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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s Blog (137)

बने हमसफ़र तेरी ज़ीस्त में कोई मेहरबाँ वो तलाश कर (१६)

11212 *4

बने हमसफ़र तेरी ज़ीस्त में कोई मेहरबाँ वो तलाश कर

जो हयात भर तेरा साथ दे कोई जान-ए-जाँ वो तलाश कर

***

तेरे सुर में सुर जो मिला सके तेरे ग़म में साथ निभा सके

तेरे संग ख़ुशियाँ मना सके कोई हमज़बाँ वो तलाश कर

***

कहीं डूब जाये न दरमियाँ कभी सुन के बह्र की धमकियाँ

चले नाव ठीक से ज़ीस्त की कोई बादबाँ वो तलाश कर

***

भला लुत्फ़ क्या मिले प्यार में नहीं गर अना रहे यार में

जो अदा से जानता रूठना कोई सरगिराँ वो तलाश कर

***

ये…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 20, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ (१५)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )

झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ

खेल करते हैं वतन की नई तामीर के साथ 

***

ख़्वाब देखोगे न तो खाक़ मुकम्मल होंगे 

ये तो पैवस्त* हुआ करते हैं ताबीर के साथ 

***

जो बना सकते नहीं चन्द निशानात कभी 

हैफ़* क्या हश्र करेंगे वही तस्वीर के साथ 

***

ग़म भी हमराह ख़ुशी के नहीं रहते,जैसे

कोई शमशीर कहाँ रहती है शमशीर के…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 19, 2019 at 2:30am — 8 Comments

ग़ज़ल: ख़त्म इकबाल-ए-हुकूमत को न समझे कोई (१४)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )

ख़त्म इकबाल-ए-हुकूमत* को न समझे कोई 

और लाचार अदालत को न समझे कोई 

***

मीर सब आज वुजूद अपना बचाने में लगे 

आम जनता की ज़रूरत को न समझे कोई 

***

ख़ून के रिश्ते भुला देती है जो इक पल में 

हैफ़ !भारत की सियासत को न समझे कोई 

***

जिस्म को छू लिया और इश्क़ मुकम्मल समझा 

इतना आसाँ भी महब्बत…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 14, 2019 at 12:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल: पांचों घी में रहती है जब सरकारी कारिन्दों की.............(१३)

(२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २ )

***

पांचों घी में रहती है जब सरकारी कारिन्दों की 

कौन सुने फ़रियाद अँधेरी नगरी के बाशिन्दों की 

***

टूटी है मिजराबें फिर भी साज़ बजाना पड़ता है 

बे-सुर होते सुर तो इसमें ग़ल्ती क्या साजिन्दों की 

***

फेंक दिया करते कचरे में क्या क्या लोग पुलिंदों में 

असली कीमत आज समझते कचराबीन पुलिंदों की …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 9, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल: न हसरतों से ज़ियादा रखें लगाव कभी ...(१२ )

(१२१२ ११२२ १२१२ २२/११२ )

***

न हसरतों से ज़ियादा रखें लगाव कभी 

वगरना क़ल्ब में मुमकिन है कोई घाव कभी 

***

इमारतें जो बनाते जनाब रिश्तों की 

उन्हें भी चाहिए होता है रखरखाव कभी 

***

हयात का ये सफर एक सा कहाँ होता 

कभी ख़ुशी तो मिले ग़म का भी पड़ाव कभी 

***

न इश्क़ की भी ख़ुमारी सदा रहे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 8, 2019 at 7:00pm — 17 Comments

'तुरंत' के दोहे (पुच्छल )

प्रस्तुत है कुछ पुच्छल दोहे 

=====================

प्रेम और उत्साह जब ,पैदा करें तरंग | 

छोड़ कुसुम के तीर तब , विहँसे तनिक अनंग || 

मिलन का क्षण ही ऐसा | 

***

देश प्रेम की हर समय ,उठती रहे हिलोर | 

उन्नति की फिर देश में ,निश्चित होगी भोर || 

यही हो लक्ष्य हमेशा | 

***

ह्रदय सभी के आ सकें ,थोड़े से भी पास | 

फिर निश्चित इस देश में ,छा जाये…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 6, 2019 at 2:30pm — 5 Comments

हज़ारों बार क़ुदरत ने इशारा तो किया होगा  ........(११)

++ग़ज़ल ++(1222 1222 1222 1222 )

हज़ारों बार क़ुदरत ने इशारा तो किया होगा 

कभी नाहक कोई तूफ़ान शायद ही उठा होगा 

***

जुनूनी है जिसे मंज़िल नज़र भी साफ़ आती है 

वही अक़्सर अचानक नींद से उठकर खड़ा होगा 

***

समझ रक्खे कोई तो इश्क़ की गलियाँ नहीं देखे 

क़दम पहला उठाया वो यक़ीनन सरफिरा होगा 

***

नफ़ा-नुक़्सान उल्फ़त में लगाए कौन छोडो…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 5, 2019 at 4:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल: लगता है इस साल सनम कटनी तन्हाई मुश्किल है  ... (१० )

( २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २ )

.

लगता है इस साल सनम कटनी तन्हाई मुश्किल है 

बीते लम्हों के सहरा से हैफ़* ! रिहाई मुश्किल है (*हाय-हाय ,अफ़सोस  )

***

ख्वाब तसव्वुर ख़त मौसम ये चाँद बहाने कितने हैं 

तेरी यादों के लश्कर से यार जुदाई मुश्किल है 

***

माना ग़म की मार पड़ी है चारों खाने चित्त हुआ 

कैसे भी हों मेरे अब हालात गदाई* मुश्किल…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 4, 2019 at 3:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल: बना हूँ ज़ीस्त में मर्ज़ी से मेरी आबिर भी .......(९ )

(1212 1122 1212 22 /112 )

.

बना हूँ ज़ीस्त में मर्ज़ी से मेरी आबिर* भी (*राहगीर )

फ़क़ीर मीर कभी और कभी मुसाफ़िर भी 

*

किया शुरू'अ जहाँ से सफ़र न सोचा था

उसी जगह पे सफर होगा मेरा आखिर भी 

*

ये दौड़भाग तो पीछा कभी न छोड़ेगी 

ज़रा सा वक़्त निकालो ना ख़ुद की ख़ातिर भी 

*

किसी ग़रीब की हालत का ज़िक़्र क्या…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 3, 2019 at 10:00am — 10 Comments

कैसा होगा नया साल यह, कहना शायद मुश्किल है ......... (८ )

कैसा होगा नया साल यह, कहना शायद मुश्किल है 

मनोकामना सम्भव है पर , अच्छी हो सबकी ख़ातिर | 

***

लिखा नियति ने जो इस पर है निर्भर क्या हो अगले पल | 

कृपा बरस जाये प्रभु की या जीवन से हो जाये छल | 

लेकिन अच्छा सोचोगे तो होगा जीवन में अच्छा 

बुरा अगर सोचा तो वैसा सम्भव है हो जाये कल | 

ज्योतिष-ज्ञान सभी की ख़ातिर रखना शायद मुश्किल…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 1, 2019 at 10:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल: है कितना मुझ पे तुम्हारा क़याम लिख देना।....(६ )

(1212 1122 1212 22 ) 

है कितना मुझ पे तुम्हारा क़याम लिख देना 

उठे जो दिल में वो बातें तमाम लिख देना 

**

ज़रा सा हाशिया आगाज़ में ज़रूरी है 

ख़ुदा का नाम ले ख़त मेरे नाम लिख देना 

***

मुझे बताना कि क्या चल रहा है अब दिल में 

गुज़र रही है तेरी कैसे शाम लिख देना 

***

तरीका और भी है बात मुझ तलक पहुँचे 

हवा के हाथ…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 29, 2018 at 11:00am — No Comments

ये  मिला सिला हमें तुम्हारे एतबार का

आज पेश है एक नगमा --

*

ये  मिला सिला हमें तुम्हारे एतबार का

कारवाँ लुटा लुटा सा रह गया है प्यार का

*

न तुम हमारे हो सके न और कोई हो सका

ग़रीब का नसीब तो न जग सका न सो सका

न भूल हम सके सनम कभी तुम्हारी बुज़दिली

कि कोशिशों से भी कभी कली न दिल की फिर खिली

मौसम-ए-ख़िज़ाँ ने घोंट डाला दम बहार का

कारवाँ लुटा लुटा सा रह गया है प्यार का

*

यक़ीन कैसे हम करें कि ज़िंदगी में तुम नहीं

सुकून के हसीन पल हमारे खो गए कहीं

जिधर भी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 28, 2018 at 10:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल: बारम्बार सियासत की क्या (५ )

( 22 22 22 22 22 22 22 2 )

***

बारम्बार सियासत की क्या यह नादानी अच्छी है ? 

धर्मों की आपस में क्या आतिश भड़कानी अच्छी है ? 

***

रखना दोस्त बचाकर मोती कुछ ख़ुशियों की  ख़ातिर भी 

छोटे मोटे ग़म पर आती क्या तुग़्यानी* अच्छी है ?(*बाढ़ )

***

सोचा समझा था पुरखों ने फिर कानून बनाये कुछ 

आज़ादी की ख़ातिर तन की क्या उर्यानी* अच्छी है…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 27, 2018 at 11:30am — 8 Comments

गर मीर* ही न ध्यान रखेगा अवाम का। .....(४)

गर मीर* ही न ध्यान रखेगा अवाम का (*नायक )

फिर क्या करे अवाम भी ऐसे निज़ाम का 

***

अब तक न याद आई थी उसको अवाम की 

क्या रह गया यक़ीन फ़क़त आज राम का 

***

दौलत कमाई ख़ूब मगर इतना याद रख-

"बरकत नहीं करे कभी पैसा हराम का "

***

बेकार तो जहाँ में नहीं जिन्स* कोई भी (*वस्तु )

गर्द-ओ-गुबार भी कभी होता है काम…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 26, 2018 at 2:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल:पुरखार रहगुज़र है चलना सँभल सँभल के......(३)

(221 2122 221 2122 )



पुरखार रहगुज़र है चलना सँभल सँभल के

आसाँ नहीं निभाना मत लेना इश्क़ हल्के

***

सच कह रहे हैं हमने देखा बहुत ज़माना

रह जाएँ आग में सब आशिक़ कहीं न जल के

***

दम तोड़ती यहाँ पर आई नज़र है हसरत

देखे हैं लुटते अरमाँ हर पल मचल मचल के

***

जो चाहते हैं अपना चैन-ओ-सुकून खोना

मैदाँ में वो ही आये हाथों में थूक मल के

***

अक़्सर यहाँ पे पड़ता मिर्गी के जैसा दौरा

कटती है रात सारी करवट बदल बदल के

***…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 24, 2018 at 11:30am — 6 Comments

ग़ज़ल --ज़मीँ थे तुम मुहब्बत की.......(२)

ज़मीँ थे तुम मुहब्बत की तुम्हीँ गर आस्माँ होते 

हमारे ग़म के अफ़साने ज़माने से निहाँ* होते (*छुपे हुए )

***

बने हो गैर के ,रुख़्सत हमारी ज़ीस्त से होकर 

न देते तुम अगर धोका हमारे हमरहाँ* होते (*हमसफर )

***

तुम्हारी आँख  की मय को अगर पीते ज़रा सी हम 

तुम्हीं साक़ी बने होते तुम्हीं पीर-ए-मुग़ाँ* होते(*मदिरालय का प्रबंधक ) 

***

बनाया हिज़्र को हमने…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 23, 2018 at 2:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल--फरेब ओ झूठ की यूँ तो सदा.......(१)

बह्र -बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम

अरकान -मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 

मापनी-1222 1222 1222 1222

***

फरेब-ओ-झूठ की यूँ तो सदा जयकार होती है,

मगर आवाज़ में सच की सदा खनकार होती है।

**

हुआ क्या है ज़माने को पड़ी क्या भाँग दरिया में 

कोई दल हो मगर क्यों एक सी सरकार होती है 

***

शजर में एक साया भी छुपा रहता है अनजाना

मगर उसके लिए…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 21, 2018 at 5:00pm — 15 Comments

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