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August 2013 Blog Posts

शिव महिमा [दोहे]

गँगा जल की कुण्डलियां, भर लाए शिव भक्त

कावड़ ले मनमोहिनी ,सब को करें आसक्त||



शिव नगर हरिद्वार की, महिमा अपरमपार

कावड़ मेले हैं लगे , सजे हुए बाजार||



नारे बोल बम बम के ,गूँज रहे चहुँ ओर

मस्त मलंग घूम रहे, मिल सब करते शोर||



आए पूरे देश से , बम बम करते आज

त्रिलोचन महादेव का , तिलक कर रहे आज||



लाखों भक्त शंकर का, करते हैं अभिषेक

शिवरात्री है आ गई, माथा तू भी टेक||



बम बम करते आ गए ,शिव के सेवादार …

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Added by Sarita Bhatia on August 5, 2013 at 11:00am — 5 Comments

अन्तरंग यह बात...

आज सच तुझसे कहूँ

बिन तेरे कैसे रहूँ

इक दिन न इक रात

अन्तरंग यह बात...

सांसों में अब मिठास है

कड़वाहट अब न पास है

जब से तू है साथ

अन्तरंग यह  बात...

जुल्फ तेरी  घनघोर घटा

लहराएँ तो सर्द हवा

प्यार तेरा बरसात

अन्तरंग यह बात...

नयन तेरे मधुशाला हैं

बाहें तेरी, मेरी माला हैं

पाक मेरे जज्बात

अन्तरंग यह  बात...

मर जाऊं मिट जाऊं मैं

तुझ संग ही जी पाऊँ…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on August 4, 2013 at 11:00pm — 27 Comments

मै हूँ राष्ट्रपुरुष भारत, मै कवि के मुख से बोल रहा हूँ

पर्वत राज हिमालय जिसका मस्तक है

जिसके आगे बड़े बड़े नतमस्तक है

सिन्धु नदी की तट रेखा पर बसा हुआ

गंगा की पावन धारा से सिंचित है

जिसको तुम सोने की चिड़िया कहते थे

छोटे बड़े जहाँ आदर से रहते थे 

जहाँ सभी धर्मो को सम्मान मिला

जहाँ कभी न श्याम श्वेत का भेद  हुआ

जिसको राम लला की धरती कहते है

गंगा यमुना सरयू जिस पर बहते है

जिस धरती पर श्री कृष्णा ने जन्म लिया

जहाँ प्रभु ने गीता जैसा ज्ञान दिया

जहाँ निरंतर वैदिक…

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Added by Aditya Kumar on August 4, 2013 at 8:00pm — 22 Comments

तुम आज़ाद हो

तुम पिंजरे में बंद मुर्दा ज़िन्दगी के सिवा कुछ भी तो नहीं ,

अपने आप को ,आज़ाद पंछी मान बैठे हो ,

तुम्हारी तनी  हुई मुट्ठियाँ ,बढ़ते कदम ,

बीवी बच्चों को देख, अपाहिज हो जाते हैं ,

तुम्हारे मस्तक की मांसपेशियां ,

पेट की तरफ देख ,अनाथ हो जाती है ,

तुम्हारी जुबान ,साहब को देख ,…

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Added by Dr Dilip Mittal on August 4, 2013 at 6:00pm — 4 Comments

गीत की जन्मपत्री बनाते रहे

पीर पंचांग में सिर खपाते रहे ।

गीत की जन्मपत्री बनाते रहे ।

हम सितारों की चौखट पे धरना दिये

स्वप्न की राजधानी सजाते रहे ।

लाख प्रतिबंध पहरे बिठाये गये

शब्द अनुभूतियों के सखा ही रहे

आँसुओं को जरूरत रही इसलिये

दर्द के कांधे के अँगरखा ही रहे

श्वास की बाँसुरी बज उठी जब कभी

हम निगाहें उठाते लजाते रहे।

पर्वतों से मचलती चली आ रही,

गीत गोविन्द मुग्धा नदी गा रही,

पांखुरी-पांखुरी खिल गई रूप की

भोर लहरा रही, चांदनी गा…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 4, 2013 at 4:00pm — 19 Comments

शब्द ही तो थे

शब्द ही तो थे …

नयनों के झिलमिल
बिम्बों की भाषा

तरल सीकरों में
ढलती अभिलाषा

टूट तो जाने ही थे

अन्तस् के बंध;

विष  से उफनाये वे-

कटुता के छंद !

शब्द ही तो थे...

फट पडीं, ज्यों बेतरह
कपास की गाठें
चिंदी चिंदी  बिखर गये -

अनछुए अर्थ
विद्रोही पवन का

पाकर स्पर्श 
खुले अवगुंठन

 वह उद्दात्त मन का…

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Added by Vinita Shukla on August 4, 2013 at 4:00pm — 34 Comments

दिया द्वार पर जूझ रहा

कितने कितने सूरज चमके

पर अँधियारा शेष रहा

तेरे मेरे मन के अंदर

इक संशय फल फूल रहा।।

 

सरपत के ढेरों झाड़ उगे

तन छू ले कट जाता है

इन बबूल के काँटों से भी

भीतर तक छिल जाता है

सावन की बौछारों में भी

मन उपवन सब सून रहा।।

 

तुम मिलते हो मुझको जैसे

इक गुजरी तरुणाई सी

भाव खिलें डाली पर कैसे

वह रूखी मुरझाई सी

साज संवार व्यर्थ रहा सब

धूल भरा यह रूप रहा।।

 

चिड़ियों ने…

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Added by बृजेश नीरज on August 4, 2013 at 3:00pm — 28 Comments

एक मार्केटिंग मैनेज़र की आत्मव्यथा

मैं सपने बेचता हूँ।

आज के, कल के,

और कभी कभी तो बरसों बाद के भी।



इन सपनों की ज़रुरत नहीं तुम्हें।

इनका अहसास मैंने दिलाया है,

तुम्हारे जेहन में घुसकर...

तुम्हारे डर को कुरेदकर।



मैं और मुझ जैसे सैकड़ों लोग,

झांकते हैं,

तुम्हारे गुसलखानों में,

तुम्हारी रसोई में,

तुम्हारे ख्वाबगाहों में।



मुझे पता है,

कितनी दफा ब्रश करते हो तुम,

कैसे रोता है तुम्हारा बच्चा गीली नैपी में, और

क्यूँ तुम्हारे चेहरे की चमक खो…

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Added by Arvind Kumar on August 4, 2013 at 7:30am — 11 Comments

ग़ज़ल - जीवन में मत जमीर को पलभर सुलाइए (बह्र - 221 2121 1221 212)

जीवन में मत जमीर को पलभर सुलाइए।

सोने लगे तो फेंक के पानी जगाइए।

बेगैरतों के शह्र में रहते जो शौक से,

अपने घरों की लाज को उनसे बचाइए।

अनमोल रत्न शील ही होता जहान में,

यूँ कौड़ियों के मोल इसे मत लुटाइए।

जिसने दिये हों सात वचन सात जन्मों के,

केवल उसी के सामने घूँघट उठाइए।

बीमारियाँ चरित्र की लगती हैं छूत से,

पीड़ितजनों के पास जियादा न जाइए।

बस दागदार करते जो घर की दीवारों को,

वैसे चिराग हाथ से…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 3, 2013 at 7:17pm — 16 Comments

हरे भरे बागों को मिटाया जा रहा है |कविता - अतुकांत |

कागज़ के फूलों को सजाया जा रहा है |
हरे भरे बागों को मिटाया जा रहा है |
क्या होगा हाल उन कश्तियों का ,
जिन्हें सुर्ख रेत पर चलाया जा रहा है | 
कैसे सूखे आँसू  उन ग़मगीन आँखों का …
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Added by Shyam Narain Verma on August 3, 2013 at 3:54pm — 8 Comments

चांदनी फिर पिघलने लगी है

चांदनी फिर पिघलने लगी है

आँसुओं से धुली वो इबारत

गीत बनकर मचलने लगी है।

रोते-रोते हुए पस्त शिशु से,

भावना के विहग सो गये थे

सांझ की डाल सहमी हुई थी,

भोर के पुष्प चुप हो गये थे

फिर अचानक हुई कोई हलचल,

जैसे लहरा गया कोई आंचल

उनके दिल से उठी एक बदली

मेरी छत पे टहलने लगी है।

इक गजल पर तरह दी किसी ने,

भूला मुखड़ा पुनः गुनगुनाया

प्यार से साज की धूल झाड़ी,

मुद्दतों बाद फिर से उठाया

तार…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 3, 2013 at 3:30pm — 25 Comments

नज़्म - सिगरेट सी ज़िन्दगी

उँगलियों के बीच फँसी

सिगरेट की तरह

कब से सुलग रही है ज़िन्दगी

सैकड़ों ख्वाब हैं,

कश-दर-कश, धुआँ बनकर

भीतर पहुँच रहे हैं..

ज्यादातर का तो

दम ही घुटने लगता हैं

और भाग जाते हैं लौटती साँसों के साथ ।

पर कुछेक हैं,

जो छूट गए हैं भीतर ही कहीं

पड़े हुए हैं चिपक कर, टिककर..

इन दिनों एक-एक कर मैं

उन्हीं ख़्वाबों को

मुकम्मल करने में लगा हूँ.



मिलूँगा फिर कभी

कि अभी ज़रा जल्दी में हूँ

मेरी सिगरेट ख़त्म होने को… Continue

Added by विवेक मिश्र on August 3, 2013 at 3:09pm — 26 Comments

आज हुआ मौसम भी इस तरह ख़राब ....

आज हुआ मौसम भी इस तरह ख़राब 
तुम लगो गुलाब से नजर हुयी शराब   
सांवले से रुख  पे है बनारसी समां 
शाम अवध की है तेरे हुस्न की किताब  
जुल्फ तेरी नागिन सी या लगें घटा 
अब हटा लो आप रुख पे जो पड़ा हिजाब 
जादू नजर का है हुआ या हो गया नशा  
बैठिये भी खोलिए ये इश्क की किताब
तेरी अदा है लग रही अजंता की गुफा 
कोई सवाल पूछिए, या दीजिये जवाब
जुल्फ मत बिखेरिये संभालिये जरा 
होश खो…
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Added by Ashish Srivastava on August 3, 2013 at 11:00am — 4 Comments

ग़ज़ल : कहानी तुम अमर कर दो

बहर : हज़ज मुरब्बा सालिम
१२२२, १२२२

दिवाना दिल जिगर कर दो,
इधर भी तो नज़र कर दो,

फलक से चाँद लाऊं मैं,
इशारा तुम अगर कर दो,

अकेले रास्ता मुश्किल,
सुहाना तुम सफ़र कर दो,

हजारों मैं ग़ज़ल कह दूँ,
सरल थोड़ी बहर कर दो,

पिला दो हाँथ से अपने,
सुधा बेशक जहर कर दो,

मुहब्बत मैं अजय कर दूँ,
कहानी तुम अमर कर दो...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by अरुन 'अनन्त' on August 3, 2013 at 10:30am — 16 Comments

आलेख/ आधुनिकता बनाम पुश्तैनी

             इस आधुनिक और भागमभाग जिंदगी में यदि किसी चीज़ का अकाल पड़ा है तो वो समय है कोई किसी से बिना मतलब मिलना नहीं चाहता यदि आप किसी से मिलना चाहो तो उसके पास टाइम नही है। और मजबूरी वश या अनजाने में यदि मिलना भी पड़ जायें तो मात्र दिखावटी प्यार व चन्द रटी रटाई बातें करने के बाद मौका मिलते ही “आओ ना कभी ” कह कर बात खत्म करने की कोशिश की जाती है और सामने वाला भी तुरन्त आपकी मंशा समझ कर टाइम ही नही मिलता का नपा तुला जवाब देकर इतिश्री कर लेता है। लगता है जैसे एक…

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Added by D P Mathur on August 3, 2013 at 9:23am — 13 Comments

लघुकथा: थोड़ी सी प्यास

किसान हीरा की पत्नी घाट से जो मटका भर कर लाती थी, उसमें छोटा सा छेद हो गया था| उस पर हाथ रखते रखते भी पानी ज़मीन पर गिर ही जाता| जैसे तैसे वो पानी लेकर आती थी|

उसने अपने पति से इस बात की शिकायत की कि, अब इस मटके से पानी भरना संभव नहीं है, आप नया मटका ले आओ| हीरा थोड़ा व्यस्त था, जब तक वो नया मटका खरीदता, तब तक पुराने मटके का छेद काफी बढ़ गया और बहुत सारा पानी तो रास्ते में ही गिर जाता|

नया मटका आते ही पुराना मटका हीरा की पत्नी ने बाहर फैंक दिया, वहां काफी कीचड़ थी,…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 3, 2013 at 1:00am — 8 Comments

एक ग़ज़ल

उसके लिए कहना कितना आसान था,

सुखों के लिए बिक रहा मेरा ईमान था |

 

जो दुखों के पंख लगा के घर में आता है,

उसकी खुशामदीद का क्यों अरमान था |

 

तय की थीं मंज़िलें जिन्होंने दोस्ती की

वो कह गए कि उनका बड़ा एहसान था |

 

मैनें खोद के देखा इंसानियत की परतों को

ना तो वहां रूह थी और कहाँ इंसान था |

 

आओ छुपा दें हर ग़म को आखों में ही

सुख को सुखाना कहां इतना आसान था |

( मौलिक और अप्रकाशित )

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 3, 2013 at 12:00am — 10 Comments

तुम स्त्री हो ...

सावधान रहो

सतर्क रहो

किस किस से

कब कब

कहाँ कहाँ

हमेशा रहो

हरदम रहो

जागते हुए भी

सोते हुए भी

क्या कहा ?

ख्वाब देखती हो

किसने कहा था

बंद करो

कल्पना की कूची से

आसमान में रंग भरना

उड़ना चाहती हो ?

क़तर डालो पंखो को

अभी के अभी

ओफ्फ तुम मुस्कुराती हो

अरे तुम तो खिलखिलाती भी…

Continue

Added by MAHIMA SHREE on August 2, 2013 at 10:30pm — 43 Comments

मत्तगयंद सवैये - (रवि प्रकाश)

प्रथम प्रयास

- - - - - - - - -

1. बंजर हो धरती कितनी पर ये मन उर्वर देश वही है।

शूल गड़े दुखते तन में नित कातरता पर लेश नहीं है।

कौन मुझे समझे,परखे,उलझा अपना चिर वेश वही है।

कुंठित हो कर भी मुझमें कुछ धार अभी तक शेष कहीं है॥

2.

सादर है अधिकार तुम्हें तुम रूप-सुधा अविराम लुटाना।

तारक,हीरक या मणि-कांचन-मंडित जीवन पे इतराना।

यौवन की चिनगी दिखला कर प्रेम-हुताशन भी सुलगाना।

प्यास बुझे न नदी-जल से जब सागर के तट गागर लाना॥…



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Added by Ravi Prakash on August 2, 2013 at 8:00am — 11 Comments

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