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अब मेरे ख्वाबो को जीने दो ,

अब मेरे ख्वाबो को जीने दो ,

बचपन खेलने को तरस गया ,
हाथो में किताब पड़ने से ,
जवानी कर्मो में गुजर गया ,
और आगे बढ़ने में ,
पूरा चला ढाई कोस , 
वही कहावत हो गई , …
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Added by Rash Bihari Ravi on June 29, 2011 at 7:00pm — No Comments

कैसे कहू मैं दिल की .....

कैसे कहू मैं दिल की ......

दिल में ही रह गई .
ख्वाब अधुरा रह गया ,
ख्वाबो पे छुरी चल गई  ,
कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .
बालपन की मन में ब्यथा ,
तन सयानी हो गई ,
लोगो की नजरो में आना ,
जवानी दुश्मन हो गई 
कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .
अपने होते ख्वाबें होती ,
मन की मुरादें मिल जाती ,
अपनों ने जो दगा किया…
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Added by Rash Bihari Ravi on June 29, 2011 at 4:30pm — 15 Comments

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - महंगाई ने आर्थिक बजट बिगाड़ दिया है।

पहारू - ‘आम आदमी के साथ हाथ‘ वाली सरकार पर और विश्वास करो।





2. समारू - बाबा रामदेव ने कहा है कि वे कायर नहीं है।

पहारू - सच है, नहीं भागते तो पुलिस का कोपभाजन बनना पड़ जाता।





3. समारू - छग कांग्रेस में नए जिलाध्यक्षों की घोषणा जल्द होने वाली है।

पहारू - फिर क्या है, कलह भी जल्द आने वाली है।







4. समारू - भाजपा के मध्यप्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने बढ़ती महंगाई को लेकर मौत मांगी… Continue

Added by rajkumar sahu on June 29, 2011 at 1:27pm — 1 Comment

बचपन

नन्हा सा, अल्हड़ सा, वो प्यारा बचपन,

ज़िंदगी की धूप से अछूता बचपन

 

बचपन के वो दिन कितने अच्छे थे

जब संग सबके हम खेला करते थे

दुखी होते थे एक खिलौने के टूटने पर

और छोटी सी ज़िद्द पूरी होने पर,खुश हो जाया करते थे

हँसता, खिलखिलता वो निराला बचपन

ज़िंदगी की धूप से अछूता बचपन

 

वो बारिश के मौसम का भीगना याद आता…

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Added by Vasudha Nigam on June 29, 2011 at 10:00am — 15 Comments

-: हिंदी सलिला :- विमर्श १ भाषा, वर्ण या अक्षर, शब्द, ध्वनि, व्याकरण, स्वर, व्यंजन -संजीव वर्मा 'सलिल'-

 -: हिंदी सलिला :-

विमर्श १

भाषा, वर्ण या अक्षर, शब्द, ध्वनि, व्याकरण, स्वर, व्यंजन

-संजीव वर्मा 'सलिल'-

औचित्य…

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Added by sanjiv verma 'salil' on June 28, 2011 at 11:29pm — No Comments

ये तेरी ज़द मे रहता है

ये तेरी ज़द मे रहता है , तू अपनी हद मे रहता है ........

परिंदा दिल का कब खींची हुई सरहद मे रहता है ........

सफ़र अब तय नही होता ... चलो अब लौट जाते हैं ........

अगर… Continue

Added by Prabha Khanna on June 28, 2011 at 6:50pm — No Comments

ज़िन्दगी तुझे जी लुंगी मैं..

ज़िन्दगी तुझे जी लूंगी मैं...

 

नाकामियों से ऊपर उठते हुए,

समय के आगे न झुकते हुए,

मुश्किलों से हंस कर मिलूंगी मैं!

ज़िन्दगी तुझे जी लूंगी मैं...

 

रुठेंगी कब तक मंजिलें मुझसे,

मायूस होगी कब तक महफ़िलें मुझसे,

तूफ़ान भी अब डिगा न सकेंगे,

लहरों के वेग से अब न डरूँगी मैं!

ज़िन्दगी तुझे जी लूंगी मैं...

 

भिगोया हैं बहुत आँचल को अपने,

अरसा गुज़र गया मुस्कुराहटो की तलाश में,

अब भीगी पलकों पर…

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Added by Vasudha Nigam on June 28, 2011 at 2:30pm — 4 Comments

मेरी अपनी

गुलामी की ये कड़ियाँ , हाँ ये कड़ियाँ मेरी अपनी हैं ... सलाखें मेरी अपनी हैं ...........

भले ही बंद हैं आँखें , ये आँखें मेरी अपनी हैं .......



बहारों जैसे मौसम इत्तेफाकन तो नहीं आते , गुलाबों को मसल देने की आदत मेरी अपनी है .......



ज़माने भर की खुशियाँ बाँध कर आँगन में रखो तुम , मिले जो कुछ , गँवा देने …
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Added by Prabha Khanna on June 28, 2011 at 10:30am — No Comments

मेरे साहित्यिक आदर्श डा. रामविलास शर्मा — डा॰ महेन्द्रभटनागर

 

मेरे साहित्यिक आदर्श डा. रामविलास शर्मा

डा॰ महेन्द्रभटनागर

 

          प्रारम्भ से ही, साहित्य-लेखन के क्षेत्र में डा.रामविलास शर्मा जी ने मुझे प्रोत्साहित किया। उनसे मेरा परिचय सन् 1945 से है; जब मैं ‘विक्टोरिया कालेज’, ग्वालियर में  बी.ए. के अंतिम वर्ष का छात्र था। तब कालेज में, डाक्टर साहब का भाषाण आयोजित था। वे प्रो.…

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Added by MAHENDRA BHATNAGAR on June 27, 2011 at 7:35pm — 1 Comment

चुपचाप देखते रहते हो...

 

जाने कैसा दौर गुज़र रहा है ये ,

खुदा का घर दहशत में है

जन्नत लिपटी पड़ी  है नुकीले तारों में

खूब चलता है ब्योपार इन दिनों नुकीली तारों का |

 

बर्फ की चादर अब तो मैली हो चली है

 

खून के धब्बों से ,

जख्मी हो गए हैं

बन्दूक की नोक पर कदम…

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Added by Veerendra Jain on June 27, 2011 at 12:13pm — 6 Comments

विश्वासघात

विश्वासघात, क्या होता हैं यह विश्वासघात,

जो हिला देता हैं आपका संपूर्ण वजूद!

या फिर वो जो खोखला कर देता हैं आपकी जड़ो को,

और उठा देता हैं आपका विश्वास दुनिया से,

और क्या परिभाषा होता है विश्वास की,

जो बना देती हैं गिरो को भी अपना!…

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Added by Vasudha Nigam on June 27, 2011 at 12:00pm — No Comments

कतरने ख़्वाबों की

ख्वाब मेरे



कपड़े की 
कतरनों के माफिक 
कटे फटे 
जब भी सहेजना चाहा 
कतरनों की तरह ही 
बिखर जाते हैं 
फिर भी 
मैं…
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Added by sangeeta swarup on June 26, 2011 at 3:58pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
चीख सिलवटों की

निस्शब्द स्वरों के कानफोड़ू शोर

चिलचिलाते मौन की बेधती टीस

लगातार भींचती जाती दंत-पंक्तियों में घिर्री कसावट

माज़ी का गाहेबगाहे हल्लाबोल करते रहना..... ....

जब एकदम से सामान्य हो कर रह जाय.. 

तो फिर...

कागज़ के कँवारेपन को दाग़ न लगे भी तो कैसे?

आखिर जरिया भर है न बेचारा ..

/एक माध्यम भर../

कुछ अव्यक्त के निसार हो जाने भर का

महज़ एक जरिया ... ...और....

किसी जरिये की औकात आखिर होती ही क्या है ?

उसके…

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Added by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 8:09pm — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
स्मृतियों के दरीचे से

स्मृतियों के अनगढ़ कमरे से

अचानक बाहर फुदक आयी हैं कुछ नम रोशनियाँ... /आज फिर.. ..

एक बार फिर

मासूम सी कोशिश की है इनने..

कि, मनाँगन में

कशिशभरी आवारा धूप बन लहर-लहर नाचेंगी..

 

तुम मेरे साथ हो न हो.... ..

इन रोशनियों के साथ जरूर होना.. ..

...............कोशिश तो करना.. ..

मुझे पता है .. गया समय उल्टे पाँव नहीं चलता..

किन्तु इन भोली-निर्दोष रोशनियों को अब कौन समझाये..

और देखो.. ..

तुम भी मत समझाना..…

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Added by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 7:30pm — 12 Comments

ज़बां फूलों सी रखता है

ज़बां फूलों सी रखता है ......

अना पत्थर सी रखता है ......

अधूरी दास्तां दिल मे छिपा कर वो भी रखता है ......…





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Added by Prabha Khanna on June 24, 2011 at 7:02pm — 6 Comments

‘राष्ट्रपति को भा गई छत्तीसगढ़ की आत्मीयता’

छत्तीसगढ़ ने ‘धान का कटोरा’ के तौर पर देश-दुनिया में पहचान रखी है। प्रदेश की प्राचीन संस्कृति व लोककला यहां की प्रमुख विरासत है। छग में दूसरे राज्यों तथा अन्य देशों से जब भी कोई पहुंचते हैं तो वे सहसा ही यहां के लोगों की आत्मीयता से अभिभूत हो जाते हैं। वनांचल क्षेत्रों की आदिवासी संस्कृति व परंपरा जानकर हर कोई वाह-वाह किए बगैर नहीं रहता और यहां की यादों को अपनी संस्मरण में उतार लेते हैं। छत्तीसगढ़ के लिए अक्सर कहा जाता है - ‘छत्तीसगढ़िया-सबसे बढ़िया’। यह उक्ति आज की बनाई हुई नहीं है, बल्कि बरसों से… Continue

Added by rajkumar sahu on June 24, 2011 at 5:16pm — No Comments

कविता : माँ की गाली

कभी माँ थी मैं तुम्हारी
आज केवल
एक स्त्री देह रह गई
क्योंकि तुमने
गुस्से में ही सही
दूसरों को गाली देने के लिए ही सही
‘माँ’ शब्द को
अपशब्दों से जोड़कर
नए शब्दों को
पैदा करना सीख लिया है

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 24, 2011 at 3:05pm — 1 Comment

परीक्षा, फर्जीवाड़ा और छत्तीसगढ़

ऐसा लगता है, जैसे छत्तीसगढ़ की परीक्षाओं का, फर्जीवाड़ा और विवादों से चोली-दामन का साथ है। तभी तो प्रदेश में होने वाली अधिकांश परीक्षाओं में किसी न किसी तरह से धब्बा लगा ही जाता है। छग में शिक्षा नीति जिस तरह लचर है, उसी का खामियाजा होनहार छात्रों व उनके अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है। प्रदेश के लिए परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा की बात कोई नई नहीं रह गई है, यही कारण है कि छग से दूसरे राज्यों में जाकर पढ़ने वाले प्रतिभावान छात्रों को ‘हेय’ की दृष्टि से देखा जाता है, यह किसी भी सूरत में विकास पथ पर आगे…

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Added by rajkumar sahu on June 24, 2011 at 2:00am — No Comments

"वो" और "मैं"...!!

((जब-जब 'खुद' को देखना चाहा... खुद को दो हिस्सों में बंटा पाया... कभी "वो" जो जीती ज़िन्दगी... तो कभी "मैं" जिसे जीती ज़िन्दगी... कुछ शब्द सिर्फ 'मेरे' बारे में... मेरी 'नज़र' में... मुझे जानने के लिये... मुझे समझने के लिये...))… Continue

Added by Julie on June 23, 2011 at 9:54pm — 9 Comments

खाना नहीं पर गाना जरूर

अगर दुनियां में आज लोग दुखी हैं तो उसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार में उन जैसे लोगों को मानता हूँ जो खाते कम गाते ज्यादा हैं



आप बहुचर्चित food shows का उदाहरण ले सकते हैं जिसमें आपको आसानी से एक महिला या पुरुष दिख जायेगा जो खाना चखने के दौरान अजीब अजीब आवाजें निकालना शुरू कर देता हैं

उनके चटकारे देखकर, देखने वाले मनुष्य को अपना अच्छा खासा स्वादिष्ट भोजन भी कम स्वादिष्ट लगने लगे इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं



किसी महापुरुष से सुना था के मनुष्य इस बात से दुखी नहीं के उसके घर… Continue

Added by Bhasker Agrawal on June 23, 2011 at 7:30pm — 4 Comments

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