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डॉ छोटेलाल सिंह's Blog (30)

पर्यावरण (दोहा छन्द)

पर्यावरण   (दोहा छन्द)

बढ़ा प्रदूषण इस कदर, त्राहिमाम हर ओर

जल थल नभ दूषित हुआ,मचा भयंकर शोर.1.

अपने मन का सब करे,काटे वन दिन रात

दैत्य प्रदूषण दन्त से, कैसे मिले निजात.2.

धुँवा धुँवासा हो रहा ,नहीं समझते लोग

अस्पताल में भीड़ है,घर घर बढ़ता रोग.3.

धरती का छेदन करे, पानी तल से दूर

कृषक हाल बेहाल है,मरने को मजबूर.4.

घर आँगन में वृक्ष लगे, सुंदर हो परिवेश

शुद्ध हवा सबको…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on April 17, 2018 at 8:56am — 5 Comments

बेटियां

बदल रही परिवेश बेटियां,करके अद्भुत काम

विश्व पटल पर आगे आकर,रोशन करती नाम ll

श्रम के बल से जीत रही हैं,स्वर्ण पदक हर बार

निज प्रतिभा से कर जाती हैं,  सारी बाधा पार ll

सुरम्य धरती का हर कोना , बेटी से गुलजार

स्नेह भावमय जग को करती,सदा लुटाती प्यार ll

अंगारों पर चलना सीखी , बेटी बनी जुझार

कठिन घड़ी जब भी आती है,जमकर करती वार ll

सीख सको सीखो बेटी से, जीवन का हर सार 

दया धर्म समता ममता की ,…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on April 11, 2018 at 7:09pm — 6 Comments

गौरैया (ताटंक छन्द)

गौरैया की चीं चीं बोली, सबको बड़ी सुहाती है

प्रातः काल मधुर बेला में, गीत मनोहर गाती है

फुदक फुदक कर दाने चुगती, मन को बड़ी लुभाती है

खिड़की और झरोखों से नित, हर पल आती जाती है ll

खेत बाग वन घर आँगन को, गौरैया चहकाती है

घरों और चौबारों में नित, अपना नीड़ बनाती है

घर की शोभा उजड़ गयी है, गौरैया के जाने से

नव युग का मानव वंचित है, गौरैया के गानें से ll

विकास की अंधी दुनिया मे, पंछी गुम हो जाते हैं

बढ़ा…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on March 25, 2018 at 4:48pm — 5 Comments

होली

होली

समता ममता प्यार मुहब्बत, हिलमिल बाँटे होली में

समरसता औ सत्य अहिंसा,छलके मीठी बोली में

होली की सतरंगी आभा,कण कण में फैलाएंगे

वैर भाव का बीज कहीं पे,हरगिज नहीं उगाएंगे

कूड़े का अम्बार उठाकर,दहन करेंगे होली में

कटुता और विषमता का मिल,हवन करेंगे होली में

रंग गुलाल भाल पर शोभित,प्रेम सहित हो होली में

सहिष्णुता का पाठ पढ़ाएं,करें सभी हित होली में

सब मिलकर हुड़दंग मिटाएँ,मचे रार ना होली में

ताना बाना बुने कर्म का,जुड़े तार इस होली…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on March 2, 2018 at 10:57pm — 5 Comments

सबक

सबक

देश खोखला होता जाता,आज यहाँ मक्कारों से

सदा कलंकित होता भारत, भीतर के गद्दारों से

लाज शर्म है नहीं किसी को, अपना नाम डुबाने में

मटियामेट करे इज्जत को, देखो आज जमाने में  

देश धरा के जो हैं दुश्मन, सबको नाच नचाते हैं

सारी अर्थव्यवस्था को वे, तितर वितर कर जाते हैं

अपनी मर्जी के हैं मालिक, अपना हुक्म चलाते हैं

लूट लूट कर भरे तिजोरी, फिर ये गुम हो जाते हैं

आज व्यवस्था जमीदोज है, हर जुर्मी हैवानों से

कैसे मुक्ति मिले भारत को, इन पाजी…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on February 25, 2018 at 9:21am — 10 Comments

परिवर्तन (सरसी छन्द)

परिवर्तन (सरसी छन्द)



प्रचंड लीला परिवर्तन की, सभी झेलते मार

पुष्प सदा जो खिलते रहते, कम्पित होती डार।1।



भृंग मधुर रव तान सुनाते, करते वे मदहोश

गम में सभी सहन करते हैं, परिवर्तन आक्रोश।2।



हरित पर्ण पर हिमकन शोभित, नर्तन करती रोज

परिवर्तन का तांडव पल में, धूमिल करता ओज ।3।



सदा बाग का माली हँसता, सुषमा देख अपार

पतझड़ में नित रुदन करे वह, दिखता हाहाकार।4।



परिवर्तन की विषम ज्वाल में, जलता राज समाज

चीख पुकार सुनाई देती,… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on November 27, 2017 at 6:57pm — 7 Comments

धुँआ (सरसी छन्द)

*धुआँ (सरसी छःन्द)*



आसमान में धुआँ धुआँ है, हुए सभी बेहाल |

व्याकुलता बढ़ती जाती है, जीना हुआ मुहाल ||



काली धुंध सड़क पे छायी, मुश्किल चलनी राह |

नर नारी सबके ही मुख से, निकल रही है आह ||



अस्त व्यस्त सारा जन जीवन, सुनता कौन पुकार |

आपस में कर खींचातानी,बढ़ा रहे तकरार ||



जिम्मेदारी भूल गए हैं, सभी बजाते गाल |

दिल के भीतर कालापन है, बिगड़ गयी है चाल ||



धुँधलायी नित बढ़ती जाती,उठता रोज सवाल |

फिक्र नहीं है यहाँ किसी… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on November 13, 2017 at 5:51pm — 12 Comments

बेहाल जिन्दगी

बेहाल जिन्दगी



बिखरे सूखे पत्तों के बीच

फूस की झोपड़ी में

बेहाल जिन्दगी

अटकी साँसे

दुहाई दे रही थीं

सिर्फ जीने के लिए

दूर स्थित खेत में

कुछ काले श्वान

दूषित मटमैले

चेहरों पर भौंक रहे थे

बार बार गूँजती आवाज

सहमा डरा चेहरा

बहुत निराश

कम्पित भयावहता के बीच

कुछ टूटे फूटे बर्तन

बिखरे पड़े इधर उधर

बहते अश्रुओं के बीच

कोस रहे थे

अपनी बदनसीबी पर

निरीह आँखे निहार रही थी

ऊँचे मुंडेर… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 31, 2017 at 12:23pm — 18 Comments

दीवाली (सरसी छन्द)

दीवाली (सरसी छन्द)





दिल से दिल के तार मिलाएं, दीवाली के नाम

खाएं और खिलाएं सबको,दें अच्छा पैगाम



एक दीप सा बन जीवन में, करें सदा उल्लास

मन मंदिर में ज्ञानदीप से,नित ही करें प्रकाश



झूम झूमकर खुशी मनाएं,बैठें सबके संग

कर्म सुगम पथ सब अपनाएं,सीख हुनर औ ढंग



बोलें मीठी वाणी सबसे,करें नहीं विद्वेष

दुनिया में है सबसे न्यारा,प्यारा भारत देश



एक बनेंगे नेक बनेंगे,ऊँचा होगा नाम

सुन्दर समाज अपना होगा,नेक करेंगे… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 25, 2017 at 3:31pm — 9 Comments

बचपन

बचपन होता कितना प्यारा

लगता है हम सबको न्यारा

भेदभाव से है अनजाना

हर गम से होता बेगाना ll



खेलकूद कर हँसता गाता

स्नेह भाव से रखता नाता

नटखट रूप सदा मन भाये

नाचे गाये और बजाये ll



गेमतड़ी औ गिल्ली डंडा

पाये जीत लगा हथकंडा

आइस पाइस छुपन छुपाई

बचपन कितना प्यारा भाई ll



बचपन का हर पन्ना सादा

सीख रहा सबसे मर्यादा

मन की झिझक मिटाता जाता

खाता पीता हँसता गाता ll



मधुर घड़ी बचपन की होती

मात पिता बिन… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 18, 2017 at 4:33pm — 9 Comments

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