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MAHIMA SHREE's Blog (34)

दो कवितायेँ किसान भाईयों के लिए

किसान भाईयों के लिए जो निरंतर आत्महत्याओं के लियें विवश हो रहे हैं ...
.
१.मैं किसान हूँ  
मैं बोता हूँ
गन्ने , चावल , आलू
सब्जियां और ना जाने
कितनी फसलें
खोदता हूँ मिटटी
प्यार से रोपता हूँ
देता हूँ स्नेह
इंच दर इंच बढ़ना
 रोज ताकता हूँ
और नाच उठता हूँ
बढ़ता देख
गाता हूँ…
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Added by MAHIMA SHREE on May 27, 2012 at 5:00pm — 22 Comments

मोती..

आत्मावलोकन के क्षणों में

मन मेरे

जब तू जूझता

डूबता , उतराता

फिर थक के बैठ 

किनारे सुस्ताता है

औ तब ये सब 

देख रही होती हैं 

मेरी आँखे 

सबसे परे

उन सारे पलों को

तुझे जीते हुए

औ तभी

विहँस पड़ती हैं

उसी क्षण 

जब उनमें से 

चुन लेता है तू

एक मोती    

18th May2012

Added by MAHIMA SHREE on May 18, 2012 at 10:10pm — 22 Comments

गुफ्तगू माँ से (मदर्स डे पर )

माँ 
ये कौन सी  सफलता है 
ये कैसा लक्ष्य है
जो ले आया है
तुमसे दूर 
बहुत दूर
ये कैसी तलाश है
कैसा सफ़र है
की मैं चल पड़ी हूँ 
अकेले ही
तुम्हे छोड़ कर
ये कैसी जिद है मेरी
ठुकरा कर छत्र छाया तेरी
निकल पड़ी हूँ
कड़ी धूप में झुलसने…
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Added by MAHIMA SHREE on May 12, 2012 at 6:30pm — 26 Comments

तुम्हारा मौन

तुम्हारा मौन
विचलित कर देता है
मेरे मन को
सुनना चाहती हूँ तुम्हे
और
मुखर हो जाती हैं
दीवारें , कुर्सियां
टेबल , चम्मचे
दरवाजे
सभी तो कहने लगते हैं
सिवाए तुम्हारे

Added by MAHIMA SHREE on May 10, 2012 at 4:15pm — 17 Comments

भीड़...महिमा श्री

हां भीड़ में शामिल
मैं भी तो हूँ
रोज
अलसुबह उठ के
जाती हूँ
शाम को आती हूँ
दूर से देखती हूँ
कहती हूँ
ओह देखो तो जरा
कितनी भीड़ है
और फिर
मैं भी भीड़ हो जाती हूँ

Added by MAHIMA SHREE on May 10, 2012 at 4:00pm — 26 Comments

मायाजाल

  मैंने अपने अंदर बना डाले हैं

अजीब से दायरे 

अनेक बंधन 

अनेक विचार 

मैंने पाल रखे हैं…

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Added by MAHIMA SHREE on April 29, 2012 at 5:00pm — 26 Comments

कुछ हाइकु ....

१. बौराया आम

चहका उपवन

आया बसंत



२. गरजे घन

नाच उठा किसान

बुझेगी प्यास



३.दहेज़ भारी

कुरीतियों की मारी

वधु बेचारी



४.अंकुर बनी

अभी नहीं खिली थी

भ्रूण ही तो थी



५.शोर है कैसा

कुर्सी पे तो है बैठा

अपना नेता



६ धर्म की आड़

बाबाओ का व्योपार

दुखी संसार



७. ठाट बाट में

कानून की आड़ में

कैदी दामाद



८. टूटे सपने

डिग्रियां बनी भार 
 बेरोजगार



९.व्याकुल…
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Added by MAHIMA SHREE on April 21, 2012 at 5:30pm — 18 Comments

चक्रव्यूह (कहानी)

आज भी तापमान ४.५ डिग्री सेंटीग्रेड है पर काम पर तो जाना ही है. डर किस बात का है, खुला आसमान अपना ही तो है , आंधी -बारिश  , धूप-छांव, घना कोहरा हो या ओस टपकाता आसमान, काम तो करना ही है, यह कोई नई बात थोड़े ही है.छोटू के लिये लाना है स्वेटर, उसकी माँ के लिए गर्म शाल, छुटकी के लिए टोपी , खुद अपने लिए कम्बल और अम्मा के लिए दवाईया, अम्मा बेचारी रात भर खाँसती रहती है. घर की छत भी टपक  रही है, उसकी भी मुरम्मत करवानी है. पूरी बरसात टपकती रहती है और सर्दियों में बर्फीली…
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Added by MAHIMA SHREE on April 15, 2012 at 2:00pm — 38 Comments

नदी सी मैं ...

जिंदगी के चंद टुकड़े
यूँही
बिखरने दिया
कभी यूँही
उड़ने दिया
संभाल कर जब कभी
रखना चाहा
समय ने ना रहने दिया
नदी सी मैं
बहती रही
कभी मचलती रही
कभी उफनती रही
तोड़ किनारा
जब भी बहना चाहा
बांधो( बन्धनों) से और भी
जकड़ा पाया
गंदे नाले हों
या शीतल धारा
जो भी मिला
अपना बना डाला
जिंदगी
कभी नदी सी
कभी टुकड़ो सी
जैसे भी पाया
बस जी डाला

Added by MAHIMA SHREE on April 12, 2012 at 11:45am — 12 Comments

इन्तजार की अवधि

मृत्यु जब तक तुम्हे

वरण नहीं कर लेती

तब तक करो इन्तजार

रखो अटल  विश्वास

गले लगा लो

सारी  प्रवंचनाएं

मत ठुकराओ

दुनियावी…

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Added by MAHIMA SHREE on March 29, 2012 at 10:17pm — 16 Comments

निजत्व की खातिर

निजत्व की खातिर

कर्तव्यो की बलिवेदी से

कब तक भागेगा इन्सान

ऋण कई हैं

कर्म कई हैं

इस मानव -जीवन के

धर्म कई हैं

अचुत्य होकर इन सबसे

क्या कर सकेगा

कोई अनुसन्धान

कई सपने हैं

कई इच्छाये हैं

पूरी होने की आशाये हैं

पर विषयों के उद्दाम वेग से

कब तक बच सकेगा इन्सान

भीड़-भाड़ है

भेड़-चाल है

दाव-पेंच के

झोल -झाल है

इनसे बच कर अकेला

कब तक चलेगा…

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Added by MAHIMA SHREE on March 15, 2012 at 4:30pm — 60 Comments

चेहरे.....

चेहरे के पीछे

चेहरे है

उन पे कसे नकाब

बड़े तगड़े है..

मीठे बोलो के भीतर

तीखेपन का खंजर है..

घावों पे मरहम तो है

पर दाग बने गहरे है

लोग बने मदारी है.. और

समझे हमे जमूरा

मतलब की यारी है और

जमकर सीनाजोरी है

संभल संभल के हँसना है और

नाप तोल के कहना

मन के दुखड़े खोले तो

कहते है रोना धोना

खुल के जीने का

दम भर लो कितना भी

पर बच बच के है रहना

दुनिया गर…

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Added by MAHIMA SHREE on March 12, 2012 at 5:30pm — 16 Comments

अंतस का कोना...

बतकही कितनी भी
कर लूँ
रहता है खाली खाली
अंतस का कोना
ढोल बजा लूँ कितनी भी
रहता है सुना सुना
अंतस का कोना
शब्दों का मायाजाल है
जिंदगी का ख्याल है
कोशिश कितनी भी कर लूँ
रहता उदास है
अंतस का कोना
इश्वर के दरबार में
सब के लिए अरदास है
चलो अक दीप जला लूँ
जुगनुओ को दोस्त बना लूँ
अपनेपन के शोर से
गुंजित कर लूँ
अंतस का कोना.....

Added by MAHIMA SHREE on March 2, 2012 at 5:52pm — 9 Comments

मुक्ति ......

सुंदर -असुंदर

रूप-रंग

उच्च-नीच

उतार-चढ़ाव

गुड़िया-गहने

बादल-बिजली

फूल-काँटे

जीत-हार

अपना-पराया

मान-अपमान…

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Added by MAHIMA SHREE on February 29, 2012 at 11:00pm — 12 Comments

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