पड़ते दुख के घाट पर, कभी न जिनके पाँव
समझ न आता है उन्हें, जग में रोता गाँव।१।
*
चल आती है जो खुशी, दुख बैठा जिस राह
पुरखों से सुनते वही, टिकती बहुत अथाह।२।
*
सुख से सुख की कब हुई, तुलना जग में बोल
सुख का करते मान हैं, बजकर दुख के ढोल।३।
*
दुख आकर देता सदा, सुख को रंग हाजार
उस बिन फीका ही रहे, सुख का घर संसार।४।
*
दुख तो ऐसा बौर है, जिस भीतर सुख बीच
जोर-जबर से कब इसे, कोई सका उलीच।५।
*…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 22, 2024 at 6:00am — 2 Comments
दोहा पंचक. . . . . गिरगिट
बात- बात पर आदमी ,बदले रंग हजार ।
गिरगिट सोचे क्या करूँ, अब इसका उपचार ।।
गिरगिट माँगे ईश से, रंगों का अधिकार ।
लूट लिए इंसान ने, उसके रंग अपार ।।
गिरगिट तो संसार में, व्यर्थ हुई बदनाम ।
रंग बदलना आजकल, इंसानों का काम ।।
गिरगिट बदले रंग जब , भय का हो आभास।
मानव बदले रंग जब, छलना हो विश्वास ।।
शायद अब यह हो गया, गिरगिट को आभास ।
नहीं सुरक्षित आजकल, इंसानों में वास ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on July 16, 2024 at 8:30pm — 3 Comments
रात के हुस्न पर थी टँकी चाँदनी
पर घटाओं से ही मैं उलझता रहा
चाँद पाने की कोशिश नहीं थी मगर
चाँद छूने को ही मैं मचलता रहा
सिक्त आँचल हिलाती रही रात भर
फिर भी गुमसुम हवा ही बही रात भर
कुछ सितारे ही बस झिलमिलाते रहे
धैर्य की ही परीक्षा चली रात भर
प्रीति के दर्द को भी दबाये हुए
घूँट आँसू के ही मैं निगलता रहा
चाँद आया नहीं देर तक सामने
स्याह बादल लगे चादरें…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on July 16, 2024 at 5:43pm — 6 Comments
१२१२ ११२२ १२१२ २२
मिज़ाज़-ए-दश्त पता है न नक़्श-ए-पा मालूम
हमारे दर्द-ए-जिगर का भी किसको क्या मालूम
करेगा दर्द से आज़ाद या जिगर छलनी
तुम्हारे तीर-ए-नज़र की किसे रज़ा मालूम
न जाने कैसे थमेगा ये सिलसिला ग़म का
कोई बताये किसी को हो गर ज़रा मालूम
झुकाएं कौन से दर पर ज़बीं ये दीवाने
वफ़ा का कौन सा घर है किसी को क्या मालूम
क़फ़स में क़ैद परिंदे की बेबसी देखो
न हश्र-ए-क़ैद पता है न है ख़ता…
ContinueAdded by Aazi Tamaam on July 14, 2024 at 11:30am — 10 Comments
Added by Mamta gupta on July 13, 2024 at 11:28am — 5 Comments
लफ़्ज़ों को हथियार बना
फिर उसमें तू धार बना
छोड़ तवज़्ज़ो का रोना
अपना इक मेयार बना
लंबा वृक्ष बना ख़ुद को
लेकिन छायादार बना
बेवकूफ़ियाँ बढ़ती गयीं
जितना बशर हुश्यार बना
शिकवा गुलों से है न तुझे?
तो कांटों को यार बना
जिसने दिखाई राह नई
वो दुनिया का शिकार बना
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Added by जयनित कुमार मेहता on July 9, 2024 at 7:53pm — 4 Comments
दोहा सप्तक : इच्छा ,कामना, चाह आदि
मानव मन संसार में, इच्छाओं का दास ।
और -और की चाह में, निस-दिन बढ़ती प्यास ।1।
इच्छा हो जो बलवती, सध जाता हर काम ।
चर्चा उसके नाम की, गूँजे आठों याम ।2।
व्यवधानों की लक्ष्य में, जो करते परवाह ।
क्षीण लगे उद्देश्य में, उनके मन की चाह ।3।
अन्तर्मन की कामना, छूने की आकाश ।
सम्भव है यह भी अगर, होवें नहीं हताश ।4।
परिलक्षित संसार में, होता वो परिणाम ।
इच्छा के अनुरूप…
Added by Sushil Sarna on July 5, 2024 at 8:30pm — 8 Comments
बात सुनकर ही कुछ कहा जाए,
हो न ये, बात का मजा जाए।
बोल चल देते वे ठिकाने तज,
मूल जिनका हवा-हवा जाए।
सत्य कहने का भी सलीका है,
जिसको छोड़ो, न सच सहा जाए।
जिंदगी है, खुशी-ओ-रंज भी हैं,
साथ इनके मियां जिया जाए।
काम ईमान से करे अपना,
तो वो इंसाँ भला कहा जाए।
'बाल' सच को नकारा ही जाता,
ऐसा भी क्यों समझ लिया जाए?
मौलिक अप्रकाशित
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 4, 2024 at 10:18pm — 2 Comments
दोहा एकादश. . . . जरा काल
दृग जल हाथों पर गिरा, टूटा हर अहसास ।
काया ढलते ही लगा, सब कुछ था आभास ।।1
जीवन पीछे रह गया, छूट गए मधुमास ।
जर्जर काया क्या हुई, टूट गई हर आस ।।2
लार गिरी परिधान पर, शोर हुआ घनघोर ।
काया पर चलता नहीं, जरा काल में जोर ।।3
लघु शंका बस में नहीं, थर- थर काँपे हाथ ।
जरा काल में खून ही , छोड़ चला फिर साथ ।।4
अपने स्वर्णिम काल को ,मुड़-मुड़ देखें नैन ।
जीवन फिसला रेत सा, काटे कटे न रैन ।।5
सूखा रहता…
ContinueAdded by Sushil Sarna on July 3, 2024 at 2:00pm — No Comments
दोहे आज के .....
बिगड़े हुए समाज का, बोलो दोषी कौन ।
संस्कारों के ह्रास पर, आखिर हम क्यों मौन ।।
संस्कारों को आजकल, भला पूछता कौन ।
नंगेपन के प्रश्न पर, आखिर हम क्यों मौन ।।
नर -नारी के मध्य अब, नहीं शरम की रेख ।
खुलेआम अभिसार का, देख तमाशा देख ।।
सरेआम अब हो रहा, काम दृष्टि का खेल ।
युवा वर्ग में आम अब, हुआ अधर का मेल ।।
सभी तमाशा देखते, कौन करे प्रतिरोध ।
कल के बिगड़े रंग का, नहीं किसी को बोध ।।
कर में कर को थाम कर, चले…
ContinueAdded by Sushil Sarna on June 27, 2024 at 9:27pm — No Comments
2122 1212 112/22
*
ज़ीस्त का जो सफ़र ठहर जाए
आरज़ू आरज़ू बिख़र जाए
बेक़रारी रहे न कुछ बाक़ी
फ़िक्र का दौर ही गुज़र जाए…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on June 25, 2024 at 3:30pm — 2 Comments
बुआ का रिबन
बुआ बांधे रिबन गुलाबी
लगता वही अकल की चाबी
रिबन बुआ ने बांधी काली
करती बालों की रखवाली
रिबन बुआ की जब नारंगी
हाथ में रहती मोटी कंघी
रिबन बुआ जब बांधे नीली
आसमान सी हो चमकीली
हरी लाल हो रिबन बुआ की
ट्रैफिक सिग्नल जैसी झांकी
बुआ रिबन जो बांधे पीली
याद आती है दाल पतीली
रिबन सफेद बुआ ने डाले
उड़े कबूतर दो…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on June 24, 2024 at 10:43pm — 2 Comments
1222 1222 122
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जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में
वो फ़्यूचर खोजता है लॉटरी में
दिखाई ही न दें मुफ़्लिस जहां से
न हो इतनी बुलंदी बंदगी में
दुआ करना ग़रीबों का भला हो …
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 22, 2024 at 3:30pm — 5 Comments
दोहे सप्तक . . . . . सच-झूठ
अभिव्यक्ति सच की लगे, जैसे नंगा तार ।
सफल वही जो झूठ का, करता है व्यापार ।।
झूठों के बाजार में, सत्य खड़ा लाचार ।
असली की साँसें घुटें, आडम्बर भरमार ।।
आकर्षक है झूठ का, चकाचौंध संसार ।
निश्चित लेकिन झूठ की, किस्मत में है हार ।।
सच के आँगन में उगी, अविश्वास की घास ।
उठा दिया है झूठ ने, सच पर से विश्वास ।।
झूठ जगाता आस को, सच लगता आभास ।
मरीचिका में झूठ की, सिर्फ प्यास ही प्यास ।।
सत्य पुष्प पर झूठ…
ContinueAdded by Sushil Sarna on June 18, 2024 at 9:13pm — No Comments
दोहा पंचक. . . सागर
उठते हैं जब गर्भ से, सागर के तूफान ।
मिट जाते हैं रेत में, लहरों के अरमान ।।
लहर- लहर में रेत पर, मचलें सौ अरमान ।
मौन तटों पर प्रेम की, रह जाती पहचान ।।
छलकी आँखें देख कर, सूना सागर तीर ।
किसके अश्कों ने किया, खारा सागर नीर ।।
कौन बनाता है भला, सागर तीर मकान ।
अरमानों को लीलता, इसका हर तूफान ।।
देखा पीछे पर कहाँ, जाने गए निशान ।
हर वादे को दे गया, घाव एक तूफान ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on June 10, 2024 at 1:00pm — 6 Comments
२२१/२१२१/१२२१/२१२
कानों से देख दुनिया को चुप्पी से बोलना
आँखों को किसने सीखा है दिल से टटोलना ।१।
*
कौशल तुम्हें तो आते हैं ढब माप तौल के
जब चाहो खूब नींद को सपनों से तोलना।२।
*
कब जाग जाये कौन सा बदज़ात जानवर
सीमा के हर कपाट को खुलकर न खोलना ।३।
*
करना हमेशा अन्न का जीवन में मान तुम
चाहे पड़े भकोसना या फिर कि चोलना।४।
*
चक्का समय का घूम के लौटा है फिर वहीं
जिस में…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2024 at 5:44am — No Comments
दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते
रिश्ते नकली फूल से, देते नहीं सुगंध ।
अर्थ रार में खो गए, आपस के संबंध ।।
रिश्तों के माधुर्य में, आने लगी खटास ।
मिलने की ओझल हुई, संबंधों में प्यास ।।
गैरों से रिश्ते बने, अपनों से हैं दूर ।
खून खून से अब हुआ, मिलने से मजबूर ।।
झूठी हैं अनुभूतियाँ , कृत्रिम हुई मिठास ।
रिश्तों को आते नहीं, अब रिश्ते ही रास ।।
आँगन में खिंचने लगी, नफरत की दीवार ।
रिश्तों की गरिमा…
Added by Sushil Sarna on June 7, 2024 at 8:30pm — 6 Comments
दोहा पंचक. . . . . दम्भ
हर दम्भी के दम्भ का, सूरज होता अस्त ।
रावण जैसे सूरमा, होते देखे पस्त । ।
दम्भी को मिलता नहीं, जीवन में सम्मान ।
दम्भ कुचलता जिंदगी, की असली पहचान ।।
हर दम्भी को दम्भ की, लगे सुहानी नाद ।
इसके मद में चूर वो, बन जाता सैयाद ।।
दम्भ शूल व्यक्तित्व का, इसका नहीं निदान ।
आडम्बर के खोल में, जीता वो इंसान ।।
दम्भी करता स्वयं का, सदा स्वयं अभिषेक ।
मैं- मैं को जीता सदा, अपना हरे…
Added by Sushil Sarna on June 2, 2024 at 6:56pm — No Comments
कहूं तो केवल कहूं मैं इतना कि कुछ तो परदा नशीन रखना।
कदम अना के हजार कुचले,
न आस रखते हैं आसमां की,
ज़मीन पे हैं कदम हमारे,
मगर खिसकने का डर सताए, पगों तले भी ज़मीन रखना।
उदास पल को उदास रखना,
छिपी तहों में खुशी दबी है,
न झूठी कोई तसल्ली लाना,
हो लाख कड़वी हकीकतें पर, न ख़्वाब कोई हसीन रखना।
दसों दिशाएं विलाप में हैं,
बिसात बातों की बिछ गई है,
बुनाई लफ्जों की हो रही है,
हमारे आधे में तय तुम्हारा रखा है आधा यकीन…
Added by मिथिलेश वामनकर on May 29, 2024 at 11:52pm — 8 Comments
आग लगी आकाश में, उबल रहा संसार।
त्राहि-त्राहि चहुँ ओर है, बरस रहे अंगार।।
बरस रहे अंगार, धरा ये तपती जाए।
जीव जगत पर मार, पड़ी जो सही न जाए।
पेड़ लगा 'कल्याण', तुझी से यह आस जगी।
हरी - हरी हो भूमि, बुझे जो यह आग लगी !
सुरेश कुमार 'कल्याण'
मौलिक एवम् अप्रकाशित
Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 29, 2024 at 8:00pm — 2 Comments
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