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रमेश कुमार चौहान's Blog (60)

दोहे-रमेश चौहान

काम काम दिन रात है, पैसे की दरकार ।

और और की चाह में, हुये सोच बीमार ।।



रूपया ईश्वर है नही, पर सब टेके माथ ।

जीवन समझे धन्य हम, इनको पाकर साथ ।।



मंदिर मस्जिद देव से, करते हम फरियाद ।

अल्ला मेरे जेब भर, पसरा भौतिक वाद ।।



निर्धनता अभिशाप है, निश्चित समझे आप ।

कोष बड़ा संतोष है, मत कर तू संताप ।।



धरे हाथ पर हाथ तू, सपना मत तो देख ।

करो जगत में काम तुम, मिटे हाथ की रेख ।।



बात नही यह दोहरी,  है यही गूढ ज्ञान ।

धन…

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Added by रमेश कुमार चौहान on August 3, 2014 at 10:00pm — 7 Comments

त्रिभंगी छंद

ये रिमझिम सावन, अति मन भावन, करते पावन, रज कण को ।
हर मन को हरती, अपनी धरती, प्रमुदित करती, जन जन को ।
है कलकल करती, नदियां बहती, झर झर झरते, अब झरने ।
सब ताल तलैया, डूबे भैया, लोग लगे हैं, अब डरने ।।
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मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on August 3, 2014 at 6:30pm — 10 Comments

मातु भारती (त्रिभंगी छंद)

हे भाग्य विधात्री, जन सुख दात्री, मातु भारती, वंदन है ।
मां माटी तोरी, सौंधी भोरी, रज कण माथे, चंदन है ।।
गिरि हिम आच्छादित, करते प्रमुदित, मुकुट मणी सा, सोहत है ।
धरा मनोहारी, मातु तुम्हारी, हरि हर को भी, मोहत है।।
...............................................................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on June 29, 2014 at 9:14am — 10 Comments

आदमी (गीतिका छंद)

आदमी से आदमीयत, खो गई है रे कहां ।

आदमी से आदमी को, डर तभी तो है यहां ।।

आदमी में जो पड़ा है, स्वार्थ का साया जहां ।

आदमी अब आदमी से, बच नही पाये यहां ।।



आदमी आतंकवादी, उग्रवादी जो बने ।

आदमी के हाथ दोनो, खून से ही हैं सने ।।

मर्द जो है आदमी में, वो बलत्कारी लगे ।

गोद की बेटी उसे तो, ना दिखे अपने सगे ।।



आदमी को आदमी जो, है बनाना फिर कहीं ।

आदमी में तो जगाओ, आदमीयत फिर वही ।।

आदमी जो आदमी से, प्रेम करने फिर लगे…

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Added by रमेश कुमार चौहान on June 17, 2014 at 11:00pm — 6 Comments

बेटी

छप्पय छंद
बेटी होना पाप, त्रास में जीवन सारा ।
जन्म पूर्व ही घात, उसे कितनों ने मारा ।।
कंपित होती सांस, वायु है दूषित सारी ।
छेड़ छाड़ हर पाद, नगर गांव बलात्कारी ।।
गली गली में भेडि़या, नोचें बेटी मांस को ।
जीवित होकर लाश हैं, बेटी सह  इस त्रास को ।।
.................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on June 5, 2014 at 3:00pm — 14 Comments

रहना हमे सचेत ....(रोला)

मेरे अजीज दोस्त, अमर मै अकबर है तू ।

मै तो तेरे साथ, साथ तो हरपल है तू ।।

रहना हमे सचेत, लोग कुछ हमें न भाये ।

हिन्दू मुस्लिम राग, छेड़ हम को भरमाये ।।



मेरे घर के खीर, सिवइयां तेरे घर के ।

खाते हैं हम साथ, बैठकर तो जी भर के ।।

इस भोजन का स्वाद, लोग वो जान न पाये ।

बैर बीज जो रोप, पेड़ दुश्मनी का लगाये ।। रहना हमे सचेत ....



यह तो भारत देश, लगे उपवन फूलों का ।

माली न बने चोर, कष्ट दे जो शूलों का ।।

रखना हमको ध्यान, बांट वो हमें न…

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Added by रमेश कुमार चौहान on May 3, 2014 at 6:00pm — 6 Comments

ताँका

ताँका पाँच पंक्तियों और 5,7,5,7,7= 31 वर्णों के लघु कविता



1.हर चुनाव

बदले तकदीर

नेताओं का ही

सोचती रह जाती

ये जनता बेचारी ।।



2.लूटते सभी

सरकारी संपदा

कम या ज्यादा

टैक्स व काम चोर

इल्जाम नेता सिर ।।



3.उठा रहे है

नजायज फायदा

चल रही है

सरकारी योजना

अमीर गरीब हो ।।



4.जनता चोर

नेता है महाचोर

शर्म शर्माती

कदाचरण लगे

सदाचरण सम ।।



5.जल भीतर

अटखेली करती…

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Added by रमेश कुमार चौहान on April 30, 2014 at 11:00pm — 4 Comments

चोका


कौन करे है ?
देश में भ्रष्टाचार,
हमारे नेता,
नेताओं के चम्मच
आम जनता
शासक अधिकारी
सभी कहते
हाय तौबा धिक्कार
थूक रहे हैं
एक दूसरे पर
ये जानते ना कोई
नही नही रे
मानते नही कोई
तुम भी तो हो
मै भी उनके साथ
बेकार की है बात ।
.....................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on April 30, 2014 at 2:18pm — 6 Comments

आज मेरे देश में (घनाक्षरी छंद)



मनहरण घनारक्षरी छंद -31 वर्ण चार चरण 8,8,8,7 पर यति चरणांत गुरू

..............................................................

झूठ और फरेब से, सजाये दुकानदारी ।

व्यपारी बने हैं नेता,  आज मेरे देश में ।।

वादों के वो डाले दाने, जाल कैसे बिछायें है ।

शिकारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।

जात पात धरम के, दांव सभी लगायें हैं ।

जुवारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।

तल्ख जुबान उनके, काट रही समाज को ।

कटारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।…

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Added by रमेश कुमार चौहान on April 28, 2014 at 6:30pm — 7 Comments

हिन्दी श्लोक (अनुष्‍टुप छंद)

अनुष्‍टुप छंद 4 चरण प्रत्येक चरण 8-8 वर्ण

विषम चरण - वर्ण क्रमांक पाँचवाँ, छठा, सातवाँ, आठवाँ क्रमशः लघु, गुरू, गुरू, गुरू

सम  चरण -  वर्ण क्रमांक पाँचवाँ, छठा, सातवाँ, आठवाँ  क्रमशः लघु, गुरू, लघु, गुरू

----------------------------------------------------------------------------------------------------------



मदिरापान कैसा है, इस देश समाज में ।

अमरबेल सा मानो, फैला जो हर साख में ।।



पीने के सौ बहाने हैं, खुशी व गम साथ में ।

जड़ है नाश का दारू, रखे…

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Added by रमेश कुमार चौहान on March 26, 2014 at 4:38pm — 4 Comments

फाग

होली है .............


तुम रचाओं रास, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
राधा बुलाओ खास, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
हम होली मनाये आज, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
भक्त गाये फाग, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
उड़े हे रंग गुलाल, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
ब्रज लगे हमारे गांव, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
तुम रचाओं रास, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
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मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on March 16, 2014 at 5:53pm — 1 Comment

कह मुकरियां (-रमेश चौहान)

कह मुकरियां

1.

श्‍याम रंग तुम्हरो लुभाये ।

रखू नैन मे तुझे छुपाये ।

नयनन पर छाये जस बादल ।

क्या सखि साजन ? ना सखि काजल ।

2.

मेरे सिर पर हाथ पसारे

प्रेम दिखा वह बाल सवारे ।

कभी करे ना वह तो पंगा ।

क्या सखि साजन ? ना सखि कंघा

3.

उनके वादे सारे झूठे ।

बोल बोले वह कितने मिठे ।

इसी बल पर बनते विजेता ।

क्या सखि साजन ? ना सखि नेता ।।

4.

बाहर से सदा रूखा दिखता ।

भीतर मुलायम हृदय रखता ।।

ईश्‍वर भी…

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Added by रमेश कुमार चौहान on February 17, 2014 at 9:28pm — 11 Comments

तड़प रहा मन

बासंती बयार

होले होले

बह रही है



तड़प रहा मन

दिल पर

लिये एक गहरा घाव

यादो का झरोखा

खोल रही किवाड़

आवरण से ढकी भाव



इस वक्त पर

उस वक्त को

तौल रही है



नयन तले काजल

लबो पर लाली

हाथ कंगन

कानो पर बाली



तेरे बाहो पर

मेरी बदन

झूल रही है



ईश्‍वर की क्रूर नियति

सड़क पर बाजार

कराहते रहे तुम

अंतिम मिलन हमारा

हाथ छुड़ा कर

चले गये तुम



तन पर… Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on February 14, 2014 at 10:54pm — 9 Comments

मिले दिल से साथ (नवगीत)

मंदिर मस्जिद द्वार

बैठे कितने लोग

लिये कटोरा हाथ



शूल चुभाते अपने बदन

घाव दिखाते आते जाते

पैदा करते एक सिहरन

दया धर्म के दुहाई देते

देव प्रतिमा पूर्व दर्शन



मन के यक्ष प्रश्‍न

मिटे ना मन लोभ

कौन देते साथ



कितनी मजबूरी कितना यथार्थ

जरूरी कितना यह परिताप

है यह मानव सहयातार्थ

मिटे कैसे यह संताप

द्वार पहुॅचे निज हितार्थ



मांग तो वो भी रहा

पहुॅचा जो द्वार

टेक रहा है माथ



कौन भेजा उसे यहां पर

पैदा…

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Added by रमेश कुमार चौहान on February 11, 2014 at 12:08pm — 6 Comments

प्रेम (गजल सह गीतिका छंद)

बहर - 2122, 2122, 2122, 212

प्रेम का मै हू पुजारी, प्रेम मेरा आन है ।

प्रेम का भूखा खुदा भी, प्रेम ही भगवान है ।।



वासना से तो परे यह, शुद्ध पावन गंग है ।

जीव में जीवन भरे यह, प्रेम से ही प्राण है ।।



पुत्र करते प्रेम मां से, औ पिता पु़त्री सदा ।

नींव नातो का यही फिर, प्रेम क्यो अनुदान है ।।



बालपन से है मिले जो, प्रेम तो लाचार है ।

है युवा की क्रांति देखो, प्रेम आलीशान है ।।



गोद में तुम तो रहे जब , मां पिता कैसे…

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Added by रमेश कुमार चौहान on February 10, 2014 at 7:30pm — 1 Comment

बिदाई (गीतिका छंद)

दें बिदाई आज तुम्हे, है परीक्षा की घड़ी ।
सीख सारे जो हमारे, तुम्हरे मन में पड़ी ।।
आज तुम्हे तो दिखाना, काम अब कर के भला ।
नाम होवे हम सबो का,  हो सफल तुम जो भला ।।

हर परीक्षा में सफल हो, दे रहे आशीष हैं।
हर चुनौती से लड़ो तुम, काम तो ही ईश है ।।
कर्म ही पूजा कहे सब, कर्म पथ आगे बढो ।
जो बने बाधा टीलाा सा, चीर कर रास्ता गढ़ो ।।

----------------------------------------------------

मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on February 10, 2014 at 8:00am — 12 Comments

एक तरही गजल (रमेश कुमार चौहान)

(बहर - 2122,2122,212)

पैर में क्यो गुदगुदी होने लगी
याद तेरी बेबसी होने लगी

वक्त काफी हो गया तुम से मिले
तेरी सूरत अजनबी होने लगी

अपने हाथो घाव ताजा कर रहा
जख्म स्याही लेखनी होने लगी

ये इबारत प्यार का है चेहरा
हर नए गम से खुशी होने लगी

तू नही तेरी निशानी ही सही
देख लो संजीवनी होने लगी
------------------------
मौलिक एवं अप्रका‍शित

Added by रमेश कुमार चौहान on February 5, 2014 at 10:00pm — 7 Comments

सरस्वती वंदना (गीतिका छंद)

हे भवानी आदि माता, व्याप्त जग में तू सदा ।
श्‍वेत वर्णो से सुशोभित, शांत चित सब से जुदा ।।
हस्त वीणा शुभ्र माला, ज्ञान पुस्तक धारणी ।
ब्रह्म वेत्ता बुद्धि युक्ता, शारदे पद्मासनी ।।

हे दया की सिंधु माता, हे अभय वर दायनी ।
विश्‍व ढूंढे ज्ञान की लौ, देख काली यामनी ।।
ज्ञान दीपक मां जलाकर, अंधियारा अब हरें ।
हम अज्ञानी है पड़े दर, मां दया हम पर करें ।।
---------------------------
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on February 4, 2014 at 6:00pm — 11 Comments

मदिरापान (दोहावली)

मदिरा सेवन जो करे, तन मन करते खाक ।

मान सम्मान बेचकर, बोल रहे बेबाक ।।



धर्म कर्म जाया करे, करते मदिरा पान ।

बीबी बच्चें रो रहे, देखो खोटी शान ।।



सुख दुख का साथी कहे, मदिरा को सम्मान ।

सुख में दुख पैदा करे, उसे कहां है भान ।।



पार्टी सार्टी है करे, जो हैं अप टू डेट ।

बाटली साटली रखे, कुछ करते अपसेट ।।



गरीब अमीर दास है, मदिरा है भगवान ।

वंदन करते शाम को, लगा रहे जी जान…

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Added by रमेश कुमार चौहान on February 3, 2014 at 8:00pm — 7 Comments

छप्पय छंद

छप्पय छंद (रोला+उल्लाला)

हिन्दी अपने देश, बने अब जन जन भाषा ।
टूटे सीमा रेख, हमारी हो अभिलाषा ।।
कंठ मधुर हो गीत, जयतु जय जय जय हिन्दी ।
निज भाषा के साथ, खिले अब माथे बिन्दी ।।
भाषा बोली भिन्न है, भले हमारे प्रांत में ।
हिन्दी हम को जोड़ती, भाषा भाषा भ्रांत में ।।
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मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on February 1, 2014 at 4:07pm — 8 Comments

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