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October 2011 Blog Posts

दीपावली अयोध्या में

श्री रामचंद्र जी के अयोध्या लौटने पर उनके स्वागत में एक गीत -

 

हेली मंगल गाओ आज ,

सहेली मंगल गाओ आज |

 

ढोल नगाड़ा नौपत बाजे 

अयोध्या  में आज 

तोरण द्वार सजे सब आँगन

कौशल्या घर आज |

 

मोत्यां चौक पुरावो है सखी 

झिलमिल आरती थाल

रामचंद्र जी लौटेंगे सखी 

सीता लखन संग आज |

 

शुभ घड़ी आई भ्राता मिलाई

दशरथ के घर आज 

भरत की तपस्या लायेगी  

सखी ! खुशियों का अम्बार…

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Added by mohinichordia on October 21, 2011 at 9:00pm — No Comments

शुभ दीपावली

सदियों से हम, साल में इक दिन, घर-घर दीप जलाते हैं |

इस दिन को कह कर दीवाली, खुशियाँ बहुत मनाते हैं ||



दीप जलें, अंधियारा भागे, हो जाता उजियारा है |

हर दिन ख़ुशी के दीप जलाएं, बनता फ़र्ज़ हमारा है ||…

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Added by Shashi Mehra on October 21, 2011 at 9:30am — No Comments

चाहरदीवारी

Added by Vasudha Nigam on October 20, 2011 at 2:07pm — 4 Comments

कविता : लद गया जमाना शराफत का भाई.....

लद गया जमाना शराफत का भाई
 साधू के भेष में  घुमने लगे कसाई.
        अब तो बिकने लगा इमान कौड़ीयों के भाव में.
        झूठ की हुकूमत हो गयी सच्चाई के गावं में.  
बेआबरू होखे दर-दर भटके बिश्वास.
रिश्तों-नातों से हमदर्दी ने ले ली बनवास.
         बड़ों से बड़प्पन मिटा छोटों से मिटा लिहाज़.
        नारी के कोमल ह्रदय से मिट गया पावन लाज.
चारों तरफ बेशर्मी की घनघोर घटा है छाई.
लद गया जमाना शराफत का…
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Added by Noorain Ansari on October 20, 2011 at 9:06am — 4 Comments

कंदील नहीं मिलते

कभी रास्ते कभी निशाने-मंजिल नहीं मिलते.

 सफीने डूब जाते है उन्हें साहिल नहीं मिलते.…

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Added by AVINASH S BAGDE on October 19, 2011 at 8:00pm — 4 Comments

लघुकथा - बकाया !

लघुकथा -  बकाया !

डॉ धीरज आज सुबह कुछ देर से अस्पताल में पहुंचे थे | सीधे आई सी यू में भर्ती…

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Added by Abhinav Arun on October 19, 2011 at 9:00am — 16 Comments

ग़ज़ल





मैं जुबां पर सिर्फ मैं, यह बात है अभिमान की,

छोड़ मैं को अब बनें हम बात ये ही ज्ञान की. |१|

 

जो किसी को भी न भातीं छोड़ दो वो आदतें,

दोस्तों अब फिक्र हो इस देश के सम्मान की.   |२|



माँ से हमको है मिलाया बाप का साया दिया,

हम चुका सकते नहीं कीमत तेरे एहसान की. |३|



जान देकर जो गये अपनी शहीदाने…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 19, 2011 at 12:30am — 8 Comments

व्यंग्य - जहां-तहां अन्नागिरी

समाजसेवी अन्ना हजारे ने पिछले दिनों तेरह दिनों तक अनशन करके ‘अन्नागिरी’ को हवा दे दी है। देश में अब तक नेतागिरी, चमचागिरी, बाबागिरी की हवा चल रही थी। अन्नागिरी के हावी होते ही अभी भ्रष्टाचारियों के मूड खराब हो गए हैं, क्योंकि जहां-तहां अन्नागिरी ही छाई हुई है। हर जुबान से बस अन्नागिरी की लार लपक रही है। किसी को अपनी बात मनवानी है तो वह, बस अन्नागिरी करने लग जा रहा है। वैसे हमारे समाजसेवी अन्ना जी ‘अनशन’ के लिए माहिर माने जाते हैं, लेकिन उनके पीछे जो लोग ‘अन्नागिरी’ का सहारा लेने लगे हैं,…

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Added by rajkumar sahu on October 18, 2011 at 1:17am — No Comments

प्यार

ऐ खुदा तुझे मैं मेरे दोस्तों मे शुमार करता हूँ 

ध्यान से सुन तुझे मैं मेरा राज़दार करता हूँ 

 

मुझको दे जाता है वो शख्स हमेशा ही धोखा 

फिर भी भरोसा मैं उसका बार-बार करता हूँ 

 

देगी…

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Added by Vikram Srivastava on October 17, 2011 at 8:00pm — 2 Comments

व्यंग्य - अस्पताल का मनमोहक सुख

एक बात सब जानते हैं कि जब हम बीमार होते हैं, तब इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं और डॉक्टर नब्ज समझकर इलाज करते हैं। अस्पताल जाने के बाद बीमारी छोटी हो या बड़ी, गरीबों के लिए कुछ ही दिन अस्पताल ठिकाना बन पाता है। गरीबों के लिए ‘गरीबी’ अभिशाप अभी से नहीं है, जमाने से ऐसा ही क्रूर मजाक चल रहा है। हर हालात में गरीब ही बेकार का पुतला होता है, जिसकी ओर देखने की किसी को फुरसत तक नहीं होती, वहीं जब कोई मालदार, अस्पताल की दहलीज पर पहुंचता है, उसके बाद गरीबों को हेय की दृष्टि से देखने वाले भी, उनकी…

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Added by rajkumar sahu on October 16, 2011 at 4:49pm — No Comments

क्यों अदीब अब तक है खोये ज़ुल्फ़ और रुखसार में !!

हमको  रहना  चाहिए  अब  सोह्बते  तलवार  में !

क्यों अदीब अब तक है खोये ज़ुल्फ़ और रुखसार  में !!


जब  तलक  उलझा  रहेगा  दामने  दिल  खार  में !
हम  सुकू  से  रह  नहीं  पाएंगे  इस  गुलज़ार  में  !!


नकहते  गुल  सुबहे  नौ शम्सो  कमर  अंजुम  जिया ! 
नेमतें  क्या  क्या  छुपी  है  यार  के  दीदार  में !!


मुद्दतो  जिस …
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Added by Hilal Badayuni on October 15, 2011 at 5:00pm — 9 Comments

मरना चाहू मर ना पाउ ये क्या किया तू महंगाई ,

मरना चाहू मर ना पाउ ये क्या किया तू महंगाई ,

निर्लज हैं मनमोहन तुझे शर्म क्यों नहीं आई ,
बतीस के आधार बाना कर गरीबी ये मिटायेंगे ,
गरीबी से नाम कटेगा खाना फिर ना पाएंगे ,
हमको कहते बतीस में तुम अपना दिन बिताओ ,
क्या होगा अब बतीस अब कोई इन्हें समझाओ ,
लुट के घर ये भर लेते हैं देते महंगाई के दुहाई ,
मरना चाहू मर ना पाउ ये क्या किया तू महंगाई ,

Added by Rash Bihari Ravi on October 15, 2011 at 1:16pm — No Comments

क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन,

क्रेडिट कार्ड

 

सपना दिखता हैं ,

पावर दिलाता हैं ,

खर्चे में तो तो पंख लगता हैं ,

ना हो पैसा फिर कम हो जाता हैं ,

लगे की दोस्तों में इज्जत बढ़ता हैं,

बिल जब आता हैं ,

पागल बनाता हैं ,

क्यों ली क्रेडिट कार्ड ,

समझ ना आता हैं ,

भाई ये इज्जत लेकर ही जाता हैं ,

.

.

बैंक ऋण

 

पहली पहली बार ये ,

झट पट मिल जाता हैं ,

क्यों की अन्दर की बात ,

समझ में ना आता हैं…

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Added by Rash Bihari Ravi on October 15, 2011 at 11:30am — 2 Comments

ग़ज़ल :- धमा चौकड़ी करता बचपन

ग़ज़ल :-  धमा चौकड़ी करता बचपन
 
धमा चौकड़ी करता बचपन ,…
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Added by Abhinav Arun on October 15, 2011 at 10:50am — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जो बीते... तो बीत गये --- सौरभ

 

कंधे पर मेरे एक अज़ीब सा लिजलिजा चेहरा उग आया है.. .

गोया सलवटों पड़ी चादर पड़ी हो, जहाँ --

करवटें बदलती लाचारी टूट-टूट कर रोती रहती है चुपचाप.



निठल्ले आईने पर

सिर्फ़ धूल की परत ही नहीं होती.. भुतहा आवाज़ों की आड़ी-तिरछी लहरदार रेखाएँ भी होती हैं

जिन्हें स्मृतियों की चीटियों ने अपनी बे-थकी आवारग़ी में बना रखी होती हैं

उन चीटियों को इन आईनों पर चलने से कोई कभी रोक पाया है क्या आजतक?..

 …

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Added by Saurabh Pandey on October 15, 2011 at 9:30am — 20 Comments

कैसा असर दोस्तों?

कैसा असर दोस्तों?

प्यार का है ये कैसा असर दोस्तों.
रब के आगे झुका मेरा सर दोस्तों.
मेरी धड़कन का हर तार गाने लगा,
उसकी धुन में ही चारों पहर दोस्तों.
एक रेला सा  आया  बहा ले  गया,
मेरे जज्बात की हर  लहर दोस्तों.
अब ख्यालों की बस्ती यूँ आबाद है,
चाहे घर हो या हो वो सफ़र दोस्तों.
प्यार की छल छलाती नदी हो गई,
ज़िन्दगी जो थी सूखी नहर दोस्तों.
उनकी आँखों को मै जाम कहने…
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Added by AVINASH S BAGDE on October 14, 2011 at 7:00pm — No Comments

चमचा



जब से चमचा चलन में आया है |
 कुछ नयापन, वतन में आया है ||
बे-हयाई व बेईमानी को, होश्यारी में जब मिलाया है |
तब कहीं जा के आज का इन्सां, खुद को चमचा कहाने पाया है ||
खूब नुस्खा, यह हाथ आया है, हमने चमचों से दिल लगाया है |
रंग लाई है, उल्फत-ए-चमचा ,हम पे अब,बरकतों का साया है ||
जिसकी…
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Added by Shashi Mehra on October 14, 2011 at 10:01am — 1 Comment

व्यंग्य - मुझे नहीं बनना प्रधानमंत्री

पहले मैं अपने पुराने दिनों की याद ताजा कर लेता हूं। जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे, उस दौरान शिक्षक हमें यही कहते थे कि प्रधानमंत्री बनोगे तो क्या करोगे ? इस समय मन में बड़े-बड़े सपने होते थे। उस सपने को पाले बैठे, अपन आज बचपन से जवानी की दहलीज में पहुंच गए हैं। हम जैसे देश में न जाने कितने, यह सपना देखते हैं, लेकिन खुली आंख से सपना कहां पूरा होता है ? ये अलग बात है कि कई बार ऐसा होता है, जब व्यक्ति सपना तक ही नहीं देखा रहता और प्रधानमंत्री बन जाता है। बिन मांगे मुराद मिल जाती है और जीवन की…

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Added by rajkumar sahu on October 14, 2011 at 12:11am — No Comments

स्वप्न सुंदरी

हे प्रभु ! मेरी स्वप्न  सुंदरी 

अब तो यथार्थ बन आ जाये 

उसको पाकर जीवन मे मेरा 

मन हर्षित, पुलकित हो जाए 

 

स्वेत वर्ण और केश स्वर्ण हो,

जो देखे चकरा जाये |

सुंदर, कोमल, मधुर, कर्णप्रिय

बोले तो…

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Added by Vikram Srivastava on October 13, 2011 at 6:00pm — 12 Comments

जगजीत सिंह को मेरी खिराज ए अकीदत (श्रद्धांजली)

 क़लम रुक रही है बहर खो रही है,

खड़ी है मुसलसल गज़ल रो रही है।



मुझे यूं ग़ज़ल से मुखातिब कराया,

तरन्नुम से मेरा जहाँ जगमगाया,…

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Added by इमरान खान on October 13, 2011 at 11:31am — 5 Comments

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