For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

June 2016 Blog Posts

तज़मीन बर तज़मीन

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन



तज़मीन बर तज़मीन हज़रत "क़मर" उज्जैनी बर ग़ज़ल हज़रत-ए-'मख़मूर दहलवी'





दिल-ए-बर्बाद ये हसरत ,ये अरमाँ कौन देखेगा

हमारे दिल में जो है दर्द पिन्हाँ कौन देखेगा

बताओ तो ज़रा ये ग़म का तूफ़ाँ कौन देखेगा

'ख़ुशी देखी है बर्बादी का समाँ कौन देखेगा'

'चमन से रुख़्सत-ए-दौर-बहाराँ कौन देखेगा'

'जलाकर दिल मिसाल-ए-शम्अ-ए-सौज़ाँ कौन देखेगा'

"मुहब्बत में शब-ए-तारीक-ए-हिजराँ कौन देखेगा

हमीं देखेंगे ये ख़्वाब-ए-परीशाँ कौन… Continue

Added by Samar kabeer on June 3, 2016 at 12:00am — 20 Comments

ग़ज़ल.....अब आजमा लें दर्द को

इस्लाह के लिए विशेषकर काफ़िए को लेकर मन में शंकायें हैं 

2122       2122       2122       212

​क्यों नहीं अपनी रगों से हम निकालें दर्द को

है ग़मों की इन्तहां अब आजमा लें दर्द को

बात पहले प्यार से फिर भी नहीं जो मानता 

गेंद की तरहा हवा में फिर उछालें दर्द को

गर ग़मों की चाहतें हैं ज़िन्दगी भर साथ की 

हमसफ़र अपना बना उर में छुपा लें दर्द को

नफरतों के राज में क्या रीत…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 2, 2016 at 8:36pm — 12 Comments

बह्र नई सी आप तो कोई, उम्दा ग़ज़ल ही लगती हैं- ग़ज़ल

2222 2222 2222 222

-----------------------------------------------------------------

आपकी नज़रें ताज़ा ताज़ा, फूल कमल ही लगती हैं।

बह्र नयी सी आप तो कोई, उम्दा ग़ज़ल ही लगती हैं।।



चाह रहे हैं छू लें लेकिन, रुसवाई से हम डर जाते।

जबकी मुस्का कर मिलती हैं, आप सरल ही लगती हैं।।



इसकी प्यास कई सदियों की, है मन का पंछी व्याकुल।

आप स्रोत सब मदिराओं की, असली तरल ही लगती हैं।।



जितने रूप धरा के सुन्दर, सारे हैं फीके फीके।

आपकी फ़ोटो कॉपी सारे, आप… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 2, 2016 at 8:00pm — 4 Comments

सीखना होगा

खुशियों में , गम के साये में
जीना सीखना होगा

प्यार में , नफरत के साये में

संभल कर खुद को ही चलना  होगा

इज़हार ख़ुशी का न गम की नुमाईश
एक साथ दोनों को पीना होगा

भ्रम बनकर सतायेंगी गर यह
इस चक्र से निकल कर आगे बढ़ना होगा

जीवन को समझकर बढ़ना होगा
सोच कर हर कदम रखना होगा |

मौलिक एवं अप्रकाशित



Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 2, 2016 at 5:30pm — 3 Comments

दिल-ऐ-बिस्मिल में ...

दिल-ऐ-बिस्मिल में ...

कुछ भी तो नहीं बदला

नसीम-ऐ-सहर

आज भी मेरे अहसासों को

कुरेद जाती है

मेरी पलकों पे

तेरी नमनाक नज़रों की

नमी छोड़ जाती है

कहाँ बदलता है कुछ

किसी के जाने से

बस दर्द मिलता है

गुजरे हुए लम्हात की मरकदों पे

यादों के चराग़ जलाने में

और लगता है वक्त

लम्हा लम्हा मिली

अनगिनित खराशों को

ज़िस्म-ऐ-ज़हन से मिटाने में

अपनी ज़फा से तुमने

वफ़ा के पैरहन को

तार तार कर दिया

आरज़ू के हर अब्र…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 2, 2016 at 1:55pm — 6 Comments

चिर-दिनों तक तुम हो मेरी

चिर-दिनों तक तुम हो मेरी,

युगों युगों तक रहूँ तुम्हारा|

इक दूजे से अलग नही हम,

जनम-जनम तक साथ हमारा|



जितनी मर्जी उतना रुठो,

जितना मन हो रहो बेखबर,

तुम्हे मनाऊँ चिर-जीवन तक,

बिछड़न तुमसे नही गँवारा|



आस मेरी तुम साँस मेरी तुम,

तुम ही मेरे दिल की धड़कन,

अब तो सबकुछ तुम ही मेरी,

नजरों को बस तुम्ही नजारा|



तुमको चाहूँ तुम्हे सराहूँ,

तेरे ही बारे मे सोचूँ,

उस जीवन को भूल गया हूँ,

जो कुछ तेरे बिना… Continue

Added by आशीष यादव on June 2, 2016 at 11:21am — 6 Comments

भूखी रचनाएँ और वेक अप कॉल (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

क़ुरैशी साहब की रचनाएँ संभाग से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं थीं, लेकिन दूसरे साथी लेखकों की प्रकाशित रचनाओं, संग्रहों और उनको मिलने वाले छोटे-बड़े सम्मानों से वे बहुत विचलित रहा करते थे। प्रकाशन की भूख उन्हें बहुत सताया करती थी, पर क्या करें न तो आर्थिक स्थिति अच्छी थी और न ही कोई सहारा। बहुत से सम्पादकों से मधुर संबंध होने के बावजूद जब कभी उनकी रचनाएँ अस्वीकृत हो जातीं, तो उनकी नींद हराम हो जाती थी। इस बार तो एक पत्रिका के संपादक…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 2, 2016 at 6:00am — 16 Comments

सदा ही ख्वाब में आऊ सदा जगाऊ मैं तुमको

बहर -1222 1222 1212 2222

सदा ही ख्वाब में आऊ सदा जगाऊ मैं तुमको

खुले जब आँख लूँ जब नाम पास पाऊ मैं तुमको

तेरी जब गोद में रखकर के सर गजल मैं पढता था

मेरा अरमान है इक बार फिर सुनाऊ मैं तुमको

गये जब से अकेला छोड़ हम तभी से रोते हैं

नहीं हसरत मेरी रोऊँ नहीं रुलाऊ मैं तुमको

भटकता दर-ब-दर हूँ फिर रहा कहाँ हो बोलो ना

सहा क्या क्या गवायाँ क्या मिलो गिनाऊ मैं तुमको

सहा जाता न अब हमसे विरह भरा मेरा जीवन

मेरी बाहें खुली आओ गले लगाऊ मैं…

Continue

Added by maharshi tripathi on June 1, 2016 at 11:10pm — No Comments

मुलाकातें....

(22 22 22)

छोटी छोटी बातें
छोटी छोटी रातें

.

छोटे छोटे लम्हे
जीवन की सौगातें

.

भीगा भीगा मौसम
गुन गुन करती रातें

.

दिल में आग लगायें
रिमझिम सी बरसातें

.

तेरे मेरे सपने

दिल से दिल की बातें

.

आंसू आंसू शिकवा
आंसू आंसू बातें

.

याद रही खामोशी
भूले न मुलाकातें

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 1, 2016 at 1:30pm — 4 Comments

एक और प्रयास/सुरेश कुमार ' कल्याण '

करके याद हमें अब दिल जलाते हैं वो,

बेवफाई का मातम अब मनाते हैं वो।



हमारे बीते हुए लम्हों को याद कर,

अब अपना पल पल बिताते हैं वो।



जाहिर हो जाता है उनके चेहरे पे गम,

खुशी के लम्हे भी गम में बिताते हैं वो।



खुश नजर आने की कोशिश करते हैं मगर,

दिवानगी में दुःख की बात कह जाते हैं वो।



हमें तरस आता है उनकी हालत पर,

पर हमारे सामने आने से कतराते हैं वो।



रात में बिस्तर पर करवटें बदलते हुए,

फिर भी हमारी यादों में खो जाते…

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on June 1, 2016 at 1:26pm — 12 Comments


प्रधान संपादक
अपनी अपनी भूख (लघुकथा)

पिछले कई दिनों से घर में एक अजीब सी हलचल थीI कभी नन्हे दीपू को डॉक्टर के पास ले जाया जाता तो कभी डॉक्टर उसे देखने घर आ जाताI दीपू स्कूल भी नहीं जा रहा थाI घर के सभी सदस्यों के चेहरों से ख़ुशी अचानक गायब हो गई थीI घर की नौकरानी इस सब को चुपचाप देखती रहतीI कई बार उसने पूछना भी चाहा  किन्तु दबंग स्वाभाव मालकिन से बात करने की हिम्मत ही नहीं हुईI आज जब फिर दीपू को डॉक्टर के पास ले वापिस घर लाया गया तो मालकिन की आँखों में आँसू थेI रसोई घर के सामने से गुज़र रही मालकिन से नौकरानी ने हिम्मत जुटा कर पूछ…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on June 1, 2016 at 12:51pm — 17 Comments

प्रस्तावित है कुछ खुशियाँ - गीत

स्तावित खुशियाँ

प्रस्तावित है कुछ खुशियाँ

कुछ सपनों का अनुबंध

दीवारों ने कब देखी है

नील गगन की क्यारी

सोच रही है तन्हाई

कब जायेगी लाचारी

हिम्मत के जब पाँव बढ़े

दानों का हुआ प्रबंध

अरमानों की किस्मत में

क्यों होता कहर जरूरी

समझोते की भठ्ठी में

करता है मौन मजूरी

स्वीकारा प्रतिक्षण ऋतू ने

परिवर्तन से सम्बन्ध

बजते बजते सरगम की

सब टूट…

Continue

Added by asha deshmukh on June 1, 2016 at 11:00am — 6 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Monday
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Monday
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेतुझे याद किया था हमने ... "क्या...तुम्हारे मन के द्वार…See More
Monday
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Friday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service