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बसंत कुमार शर्मा's Blog – July 2017 Archive (8)

रह गए हम -ग़ज़ल- बसंत कुमार शर्मा

मापनी 2122  2122 212

 

दूर से  नजरें  मिलाते  रह गए हम  

पास उनके आते’ आते रह गए हम

 

कान  पर जूं  तक न रेंगी साहिबों के,

हक़ की खातिर गिड़गिड़ाते रह गए हम   

 

तल्खियाँ हर बात में उनकी रहीं हैं,

प्यार की धुन गुनगुनाते रह गए…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 28, 2017 at 1:25pm — 14 Comments

यहाँ हुजूर - ग़ज़ल- बसंत कुमार शर्मा

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलात

मापनी २२१/२१२१/१२२१/२१२

 

करते नहीं हैं’ लोग शिकायत यहाँ हुजूर,

थोड़ी तो’ हो रही है’ मुसीबत यहाँ हुजूर.

बिकने लगे हैं’ राज सरे आम आजकल,

चमकी खबरनबीस की’ किस्मत यहाँ हुजूर.

बिछती कहीं है’ खाट, कहीं टाट हैं बिछे,

हो हर जगह रही है’ सियासत यहाँ हुजूर.

पलते रहे हैं’ देश में जयचंद हर जगह,

पहली नहीं है’ आज ये’…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 26, 2017 at 1:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल- कब किसी से यहाँ मुहब्बत की

कब किसी से यहाँ मुहब्बत की.  

जब भी' की आपने सियासत की.

 

प्यार  पूजा  सदा  ही हमने तो,

आपने कब इसकी इबादत की

 

जुल्म  धरती ने सह लिए सारे,

आसमां  ने मगर बगावत की

 

आदमी आदमी  से  जलता है,

कुछ कमी है यहाँ जहानत…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 25, 2017 at 10:10am — 10 Comments

लगती रही फिर भी भली

जिन्दगी की रेलगाड़ी,

भागती सरपट चली.

 

मिल न पायीं दो पटरियाँ,

साथ पर चलती रहीं.

देख कर अपनों की खुशियाँ,

दीप बन जलती रहीं.

 

दे गयी राहत सफर में,

चाय की इक केतली.

 

मौसमों की मार…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 23, 2017 at 1:11pm — 9 Comments

क्या बस निंदा काफी है

निर्दोषों के हत्यारों की,

क्या बस निंदा काफी है.

घाटी में आतंकी मिलकर,

दिखा रहे हैं दानवता.

हृदय विलखता लिए हुए हम,

ओढ़े बैठे सज्जनता.

तड़प रही है भारत माता,

जयचंदों को माफ़ी है.

जाति धर्म की राजनीति में,

इंसान हो रहा गायब.

चमचों की कोशिश रहती है,

रहे हमेशा खुश साहब.

भोली जनता को गोली है,

पल पल नाइंसाफी है.

टूट गए हैं सारे…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2017 at 4:52pm — 12 Comments

तुलसी को वनवास हो हो गया

घर टूटे मिट गए वसेरे,

महलों में आवास हो गया.

ऊँचे कद को देख लग रहा,

सबका बहुत विकास हो गया.

भूल गए पहचान गाँव की,

बसे शहर में जब से आकर.

नहीं अलाव प्रेम के जलते,

सूनी है चौपाल यहाँ पर.

 

अधरों पर मुस्कान…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2017 at 9:25am — 8 Comments

मेरे गाँव में

मापनी २२१२ २२१२ २२१२  

 

आ  तो सही  एक  बार मेरे गाँव में

अद्भुत अतिथि सत्कार मेरे गाँव में

 

हर वक्त  रहते  हैं खुले सबके लिए

सबके दिलों के  द्वार  मेरे  गाँव  में

 

तालाब  नदियाँ और पनघट की छटा

है  प्रीति  का…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 12, 2017 at 9:44am — 20 Comments

एक भारत श्रेष्ठ भारत

नवसृजन कर हम बनाएँ,

एक भारत श्रेष्ठ भारत

 

काम हो हर हाथ को,

ख़त्म हो बेरोजगारी.

हो न शोषण बालकों का,

और हो भय मुक्त नारी.

आचरण में भ्रष्टता से,

मुक्त हो अपनी सियासत.

 

शांति के हम दूत बनकर,…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 11, 2017 at 8:41am — 10 Comments

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