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March 2011 Blog Posts (134)

सामयिक गीत: राम जी मुझे बचायें.... -- संजीव 'सलिल'

सामयिक गीत:

राम जी मुझे बचायें....

-- संजीव 'सलिल'

*

राम जी मुझे बचायें....



एक गेंद के पीछे दौड़ें ग्यारह-ग्यारह लोग.

एक अरब काम तज देखें, अजब भयानक रोग..

राम जी मुझे बचायें,

रोग यह दूर भगायें....

*

परदेशी ने कह दिया कुछ सच्चा-कुछ झूठ.

भंग भरोसा हो रहा, जैसे मारी मूठ..

न आपस में टकरायें,

एक रहकर जय पायें...

*

कड़ी परीक्षा ले रही, प्रकृति- सब हों एक.

सकें सीख जापान से, अनुशासन-श्रम नेक..

समर्पण-ज्योति… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 31, 2011 at 12:06pm — 3 Comments

अनमनी आकुल अखिल की आस्थाएं

अनमनी आकुल अखिल की आस्थाएं

(मधु गीति सं. १७२५ , दि. १४ मार्च, २०११)

 

अनमनी आकुल अखिल की आस्थाएं, व्यवस्था की अवस्था का सुर सुधाएं;

चेतना भरकर…

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Added by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on March 31, 2011 at 12:00pm — 2 Comments

कुछ हाइकू

नीली ओढ़नी
रात की चादर
पसरे तारे

 

फूटी है भोर
जागते अरमान
आशा किरण

 

नई रौशनी
उजालों का सफर
बढ़े काफिले

 

साँझ की बेला
सूरज परछाईं
ढलता दिन

 

जीवन चक्र
चलता जाता यूँ ही
बीतते दिन

Added by Neelam Upadhyaya on March 31, 2011 at 10:38am — 3 Comments

मुक्तिका: हुआ सवेरा संजीव 'सलिल

मुक्तिका:

हुआ सवेरा

संजीव 'सलिल'

*

हुआ सवेरा मिली हाथ को आज कलम फिर.

भाषा शिल्प कथानक मिलकर पीट रहे सिर..

भाव भूमि पर नभ का छंद नगाड़ा पीटे.

बिम्ब दामिनी, लय की मेघ घटा आयी घिर..

बूँद प्रतीकों की, मुहावरों की फुहार है.

तत्सम-तद्भव पुष्प-पंखुरियाँ डूब रहीं तिर..

अलंकार की छटा मनोहर उषा-साँझ सी.

शतदल-शोभित सलिल-धार ज्यों सतत रही झिर..

राजनीति के कोल्हू में जननीति वृषभ क्यों?

बिन पाये प्रतिदान रहा बरसों…

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Added by sanjiv verma 'salil' on March 31, 2011 at 9:30am — 1 Comment

जियरा धड़के जर के पिया जी

जियरा धड़के जर के पिया जी

देखो हैं खेलत होरी पिया जी...

घेरे हैं उनको सखियाँ हमारी 

रंग हैं लगावें जम के पिया जी...

करत है लीला रास मैं जानू 

जियरा…

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Added by भरत तिवारी (Bharat Tiwari) on March 30, 2011 at 6:30pm — 1 Comment

मेरे उस्ताद

मेरे उस्ताद कागज़ पर चन्द लकीरें बनाते है,

कभी अल्फ़ाज़ जोडते हैं कभी काफ़िये बनाते है.



पेशानी पर हैरत यूं गश खाती है,

जब अपने रंग मे आकर कोई गज़ल सुनाते है.



मुझे भी फ़ख्र होता है यें देख कर लोंगों,

जब बोलते हैं मेरी रगों में इन्क़िलाब लातें है.



मुझ जैसे शागिर्द पर रख के अपना हाथ,

लफ़्ज़ों की जादूगरी का हुनर सिखाते है.



ऐसी शख्सियत का ज़िक्रे ब्यां क्या हो,

जिन्हे अहले इल्म फ़ख्रे हिन्दुस्तां बताते है.



अपने फ़न की… Continue

Added by अमि तेष on March 29, 2011 at 1:00pm — 4 Comments

साहस...

 

आज फिर मैं सुबह के जागने से पहले उठा,
और सूरज से पहले घर से निकल गया  
सफ़र लम्बा है और
मंजिलों तक के फ़ासले जो तय करने हैं |
राहें पथरीली और उबड़ खाबड़ भी हैं तो क्या ?
चाँद पर घर बनाना है तो,…
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Added by Veerendra Jain on March 28, 2011 at 3:53pm — 10 Comments

एक और मुश्किल..

अनगिनत विचारों में से एक विचार चुन पाना  है  मुश्किल ..

विचार चुन भी लो तो उसको शब्दों में पिरोना भी है एक मुश्किल..…
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Added by Lata R.Ojha on March 28, 2011 at 3:30pm — 5 Comments

व्यंग्य - उफ ! ये क्रिकेट की किचकिच

अभी विश्वकप क्रिकेट का दौर चल रहा है। खिलाड़ी जो प्रदर्शन कर रहे हैं, वो जैसा भी हो, मगर हर कोई अपना राग अलाप रहा है। स्थिति तो ऐसी हो गई है कि जितने मुंह, उतनी बातें। विश्वकप कोई भी टीम जीते, लेकिन जुबानी जमा खर्च करने में हर कोई माहिर नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि क्रिकेट की किचकिच में देश का हर मुद्दा चर्चा से गायब हो गया है। फिलहाल क्रिकेट में सब उलझे हुए हैं। जब क्रिकेट की बात शुरू होती है तो क्रिकेटेरिया के हर बाहरी खिलाड़ी अपने तर्क का हथौड़ा लगाने तथा बातों-बातों में दो-दो हाथ आजमाने से… Continue

Added by rajkumar sahu on March 28, 2011 at 12:52am — No Comments

भ्रष्टाचार.....नेमीचन्द पूनिया "चन्दन"

भ्रष्टाचार-

हाकिम से लेकर अर्दली तक नौेकर से लेेेकर व्यौपारी तक।।

भ्रष्टाचार फैला देश में।मेरे गाॅव से दिल्ली तक।।

गाय से लेकर हाथी तक।कुते चूहे से लेकर बिल्ली तक।।

पेशोपेश में हैं पशु-पक्षी।बाज से लेकर तित्ल्ली तक।।

भ्रष्टाचार फैला देश…

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Added by nemichandpuniyachandan on March 27, 2011 at 8:30pm — 2 Comments

दुल्हन की दास्ताँ

 जो कल उन्मुक्त बेखौफ़ चलती थी

आज अकेले खामोश बैठी है

कल तक जिसका अलग अस्तित्व था

अब दुसरो से पहचान ही उसका अस्तित्व होगा

कल तक जो हर जिम्मेदारी से बचती थी

मदमस्त उल्लासित हो चहकती थी

अब दूसरो की जिम्मेदारी संभालेगी

अपनी हँसी लुप्त कर दूसरो को सँवारेगी

दुल्हन के सुर्ख लाल जोड़े में

एक बंदनी की भाँति लग रही

फ़ेरो की पवित्र अग्नि में

उसकी ख्वाहिशे सुलग रहीं          

सर पर जड़ित स्वर्ण टीका

उसके विषाद मे…

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Added by Mayank Sharma on March 27, 2011 at 3:00pm — 1 Comment

"निभाते जो साथ तो बात कुछ और थी”

मेरी जिन्दगी का मतलब काश की समझे होते,    

होते न आज इतने दूर  तो बात कुछ और होती.

है किस्मत कितनी बुरी बोलती है ऐ मेरे हाँथ की लकीरे,        

तुम पास होते तो बात कुछ और होती.                        

मै अब मेरी जिंदगी से करू क्या शिकवा गम नहीं मरने का,     

तुम साथ होते तो बात कुछ और…

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Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on March 27, 2011 at 11:30am — 3 Comments

होली की गुझियाँ

 

श्री नवीन जी लीजिये गुझिया खासमखास

मावा इनमे नहीं पर ...,  भरा प्रेम अहसास१ 
मेरी राधा विरह में , आहें भरे हज़ार ...
श्याम-सलोने के बिना क्या होली त्यौहार...२ 
रंग लगा कुछ इस तरह, रंगा सकल विश्वास 
श्याम रंग से बिखरता, चारो ओर प्रकाश ३.
जलती होली में जला अपने सारे पाप
मन दर्पण को कीजिये भैया पहले साफ़ ...४.
जलती होली से निकल सिया कहें हे राम !
पावनता तो बिक चुकी अब शंका के दाम…
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Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on March 27, 2011 at 10:00am — 2 Comments

भावनात्मक दरारें

माता पिता की ज़ख्मों वाली पीठ,

को न सहलाना,

परिवार की मुस्कुराहटों में,

न मुस्काना,

दोस्तों की खामोशियों में,

चुप रह जाना,

अपनों के दिलों में,

न झाँक पाना,

हमारी मजबूरियां नहीं,

कमजोरियां हैं,

जो अक्सर अपने,

बंधनों के,

एक धागे को,

तोड़ जाती हैं,

भावनात्मक दरारें हैं ये,

नहीं भरो तो,

निशान छोड़ जाती हैं .



किसी शीतल सुबह,

अपनी हथेलियों में,

ओस की बूँदें भरो,

अपने अहं को कर किनारे,

उसमे मिलाओ,

प्रेम… Continue

Added by neeraj tripathi on March 26, 2011 at 3:25pm — 15 Comments

यूं मेरे हाथ मुझ को छुड़ानें न दो,

यूं मेरे हाथ मुझ को छुड़ानें न दो,

बहुत याद आयेंगें हम, हमें जानें न दो.



गर हमें प्यार है, तो फ़िर डर कैसा,

अब कोइ राज़-ए-महोब्बत छुपानें न दो.



तेरी सांसों की महक की है ज़रूरत मुझको,

अब मेरे दिल में किसी और को आनें न दो.



इस तरह रोतें रहोंगे तो भला क्या होगा,

अश्क आंखों में मेरी जान कभी आनें न दो.



कर लो अब तो तुम मेरी महोब्बत का यक़ीन.

तुम मुझे अब और क़समें खानें न दो.



'अमी' तेरे प्यार के रंग में सराबोर है… Continue

Added by अमि तेष on March 26, 2011 at 12:51am — 2 Comments

नवगीत: कब होंगे आज़ाद हम संजीव 'सलिल'

नवगीत

 

कब होंगे आज़ाद हम



संजीव 'सलिल'

*

कब होंगे आजाद?

कहो हम

कब होंगे आजाद?



गए विदेशी पर देशी

अंग्रेज कर रहे शासन

भाषण देतीं सरकारें पर दे

न सकीं हैं राशन

मंत्री से संतरी तक कुटिल

कुतंत्री बनकर गिद्ध-

नोच-खा रहे

भारत माँ को

ले चटखारे स्वाद

कब होंगे आजाद?

कहो…

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Added by sanjiv verma 'salil' on March 26, 2011 at 12:29am — 2 Comments

तू अकेला है (दीपक शर्मा कुल्लुवी)

तू अकेला है


किस किस की खातिर तू रोता रहेगा…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on March 25, 2011 at 3:30pm — 2 Comments

दिलों का वास्ता कैसा सवालों के जहां साए ?

तेरे दीदार की हसरत, हमारे दिल में पलती है



हुई मुद्दत मेरी नज़रें, तुम्हारी राह तकती हैं



यही ख्वाहिश थी बस दिल में, मैं तेरे दर पे आ बैठा



और उसपे पूछना तेरा, बताओ क्यों यहां आए ?





अनूठे यार हो तुम भी, गज़ब के प्यार हैं हम भी



भले मझधार हो तुम भी, सुनो पतवार हैं हम भी



सवालों से तेरे घबरा गया तो ख़ाक याराना



दिलों का वास्ता कैसा सवालों के जहां साए ?





यही इल्ज़ाम है तुम पर, कि दिल बर्वाद करते… Continue

Added by Aakarshan Kumar Giri on March 25, 2011 at 12:07pm — 4 Comments

KHEL

खेल खेले जाते है

विश्व भर मै.लिए सद्भावना
 और सहकारिता का आधार
जीवन भी तो खेल है,
आईए इस पर करें विचार
शबनमी धुप पाने से पहले
गुजरना पड़ता है
सर्द हवाओं के दौर से
जीत हासिल करने से पहले
गुजरना पड़ता है
कठिन श्रम के दौर से
हारे गर आज तो 
जीतेंगे कल 
यही विचार 
बढाए रखता है मनोबल
लिए श्रम ओर विश्वास का सम्बल
हार जाओ तो भी…
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Added by rajni chhabra on March 24, 2011 at 11:06pm — 4 Comments

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