंसी के सामने मुंह नहीं खोल रहे हैं।

पहारू - मगर, ए. राजा तो जुबान खोलकर सरकार का सिरदर्द बन गया है।





2. समारू - बिलासपुर में आईटीआई का पर्चा लीक होने की खबर है।

पहारू - छग के लिए पर्चा लीक होना कौन सी बड़ी बात है।





3. समारू - ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने सूत की माला से जूता साफ किया।

पहारू - नेता तो जनता को बरसों से जूते के ‘तलवे’ नीचे रखते आ रहे हैं।



4. समारू - छग सरकार ने अब शहरों…

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Added by rajkumar sahu on July 27, 2011 at 9:00pm — No Comments

एक लड़की को याद करता हूँ !!

शहर के किसी कालेज की

एक लड़की को याद करता हूँ !
सारे काम उसकी तस्वीर
देखने के बाद करता हूँ !


लाइब्रेरी,स्टैंड,कैन्टीन,कैम्पस में
जब वो न दिखे
थक जाऊँ सीढियाँ चढ़ते-उतरते मगर…
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Added by Ritik 'Hatif' on July 27, 2011 at 8:30pm — 4 Comments

लक्षलिंग में चढ़ता है एक लाख चावल !

छत्तीसगढ़ की काशी के नाम से विख्यात लक्ष्मणेश्वर की नगरी खरौद में सावन सोमवार पर श्रद्धालुओं का तांता लगता है। भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन के लिए प्रदेश से अनेक जिलों के अलावा दूसरे राज्यों से भी दर्शनार्थी भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां सावन सोमवार के दिन सुबह से श्रद्धालुओं की लगी कतारें, देर रात तक लगी रहती हैं और भक्तों के हजारों की संख्या में उमड़ने के कारण मेला का स्वरूप निर्मित हो जाता है। भगवान लक्ष्मणेश्वर स्थित ‘लक्षलिंग’ में एक चावल चढ़ाया जाता है और श्रद्धालुओं में असीम…

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Added by rajkumar sahu on July 27, 2011 at 5:12pm — No Comments

क्या है वो.....

हर प्रश्न का हल भी वो है

और

जटिल प्रश्नों से भरी उलझन भी वो है........

क्या है वो.....

जीवन की परिभाषा वो

मृत्यु की परछाई वो

जीवन तो पहले भी था

अब जीवन की सार्थकता भी वो है.......

क्या है वो......

बिंदिया की चमक वो

कंगन की खनक वो

शृंगार तो सजाता पहले भी था

अब शृंगार की चमक भी वो है

क्या है वो.....

दिल की धड़कन भी वो

चेहरे की ख़ुशी भी वो

ख़ुशी पहले भी थी

पर ख़ुशी की खनक भी वो

क्या है वो......

एक…

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Added by Yogyata Mishra on July 27, 2011 at 5:00pm — 6 Comments

पिघलता पत्थर

अमावस सी ज़िंदगी में

अचानक ही 
छिटक गयी चाँदनी 
एक बादल की ओट से …
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Added by sangeeta swarup on July 27, 2011 at 4:00pm — 16 Comments

व्यंग्य - आओ धर्मशाला में उम्र गुजारें !

जैसा नाम ही है, धर्मशाला। देखिए, इस लिहाज से मानव धर्म का कुछ तो काम होगा ही। अब यहां राजनीतिक गोटी बिछने वाली धर्मशाला की बात कर लें, क्योंकि इन दिनों देश में धर्मशाला की नई वेरायटी पर बहस शुरू हो गई है और ‘राजनीतिक धर्मशाला’ की खासियत मुझे पता नहीं है, क्योंकि कभी मेरा पाला नहीं पड़ा है। वैसे भी इस धर्मशाला में हर समय जिस तरह से हुज्जतबाजी मची रहती है, उसके बाद मेरा मन नहीं कहता कि चले जाओ और अपने को कोसने के काबिल बनाओ।

पिछले दिनों जिन्न की बोतल से ‘राजनीतिक धर्मशाला’ सामने आई। एक… Continue

Added by rajkumar sahu on July 27, 2011 at 12:05pm — No Comments

पावन सोमारी

सखी पावन सोमारी है सावन की .

बेल की पाती -कपूर की बाती.

बेला है थाली सजावन की.

सखी पावन सोमारी है सावन की .

 

सावन में शंकर को दूधो नहाओ.

रोरी और चन्दन का टीका लगाओ.

महीना है शम्भु मनावन की.

सखी पावन सोमारी है सावन की .

 

 …

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Added by satish mapatpuri on July 26, 2011 at 11:00pm — No Comments

धारावाहिक यात्रा-संस्मरण "चार-गाम-यात्रा" (All rights are reserved.)

हज़रत निज़ामुद्दीन-बैंगलोर राजधानी ऐक्स्प्रेस में दो रातों तक कुछ नन्हे-मुन्ने कॉकरोचों से दो-दो हाथ करते हुए 30 अक्टूबर की सुबह जब हम बैंगलोर सिटी जंक्शन पहुंचे तो दिन निकल चुका था । ट्रेन रुकने से पहले ही हमें उन क़ुलियों ने घेर लिया जो चलती ट्रेन में ही अन्दर आ गये थे । सामान उठाकर ले चलने से लेकर होटल दिलाने, लोकल साइट-सीइंग और मैसूर-ऊटी तक का टूर कराने के ऑफ़र्ज़ की बरसात होने लगी । मगर हम तो काफ़ी जानकारी पहले से ही इकट्ठा करके पूरी तैयारी से आये थे, इसलिये क़ुली साहिबान की दाल नहीं…

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Added by moin shamsi on July 26, 2011 at 1:34pm — 15 Comments

क्या इसी को मुहब्बत कहते है

क्या इसी को मुहब्बत कहते हैं

जब हम बैचेन से रहते हैं

अक्सर कुछ कहने की चाह मे

सपनों मे खोये रहते हैं

क्या इसी को मुहब्बत कहते हैं

 

उनकी एक झलक पाने के लिए

हम हर दिन राहों मे इंतजार करते हैं

न जाने क्यों हम कुछ कहने से डरते हैं

क्या इसी को मुहब्बत कहते हैं

 

अक्सर वो सपनों में आती है

आँखें खोलूँ तो न जाने कहाँ चली जाती है

सिर्फ इन आँखों को उसकी ही सूरत भाती है

क्या इसी…

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Added by Bishwajit yadav on July 26, 2011 at 10:30am — 6 Comments

संस्मरण (Reminiscence)

अभी कुछ दिनो पहले

बचपन के बीत जाने के बाद 
एक खेल खेला करते थे...
नाम छुपा कर अधरों पर
एक फूल संभाले हाथों   मे
बडी उम्मीद के साथ 
पंखुरियाँ तोड़ते हुए कहना,
'He loves me, he loves me not'
हारना  तो एक फूल और,
जीतते तो अनजाने ही 
रंग गुलनार!
तब कब समझा और कब जाना
के हर एक हासिल पर यूं  ही
सौ- सौ कुर्बानियाँ होंगी
बिखरे लम्हों…
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Added by Aradhana on July 25, 2011 at 7:30pm — 16 Comments

उम्र के इस पड़ाव पर

.

उम्र के इस पड़ाव पर

खड़ा हूँ ये सोच कर

क्या खोया क्या पाया

समझूँ सबकुछ देख कर

वही पर हूँ

जहाँ पर था

उस समय भी

मैं ही था

आज भी हूँ

उस समय

मैं बालक था

लड़कपन और ठिठोली करता

आज भी हूँ

वही बालक

मगर अंतर हैं

तब वो पुत्र था

आज ये पिता है.





२.

मैं स्कूल नहीं जाऊँगा ,

जब ये शब्द मुझे याद आते हैं

कसम से

बहुत याद…

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Added by Rash Bihari Ravi on July 25, 2011 at 7:30pm — 4 Comments

सृष्टि का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी मनुष्य ,

सृष्टि का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी मनुष्य ,

अपने भाग्य एवं भविष्य का निर्माता वो ,
अक्लमंदी के प्रदर्शन में प्रकृति के बिरोध करे ,
जिसे हम विकास कहते हैं वो विनाश का द्वार हैं ,
हम प्राकृतिक संपदाओं को जो नष्ट कर रहे हैं ,
धारा प्रदूषित होने से हम मृत्यु को वरण कर रहे हैं ,
हर कोई जाने-अनजाने में खुद को मारना चाहता हैं ,
नहीं तो धूम्रपान मद्यपान को वो वरण नही करता…
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Added by Rash Bihari Ravi on July 25, 2011 at 7:00pm — 2 Comments

पहला प्यार

यूँ ज़िन्दगी में आया पहला प्यार

जैसे रेत की तपन में पड़ गई सावन की फुहार

 

तुमको देखा तो लगा की बस यहीं हैं

जिस पर करना हैं अपना सब कुछ निसार

 

घंटो छत पर कड़ी धुप में खड़े रहते थे हम

इस इंतज़ार में की बस एक बार हो जाये तेरा…

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Added by Vasudha Nigam on July 25, 2011 at 3:37pm — 4 Comments

मुक्तिका संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:     - संजीव 'सलिल'


*
नैन
बैन.

नहीं
चैन.

कटी
रैन.

थके
डैन.

मिले
फैन.

शब्द
बैन.

चुभे
सैन.

*

16 december 2010

Added by sanjiv verma 'salil' on July 25, 2011 at 8:46am — 3 Comments

ग़ज़ल : लाश तेरी यादों की

लाश तेरी यादों की मैं न छोड़ पाता हूँ

रोज दफ़्न करता हूँ रोज खोद लाता हूँ



जो रकीब था कबसे बन गया खुदा मेरा

रोज सर कटाता हूँ रोज सर झुकाता हूँ…



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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 24, 2011 at 3:30pm — 3 Comments

बरखा बहार आयी

बरखा  बहार आयी :-

                                              याद तुम्हारी सतायेंगी
                                              जब बुँदे बरसेंगी सावनकी 
                                              आसूओंकी धारओंका 
                                              साथ निभाएंगी…
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Added by Mohini Dhawade on July 24, 2011 at 3:18pm — No Comments

ग़ज़ल

             ग़ज़ल 



लगती है बाज़ार गुज़रते हैं आदमीं 

हर रोज़ बिकने खड़े होते हैं आदमीं 



उठते हैं हर सुबह जाने क्या सोचकर 

इस पेट के आगे पर झुकते  हैं आदमीं 



तपती दोपहरी में जब लगती है प्यास 

बुझे ए कैसे यही सोचते हैं आदमीं …



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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on July 24, 2011 at 9:47am — 2 Comments

मुक्तिका: जानकर भी... --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:                                                                                              

जानकर भी...

संजीव 'सलिल'

*

रूठकर दिल को क्यों जलाते हो?

मुस्कुराते हो, खूब भाते हो..



एक झरना…

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Added by sanjiv verma 'salil' on July 24, 2011 at 9:00am — 1 Comment

घनाक्षरी सलिला : छत्तीसगढ़ी में अभिनव प्रयोग. संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी सलिला :

छत्तीसगढ़ी में अभिनव प्रयोग.

संजीव 'सलिल'

*

अँचरा मा भरे धान, टूरा गाँव का किसान, धरती मा फूँक प्राण, पसीना बहावथे.

बोबरा-फार बनाव, बासी-पसिया सुहाव, महुआ-अचार खाव, पंडवानी भावथे..

बारी-बिजुरी बनाय, उरदा के पीठी भाय, थोरको न ओतियाय, टूरी इठलावथे.

भारत के जय बोल, माटी मा करे किलोल, घोटुल मा रस घोल, मुटियारी भावथे..

*

नवी रीत बनन दे, नीक न्याब चलन दे, होसला ते बढ़न दे, कउवा काँव-काँव.

अगुवा के कोचिया, फगुवा के लोटिया, बिटिया…

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Added by sanjiv verma 'salil' on July 22, 2011 at 8:00am — 5 Comments

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - छग के जगदलपुर में एसीबी के शिकंजे में आए करोड़पति अफसर।

पहारू - देखते रहो, कुछ और धनपशु का अवतार आने वाले दिनों में होगा।





2. समारू - वारदात को अंजाम देने के बाद नक्सली पश्चाताप कर रहे हैं।

पहारू - उनकी घर वापसी ही पश्चाताप हो सकता है।





3. समारू - वोट के बदले नोट मामले में परत-दर-परत खुलासा हो रहा है

पहारू - अभी तो सूत्रधार का सींखचों के पीछे आना बाकी है।





4. समारू - छग के एसपीओ बेरोजगार नहीं होंगे।

पहारू - ऐसा होता… Continue

Added by rajkumar sahu on July 21, 2011 at 10:35pm — No Comments

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