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Abhinav Arun's Blog – October 2010 Archive (15)

ग़ज़ल-तेरा लोटा तेरा चश्मा

ग़ज़ल



कहूँ कैसे कि मेरे शहर में अखबार बिकता है

डकैती लूट हत्या और बलात्कार बिकता है |



तेरे आदर्श तेरे मूल्य सारे बिक गए बापू

तेरा लोटा तेरा चश्मा तेरा घर-बार बिकता है |



बड़े अफसर का सौदा हाँ भले लाखों में होता हो

सिपाही दस में और सौ में तो थानेदार बिकता है |



वही मुंबई जहाँ टाटा अम्बानी जैसे बसते हैं

वहीं पर जिस्म कईओं का सरे बाज़ार बिकता है |



चुने जाते ही नेता सारे… Continue

Added by Abhinav Arun on October 30, 2010 at 3:24pm — 12 Comments

ग़ज़ल : कम रहे आखिर



पांव रिश्तों के जम रहे आखिर

हम हकीकत में कम रहे आखिर |



जिनके दिल पर भरोसा पूरा था

उनके हाथों में बम रहे आखिर |



तीर उस ओर थे दिखाने को

पर निशाने पर हम रहे आखिर |



दिन में लगता है भोग पंचामृत

शाम को पी तो रम रहे आखिर |



सच कहे और लड़े सिस्टम से

उसमे दम तक ये दम रहे आखिर |





नोट संसद में जेल में हत्या

काम के क्या नियम रहे आखिर |



जाने क्यूँ महलों तरफ… Continue

Added by Abhinav Arun on October 30, 2010 at 2:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल:भूख करप्शन

भूख करप्शन महंगाई बेकारी है

कैसी आगे बढ़ने की लाचारी है |



ट्यूशन के पैसे से पिक्चर देख रहे

अपने ही मुस्तकबिल से गद्दारी है |



वृद्धावस्था पेंशन पर दिन काट रही

बड़े हुए बच्चों की माँ बेचारी है |



काँटों का इक ताज सूली ले आओ

मेरी ईसा बनने की तैयारी है |



साठ साल से हरा भरा फल फूल नहीं

पौधे की जड़ में कोई बीमारी है |



आप कहाँ से इतनी खुशियाँ ले आये

क्या कुर्सी से आपकी रिश्तेदारी है |



किसे सफाई दे और किसका… Continue

Added by Abhinav Arun on October 27, 2010 at 3:42pm — 3 Comments

कविता-मैं दधीची दान लो

जो सहा वो कहा

मौन है ये ज़ुबां

दर्द की इन्तेहाँ |



एक कली गयी कहाँ

थक गया बाग़बां

हमसफ़र चल रहा

रास्ता जल रहा |



किसके हाथ असलहा

कौन हाँथ मल रहा

आज है कल कहाँ

आँख में जल कहाँ

हर तरफ प्यास है

गाँव में नल कहाँ |



योजना मृगतृष्णा

नैतिकता हे कृष्णा

ज़ोर ज़बर चल रहा

फैसला टल रहा

लाल सूर्य ढल रहा

गर्म ग्रह गल रहा |



एक सवाल है खड़ा

किससे कौन है बड़ा

गर्भ क्यों पल रहा

चल रही… Continue

Added by Abhinav Arun on October 27, 2010 at 3:00pm — 1 Comment

ग़ज़ल:काम बेशक न कीजिये

काम बेशक न कीजिए ज्यादा,

मीडिया में मगर दिखिए ज्यादा.



ये सियासत के खेल है साहब ,

बोइये कम छीटिए ज्यादा.



मिल गया है रिमांड पर अभियुक्त

पूछिए कम पीटिए ज्यादा.



सैलरी झाग दूध रिश्वत है,

फूंकिए कम पीजिए ज्यादा.



शेख जी हैं नए नए शायर ,

दाद कुछ और दीजिए ज्यादा.



लिफ्ट छाते में देकर देख लिया ,

बचिए कम भीगिए ज्यादा.



सभ्यता की पतंग और पछुआ बयार,

ढीलिए कम लपेटिए ज्यादा.



अपसंस्कृति की पपड़ियाँ… Continue

Added by Abhinav Arun on October 19, 2010 at 1:30pm — 13 Comments

रिपोर्ट:जब बच्चन जी ने बेची 'मधुशाला'

दशहरा के अवसर पर १७ अक्टूबर २०१० को वाराणसी स्थित श्री शारदापीठ मठ सभागार में वरिष्ठ शायर श्री अनुराग शंकर वर्मा के ग़ज़ल संग्रह "कहने को जुबां है"का विमोचन और इस मौके पर कवि सम्मलेन का आयोजन किया गया. मैं भी आमंत्रित था यह आयोजन कई मायनों में यादगार रहा. पहली बात यह कि श्री अनुराग जी अभी उम्र के ८३ वें वर्ष में चल रहे है और यह उनका पहला संग्रह है. जो उनकी स्वयं की इच्छा से नहीं बल्कि दूसरों के अधिक प्रयास से साकार रूप ले सका है. अनुराग जी का सारा लेखन उर्दू में है और उसे समेटना काफी मुश्किल था… Continue

Added by Abhinav Arun on October 18, 2010 at 4:30pm — 5 Comments

गज़ल - आंधियां चल दीं

आंधियां चल दीं आज़मानें सौ ,

गढ़ लिए हमने आशियानें सौ.



जिनकी हस्ती नहीं बसाने की ,

वो चले बस्तियां ढहानें सौ.



पुलिस के वास्ते बस एक थाना ,

माफिया के यहाँ ठिकानें सौ.



जीते जी तो हुआ न कोई एक,

अब मरा है चले नहानें सौ.



सफेदी ज़ुल्फ़ की यूँ ही तो नहीं ,

एक दिल यहाँ फसानें सौ.



लाख हैं बालियाँ चिडियाँ दस बीस,

खेत में बन गयीं मचानें सौ.



कटी उस ओर है खुशियों की पतंग,

लूटने चल दिए दीवानें… Continue

Added by Abhinav Arun on October 16, 2010 at 4:03pm — 5 Comments

दोहे:-तंगी नट भैरव हुई

तंगी नट भैरव हुई और भूख मदमाद ,

महंगाई के कंठ से फूटे अभिनव राग.



हांथी की चिंघाड से दहके सब आधार,

साइकिल पंचर हो गयी और कमल बेकार.



महंगाई बढती गयी नहीं बड़ी तनख्वाह,

अभिनव इस सरकार को बहुत लगेगी आह.



योजना के संदूक पर बैठे सौ सौ नाग,

भूखा पेट गरीब का कैसे गाये फाग.



राजनीति के खेल में कैसी शह और मात,

संसद में सुबह हुई हवालात में रात.



स्वयं मलाई खा रहे हमें सिखाते योग,

सन्यासी के भेस में कैसे कैसे लोग.

(बाबा… Continue

Added by Abhinav Arun on October 16, 2010 at 3:30pm — 1 Comment

कविता:- माँ

देखा न तुझे

जाना भी नहीं

तेरा रूप है क्या

और रंग कैसा

पर माँ तू मुझमें रहती है.



मैं चलता हूँ

पर राह है तू

हैं शब्द तेरे और भाव तेरे

माँ फूलों सा सहलाती तू

और काँटों को तू चुनती है.



हैं हाँथ मेरे कविता तेरी

ये अलंकार ये छंद सभी

माँ तू ही सबकुछ गढ़ती है

मैं लिखता रहता हूँ बेशक

तू सबसे पहले पढ़ती है.



तू पालक है और पोषक भी

तू ही माँ सुबह का सूरज

और चाँद की शीतल छाँव भी तू

माँ मैं जब भी तितली… Continue

Added by Abhinav Arun on October 13, 2010 at 4:09pm — 1 Comment

कविता:- दशहरा

दस रंग भरे

दस रूप धरे

दशहरा हरा कर दे जग को.



दस आशाएं

दस उम्मीदें

दस आकांक्षाएं पूरी हों.



दस आँचल हों

दस गोद भरें

दस बूटे बेल सजे संग संग.



दस द्वेष जलें

दस ईर्ष्याएँ

दस तर्क वितर्क हों धूमिल भी.



दस अलंकार

दस विद्याएँ

दस सिद्धि मिलें दस दीप जलें.



दस ओर हमारा यश गूंजे

दस पदकों की खन-खन भी हो

दस पद अंतर की ओर चलें

दस परिमार्जित हों इच्छाएं .



दस मित्र बने

दस बातें… Continue

Added by Abhinav Arun on October 13, 2010 at 3:30pm — 6 Comments

गज़ल:हमारा शक ...

हमारा शक सही हो ऐसा अक्सर नहीं होता,

हर आदमी के हाँथ में पत्थर नहीं होता.



मेरे दुखों की बाबत मुझसे न पूछिए,

जो ज्वार को रोये वो समुन्दर नहीं होता.



मैं अपने घर के लोगों से मिलता हूँ उसी रोज,

जिस रोज मेरे घर मेरा दफ्तर नहीं होता.



सच बोलता हूँ मान न होने का गम नहीं,

नासूर कितने होते जो नश्तर नहीं होता.



कितने बरस से बन रही हैं योजनाएं पर,

लाखों हैं जिनके सर पर छप्पर नहीं होता.



गढ़ते हैं किले आपके कर पेट पीठ एक,

उनको… Continue

Added by Abhinav Arun on October 10, 2010 at 10:00am — 2 Comments

गज़ल:याद जाने कहाँ

याद जाने कहाँ खो गयी,

बात आयी गयी हो गयी .



दिन में हल मैं चलाता रहा,

रात में बीज वो बो गयी.



बंद थीं मछलियाँ जार में,

तितली पानी से पर धो गयी.



बाद मुद्दत के आयी खुशी ,

मेरे हालात पर रो गयी.



तुमने बच्ची को डाटा बहुत ,

लेके टेडी बीयर सो गयी.



उसकी यादों में खोया था मैं,

इसका तस्कीन कर वो गयी.



एक नौका नदी से मिली ,

और मंझधार में खो गयी.



माँ ने कुछ भी तो पूछा न था,

कैसे मन को मेरे टो… Continue

Added by Abhinav Arun on October 10, 2010 at 10:00am — 1 Comment

गज़ल:उसकी हद उसको..

उसकी हद उसको बताऊंगा ज़रूर,

बाण शब्दों के चलाऊंगा ज़रूर.



इस घुटन में सांस भी चलती नहीं,

सुरंग बारूदी लगाऊंगा ज़रूर.



यह व्यवस्था एक रूठी प्रेयसी,

सौत इसकी आज लाऊंगा ज़रूर.



सच के सारे धर्म काफिर हो गए,

झूठ का मक्का बनाऊंगा ज़रूर.



इस शहर में रोशनी कुछ तंग है,

इसलिए खुद को जलाऊंगा ज़रूर.



आस्था के यम नियम थोथे हुए,

रक्त की रिश्वत खिलाऊंगा ज़रूर.



आख़री इंसान क्यों मायूस है ,

आदमी का हक दिलाऊंगा… Continue

Added by Abhinav Arun on October 10, 2010 at 9:30am — 2 Comments

गज़ल:कोल्हू चाक..

कोल्हू चाक रहट मोट की आवाज़ें,

शहरों से आयातित चोट की आवाज़ें.



मान मनोव्वल कुशलक्षेम पाउच और नोट ,

सबके पीछे छिपी वोट की आवाज़ें.



लूडो कैरम विडियो गेम के पुरखे हुए ,

बच्चों के हांथों रिमोट की आवाज़ें.



ध्यान रहे इस ताम झाम में दबें नहीं ,

आयोजन में हुए खोट की आवाज़ें .



मजबूरी में बार गर्ल बन बैठी वो ,

सिसकी पर भारी है नोट की आवाज़ें.



बेटा नहीं नियम से आता मनी-ऑर्डर,

कौन सुनेगा दिल के चोट की आवाज़ें.



मेरी… Continue

Added by Abhinav Arun on October 9, 2010 at 8:30am — 7 Comments

ग़ज़ल:इतना गुलज़ार सा..

इस टिप्पणी के साथ कि चाहें तो इसे अ-कविता की तरह अ-ग़ज़ल मान लें-



इतना गुलज़ार सा जेलर का ये दफ्तर क्यूं है,

आरोपी छूट गया और गवाह अन्दर क्यूं है.



सुलह को मिल रहें हैं मौलवी और पंडित भी ,

सियासी पार्टियों में भेद परस्पर क्यूं है.



अगर गुडगाँव नोयडा हैं सच ज़माने के ,

कहीं संथालपरगना कहीं बस्तर क्यूं है.



रंग केसर के जहां बिखरे हुए थे कल तक ,

उन्हीं खेतों में आज फ़ौज का बंकर क्यूं है.



जबकि बेटों के लिए कोई नहीं है… Continue

Added by Abhinav Arun on October 6, 2010 at 4:00pm — 5 Comments

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