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दोष देखो तो सूरज के सर हो गया----ग़ज़ल

212 212 212 212

घोर कलयुग का ऐसा असर हो गया
वस्त्र धर के भी नंगा नगर हो गया

आवरण धारणा का है यूँ सोच पर
आदमी का मनस भ्रम का घर हो गया

स्वाप-विष का हुआ है असर इस क़दर
सच के प्रति हर मनुज बे-नज़र हो गया

फैसला उल्लुओं की अदालत का है
दोष देखो तो सूरज के सर हो गया

जागती ही नहीं आत्मा क्या करें
"मैं" से ख़ुद का ही मुश्किल समर हो गया

मौलिक- अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 22, 2018 at 10:36am

आदरणीय लक्ष्मण धामी सर बहुत बहुत आभार.सुझाव का सदैव स्वगत है

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 22, 2018 at 10:35am

आदरणीय फूल सिंह जी बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 22, 2018 at 10:35am

आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, कोशिश जारी है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 21, 2018 at 7:35pm

आ. भाई पंकज जी, गजल का अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई । लेकिन यह आपके अनुरूप नहीं बन पायी है । शिल्प में कसावट का अभाव दिख रहा है । अन्यथा न लें...

Comment by PHOOL SINGH on December 17, 2018 at 2:52pm

 सच्चाई को उजागर करती सुंदर रचना बधाई स्वीकारे

Comment by Samar kabeer on December 17, 2018 at 10:44am

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

अभी शिल्प पर औए अभ्यास की ज़रूरत है ।

कृपया ध्यान दे...

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