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जनक छंदी सलिला: २ संजीव 'सलिल

जनक छंदी सलिला: २                                                                         



संजीव 'सलिल'

*

शुभ क्रिसमस शुभ साल हो,

   मानव इंसां बन सके.

      सकल धरा खुश हाल हो..

*

दसों दिशा में हर्ष हो,

   प्रभु से इतनी प्रार्थना-

       सबका नव उत्कर्ष हो..

*

द्वार ह्रदय के खोल दें,

   बोल क्षमा के बोल दें.

      मधुर प्रेम-रस घोल दें..

*

तन से पहले मन मिले,

   भुला सभी शिकवे-गिले.

      जीवन में… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on December 24, 2010 at 9:30pm — 2 Comments

अभिनंदन - अभिनंदन

Added by DEEP ZIRVI on December 24, 2010 at 3:00pm — No Comments

आज इस खामोश रात में,तुम को याद में करता हूँ

आज इस खामोश रात में,तुम को याद में करता हूँ

अतीत के बीते पन्नों को,उलट उलट के पढता हूँ



आज इस खामोश रात में,तुम को याद में करता हूँ



जब सर पे तेरा साया था

तब ये ख्याल न आया था

अब ओढ़ के काले अम्बर को

आँचल तेरा समझता हूँ



आज इस खामोश रात में,तुम को याद में करता हूँ



कहता था याद करूंगा नहीं

कभी भी बात करूंगा नहीं

पर आज तुम्हारी यादों को

आँखों में सजा के रखता हूँ



आज इस खामोश रात में, तुम को याद में करता हूँ…
Continue

Added by Bhasker Agrawal on December 24, 2010 at 12:04pm — 8 Comments

नवगीत: मुहब्बत संजीव 'सलिल

नवगीत:



मुहब्बत



संजीव 'सलिल'

*

दिखाती जमीं पे

है जीते जी

खुदा की है ये

दस्तकारी मुहब्बत...

*

मुहब्बत जो करते,

किसी से न डरते.

भुला सारी दुनिया

दिलवर पे मरते..



न तजते हैं सपने,

बदलते न नपने.

आहें भरें गर-

लगे दिल भी कंपने.

जमाने को दी है

खुदाने ये नेमत...

*

दिलों को मिलाओ,

गुलों को खिलाओ.

सपने न टूटें,

जुगत कुछ भिड़ाओ.



दिलों से मिलें दिल.

कली-गुल रहें खिल.

मिले आँख तो… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on December 24, 2010 at 8:16am — 3 Comments

जनक छंदी सलिला : १. संजीव 'सलिल'

जनक छंदी सलिला : १.

संजीव 'सलिल'

*

आत्म दीप जलता रहे,

तमस सभी हरता रहे.

स्वप्न मधुर पलता रहे..

*

उगते सूरज को नमन,

चतुर सदा करते रहे.

दुनिया का यह ही चलन..

* हित-साधन में हैं मगन,

राष्ट्र-हितों को बेचकर.

अद्भुत नेता की लगन..

*

सांसद लेते घूस हैं,

लोकतन्त्र के खेत की.

फसल खा रहे मूस हैं..

*

मतदाता सूची बदल,

अपराधी है कलेक्टर.

छोडो मत दण्डित…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on December 23, 2010 at 11:30pm — 4 Comments

मेरी बारी कब आएगी ,

आया जब मैं उज्जवल बेला ,

हसी ख़ुशी का मस्त सवेरा ,

था सब अपना नही पराया ,

ये सब उन लोगो से पाया ,

सोचता हूँ मैं अक्सर यारा ,

मेरी बारी कब आएगी  !…

Continue

Added by Rash Bihari Ravi on December 23, 2010 at 7:00pm — 3 Comments

चल मेरे मन चलें वहाँ..



चल मेरे मन चलें वहाँ..  … Continue

Added by Lata R.Ojha on December 23, 2010 at 4:30pm — 6 Comments

झूठ नहीं बोलते (लघुकथा)

एक लड़का लड़की रेस्तरां में बैठे थे ..

लड़का : अब मान भी जाओ, इतना गुस्सा ठीक नहीं .
लड़की : देखो तुम्हे झूठ नहीं बोलना चाहिए था,प्यार में झूठ नहीं बोलते

तभी लड़की का फोन बजा ..
हेलो! ..हाँ मम्मी में रस्ते में ही हूँ ..

Added by Bhasker Agrawal on December 23, 2010 at 11:14am — 7 Comments

क्या है

उसने पूछा ये क्या है

मैंने कहा सवाल है

उसने पूछा सवाल क्या है

मैंने कहा ख्याल है

उसने पूछा ख्याल क्या है

मैंने कहा बवाल है

उसने पूछा बवाल क्या है

मैंने कहा मेरा हाल है

Added by Bhasker Agrawal on December 22, 2010 at 11:48pm — 1 Comment

सच कहू धन्य हुआ OBO इन्हें पाकर ,

कोई अभिनव कोई बागी कोई हैं प्रभाकर ,

सच कहू धन्य हुआ OBO इन्हें पाकर ,

सलिल जी की शायरी मस्त
भरी गीत हैं ,

आती हैं मस्ती मन में जोगेंद्र ब्लॉग पाकर ,

नविन राकेश राणा इसके तो सितारे हैं ,

नीलम जी, रंजना जी, अनीता जी आकर

दीपक शर्मा जी की बाते निराली हैं ,

बिजय , प्रीतम , और रत्नेश भाई अक्सर ,

गुरु भी धन्य हुए इन सब को संग पाकर ,

सतीश जी के गीत मन को भोराकर ,

लिखते अच्छे ब्लॉग…

Continue

Added by Rash Bihari Ravi on December 22, 2010 at 7:30pm — 6 Comments

GHAZAL - 18

                       ग़ज़ल





न  जाने  कब  वो  समझेंगे  मुहब्बत  मेरे इस दिल की |

सताती  है  बहुत  मुझको,  अदा  
ये  मेरे  कातिल  की ||



ज़माना  देख  कर  मुझको,  पलट  कर  के  उलझता  है,

नज़र   मेरी   तरफ   उठती  नहीं  पर  मेरी  मंजिल  की ||



जिन्हें   मेरी   तमन्ना   है,  मेरी   चाहत   नहीं  हैं  वो,

मेरी  चाहत  की  चाहत  मैं  नहीं, है  बात …
Continue

Added by Abhay Kant Jha Deepraaj on December 22, 2010 at 2:30pm — 3 Comments

ये..इश्क ही तो है..

चमकती चाँदनी के काजल सी रात..





सर्द हवा और तारों का साथ.. …



Continue

Added by Lata R.Ojha on December 22, 2010 at 2:00pm — 9 Comments

जो ढूंढ सको तो..

 …

Continue

Added by Lata R.Ojha on December 22, 2010 at 1:30pm — 8 Comments

प्रेम से : कुछ अलग ..कुछ जुदा, जीवन का सच ..

ये पेट की आग भी

क्या क्या न कराती है ...

 

चैन नहीं दिन में

रातें भी घबराती हैं ...

 

जीवन जीने की इच्छा

मन को ललचाती है ...

 

आगे बढ़ने की ख्वाइश

मेहनत खूब कराती है ...

 

न गर्मी से तपता है तन

न ठण्ड डरा पाती है .....

 

ये पेट की आग भी

क्या क्या न कराती है ...

मेहनत नहीं…
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Added by Anita Maurya on December 22, 2010 at 1:30pm — 7 Comments

दिल की ख्वाहिश ...................

दिल की ख्वाहिश ...................
दिल की ख्वाहिश 
 
एक बार फिर 
दिल की ख्वाहिश है 
कुछ कहने की 
कुछ सुनने की 
कुछ दिल की बातें कहने की 
कुछ किसी के मन की सुनने की 
 
पर किससे पूछूं वह सवाल 
जिसे पूछने का साहस 
अब तक न जुटा सका मन 
कैसे कहूं कि 
धर्म की आग में 
मत करो 
मन होम 
 
कैसे कहूं…
Continue

Added by Amit Prabhu Nath Chaturvedi on December 22, 2010 at 10:19am — 4 Comments

मुक्तिका: कौन चला वनवास रे जोगी? -- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



कौन चला वनवास रे जोगी?



संजीव 'सलिल'

**



कौन चला वनवास रे जोगी?

अपना ही विश्वास रे जोगी.

*

बूँद-बूँद जल बचा नहीं तो

मिट न सकेगी प्यास रे जोगी.

*

भू -मंगल तज, मंगल-भू की

खोज हुई उपहास रे जोगी.

*

फिक्र करे हैं सदियों की, क्या

पल का है आभास रे जोगी?

*

गीता वह कहता हो जिसकी

श्वास-श्वास में रास रे जोगी.

*

अंतर से अंतर मिटने का

मंतर है चिर…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on December 21, 2010 at 11:36pm — 7 Comments

बहकाती है क्यूँ जिंदगी...? ©

 

बहकाती है क्यूँ जिंदगी...? ©



शुरू में गज़ल सी , फिर भटकती लय है क्यूँ जिंदगी......

हर रंग भरा इसमें तुमने , सवाल सी है क्यूँ जिंदगी.......

ज़वाब दिए खुद तुम्हीं ने , फिर अधूरी है क्यूँ जिंदगी.....

माना है डगर कठिन , कदम बहकाती है क्यूँ जिंदगी.....

मंजिल का पता नहीं पर , राह भटकाती है क्यूँ जिंदगी.....



Photography & Creation by :- जोगेन्द्र सिंह…

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Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on December 21, 2010 at 11:30pm — 6 Comments

तुम जो साथ हो ...

 

कहा किसी ने 'बहुत ख्वाब सजाती हो तुम.
ज़िंदगी को भी सजाना सीखो.
नुस्खे जितने बताती हो ज़िंदगी जीने के,…
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Added by Lata R.Ojha on December 21, 2010 at 11:30pm — 5 Comments


प्रधान संपादक
बलात्कार (लघुकथा)

"क्या यह बात सच है कि कल तुम्हारी बेटी से बलात्कार किया गया ?"
"हाँ साहब, कल शाम खेतों से लौटते हुए मेरी बेटी की इज्ज़त लूटी गई !"
"क्या तुम जानते हो कि दोषी कौन है !?"
"मैं ही नही साहब, सारा गाँव जानता है उस पापी को जिसने मेरी बेटी को बर्बाद किया है !"
"मगर इतनी बड़ी बात होने के बावजूद भी तुमने थाने जाकर रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई ?"
"क्योंकि मैं अपनी बेटी का सामूहिक बलात्कार नही चाहता था ! "

Added by योगराज प्रभाकर on December 21, 2010 at 4:30pm — 24 Comments

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