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Dr. Vijai Shanker's Blog (202)

जिंदगी के लिए — डॉo विजय शंकर

कभी लगता है ,

वक़्त हमारे साथ नहीं है ,

फिर भी हम वक़्त का साथ नहीं छोड़ते।

कभी लगता है ,

हवा हमारे खिलाफ है ,

फिर भी हम हवा का साथ नहीं छोड़ते l

कभी लगता है ,

जिंदगी बोझ बन गयी है ,

फिर भी हम जिंदगी को नहीं छोड़ते l

कभी लगता है

सांस सांस भारी हो रही है ,

फिर भी हम सांस लेना नहीं छोड़ते l

ये सब जान हैं

और जान के दुश्मन भी l

जिंदगी की लड़ाई हम

जिंदगी में रह कर लड़ते हैं ,

जिंदगी के बाहर जाकर कौन…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 16, 2019 at 10:04pm — No Comments

गणतंत्र - एक सूक्ष्म कविता - डॉo विजय शंकर

सूक्ष्म कविता - गणतंत्र - डॉo विजय शंकर

गण का तंत्र
या
तंत्र का गण ?

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 26, 2019 at 10:47am — 6 Comments

टुकड़ों में बटा आदमी - डॉo विजय शंकर

टुकड़ों में बटा आदमी 

टुकड़ों की बात करता है , 

टुकड़ों को छोटे , और छोटे 

टुकड़ों…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 8, 2018 at 10:05pm — 18 Comments

टकराव — डॉo विजय शंकर

फिर एक बार 

स्वाधीनता का 

जश्न मनाया हमने। 

पर अभी भी स्वाधीनता 

का…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 15, 2018 at 9:59am — 8 Comments

मार्केटिंग - डॉo विजय शंकर

प्रचार हो रहा है ,
प्रचार चल रहा है ,
दुष्प्रचार दौड़ रहा है ,
अपनी ढपली ,
अपना राग बज रहा है ,
स्वप्रचार ,
स्वयं का उपहास बन रहा है ,
दूसरे का दुष्प्रचार ,
न हास्य है , न व्यंग है ,
स्वयं आपके व्यक्तित्व से
चिपटता जा रहा है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on August 7, 2018 at 7:59pm — 11 Comments

क्षणिकायें — डॉo विजय शंकर



बहुत कुछ , बहुत हास्यास्पद है ,

फिर भी किसी को हंसी आती नहीं।

बहुत कुछ , बहुत दुखदायी है , 

फिर भी आंसू किसी को आते नहीं।… 1.

बाज़ार भी अजीब जगह है

जहां आप शाहंशाह होकर भी

रोज बिक तो सकते हैं , पर एक

दिन को भी अपनी पूरी हुकूमत में ,

पूरा बाज़ार खरीद नहीं सकते ………. 2 .

बहुत शिकायतें हैं हवा से

कि बुझा देती हैं चिरागों को ,

चलो एक चिराग ही बिना

हवा के जला के दिखा दो। ……….. 3…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 21, 2018 at 8:30pm — 13 Comments

कोई फरक नहीं पड़ता — डॉo विजय शंकर

क्या फरक पड़ता है ,
कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने
आपको और आपकी
किसी भी बात को नहीं समझा।
आपको , आप जैसे लोगों ने तो
समझा और खूब समझा।
आपकी नैय्या उनसे और
उनकी नैय्या आपसे
पार लग ही रही है ,
आगे भी लग जाएगी ।

- मौलिक एवं अप्रकाशित
 

Added by Dr. Vijai Shanker on March 23, 2018 at 5:41am — 7 Comments

सब सही पर कुछ भी सही नहीं है - डॉo विजय शंकर

आप सही हैं,
वह भी सही है ,
हर एक सही है ,
फिर भी कुछ भी
सही नहीं है।
कुछ गिने चुने
लोग बहुत खुश हैं ,
यह भी सही नहीं है।
सच जो भी है ,
सब जानते हैं ,
बस मानते नहीं ,
यह भी सही नहीं है।
ऊँट सामने है ,
देखते नहीं,
हड़िया में ढूँढ़ते है ,
यह भी सही है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on February 21, 2018 at 8:40am — 13 Comments

बंधन की डोरियां - डॉo विजय शंकर

कुछ डोरियां

कच्चे धागों की होती हैं ,

कुछ दृश्य होती हैं ,

कुछ अदृश्य होती हैं ,

कुछ , कुछ - कुछ

कसती , चुभती भी हैं ,

पर बांधे रहती हैं।

कुछ रेशम की डोरियां ,

कुछ साटन के फीते ,

रंगीले-चमकीले ,फिसलते ,

आकर्षित तो बहुत करते हैं ,

उदघाट्न के मौके जो देते हैं ,

पर काटे जाते हैं।

इस रेशम की डोरी

की लुभावनी दौड़ में ,

ज़रा सी चूक ,

बंधन की डोरियां

छूट गईं या टूट गईं ,

रेशम की डोरियां …

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 4, 2018 at 9:30am — 10 Comments

क्षणिकाएं - डॉ. विजय शंकर


  • 1.
    सच का कहीं दूर तक
    नहीं कोई पता है।
    हाँ ये सच है
    कि बहुत कुछ
    झूठ पर टिका है।
    2.
    रेत मुठ्ठी से जब
    फिसल जाती है ,
    जिंदगी कुछ कुछ
    समझ में आती है।
    3.
    रोज रोज के तजुर्बे
    यूँ बीच बीच में
    बांटा न करो ,
    ये जिंदगी गर
    एक सबक है तो
    उसे पूरा तो हो लेने दो

  • मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on December 24, 2017 at 7:52pm — 12 Comments

पढ़े-लिखे हैं आप तो - डॉo विजय शंकर

पढ़े-लिखे हैं आप तो आपको

पढ़े-लिखे दिखना चाहिए।

मोटर कार हो सब ,फिर भी अक्ल से ,

आपको , बिलकुल पैदल दिखना चाहिए।

कपड़े अजीब, चाल अजीब , हाव-भाव अजीब ,

बातचीत में अजीब होना और दिखना चाहिये।

रचनात्मक होना तो बहुत कठिन होता है ,

विध्वंस और क्रान्ति की बात करनी आनी चाहिए।

सबसे बड़ी बात आपको

घर फूंक तमाशा देखना आना चाहिए।

अपनी बुनियाद को निरंतर हिलाना और

मौक़ा लगते ही उखाड़ देना चाहिए।

आपको वो तो लपक लेंगे ही

जो उकसा रहे हैं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on November 13, 2017 at 10:57am — 15 Comments

लोकतंत्र - डॉo विजय शंकर

( 1 )
लोकतंत्र ?
जो लोक ले
उसी का तंत्र।

( 2 )
लोक तंत्र ,
इहलोक तक
परलोक का
विचार नहीं।

( 3 )
लोकतंत्र ,
लोक का तंत्र
या लोक से
ऊपर तंत्र।

( 4 )
शेर अकेला हो तो उसकी
दहाड़ के सामने भी आवाज़
उठा देते हैं लोग।
झुण्ड में भेड़-बकरिया हों तो
उनकीं हाँ में हाँ मिलाते हैं वही लोग।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on November 7, 2017 at 8:30am — 11 Comments

हवा में - डॉo विजय शंकर

हमने एक मकान बनाया ,
सबसे पहले
छत को बनाया ,
चढ़ कर उस पर
उछले-कूदे ,
खूब चिल्लाये ,
नाचे- गाये ,
देख आसमान ,
खूब इतराये ,
लगा , लपक कर
छू लेंगें ,
मुठ्ठी में नभ कर लेंगें ,
और जब नीचे झाँका , देखा ,
अचानक तब घबराये ,
हा , बुनियाद ,
कहाँ छोड़ आये।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on October 24, 2017 at 10:29am — 21 Comments

सदी ऊपर का मुकद्दमा - डॉo विजय शंकर।

अदालत लगी हुयी थी। वकील साहब लोग अपनी अपनी कुर्सियों पर बैठ चुके थे। तभी एक मुवक्किल दौड़ता हुआ आया , सीधे अपने वकील साहब के पास पहुंचा और हाथ जोड़ कर बोला ,

" राम राम साहेब " ,

" राम राम " वकील साहेब ने कहा और उसे पीछे एक बेंच दिखा कर कहा , " वहां बैठ जाओ " . वह बैठ गया। दो चार आस पास बैठे लोगों को भी हाथ जोड़ कर वह राम राम करता रहा। तभी अर्दली ने अदालत की डॉयस पर आकर इत्तला दी ,

" साहेब पधार रहे हैं " .

सभी लोग अपने अपनी जगह पर उठ कर खड़े हो गए।

जज साहेब आये ,… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 19, 2017 at 10:00pm — 2 Comments

उपलब्धियाँ - डॉo विजय शंकर

उप-शीर्षक -आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस से आर्टिफिशल हँसी तक।

प्रकृति ,
अनजान ,
पाषाण ,
ज्ञान
विज्ञान ,
गूगल ,
आट्रिफिश्यल विवेक ,
आर्टिफिशियल हँसी ,
शुभ प्रभात।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on October 17, 2017 at 7:34am — 12 Comments

सत्यमेव् जयते - डॉo विजय शंकर

सत्य के प्रति उनका समर्पण
झुठलाया नहीं जा सकता ,
सफलता उन्होंने चाहे कैसे ,
कितने ही झूठों से पायी हो ,
श्रेय सदैव सत्य को ही दिया।
अपनी हर जीत को सदैव
सत्य की जीत ही बताया।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on October 12, 2017 at 6:48pm — 10 Comments

पाओगे वही जो चाहोगे -- डॉo विजय शंकर

सच बोलू ,
सुन पाओगे ?
सत्य-मार्ग है ,
चल पाओगे ?
विजय-पथ है ,
लड़ पाओगे ?
प्रेम है ,
ले पाओगे ?
मित्रता है ,
निभा पाओगे ?
थोड़ा मीठा है ,
खा लोगे ?
नमक तेज है ,
खा लोगे ?
मुद्दा है ,
सुलझाओगे ?
या भुनाओगे ?
हर समस्या का
हल है ,
हल चाहोगे ?
बात ये है कि
पाओगे वही
जो चाहोगे।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 30, 2017 at 10:45am — 10 Comments

पाओगे वही जो चाहोगे -- डॉo विजय शंकर

सच बोलू ,
सुन पाओगे ?
सत्य-मार्ग है ,
चल पाओगे ?
विजय-पथ है ,
लड़ पाओगे ?
प्रेम है ,
ले पाओगे ?
मित्रता है ,
निभा पाओगे ?
थोड़ा मीठा है ,
खा लोगे ?
नमक तेज है ,
खा लोगे ?
मुद्दा है ,
सुलझाओगे ?
या भुनाओगे ?
हर समस्या का
हल है ,
हल चाहोगे ?
बात ये है कि
पाओगे वही
जो चाहोगे।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 30, 2017 at 10:44am — No Comments

आपका हक़ - डॉo विजय शंकर

क्या कहा ,
आपका हक़ आपको
दिया नहीं गया ?
क्योंकि हक़ आपका आपसे
हाथ जोड़ के माँगा नहीं गया।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 25, 2017 at 8:04pm — 16 Comments

गरीबी - उपचार -- डॉo विजय शंकर

किसी ने गरीब को
एक जोड़ी चप्पल दिला दी
किसी ने भूखे को एक वक़्त
शानदार रेस्त्रां में रोटी खिला दी ,
रेस्त्रां के मालिक ने
खाने के पैसे नहीं लिए
कहा , मानवता के पैसे नहीं लगते ,
कुछ इस तरह एक छोटे गरीब ने
एक बड़े गरीब की गरीबी मिटा दी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on July 3, 2017 at 10:12am — 12 Comments

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