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October 2011 Blog Posts

श्रधांजली ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह



ग़ज़लों का बादशाह, नज़्मो का सौदागर गया,

एक उसका जाना, करोड़ो को तनहा कर गया....



किनारे जिसने लगाया दर्दमंदो को सहारा देकर,

कागज़ की उस कश्ती में आज पानी भर गया.....



अपने होठों से छुए जिसने जज़बात हजारों के,

तरन्नुम का वो जादूगर करके आंख तर गया.....



अब न वो गायकी होगी, न वैसी महफिले होगी,

शायरी पसंदों का ख्वाब जैसे कोई बिखर गया...



न शेर कोई लब पर, न ग़ज़ल कोई…
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Added by Harjeet Singh Khalsa on October 12, 2011 at 11:30pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जीवन-सार --- (छंद - घनाक्षरी) --- सौरभ

 

नाधिये जो कर्म पूर्व, अर्थ दे  अभूतपूर्व

साध के संसार-स्वर, सुख-सार साधिये ॥1॥

साधिये जी मातु-पिता, साधिये पड़ोस-नाता

जिन्दगी के आर-पार, घर-बार बाँधिये ॥2॥

बाँधिये भविष्य-भूत, वर्तमान,  पत्नि-पूत

धर्म-कर्म, सुख-दुख, भोग, अर्थ राँधिये ॥3॥

राँधिये आनन्द-प्रेम, आन-मान, वीतराग

मन में हो संयम, यों, बालपन नाधिये  ॥4॥

***************

हो धरा ये पूण्यभूमि, ओजसिक्त कर्मभूमि

विशुद्ध हो विचार से, हर व्यक्ति हो खरा  ||1||

हो खरा…

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Added by Saurabh Pandey on October 12, 2011 at 11:00pm — 18 Comments

वो क्यूँ चुप हैं जिन्हें गुमाँ है ...

एक बार मैं ढूंढने को चला वो लोग जिन्हें है ये गुमाँ

सारे जहाँ से अच्छा है हिन्दोस्ताँ....



मैं हूँ विदर्भ का इक किसान

संग पत्नी दो बच्चों की जान

झेला सूखा और अकाल

उस पर पड़ी कर्जे की मार

ना ज़मीन बची ना मकान

करता हूँ ख़ुदकुशी देता हूँ अपनी जान ...

अब मेरा उनसे है सवाल

जो ड्राइंग रूम में बैठकर

बातें करें दें

इंडिया शाइनिंग की मिसाल



वो क्यूँ चुप थे जिन्हें ये गुमाँ है

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ है

वो क्यूँ चुप हैं… Continue

Added by Veerendra Jain on October 12, 2011 at 6:00pm — No Comments

ग़ज़ल :- कुछ टूट रहा टूटती आवाज़ की तरह

ग़ज़ल :- कुछ टूट रहा टूटती आवाज़ की तरह  
 …
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Added by Abhinav Arun on October 12, 2011 at 8:09am — 9 Comments

ग़ज़ल :- आँखों में गड़ते हैं टूटे रिश्तों के टुकड़े

 
ग़ज़ल :- आँखों में गड़ते हैं टूटे रिश्तों के टुकड़े
 …
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Added by Abhinav Arun on October 12, 2011 at 7:52am — 5 Comments

तो कोई प्यार के क़ाबिल न होता

जो सीने में धड़कता दिल न होता 
तो कोई प्यार के क़ाबिल न होता॥ 

अगर सच मुच वह होता मुझ से बरहम 
मिरे दुःख में कभी शामिल ना होता॥ 

किसी का ज़ुल्म क्यूँ मज़लूम सहता 
अगर वह इस क़दर बुज़दिल न होता॥

नज़र लगती सभी की उस हसीं को
जो उसके गाल पर इक तिल न होता॥ 

ज़मीर उसका अगर होता न मुर्दा 
तो इक क़ातिल कभी क़ातिल न होता॥

:सिया: महफ़िल में रौनक़ ख़ाक होती 
अगर इक रौनक़े महफ़िल न होता॥

Added by siyasachdev on October 11, 2011 at 10:29pm — 4 Comments

दस्तक

कब से देखा है,

याद भी नही तब से देखा है,
इस मौसम को आते हुए
 
एक पहचान सी है
एक मरासिम भी कायम है
फिर भी नायाब सा
किसी हसीन अजनबी की तरह
जेरे लब एक मुस्कुराहट छोड जाता  है
जब भी आता है 
 
मौसमों की भीड़ से गुज़र कर 
अचानक किसी सुबह
हरशिंगार की खुशबू से 
यूँ मन को भिगोता है  
कि फिर किसी मौसम का 
रंग नही चढ़ता…
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Added by Aradhana on October 11, 2011 at 9:00am — 5 Comments

मुक्तिका : भजे लछमी मनचली को.. संजीव 'सलिल'

मुक्तिका :

भजे लछमी मनचली को..

संजीव 'सलिल'

*

चाहते हैं सब लला, कोई न चाहे क्यों लली को?

नमक खाते भूलते, रख याद मिसरी की डली को..



गम न कर गर दोस्त कोई नहीं तेरा बन सका तो.

चाह में नेकी नहीं, तू बाँह में पाये छली को..



कौन चाहे शाक-भाजी-फल  खिलाना दावतों में


चाहते मदिरा पिलाना, खिलाना मछली तली को..



ज़माने में अब नहीं है कद्र फनकारों की बाकी.

बुलाता बिग बोंस घर में चोर डाकू औ' खली को.. …

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Added by sanjiv verma 'salil' on October 11, 2011 at 1:23am — No Comments

वी मिस यू जगजीत सिंह जी

 

 

ग़ज़ल के बादशाह श्री जगजीत सिह के निधन की खबर सुनते ही आँखे भर आई है. जगजीत सिह जी वो थे जिन्होने मुझ जैसे कई लोगो को ग़ज़ल से परिचित कराया है, जैसे संगीत और शायरी का साथ है, शायरी और ग़ज़ल है, वैसे ही ग़ज़ल और जगजीत सींग जी है, उनकी आवाज़ मे एक जादू था, रागो की आमिजीश के साथ उनकी ग़ज़ले दिल मे उतर जाती थी, दिल को छू जाती थी आज उनके लिए मुझे किसी…

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Added by Tapan Dubey on October 10, 2011 at 1:30pm — 1 Comment


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - (तरही मुशायरा -15 में सम्मिलित)

 

ज़िन्दग़ी का रंग हर स्वीकार होना चाहिये

जोश हो, पर होश का आधार होना चाहिये ||1||



एक नादाँ आदतन खुशफहमियों में उड़ रहा

कह उसे, उड़ने में भी आचार होना…

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Added by Saurabh Pandey on October 10, 2011 at 9:46am — 11 Comments

व्यंग्य - रावण के दर्द को समझिए

हर साल न जाने कितनी जगहों में रावण का दहन किया जाता है और खुशियां मनाते हुए पटाखे फोड़े जाते हैं, मगर रावण के दर्द को समझने की कोई कोशिश नहीं करता। अभी कुछ दिनों पहले जब दशहरा मनाते हुए रावण को दंभी मानकर जलाया गया, उसके बाद रावण का दर्द पत्थर जैसे सीने को फाड़कर बाहर आ गया। रावण कहने लगा, उसकी एक गलती की सजा कब से भुगतनी पड़ रही है। गलती अब प्रथा बन गई है और पुतले जलाकर मजे लिए जा रहे हैं। सतयुग में की गई गलती से छुटकारा, कलयुग में भी नहीं मिल रहा है।

रावण ने अपना संस्मरण याद करते हुए कहा…

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Added by rajkumar sahu on October 10, 2011 at 1:51am — 2 Comments

व्यंग्य - भ्रष्टाचार की आप बीती

देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार के बारे में मैं सोच ही रहा था कि अचानक भ्रष्टाचार प्रगट हुआ और मुझे अपनी आप-बीती सुनाने लगा। मुझे लगा, भ्रष्टाचार जो कह रहा है, वह अपनी जगह पर सही है। भ्रष्टाचार कह रहा था कि देश में काला पैसा बढ़ रहा है और कमीशनखोरी हावी हो रही है, भला इसमें मेरा क्या दोष है ? दोष तो उसे देना चाहिए, जो भ्रष्टाचार के नाम को बदनाम किए जा रहे हैं। केवल भ्रष्टाचार पर ही उंगली उठाई जाती है, एक भी दिन ऐसा नहीं होता कि कोई भ्रष्टाचारियों पर फिकरी कसे और देश के माली हालात के लिए जिम्मेदार… Continue

Added by rajkumar sahu on October 8, 2011 at 11:20pm — No Comments

एक पीड़ा

भारत सरकार की नई आर्थिक नीति के तहत् विगत वर्षों में जिस नीति को जारी किया गया था, उसका परिणाम कुछ ऐसा ही दिखना था. भारत सरकार ने उन क्षेत्रों में विशेष तौर पर भारी मात्रा में पैसों को झोंक दिया है, जिस क्षेत्र में नक्सलवादियों ने अपना फन फैलाया है, परन्तु उन क्षेत्रों में आने वाले पैसों को कम कर दिया है, या नहीं के बराबर दिया है अथवा घोटालों की भेंट चढ़ गया है, जिन क्षेत्रों में या तो नक्सलवादी नहीं हैं अथवा किसी किस्म का आन्दोलन नहीं हो रहा है अथवा जागरूकता की कमी है. बस्तर के जंगलों में…

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Added by Rohit Sharma on October 7, 2011 at 1:30pm — No Comments

बेवफाई भी ज़रूरी है वफ़ा से पहले !!

मर्ज़  जिस  तरह  से  लाजिम  है  दवा  से  पहले  !

बेवफाई  भी  ज़रूरी  है  वफ़ा  से  पहले  !!
ख्वाहिश  ऐ   दीद  है  यूँ   दिल  को  क़ज़ा  से  पहले  !
तुमसे  मिलने  की  तमन्ना  है  खुदा  से  पहले  !!
आरजू  तो  है  चरागों   को  जलाने  की  मगर  !
मुझको  मालूम  तो  करने  दो  हवा  से  पहले  !!
जब  मेरा  साथ  निभाना  ही  नहीं  था  तुमको  !
क्यों  दिए  मुझको  मुहब्बत  में  दिलासे  पहले  !!
सिर्फ  खिलअत  से  नहीं…
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Added by Hilal Badayuni on October 7, 2011 at 12:30pm — 3 Comments

हम तो बेघर हैं किधर जायेगे

जिनके घर हैं वो तो घर जायेगे
हम तो बेघर हैं किधर जायेगे

ये खुला आसमाँ हैं छत मेरी
इस ज़मीन पर ही पसर जायेगे

हम तो भटके हुए से राही है
क्या खबर है की किधर जायेगे

आपके ऐब भी छुप जायेगे
सारे इलज़ाम मेरे सर जायेगे

नाम लेवा हमारा कौन यहाँ
हम तो बेनाम ही मर जायेगे

न कोई हमनवां न यार अपना
हम तो तनहा है जिधर जायेगे

ए 'सिया' मत कुरेद कर पूछो
फिर दबे ज़ख्म उभर जायेगे

Added by siyasachdev on October 6, 2011 at 10:05pm — No Comments

अजब दशहरा

गजब दशहरा आया रे

अजब दशहरा आया रे 
नयी नयी खुशिया लाया रे 
देख दशहरा आया रे ......
चहु ओर है धूम मची 
शोर मचे है गली गली 
बच्चो के संग बूढों का
अजब मेल यह लाया रे
देख दशहरा आया रे...
सब झूमे है मस्ती में 
खुशियों की इन बस्ती में 
सब रंगे है एक रंग में
प्रेम का रंग ये लाया रे 
देख दशहरा आया रे
अजब दशहरा आया रे 
ढेरो खुशिया लाया…
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Added by Yogyata Mishra on October 6, 2011 at 9:02pm — No Comments

ग़ज़ल :- झूठ जब भी सर उठाये वार होना चाहिए

ग़ज़ल :-  झूठ जब भी सर उठाये वार होना चाहिए
 
झूठ जब भी सर उठाये वार होना चाहिए ,…
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Added by Abhinav Arun on October 6, 2011 at 7:23pm — 8 Comments

एक कविता: बाजे श्वासों का संतूर..... संजीव 'सलिल

बृहस्पतिवार, ६ अक्तूबर २०११

एक कविता:

बाजे श्वासों का संतूर.....

संजीव 'सलिल'

*

मन से मन हिलमिल खिल पायें, बाजे श्वासों का संतूर..

सारस्वत आराधन करते, जुडें अपरिचित जो हैं दूर.

*

कहते, सुनते, पढ़ते, गुनते, लिखते पाते हम संतोष.

इससे ही होता समृद्ध है, मानव मूल्यों का चिर…
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Added by sanjiv verma 'salil' on October 6, 2011 at 10:36am — No Comments

क्वार में

नव उत्सव

हमारे आँगन आना |
खुशियों की गमक को 
चेहरे की चमक को 
विस्तार दे जाना |
उमंगों के मेलों को 
चाहत के रेलों को
तुम साथ लाना |
अमावस की रात को 
दीयों की पांत को 
नया आलोक दे जाना |
पटाखों की लड़ियों को 
बच्चों की फुलझडियों को 
नव उल्लास दे जाना |
हल जोतते भोला को 
खड़ी फसलों को 
नयी मुस्कान दे जाना |
पडौस…
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Added by mohinichordia on October 5, 2011 at 4:13pm — 2 Comments

लड़ता रहा कबीर..

मन से फक्कड़ संत वह, तन से रहा फ़कीर.

खड़ीं सामने रूढ़ियाँ, लड़ता रहा कबीर..


तेरह-ग्यारह नाप के, रचे हजारों छंद.
दोहे संत कबीर के, करे बोलती बंद..


पूजे लोग कबीर को, ले अँधा विश्वास..
गड़े कबीरा लाज से, दोहे हुए उदास..


थोडा बोलो चुप रहो, सुनो लगा कर कान.
छोटे मुख मै क्या कहूं, कह गए लोग सुजान..


कथ्य कला काया कसक, कागज़ कलम किताब.
सब मिल कर पूरा करे, ज्ञानदेव का ख्वाब..

अविनाश बागडे.

Added by AVINASH S BAGDE on October 5, 2011 at 3:30pm — 5 Comments

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