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जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू -छग पुलिस के मुखिया बदले गए।

पहारू - गृहमंत्री से मनमुटाव का परिणाम लगता है।





2. समारू - मुंबई फिल दहल उठी है।

पहारू - कसाब जैसों को और पालो।





3. समारू - डा. चरणदास महंत केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री बन गए हैं।

पहारू - पता है, छग के भाजपा मंत्री की मंद-मद मुस्कान देखा।





4. समारू - पीएमटी के अलावा छग व्यापमं की सभी परीक्षा में गड़बड़झाले की खबर आ रही है।

पहारू - मोटी परत है, धीरे-धीरे खुलेगी ही।





5. समारू -… Continue

Added by rajkumar sahu on July 14, 2011 at 12:01am — No Comments

भटके मुसाफिर

दोस्तों आज देश के उपर कुछ पंक्तियाँ लिखने जा रहा हूँ......................



जब आज़ाद हुआ था भारतवर्ष,

एक सपना सबने देखा था,

जैसे चाँद चमकता है तारों मे,

वैसा होगा देश कुछ सालों मे,

देश हमारा करेगा विकास,

गाँधी जी की यही थी आस,

खुदा भी देगा अपना साथ,

ऐसा उनका था विश्वास.



आज 64 साल हुए,

हम सब को आज़ाद हुए,

लेकिन क्या एक पल को सोचा,

क्या से क्या हालात हुए,

कल अँग्रेज़ों ने राज किया था,

हमें बहुत बर्बाद किया था,… Continue

Added by Rohit Dubey "योद्धा " on July 13, 2011 at 11:00pm — 3 Comments

नयन तुम्हारे

कुछ कहते कहते रुक जाते हैं,

चंचल, मदभरे, नयन तुम्हारे...

पल - पल देखो डूब रहे हम,

झील से गहरे नयन तुम्हारे....

 

मूक आमंत्रण तुमने दिया था,

अधरों से कुछ भी कहा नहीं,

मुझको अपने रंग में रंग गए,

हाथों से पर छुआ नहीं,

नैनो से सब बातें हो गयीं,

रह गए लब खामोश तुम्हारे....

 

स्पर्श तुम्हारा याद है मुझको,

सदियों में भी भूली नहीं,

कोई ऐसा दिन नहीं जब,

यादों में तेरी झूली नहीं,

बिन परिचय…

Continue

Added by Anita Maurya on July 13, 2011 at 10:49pm — 2 Comments

कुदरत है अनमोल !

कुदरत है अनमोल !



कुदरत है बड़ी अनमोल

देख ले तू ये आँखें खोल ;

चल कोयल के जैसा बोल

कानों में तू रस दे घोल .

कुदरत है ........................





तितली -सा तू बन चंचल ;

सरिता सा तू कर कल-कल ;

बरखा जल सा बन निर्मल ;

घुमड़-घुमड़ कर बन बादल;

भौरा बन तू इत-उत डोल.

कुदरत है .............................

 



सूरज बन तू खूब चमक ;

चंदा सा तू बन मोहक ;

फूलों सा तू महक-महक ;

चिड़ियों जैसा चहक-चहक…

Continue

Added by shikha kaushik on July 13, 2011 at 9:00pm — No Comments

शोर-ए-दिल

नई अदा से, मुहब्बत, जता रहा है कोई |

उन्हीं से उनके लिए, ख़त लिखा रहा है कोई ||


कहा गया न, जुबां से, जो रूबरू उनके |
बिठा के पास उन्हें, सब सुना रहा है कोई ||


वो पूछते भी हैं, उल्झा के, बातों-बातों…
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Added by Shashi Mehra on July 13, 2011 at 12:30pm — 1 Comment

शोर-ए-दिल

तिनका हूँ, शहतीर नहीं हूँ | 

ज़िन्दां हूँ, तस्वीर नहीं हूँ ||



टूट रहा हूँ, धीरे-धीरे |
मैं पुख्ता, तामीर नहीं हूँ ||


हैरत से, मत देखो मुझको |…
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Added by Shashi Mehra on July 13, 2011 at 9:30am — No Comments

शोर-ए-दिल

बन्दा हूँ, भगवान नहीं हूँ |

पत्थर का इंसान नहीं हूँ ||


वक़्त के साथ, बदल सकता हूँ |
कोई वेद-पुरान नहीं हूँ ||


मैं भी गलती कर सकता हूँ |
धर्म नहीं हूँ,…
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Added by Shashi Mehra on July 12, 2011 at 6:00pm — 2 Comments

व्यंग्य - ले लीजिए स्वर्णकाल का आनंद

व्यंग्य - ले लीजिए स्वर्णकाल का आनंद यह बात सही है कि हर किसी की जिंदगी में कभी न कभी स्वर्णकाल आता ही है। उपर वाला निश्चित ही एक बार जरूर छप्पर फाड़कर देता है, ये अलग बात है कि कुछ लोग उस छप्पर में समा जाते हैं तो कुछ लोग पूरे छप्पर को समा लेते हैं। कर्म तो प्रधान होना चाहिए, मगर भाग्य से भरोसा भी नहीं उठना चाहिए, क्योंकि यह तो सभी जानते हैं, जब स्वर्णकाल का दौर चलता है तो फिर फर्श से अर्श की दूरी मिनटों में तय होती है, मगर जब संक्रमणकाल चलता है तो फिर अर्श से फर्श तक आने में पल भर नहीं…

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Added by rajkumar sahu on July 12, 2011 at 1:20am — 1 Comment

शोर-ए-दिल

इब्तदा थी मैं, इन्तहां समझा |
एक गुलचीं को, बागवान समझा ||
भूल कह लो, इसे या नादानी |
बेरहम को,था मेहरबाँ समझा ||
ज़हन में, इतने चेहरे, बसते हैं |
मैंने खुद को ही, कारवाँ समझा ||
खुद फरेबी में, ज़िन्दगी गुजरी |  

झूठ को, सच सदा, यहाँ समझा ||
कोई मकसद नहीं है, जीने का |
बाद सब कुछ, 'शशि' गँवा समझा ||

Added by Shashi Mehra on July 11, 2011 at 8:03pm — 1 Comment

मन की मस्ती ,

मन की मस्ती ,

तन की चाहत ,
आता हैं सावन ,
मिलती हैं राहत ,
रिमझिम रिमझिम ,
बरसे हैं बादल ,
तड़पे हैं दिल  ,
बेकरारी का आलम…
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Added by Rash Bihari Ravi on July 11, 2011 at 11:30am — 21 Comments

शोर-ए-दिल

उनकी ज़फ़ा का हमको, क्यूँ ऐतबार आये |

वो आज-कल खफा हैं, दिल कैसे मान जाए ||

माना की आज-कल वो, कुछ दूर हो गए हैं |

हम जानतें हैं की वो, मजबूर हो गए हैं ||

रुसवाइयों के डर से, वो रुख को है छुपाये | वो आज-कल खफा हैं

जो दिल तड़प रहा है, वो ज़रूर होंगे गम में |

जो समझ रहें हैं हमको, वो ज़रूर होंगें हममें ||

साए में आँसुओं के, हम कैसे मुस्कराएँ | वो आज-कल खफा हैं

ऐ दिल उदास न हो, अभी कुछ हुआ नहीं है |

क्यूँ कर रहा यकीं है, असर-ए-दुआ दुआ नहीं है ||

कुछ… Continue

Added by Shashi Mehra on July 11, 2011 at 10:11am — 1 Comment

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजग पर भी उंगली उठी।

पहारू - भ्रष्टाचार के हमाम में सभी नंगे हैं।



2.समारू - केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल होने वाला है।

पहारू - काले कारनामे वाले कुछ जाएंगे, कुछ आएंगे।



3.समारू -  अन्ना हजारे लाठी ही नहीं, गोली खाने को तैयार हैं।

पहारू - जरा संभलकर, दिल्ली पुलिस की तरह सरकार बौखलाई हुई है।



4.समारू - किसानों की जमीन के लिए उत्तरप्रदेश में जंग छिड़ी हुई है।

पहारू - जमीन के नाम पर राजनीति कर वोट की खेती…

Continue

Added by rajkumar sahu on July 11, 2011 at 1:02am — 1 Comment

मानसरोवर -३

 

इस दुनिया के निर्माता ने, सृष्टि के भाग्य विधाता ने.

मारुति-कृशानु के संगम से, भूमि -वारि और गगन से.

                 एक पुतला का निर्माण किया.

         मानव का नाम उचार दिया.

मांस -चर्म के इस तन में,नर -नारी के सुन्दर मन में.

एक समता का संचार किया, तन लाल रुधिर का धार दिया .

                  सबको समान दी सूर्य -सोम.

                सबको समान दी भूमि -ब्योम.

सबको चमड़े की काया दी. सबको  सृष्टि की छाया…

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Added by satish mapatpuri on July 11, 2011 at 12:30am — 9 Comments

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - छग कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल ने अलग बस्तर राज्य बनने पर सहमति जताई है।

पहारू - लगता है, दिग्गी राजा की बीमारी इन्हें भी लग गई है, मीडिया में छाए रहने की।





2. समारू - राहुल गांधी की किसान महापंचायत को नौटंकी बताया जा रहा है। पहारू - आखिर, राजनीति में होता क्या है ?





3. समारू - यूपी के फतेहपुर में ट्रेन हादसा हुआ है।

पहारू - सरकार श्रद्धांजलि देगी और कर देगी, मौत की कीमत का ऐलान।





4. समारू - राहुल गांधी ने कहा कि… Continue

Added by rajkumar sahu on July 10, 2011 at 5:40pm — No Comments

ग़ज़ल

बातइतनी समझ में आई है |
झूठ ही आजकल सच्चाई है ||


सब में जलवा-नुमाँ, खुदा खुद है |
दहर है, ये जगह खुदाई है ||


हया,वफ़ा हैं किताबों में, इसलिए हर सू |
बे-हयाई है, बे-वफाई है ||


दावा बेकार है, किसी शेय पर |
सोच तक तो, यहाँ पराई है ||


जाँचना मत जहां में रिश्ते |
जिसने जांचे हैं, चोट खाई है ||


खेल ज़ारी है, जिंदगानी का |
जीत हारी है,मात पाई है ||

Added by Shashi Mehra on July 10, 2011 at 11:30am — No Comments

क्यों नहीं किसानों की चिंता ?

भारत एक कृषि प्रधान देश है और अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि को ही मानी जाती है। बावजूद, अन्नदाताओं की चिंता कहीं नजर नहीं आती। देश में भूमिपुत्रों की माली हालत बद्तर से बद्तर होती जा रही है और सरकार द्वारा महज नीतियां बनाने की बात की जाती है और जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, वैसे ही किसानों से जुड़े मुद्दे भी रद्दी की टोकरी में डाल दिए जाते हैं। सरकार की ओर से कृषि बजट को बढ़ाने तथा किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के बारे में जैसा प्रयास होना चाहिए, वैसा अब तक नहीं हो सका है। यही कारण है कि देश के…

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Added by rajkumar sahu on July 10, 2011 at 1:44am — No Comments

वलवले

किये अपने पे, पछताता बहुत है |
तड़पता है, जो तड़पाता बहुत है ||
वो महफ़िल में, भी समझे, खुद को तंहा |
हो तन्हाई तो, घबराता बहुत है ||
कहे न, हाल के बारे में, कुछ भी |
सिर्फ माझी को, दोहराता बहत है ||
दिखावे के लिए है, मुस्कराता |
वो दिल ही दिल में, गम खाता बहुत है ||
किनारा कर लिया अपनों से उसने |
उसे खुद पर, तरस आता बहुत है ||
वो अब गैरों में अपने ढूंढ़ता है |
'शशि' के पास वो आता बहुत है ||

Added by Shashi Mehra on July 9, 2011 at 12:16pm — No Comments

शोर-ए-दिल

यह चक्कर क्या है, कि चक्कर समय का |

चला रहता है, यह थमता नहीं है ||



बुढापा इस कदर, हावी हुआ है |

जो पच जाता था, अब पचता नहीं है ||



मेरे ज़ख्मों पे, मरहम मत लगाओ |

अब इससे भी तो, कुछ बनता नहीं है ||



बहुत मांगीं दुआएँ, थक गया हूँ |

दुआओं में असर, लगता नहीं है ||



वो, है तो साँप, पर आदत है उसकी |

डराता है सिर्फ, डंसता नहीं है ||



हमें लगता था, कि वह हस रहा है |

अस्ल मैं जो कभी, हँसता नहीं है…

Continue

Added by Shashi Mehra on July 9, 2011 at 10:30am — 1 Comment

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - एक-एक कर मंत्रियों पर गाज गिर रही है।

पहारू - हां, अब उनके भाग्य में जेल की रोटी लिखी है।





2. समारू - सुप्रीम कोर्ट के सख्त फैसलों से सरकारों की नींदे उड़ गई हैं।

पहारू - अब सरकारें कहां रह गई हैं, वो तो कठपुतली बनकर रह गई है।





3. समारू - राहुल बाबा, किसानों के दर्द को समझने निकले हैं।

पहारू - मगर यूपीए-2 के दर्द का मर्ज भी तो ढूंढना चाहिए।





4. समारू - सरकार, माओवादियों से वार्ता की तैयारी कर रही है।

पहारू - वार्ता के… Continue

Added by rajkumar sahu on July 9, 2011 at 2:04am — No Comments

अपनी लिखी पुस्तक शोर-ऐ-दिल से

अब मेरी आँख मैं, आँसू नहीं आने वाले |

लाख जी भर के, सता लें ये ज़माने वाले ||

अब तो शायद ही, किसी बात पे रोना आये |

हादसे इतने हुए, मुझको रुलाने वाले ||

जानता हूँ की नहीं लौट के, फिर आयेंगे |

जितने लम्हे थे, मेरे दिल को, लुभाने वाले ||

राह तकता हूँ, खुली आँख से सोते-सोते |

लौट जाएँ न कहीं, लौट के आने वाले ||

गैर होते तो, ज़माने से, गिला भी करते |

मेरे अपने हैं, मेरा चैन , चुराने वाले ||

कट तो जायेगी 'शशि', उम्र ये जैसे-तैसे |

हम भी रूठों… Continue

Added by Shashi Mehra on July 8, 2011 at 6:34pm — No Comments

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