For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,174)

रिवाजो रस्म क्या सब कुछ बदल दिया तूने

जुरत-आमोज मेरे दिल ये क्या किया तूने

खगूर-ए-हम्द से भी कर लिया गिला तूने



फ़िक्रे-फ़र्दा न कोई गम कभी रहा हमको

कजा से संग दिल मेरे बचा लिया तूने



सुखन में आ गए हो ऐब ढूँढने लेकिन

हमनवा ये बता कितना जहर पिया तूने



अजल से चल रहा है क्या कभी ये सोचा है

रिवाजो रस्म क्या सब कुछ बदल दिया तूने



खुदा से मांग लो अब गैर के लिए भी कुछ

जिया अपने लिए तो "दीप" क्या जिया तूने ??



संदीप पटेल "दीप"



जुरत-आमोज - साहस सिखाने…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on January 29, 2013 at 9:09pm — 14 Comments

"धमाके के बाद "

क्यूँ छलक रहा अश्रु मेरा ,
क्यूँ जा रहा सुख मेरा !
करुणा बढ रही ह्रदय में ,
हाहाकार है स्वरों में !!

क्या ज़िन्दगी यहाँ सस्ती है ,
यह शमशान या बस्ती है !
जहाँ करते आमोद -प्रमोद सानन्द,
अब वीरान पड़ा है भू-खंड !

क्यूँ हो रहे तुम अधीर ,
प्रश्न करते ये मृत शरीर!
दिल से बस आह !निकलती,
जिनकी पूर्ति नम ऑंखें करती!

राम शिरोमणि पाठक "दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on January 29, 2013 at 7:19pm — 7 Comments

कोरा कागज़

कोरा कागज़

अगर तू चाहती तो कभी भी

कोरे कागज़ पर मुझको

अँगूठा लगाने को कह सकती थी

और जानती हो, मैं..

मैं ‘न’ न कहता ।

उस कोरे कागज़ पर फिर

तुम कुछ भी लिख सकती थी।



तुमने मेरे नाम पर मुझसे

अधिकार माँगा

मैंने वह आँखें मूँद के दे दिया,

पर जब "तुम्हारे" अपने नाम पर तुमने

मुझसे अधिकार माँगा,

मेरे ओंठों पर हर पल नाम तुम्हारा था,

अत: यह अधिकार मैं तुम्हें दे न सका ।



मेरे धुँधँले-धुँधले सुलगते वजूद ने

नीदों…

Continue

Added by vijay nikore on January 29, 2013 at 3:00pm — 17 Comments

संस्मरण .... अमृता प्रीतम जी

संस्मरण ... अमृता प्रीतम जी

यह संस्मरण एक उस लेखक पर है जिसने केवल अपनी ही ज़िन्दगी नहीं जी, अपितु उस प्रत्येक मानव की ज़िन्दगी जी है जिसने ज़िदगी और मौत को,खुशी और ग़म को, एक ही प्याले में घोल कर पिया है  ... जिसके लिए ज़िन्दगी की "खामोशी की बर्फ़ कहीं से भी टूटती पिघलती नहीं थी।"

यह संस्मरण उस महान कवयित्रि पर है जो सारी उम्र कल्पना के गीत लिखती रही...."पर मैं वह नहीं हूँ जिसे कोई आवाज़ दे, और मैं यह भी जानती हूँ, मेरी…

Continue

Added by vijay nikore on January 29, 2013 at 1:00pm — 17 Comments

"पैसे की दुनियां "

वाह रे पैसा ,

पैसे का अहंकार !

पैसे से सबकुछ

खरीदने को तैयार !

तो जाओ !!

पैसे से दो बूंद,

आंसू खरीद लाओ!

पैसे से खुशियों की,

एक दुकान तो लगाओ !

पैसे से रोते बच्चे को ,

एक मीठी नींद सुला दो !

वर्षों से खड़े वृक्षों को

थोड़ी सी सैर करा दो!!

पैसे से किसी का

दर्द कम कर दो

पैसे से किसी के दिल में

प्यार और सदभावना भर दो !

पैसे से ओंस की बूंदों में,

रजत आकर्षण डाल दो!

वीरान पड़े…

Continue

Added by ram shiromani pathak on January 28, 2013 at 1:30pm — 3 Comments

परेशानियाँ

बिन बुलाये आ जाती हैं

कहने पर कहाँ जाती हैं

और हम भी दिन- रात

सोते- जागते

उठते-बैठते 

उन्ही को याद करते हैं

उन्ही के बारे में सोचते हैं

उनके बिन जैसे जीना मुहाल है  

हमारे पास वक़्त नहीं है

और वो ठहरे फ़ुरसतिया 

फिर भी कौन ऐसा है 

जो नहीं करता उनकी खातिर

आखिर हैं तो अपनी ही न

छोड़ भी तो नहीं सकते

जीने के लिए वही तो वजह है

.

.

.

.

.

कितनी अजीज होती हैं न !

ये "परेशानियाँ"



संदीप पटेल…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on January 27, 2013 at 8:42pm — 5 Comments

उडती चिड़िया काट लिए ‘पर’ कहाँ प्यार है ??

भारत देश हमारा प्यारा, न्यारा इसका संविधान है

शीतल  धवल दुग्ध धार है कहीं उबलता क्या विधान है

तरह तरह की भाषा बोली हैं हम जोली

दुश्मन-मित्र हैं अपने घर ही कहीं है गोली

आस्तीन के सांप बनाये रखना दूरी

तिलक देख है  फंस -फंस जाती भोली-

जनता ! त्राहि -त्राहि कर न्याय मांगती

मुंह में राम बगल में छूरी  कहाँ जानती…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on January 27, 2013 at 12:58pm — 2 Comments

व्यंग्य : निबुहवा बाबा

एक बालक था | बालक बेरोजगार था | बहुत प्रयास किया, पर सही रोजगार नहीं मिला | अंततः थक हारकर वो जुगाड़ू बाबा की शरण में गया | उसने जुगाड़ू बाबा को अपना दुखड़ा सुनाया | उसका दुखड़ा सुनकर जुगाड़ू बाबा ने उसे दो मिर्च, एक काला धांगा और एक नींबू दिया और बोले इनको गूथ और बेच | बालक बोला- बाबा ! ये क्या रोजगार है ? बालक की बात सुनकर ऐसे मुस्कुराये जुगाड़ू बाबा, जैसे बालक ने कोइ बचकानी बतिया दी हो | वो बोले - बालक ! तू अभी अनुभवहीन है, तुझे इस संसार का कुछ नहीं पता है, इसीलिए ऐसी बेतुकी बात पूछ रहा है | इस…

Continue

Added by पीयूष द्विवेदी भारत on January 27, 2013 at 12:30pm — 6 Comments

बहुत पुराना खत हाथों में है लेकिन,खुशबू ताज़ी है अब तक संवादों की

बहुत पुराना खत हाथों में है

लेकिन,

खुशबू  ताज़ी है

अब तक संवादों की 

हल्दी के दागों में

आँचल की सिहरन  

माँ की उंगली के

पोरों का वो कंपन 

नाम लिखा है मेरा,

जब जब जहाँ वहाँ 

फ़ैल गयी है

स्याही महकी यादों की

चन्दन चन्दन बातें

घर चौबारे की

मेंहदी की साज़िश

से छूटे द्वारे की

अक्षर अक्षर गमक रहा

मौसम मौसम

शब्द शब्द  हैं गंध

नेह…

Continue

Added by seema agrawal on January 27, 2013 at 12:00pm — 3 Comments

कैसा है गणतंत्र

कैसा है गणतंत्र  
 
घर घर जाकर देख ले, महिला है परतंत्र, 
गणतंत्र हम किसे कहे, हम पर हावी तंत्र 
 
दफ्तर जाकर देख ले, कैसा है गणतंत्र,
अफसर करे न चाकरी, हावी होता तंत्र 
 
खेल जगत में देख ले,…
Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 26, 2013 at 6:30pm — 6 Comments

क्रमशः -जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन की संक्षिप्त रपट - लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

जयपुर के दिग्गी हाउस में चल रहे लिटरेचर फेस्टिवल जावेद अख्तर और प्रसून जोशी सहित कई साहित्यकारों ने विभिन्न विषयों पर अपनी राय और अनुभव साझा करते हुए सेशन को गरमाया ।

ओ बी ओ के सुधि पाठकों के लिए दूसरे दिन (दि 25-1-13)के कुछ प्रमुख अंश प्रस्तुत है :-

जावेद अख्तर के छोटे से जुमले ने लोगो के चेहरे पर मुस्कान बिखेरी । अलग अलग जुबां भी कैसे रिश्ते और लोगो को जोड़ती है जावेद ने इसकी कई मिसाल दे डाली । इस गजल सत्र में वे हिंदुस्तानी जुबान की पहचान पर तल्ख़ दिखे तो उर्दू…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 26, 2013 at 2:30pm — 6 Comments

राजी कैसे मन को कर लूं मैं गणतंत्र मनाने को?

आओ मिल गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रगान का गान करें,

संकल्पित सपनों की आओ फिर से नयी उड़ान भरें.

नये जोश से ओत प्रोत हो हम गणतंत्र मनाते हैं,

लोकतंत्र में हो स्वतंत्र हम राष्ट्र गीत को गाते हैं..

किन्तु चाहता प्रश्न पूंछना लोकतंत्र रखवारों से,

सार्थकता क्या बची रहेगी इन ओजस्वी नारों से.

क्या तुमको भूंखे बच्चों की चीख सुनाई देती है,

क्या तुमको कोई अबला की पीर दिखाई देती है.

क्या तुमने बेबस माँओं की गोद उजड़ते देखा है.

कितनी मांगों…

Continue

Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on January 26, 2013 at 2:30pm — 2 Comments

यह तेरी अर्जी है.....

यह तेरी अर्जी है
या फिर खुदगर्जी है

सिल ही देंगी गम को
सांसे भी दर्जी है

मैं तुम से रूठा हूँ
तुहमत ये फर्जी है

दिल मेरा है सोना
बहता गम बुर्जी है

गर्दिश, ग़ज़लें, गश्ती
यह मेरी मर्जी है 
~अमितेष
("मौलिक व अप्रकाशित")

Added by अमि तेष on January 26, 2013 at 1:13pm — 9 Comments

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: संजीव 'सलिल'

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:

लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर

संजीव 'सलिल'

*

लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर

भारत माता का वंदन...



हम सब माता की संतानें,

नभ पर ध्वज फहराएंगे.

कोटि-कोटि कंठों से मिलकर

'जन गण मन' गुन्जायेंगे.

'झंडा ऊंचा रहे हमारा',

'वन्दे मातरम' गायेंगे.

वीर शहीदों के माथे पर

शोभित हो अक्षत-चन्दन...



नेता नहीं, नागरिक बनकर

करें देश का नव निर्माण.

लगन-परिश्रम, त्याग-समर्पण,…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on January 26, 2013 at 8:00am — 12 Comments

gantantra diwas ki shubhkamnayen

महा महनीय जनतंत्र को  गणतंत्र की हार्दिक शुभकामनायें

हर्ष और  उल्लास के साथ पुनीत यह पर्व मनाएं

पर ध्यान रहे कोई भूखा नंगा  छूट न    जाए

सबको साथ लेकर पावन पुनीत यह पर्व मनाएं .

 

मन्जरी पाण्डेय

Added by mrs manjari pandey on January 25, 2013 at 10:40pm — 1 Comment

"बात दो रोटी की है "

कैसे भूल सकता हूँ ,
भूंख से उसका कराहना !
ज़िन्दगी और मौत का ,
अजीब मंज़र !!

रोटी के लिए संघर्ष ,
सोचो कितनी दर्दनाक मौत ,
वो भी भूंख से ,
पेट की आंत गवाह है !!

अखबार का प्रथम पृष्ठ ,
भुखमरी से मौत का चित्रण ,
छापा गया था उसमे ,
विधिवत देकर उदाहरण!

कितना परिश्रम किया होगा ,
आंकड़े एकत्र करने में ,
काश! थोड़ी मेहनत की होती ,
इनका पेट भरने में !!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक \अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on January 25, 2013 at 8:23pm — 4 Comments

तिरंगे हम तेरे सामने सिर झुकाते हैं,



तिरंगे हम तेरे सामने सिर झुकाते हैं,
लेकिन , आज हमारा सिर ,शर्म से झुक रहा है,

हमें धिक्कार है,

पिछले पांच वर्ष महिला राष्ट्रपति रही 

कई प्रदेशों की मुख्यमंत्री महिला रही और हैं,

हमारी सरकार कि नीतियों  पर

प्रत्यक्ष ,अप्रत्यक्ष एक महिला का ही राज…
Continue

Added by Dr Dilip Mittal on January 25, 2013 at 8:00pm — 2 Comments

तुम जो होंसला दिखाओ तो फर्क पड़ता है

तुम जो होंसला दिखाओ तो फर्क पड़ता है साहेब .

वर्ना , नंबर दो क्या, नंबर एक भी हो जाओ,किसे फर्क पड़ता है ?

जलसे,जयकारे ,चापलूसों की फ़ौज ,किसे फर्क पड़ता है ?

देशभक्त को अपना दोस्त बनाओ तो फर्क पड़ता है ,

दूसरों के भ्रष्टाचार की कलई खोलो ,किसे फर्क पड़ता है ?

अपनों के गलत कामों को रोको तो फर्क पड़ता है ,

पिछड़ों के मसीहा बनो किसे फर्क पड़ता है…

Continue

Added by Dr Dilip Mittal on January 25, 2013 at 7:36pm — 2 Comments

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के प्रथम दिन की संक्षिप्त रपट - लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

24 जानवरी 2013 जयपुर; आज से "जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल" प्रारंभ हो गया । इस साहित्यिक कुम्भ में देश विदेश से आये साहित्यकार, साहित्य सागर में डुबकी लगा रहे है । प्रथम दिन धर्म गुरु दलाई लामा और महाश्वेता देवी के नामं रहा ।
ओ बी ओ के सुधि पाठको के लिए कुछ अंश प्रस्तुत है ...
दलाई लामा - तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा जिनके शिष्यों की गिनती करना चीन,भारत और तिब्बत व अन्य देशों में शायद संभव नहीं, पर वे स्वयं को…
Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 25, 2013 at 5:49pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
केक्टस ही तो उगेंगे

ना जाने कब तुमने चुपके से 

ये इश्क के बीज रोपित किये 

 मेरे सुकोमल ह्रदय में 

की मैं बांवरी हो गई 

तुम्हारी चाह  में ,सांस लेने लगी 

उस तिलस्मी फिजाँ  में 

रंग बिरंगे इन्द्रधनुष आकर लेने लगे 

मेरी रग रग  में  

ऐ  मेरे शिखर तुम्हारी  गगन चुम्बी चोटी  

भी अब सूक्ष्म और सुलभ लगने लगी 

मुहब्बत के नशे में चूर 

इश्क के जूनून में जंगली 

घास बन  ,फूलों के संग संग तुम्हारे 

बदन पर रेंगती…

Continue

Added by rajesh kumari on January 25, 2013 at 11:36am — 10 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari and आशीष यादव are now friends
2 hours ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
2 hours ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
2 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
8 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
8 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो…"
10 hours ago
आशीष यादव posted a blog post

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे…See More
12 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।"
13 hours ago
आशीष यादव commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"एक बेहतरीन ग़ज़ल रचा है आपने। बिलकुल सामयिक।  इस बढ़िया रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
13 hours ago
आशीष यादव commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"सदियों से मनुष्य प्रकृति का शोषण करता रहा है, जिसे विकास समझता रहा है वह विनास की एक एक सीढ़ी…"
13 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .अधर
"वाह। "
14 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .विविध
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत बढ़िया दोहों की रचना हुई है।  बधाई स्वीकार कीजिए।"
14 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service