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February 2013 Blog Posts

"गरीबी में आटा गीला"

गरीबी में हुआ गीला आटा,

फिर से लगा ज़ोरदार चांटा !

रोटी छीन गयी क्षण भर में ,

खड़ा हो गया गरीबी के रण में !!

क्या रोटी हो गयी अनमोल ,

इश्वर अब तो कोई पथ खोल !

मै अधीर ,व्यग्र ,व्याकुल  मन से ,

कब दूर होगी गरीबी इस जीवन  से !

इश्वर कब दूर होगा दुःख दाह,

अब तो दिखा दो कोई राह !!!!

ईश्वर !

गरीबी का करो अभिषेक ,

थोड़ा लगाओ अपना विवेक !

यदि इमानदारी की रोटी खाओगे ,

सदैव गीला आटा पाओगे !

हटाओ ये गरीब की ओट,

तू…

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Added by ram shiromani pathak on February 2, 2013 at 6:30pm — 7 Comments

उल्लाला मुक्तिका: दिल पर दिल बलिहार है -संजीव 'सलिल'

उल्लाला मुक्तिका:

दिल पर दिल बलिहार है

संजीव 'सलिल'

*

दिल पर दिल बलिहार है,

हर सूं नवल निखार है..



प्यार चुकाया है नगद,

नफरत रखी उधार है..



कहीं हार में जीत…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 2, 2013 at 4:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल "संदली सा बदन है क्या कहिये"

========ग़ज़ल=======



संदली सा बदन है क्या कहिये

फूल जैसी छुअन है क्या कहिये



जल उठा है बदन तुझे छूकर

हुश्न है या अगन है क्या कहिये



सर से पा तक तुझे वो छूता है

आपका पैरहन है क्या कहिये



तीर…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on February 2, 2013 at 3:47pm — 16 Comments

ढलकते आँसुओ को सहेजना चाहते है

ढलकते आँसू  (गीत)
लक्ष्मण लडीवाला
आँसू चाहे गम के हो, ख़ुशी के हो कपोलों को भिगोते है 
देखने वाले चाहेजो समझे, ख़ुशी या गम मगर रिझाते है ।
 
आँसू जब ढलकते है, ग़मों को कम करते राहत दिलाते है, 
ढलकते आँसू बेहद ख़ुशी से पड़ते दिल के दौरे से बचाते…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 2, 2013 at 12:30pm — 17 Comments

एक नज़्म ...तुम्हारे नाम

आज की रात बहुत भारी है 

पीर है या कि जैसे आरी है !! 

आती जाती हुई साँसों में दम निकलता है,

लम्हाँ-लम्हाँ तुम्हें पाने को दिल मचलता है !   

गहरे सन्नाटे में हर ओर तेरी आवाज़ें..

इस अंधेरे में जागतीं हैं कुछ तेरी यादें !

मेरी आँखों में तडपते…
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Added by भावना तिवारी on February 2, 2013 at 11:30am — 16 Comments

गणतंत्र की जय

 गणतंत्र की जय !

गणराज्य की जय !

गणतन्त्र की सरहदें,

, गणराज्य की सरहदें,

जो तय की थी हमने,

वो टूट क्यों जाती हैं,

प्रजा के जुटने पर ?

प्रजातंत्र / लोकतंत्र /गणतन्त्र !

प्रजा से डरता क्यों है ?

उसे तो हमने ही बुना था,

अपने लिए !

आज वो खोखला हो गया है !

या खोखला कर दिया गया है !!

वो अपनी ही शक्ति से,

गण से प्रजा से,

कतराता क्यों है ?

शायद गणतंत्र के रखवालों ने,

बदल दी…

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Added by RAJESH BHARDWAJ on February 1, 2013 at 9:16pm — 4 Comments

ग़ज़ल

आपकी नज़रें इनायत हो गई,

दूर बरसों की, शिकायत हो गई ।

आप हैं तो धडकनों में गीत है,

जिंदगी जैसे, रवायत हो गई ।

बात उनकी मानना बस!फ़र्ज़ है,

जो, जहाँ, जैसी, हिदायत हो गई ।

आपकी खामोशियों को देखकर,

बात अपनी बस! हिकायत हो गई |

फूल सी लम्बी थी उनकी जिंदगी,

साँस लेने में, किफायत हो गई |

मेरी नज़रों का ,करें वो शुक्रिया,

खूबसूरत वो, निहायत हो गई ।

बात टेढ़ी कब,  तलक रहती भला,

सादगी बोली, हिमायत हो गई |…

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Added by AVINASH S BAGDE on February 1, 2013 at 7:30pm — 13 Comments

सीख ( लघु कथा )

आज सुबह उठ कर घर का काम निपटाया बेटे को स्कूल भेज दिया | पतिदेव की तबियत कुछ ठीक नही तो वो अभी सो ही रहे थे |मैंने अपनी चाय ली और किचेन के दरवाजे पर ही बैठ गई कारण ये था कि आज आँगन में बहुत दिनों बाद कुछ गौरैया आयी थीं वो चहकते हुए इधर उधर फुदक रही थीं और मैं नही चाहती थी कि वो मेरी वजह से उड़ जाएँ | तो मैं वहीँ बैठ के उनको देखते हुएचाय पीने लगी | थोड़ी देर बाद गोरैया तो उड़…

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Added by Meena Pathak on February 1, 2013 at 5:00pm — 19 Comments

आंसू ...........ख़ुशी को ये भिगाते हैं ग़मों को ये जलाते हैं

ख़ुशी को ये भिगाते हैं ग़मों को ये जलाते हैं

बिना बोले कभी आंसू बहुत कुछ बोल जाते हैं

समझने के लिए इनको मोहोब्बत का सहारा है

......नहीं तो देखने वाले तमाशा ही बनाते हैं ||

सिसक हो बेवफाई की कसक चाहे जुदाई की

पिघलता है सभी का दिल हवन की आहुती जैसे

ख़ुशी नमकीन पानी से अधिक रंगीन बनती है

कभी आंसू लगे सैनिक कभी हो सारथी जैसे ||

कहीं जब दूर जाए लाडला माँ से जुदा होकर

बहाए प्रेम के मोती दुआएं जब निकलती हैं

करे जब याद माँ का घर बहू जो बन…

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Added by Manoj Nautiyal on February 1, 2013 at 4:30pm — 8 Comments

फासला

मेरे आने और तुम्हारे जाने के बीच

बस चंद कदमों का फासला रहा

न मै जल्दी आया कभी

न कभी तुमने इंतज़ार किया

ये फासला ही तो था

जिसे हमने

संजीदगी और ईमानदारी के साथ निभाया

फासले को…

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Added by नादिर ख़ान on February 1, 2013 at 11:30am — 15 Comments

फिर भी क्‍योंकर

मन में अक्षय स्‍नेह सभी के

समरस भाव प्रवणता है

फिर भी जाने क्‍योंकर सबने

बांटी कलुष,कृपणता है

छूत-पाक का लावा-लश्‍कर

हुलस चूम कब यम आया

कसक धकेले, सदा अकेले

बूंद-बूंद कब ग़म आया

फंसा जुए में गला सभी का

पगतल अतल विकलता है

जाने फिर भी हर लिलार पर

किसने मली खरलता है

तपिश उड़ेले स्‍वाद कषैले

लिए जागते दीप कहां

रूचिर अधर पर लुटे प्राण को

मिला दूसरा सीप…

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Added by राजेश 'मृदु' on February 1, 2013 at 11:19am — 10 Comments

ग़ज़ल : बुना कैसे जाये फ़साना न आया

(बह्र: मुतकारिब मुसम्मन सालिम)

(वज्न: १२२, १२२, १२२, १२२

बुना कैसे जाये फ़साना न आया,

दिलों का ये रिश्ता निभाना न आया,

लुटाते रहे दौलतें दूसरों पर,

पिता माँ का खर्चा उठाना न आया,

चला कारवां चार कंधों पे सजकर,

हुनर था बहुत…

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Added by अरुन 'अनन्त' on February 1, 2013 at 10:59am — 21 Comments

उल्लाला गीत: जीवन सुख का धाम है -संजीव 'सलिल

अभिनव प्रयोग-

उल्लाला गीत:

जीवन सुख का धाम है

संजीव 'सलिल'

*

जीवन सुख का धाम है,

ऊषा-साँझ ललाम है.

कभी छाँह शीतल रहा-

कभी धूप अविराम है...*

दर्पण निर्मल नीर सा,

वारिद, गगन, समीर सा,

प्रेमी युवा अधीर सा-

हर्ष, उदासी, पीर सा.

हरी का नाम अनाम है

जीवन सुख का धाम है...

*

बाँका राँझा-हीर सा,

बुद्ध-सुजाता-खीर सा,

हर उर-वेधी तीर सा-

बृज के चपल अहीर सा.

अनुरागी निष्काम है

जीवन सुख का धाम…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 1, 2013 at 10:30am — 6 Comments

विवशता ..!!

रोटियाँ सिंक रहीं हैं ..!
उठती भाप,
बढ़ता ताप,
खौलता धमनियों में खून
मचल पड़ते नाखून
खरोंचने को ...खुद को
चिमटा,बेलन घर के अपने थे
आग पर चढ़ा दिया
जला दिया
इच्छाओं को ..
मैं चुपके से देखती हूँ
इन रोटियों में अक्स अपना !!
आती जाती हर आँख
सेंकती नज़र आती है रोटियाँ
भीतर उठता है धुआँ
और गहरे डूब जातीं हैं
भूख में मौन मन
विवश
देखता है
रोटियाँ सिंक रहीं हैं ..!!
~भावना

Added by भावना तिवारी on February 1, 2013 at 8:46am — 9 Comments

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