For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,160)

व्यंग्य - ‘मौन-मोहन’ से मिन्नतें

हे ‘मौन-मोहन’, आपको सादर नमस्कार। आप इतने निराश मन से क्यों अपना राजनीतिक चक्र घुमा रहे हैं। जिस ताजगी के साथ आपने देश में नई बुलंदी को छू लिए और लोगों के दिल में समाए, आखिर अब ऐसा क्या हो गया, जो आप एकदम से थके-थके से नजर आ रहे हैं। जिस जनता-जनार्दन के सिर पर अपना ‘हाथ’ होने की दुहाई देकर आप सत्ता तक पहुंचे, उसी हाथ की आज क्यों जनता से दूरी बढ़ गई है। ’आम आदमी के साथ’ का जो नारा था, वो तो शुरू से ही साथ छोड़ गया है। निश्चित ही आपकी छवि, दबे-कुचले जनता के बीच अच्छी है, लेकिन आपके द्वारा उन्हीं… Continue

Added by rajkumar sahu on September 27, 2011 at 3:15pm — No Comments

मुँह छोटा पर बात बड़ी है।

पेट बडा है, भूख  बड़ी  है,

लोभ भरा है, सोच सड़ी है।

 …

Continue

Added by Subhash Trehan on September 27, 2011 at 1:06pm — 5 Comments

एक हुए दोहा यमक: संजीव 'सलिल'

एक हुए दोहा यमक:

संजीव 'सलिल'

*

लिए विरासत गंग की, चलो नहायें गंग.

भंग न हो सपना 'सलिल', घोंटें-खायें भंग..

*

सुबह शुबह में फर्क है, सकल शकल में फर्क.

उच्चारण में फर्क से, होता तर्क कु-तर्क..

*

बुला कहा आ धार पर, तजा नहीं आधार.

निरा धार होकर हुआ, निराधार साधार..

*

ग्रहण किया आ भार तो, विहँस कहा आभार.

देय - अ-देय ग्रहण किया, तत्क्षण ही साभार..

*

नाप सके भू-चाल जो बना लिये हैं यंत्र.

नाप सके भूचाल जो, बना न पाये…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 27, 2011 at 7:30am — 1 Comment

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

---------------अंतिम अंक   --------------------

"कौन है?" मैंने हड़बड़ाकर पूछा .



"साहब ,दरवाजा खोलिए, गजब हो गया ." रामरतन के स्वर में घबड़ाहट थी. मैंने दौड़कर…
Continue

Added by satish mapatpuri on September 26, 2011 at 10:00pm — 2 Comments

एक गीत: गरल पिया है... -- संजीव 'सलिल'

एक गीत:

गरल पिया है...

संजीव 'सलिल'

*

तुमने तो बस गरल पिया है...



तुम संतोष करे बैठे हो.

असंतोष को हमने पाला.

तुमने ज्यों का त्यों स्वीकारा.

हमने तम में दीपक बाला.

जैसा भी जब भी जो पाया

हमने जी भर उसे जिया है

तुमने तो बस गरल पिया है...



हम जो ठानें वही करेंगे.

जग का क्या है? हँसी उड़ाये.

चाहे हमको पत्थर मारे

या प्रशस्ति के स्वर गुंजाये.

कलियों की रक्षा करने को

हमने पत्थर किया हिया है…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 26, 2011 at 9:30pm — 1 Comment

खाक़ (दीपक शर्मा कुल्लुवी)



खाक़
मेरी ज़िन्दगी की तरह 
मेरे बनाये चित्र भी 
चीथड़े चीथड़े हो गये
वोह तो कुछ न कह पाए 
बस खामोश हो गए 
कसक तो दिल में रह ही गई 
अंतरात्मा मेरी मायूस हो गयी
दर्द …
Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 26, 2011 at 12:05pm — 1 Comment

खामोशियाँ...

खामोशियाँ..

चुभते टीसते  नासूर दे जाती हैं..
अनचाहे ही चुभन यादों में उग आती है ..…
Continue

Added by Lata R.Ojha on September 25, 2011 at 11:42pm — 2 Comments

कौंधते सवाल

ये जंग की घड़ी नहीं,

न देश ये गुलाम है ..

फिर क्यों हम आम जनता ,

इस देश में फटेहाल है?



हम उलझे है अपनी चिंताओ में ,

देश की हम सोचे भी क्या ??

हमे मार दिया महंगाई ने ,

भ्रष्टो का कर पायेंगे क्या??



बीता वर्ष घोटालो का था,

नए वर्ष में अब होगा क्या ?

आज हर और जब घोटाला है,

तो फिर कैसी ये व्यवस्था है..

कैसा ये जनतंत्र है,

जिसमे पीस रही जनता है??





हम सबने सुने है नेताओं के कुचर्चे,

पर किसी ने उनका अंजाम सूना??

जब…

Continue

Added by सन्नी on September 25, 2011 at 10:51pm — 3 Comments

एक हुए दोहा यमक: -- संजीव 'सलिल'

एक हुए दोहा यमक:

-- संजीव 'सलिल'

*

हरि से हरि-मुख पा हुए, हरि अतिशय नाराज.

बनना था हरि, हरि बने, बना-बिगाड़ा काज?

हरि = विष्णु, वानर, मनुष्य (नारद), देवरूप, वानर

*

नर, सिंह, पुर पाये नहीं, पर नरसिंहपुर नाम.

अब हर नर कर रहा है, नित सियार सा काम..

*

बैठ डाल पर काटता, व्यर्थ रहा तू डाल.

मत उनको मत डाल तू, जिन्हें रहा मत डाल..

*

करने कन्यादान जो, चाह रहे वरदान.

करें नहीं वर-दान तो, मत कर कन्यादान..

*

खान-पान कर…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 25, 2011 at 9:00am — 1 Comment

साँई स्तवन

# साँई स्तवन #



जनम सफल कर ले, भवसागर तर ले,

छुट जायेंगे सारे फंदे, साँई चरण धर ले....

१. कौन सहारा देगा तुझको सोच ज़रा,

तुझे कहाँ ले जाएगा अभिमान तेरा,

अंत समय क्या तेरे साथ चलेगा जग ?…

Continue

Added by डॉ. नमन दत्त on September 25, 2011 at 8:17am — No Comments

व्यंग्य - महंगाई ‘डायन’ है कि सरकार

महंगाई पर हम बेकार की तोहमत लगाते रहते हैं। अभी जब बाजार में सामग्रियां सातवें आसमान में महंगाई की मार के कारण उछलने लगी, उसके बाद महंगाई एक बार फिर हमें ‘डायन’ लगने लगी। इस बार तंग आकर महंगाई ने भी अपनी भृकुटी तान दी और कहा कि उसने कौन सी गलती कर दी, जिसके बाद उसे ऐसी जलालत बार-बार झेलनी पड़ती है। महंगाई को बार-बार की बेइज्जती बर्दास्त नहीं हो रही है। उसने सोचा, अब वह कहीं और जाकर अपनी बसेरा तय करेगी, मगर सरकार मानें, तब ना।

सरकार ने जैसे दंभ भर लिया हो कि जो भी हो जाए, महंगाई को साथ रखना… Continue

Added by rajkumar sahu on September 25, 2011 at 1:13am — 1 Comment

आदरणीय योगी जी व आदरणीय सौरभ जी की प्रेरणा से जनित पाँच कह-मुकरियां :



(1)

बड़े प्यार से जो दुलरावै|

हमको अपने गले लगावै|

प्रीति-रीति में हम हों बंदी|

क्यों सखि साजन? नहिं सखि हिंदी!

_________________________



(2)

अलंकार से सज्जित सोहै|

रस की वृष्टि सदा मन मोहै  |

मिल जाता है परमानन्द |

क्यों सखि साजन? नहिं सखि छंद |

__________________________

(3)

परम संतुलित जिसका भार|

गुरु लघु रूप बना आधार!  

जन-जन को है जिसने मोहा|

क्यों सखि साजन? नहिं सखि…

Continue

Added by Er. Ambarish Srivastava on September 24, 2011 at 11:00pm — 23 Comments

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

--------------- अंक - छः  ---------------------

बम सदृश धमाका हुआ  ......................मुझे कानों पर पर विश्वास नहीं हो रहा था पर यथार्थ हर हालत में यथार्थ ही होता है. मैं शालू का प्रस्ताव सुनकर अवाक था .

"शालू ,  जानती हो तुम क्या कह रही हो ?"

"अच्छी तरह. आपने ही तो कहा था कि बार-बार कहा जाने वाला झूठ भी सच हो जाता है . आज सब लोग मुझे आपकी प्रेमिका और महबूबा कह रहे हैं . मेरे नाम के साथ आपका नाम जोड़…

Continue

Added by satish mapatpuri on September 24, 2011 at 10:20pm — No Comments

सिहर जाता हूँ, ऐसा बोलता है - ग़ज़ल : वीनस केशरी

एक नई ग़ज़ल पेश -ए- खिदमत है, मुलाहिजा फरमाए

 



सिहर जाता हूँ, ऐसा बोलता है
वो बस मीठा ही मीठा बोलता है



समय के सुर में बोलेगा वो इक दिन 

अभी तो उसका लहज़ा बोलता है



ये उसकी तिश्नगी * है या तिज़ारत…
Continue

Added by वीनस केसरी on September 24, 2011 at 2:00am — 24 Comments

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

 लेखक - सतीश मापतपुरी

--------------- अंक - पांच ---------------------

उसे देखते ही शालू तीर की तरह निकल गयी

सुबह संजय से मालूम हुआ कि रात में शालू को बेहरहमी से पीटा गया है . समाज की संकीर्णता देखकर मेरा मन क्षुब्ध हो उठा .किसी लड़की का किसी लड़के से मिलने का एक ही मतलब निकालने वाला यह समाज सजग एवं सचेत रहने के नाम पर भयंकर लापरवाही का परिचय देता रहता है . शालू पर , जो अभी यौवन के पड़ाव से कुछ दूर ही थी , उसकी मां ने सुरक्षा के ख्याल…

Continue

Added by satish mapatpuri on September 23, 2011 at 9:06pm — 2 Comments

चाँद छुप जाओ बादलों में अभी

    चाँद छुप जाओ बादलों में अभी, 

    कहीं ज़माने की तुम्हें नज़र न लगे।

 …

Continue

Added by Kailash C Sharma on September 23, 2011 at 7:00pm — 1 Comment

३ कह मुकरियाँ

(१)

जब आए - तो रस बरसाए

न आए - तो बड़ा सताए

कोई न ऐसा मनभावन 

ऐ सखी साजन?? न सखी सावन ।


(२)

मोरे पास - तो करे मगन

दूजे के संग - देत जलन 

न जग मे कोई वाके जैसा 

ऐ सखी साजन?? न सखी पैसा |

 

(३)

हमरे जीवन कै आधार

वो ही तो सगरा संसार

बड़ा सोच के रचिन रचैया 

ऐ सखी साजन?? न सखी मैया

Added by Vikram Srivastava on September 23, 2011 at 3:00pm — 13 Comments

सियार का अनशन-भाग 1

प्यारे बच्चों, सुनो कहानी................



एक बार की बात है. किसी जंगल का राजा एक शेर था. 

उसकी हिंसा और आतंक से सभी जानवर परेशान थे. कुछ उसका नाम सुनकर डर से कांपते थे और कुछ गुस्से से लाल हो जाते थे. सभी जीवों ने शेर का विरोध करने का मन बनाया. लेकिन आगे कौन बढ़े? जो भी पहल करता शेर उसे मारकर खा…
Continue

Added by Vikram Pratap on September 23, 2011 at 2:25pm — 1 Comment

नहीं आऊंगी

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

--------------- अंक - चार ---------------------

 

मैं सोच नहीं पा रहा था की इस नयी परिस्थिति का किस तरह सामना करूँ . शालू जाने लगी तो मैनें उसे पकड़ कर पुनः बिठा दिया .

" शालू ,मुझे गलत मत समझो. मेरे दिल में तुम्हारे लिए अब भी वहीँ स्नेह है, पर मां की आज्ञा तुम्हें माननी चाहिए."

शालू का मेरे यहाँ आना-जाना अब काफी कम हो गया था. वह मेरे यहाँ तब ही आती थी जब उसकी मां और मधु या तो घर से बाहर हों या सो गयी…

Continue

Added by satish mapatpuri on September 22, 2011 at 10:56pm — 2 Comments

कविता : सामान्य वर्ग के सामान्य बाप का सामान्य बेटा

मैं हूँ सामान्य वर्ग का एक सामान्य अधेड़

न, न, अभी उम्र पचास की नहीं हुई

केवल पैंतीस की ही है

मगर अधेड़ जैसा लगने लगा हूँ



मेरी गलती यही है

कि मैं विलक्षण प्रतिभा का स्वामी नहीं हूँ

न ही किसी पुराने जमींदार की औलाद हूँ

एक सामान्य से किसान का बेटा हूँ मैं



बचपन में न मेरे बापू ने मेरी पढ़ाई पर ध्यान दिया

न मैंने

नौंवी कक्षा में मुझे समझ में आया

कि इस दुनिया में मेरे लिए कहीं आशा बाकी है

तो वह पढ़ाई में ही है

तब मैंने पढ़ना…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 22, 2011 at 3:38pm — 17 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Feb 4
Sushil Sarna posted blog posts
Feb 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service