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February 2011 Blog Posts (125)

तुम्हारी याद में.........

तुम्हारी याद में.........

अनमोल मोहब्बत जब रुसवा होती है

उर के बेदर्द खौफ से जिंदगी जुदा होती है

मौत से भी गहरी जिंदगी हो जाती है 

जब वफ़ा बेवफा हो जाती है 

दिशा देना चाहता हूँ आज मै जिंदगी को, 

भूला नहीं पाता हूँ कुछ की तेरी बंदगी को,

इस पल याद करता हूँ मै बीते उस पल को,

आपके आस्तित्व से धड़कते हुए उस दिल को,
तुम मुझमे आज भी ज़िंदा हो छोड़ तुम मुझे दिए तो क्या,
जिंदगी रोज़ खफा होती है नहीं बस आती मौत तो करे…
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Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on February 24, 2011 at 9:30am — 1 Comment

कुत्ते हैं आवाम का...

(आज देश की हालत ये है कि हर नुक्कड़ पर के आवारा दोपाये अपने आपको नेता समझ बैठे हैं, देश के शीर्ष भवन  में बैठ ये विभिन्न सुरों में भौंकते हैं |  इस तस्वीर को देश समझें और टूटते झोपडी को देश का संसद...

इस कविता/व्यंग्य का भाव दोपायों के लिए है | चौपायों से क्षमाप्रार्थी हूँ उनकी इस…
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Added by Shashi Ranjan Mishra on February 24, 2011 at 8:50am — No Comments

एक गीत अनोखा लायी हूँ...

 

HIV POSITVE KIDS 

 

जब जी चाहे तब गा लेना ,एक गीत अनोखा  लायी हूँ..

हर भाव को क्षण में जी लेना ,संगीत अनोखा लायी हूँ..
जो पीर से व्याकुल कर देगा वो दर्द अनोखा लायी…
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Added by Lata R.Ojha on February 24, 2011 at 2:33am — 19 Comments

क्या पाया तुमने

वो झूठी झूठी सी खुशी

वो बनावती सी हँसी

वो जबरदस्ती का रोना

कलाकारी है वो दुखी होना

अगर तुम यही कर सके

तो क्या पाया तुमने



वो मोहोताज संतुष्टि

वो सोच कर चुप रहना

वो लिखा हुआ सा कहना

वो भाव के विपरीत बहना

अगर ऐसे रुके हो तुम 

तो क्या पाया तुमने



वो दूसरों से पूछना खासियत अपनी

वो अपनी सफलता पर यकीन ना होना

वो मजाक जो हँसी के इन्तजार में रहता

वो शोक जो है अब जुबान से बहता

अगर ऐसे उलझे हो तुम

तो क्या पाया… Continue

Added by Bhasker Agrawal on February 23, 2011 at 7:00pm — 2 Comments

कभी भी तम नहीं होता

रगों में गम नहीं होता, ये चेहरा नम नहीं होता;
तड़पती झील के आँचल में पानी कम नहीं होता;
जो बजती रागिनी थी उन हवाओं कि दिशाओं से;
अभी भी सत्य ही होता, महज़ ये भ्रम नहीं होता;
ज़रा सा उस समय मुहं मोड़ कर जो तुम नहीं मुड़ते;
विवशताओं की घाटी में कभी भी तम नहीं होता.

Added by neeraj tripathi on February 23, 2011 at 3:40pm — 2 Comments

दोहा सलिला: देख दुर्दशा देश की संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला: 

 

देख दुर्दशा देश की

 

संजीव 'सलिल'

*

देख दुर्दशा देश की, चले गये जो दूर.

उनसे केवल यह कहूँ, आँखें रहते सूर..



देश छोड़ वे भी गये, जिन्हें प्रगति की चाह.

वाह मिली उनको बहुत, फिर भी भरते आह..



वसुधा जिन्हें कुटुंब…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 23, 2011 at 12:28pm — 3 Comments

ek ghazal

 
खोट के सिक्के चलाये जा रहे है 
लोग बन्दर से नचाये जा रहे है
 
आसमां में सूर्य शायद मर गया है
मोमबत्ती को जलाये जा रहे है
 
देखिये तांडव यहाँ पर हो रहा है
रामधुन क्यों गुनगुनाये जा रहे है
 
जो पिघल कर मोम से बहने लगे है
लोग वो काबिल  बताये जा रहे है
 
आप को वो स्वप्नजीवी मानते है
स्वप्न अब रंगीन लाये जा रहे…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 22, 2011 at 10:18pm — 1 Comment

नत्था जैसी हो गई छत्तीसगढ़ के अन्नदाताओं की हालत

छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में अगर अन्नदाता आत्महत्या करने लगे तो, सोचा जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है। छत्तीसगढ़ जहां की अधिकांश आबादी कृषि कार्य पर निर्भर है और इस कृषि के काम को करने वाला टाटा या अम्बानी जैसे उद्योगपति नहीं बल्कि, एक आम किसान है, जो दिन रात एक करके फसल को तैयार करता है, उसे आज सरकारी मदद के आभाव में कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने के लिए… Continue

Added by rajendra kumar on February 22, 2011 at 8:30pm — No Comments

कांग्रेसी नेताओं में छिड़ी आपसी जंग

छत्तीसगढ़ में संजारी बालोद उपचुना व में मिली करारी हार के बाद कांग्रेसी नेताओं के बीच आपसी जंग तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष धनेंद्र साहू पर वार करते हुए बालोद प्रचार में नहीं बुलाने की बात दोहराई है। पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रदेश प्रभारी वी. नारायण सामी को पांच बिन्दुओं पर पत्र भेजकर सफाई दी है। इसमें उन्होंने चुनाव प्रचार को लेकर कांग्रेस… Continue

Added by rajendra kumar on February 22, 2011 at 9:30am — 1 Comment

लंगड़े कुत्ते का भाषण

बड़े-बड़े दरबारों में दुम हिलाया है

मालिकों के मलाईदार जूठे को खाया है

भौंक-भौंक कर किया कपालभाति

कभी लेट कर किया वज्रासन…

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Added by Shashi Ranjan Mishra on February 22, 2011 at 8:00am — 9 Comments

दोहा सलिला मुग्ध संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला मुग्ध  ***संजीव 'सलिल***

 

दोहा सलिला मुग्ध है, देख बसंती रूप.

शुक प्रणयी भिक्षुक हुआ, हुई सारिका भूप..

 

चंदन चंपा चमेली, अर्चित कंचन-देह.

शराच्चन्द्रिका चुलबुली, चपला करे विदेह..

 

नख-शिख, शिख-नख मक्खनी, महुआ सा पीताभ.

पाटलवत रत्नाभ तन, पौ फटता अरुणाभ..

 

सलिल-बिंदु से सुशोभित, कृष्ण…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 21, 2011 at 9:30am — 4 Comments

"नारी तुम केवल श्रद्धा हो"

नारी तुम केवल श्रद्धा …

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Added by Dr. Anupma Singh on February 21, 2011 at 7:18am — 1 Comment

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

(1) समारू - छत्तीसगढ़ सरकार ने 250 शराब दुकानें बंद करने का निर्णय लिया है ।



पहारू - क्या फर्क पड़ता है, गांवों की गलियों में अवैध शराब दुकानें तो हैं।







2. समारू - केन्द्र की यूपीए सरकार जेपीसी गठन को तैयार हो गई है।



पहारू - सरकार को शीतकालीन सत्र में सद ्बुद्धि क्यों नहीं आई।







3. समारू - छत्तीसगढ़ सरकार ने मार्च से गरीबों को 5 रूपये किलो में देशी चना देने का निर्णय लिया है।



पहारू - शराब तो है, चलो घर बैठे ‘चखना’ की व्यवस्था हो…

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Added by rajkumar sahu on February 21, 2011 at 12:11am — 1 Comment

GHAZAL - 27

                      ग़ज़ल



दोस्त   मेरी   दोस्ती   पर   नाज़   करके   देख   ले |

गीत  हूँ  मैं,  अपने  दिल  को  साज़  करके देख ले ||



मैं  तुझे  एक  शाह  का  रुतबा   दिला   दूँगा   कभी,

प्यार  से  तू  मुझको  अपना  ताज  करके  देख ले ||



गर  कभी  मैं  तल्ख़  था,   वो बदजुनूं था प्यार का,

दिल  नहीं  बदला  मेरा,   अंदाज़  कर  के  देख  ले ||



आज  भी  मैं  गुज़रे  कल  का  आदमी …
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Added by Abhay Kant Jha Deepraaj on February 20, 2011 at 9:25pm — 1 Comment

GHAZAL - 26

                          ग़ज़ल



मैं  हिस्सा  हूँ  उस  समाज  का,  जो  विवेक  से अंधा है |

लूट  क़त्ल  और  बेशर्मी,   हाँ   मेरे   खून   का  धंधा  है ||



बेइमानी और मक्कारी,  अपना हित, औरों का शोषण,

चालाकी  से  करने  वाला,   यहाँ   खुदा   का   बन्दा   है ||



धर्म छोड़कर,  शर्म छोड़कर,  ओढ़  लबादा  पशुता  का,

दानवता  के  पथ  पर  चलना,   प्यारा   गोरखधंधा   है ||



हाथ  में …
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Added by Abhay Kant Jha Deepraaj on February 20, 2011 at 8:58pm — No Comments

ek ghazal

 
हिल  गए  आधार  है  शायद  जमीं  के
 ध्रुव तलक लगता नहीं काबिल यकीं के
 
खुश्क धरती का कलेजा फट गया है 
है नहीं आसार अब बाकी नमी के 
 
अब मकां न है नजर आती दीवारें 
लोग रहते है यहाँ लगते कहीं के 
 
रोज़ खाली हाथ लौटा उस गली…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 20, 2011 at 8:54pm — No Comments

ek geet

 
 
कीचड दे बौछार
             ठंडी ठंडी पवन नहीं है
              नर्म गर्म वो बदन नहीं है
              उजड़े नीद निहारे बैठी 
                          - एक अकेली डार
               गंगा ही जब उलटी बहती
               नजर एक कमरे तक रहती
               जाने कैसे गणित कहे है
                               -दो और दो…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 20, 2011 at 10:34am — 2 Comments

दो छोटी कवितायेँ

 एक 
और तभी होता है ये आभास 
गिन गिन कर लेते है
एक एक
श्वांस 
तोड़ कर पिंजड़ा 
उड़ता है एक पंछी 
और छाया मंडराती है
यहीं आसपास 
 
दो
 
एक…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 20, 2011 at 10:30am — 4 Comments

लाभ क्या मिला ?

लाभ क्या मिला ?









लाभ क्या मिला ?

पिता जी की डायरी…
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Added by R N Tiwari on February 20, 2011 at 10:05am — No Comments

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