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August 2013 Blog Posts

इस नील स्यामल

अनन्तता में

धकेल कर मुझ निर्वसना को

कोई चुरा ले गया है मेरे शब्द..

मेरी ध्वनियाँ... मेरे चित्र..

जा बैठा है ना जाने

किस कदम्ब की शाख पर

कैसे पुकारूँ सखी...मैं तो गई... !!

(मौलिक व  अप्रकाशित )

Added by Vasundhara pandey on August 9, 2013 at 5:00pm — 3 Comments

दिल्ली में फिर नादिर

शरीफों में शराफत नहीं

सिंह बकरी सा मिमियाए.

देख के, भारत माता का

आंचल भी शर्माए.

**********

दुष्ट कब समझा है जग में

निश्छल प्रेम की परिभाषा.

अपनी ही लाशों पर लिखोगे

क्या देश की अभिलाषा.

 

लाल पत्थर की दीवारें भी

महफूज़ नहीं रख पाएंगी .

सीमा पर बही रक्त जब

दिल्ली तक तीर आएगी .

 

सत्ता सुख क्षणिक है

सदैव नहीं रह पायेगा.

दिल्ली की चौड़ी सड़कों पर

जब फिर से नादिर…

Continue

Added by Neeraj Neer on August 9, 2013 at 11:30am — 14 Comments

ग़ज़ल / नीरज

दर्दे सितम जो डोरे दिल कमज़ोर कर गए ।

माला से दिल की टूट कर मोती बिखर गए ।



ता उम्र हमने रखा जिनको सहेज़ कर ,

हाथो से मेरे छूट कर जाने किधर गए ।



अरमा अधूरे रह गये दिल में जो प्यार के ,

बनकर के अश्क वो मेरी आँखों में भर गए ।



आये थे दिल की दास्ताँ सुन ने वो शौक से ,

गहराइयों में दिल की झाँका तो डर गए ।



दो पग भी उनके बिन चलूँ मुमकिन न हो सका ,

हमतो खड़े ही रह गए रस्ते गुज़र गए ।



ज़िंदा हमे समझ रहे उनको खबर नही ,

जिस रोज… Continue

Added by Neeraj Nishchal on August 9, 2013 at 10:01am — 20 Comments

परिवर्तन

परिवर्तन है सत्य सदा

अपनाना इसको सीखें।

इसमें ही है नव-जीवन

नूतन-पथ बुनना सीखें।।



नूतनता,खुशियां जनती

उत्सव नित्य मनाएं हम।

खुश रहकर कुसमय काटें

समय से न कट जाएं हम।

जीवन रंग सजाने को,

नयन-अश्रु पीना सीखें।।



शोक,हर्ष,उत्थान-पतन

हमें तपा कुन्दन करते ।

अगम सिन्धु की झंझा में

कर्म सदा नौका बनते।

निष्कामी आराधक बन

जग-वन्दन करना सीखें।।



प्राण मात्र से प्रीति करें,

प्रेम-पात्र जो बनना है।

अब तो… Continue

Added by Vindu Babu on August 9, 2013 at 8:58am — 20 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघु कथा : रमजान (गणेश जी बागी)

क किलो मटन आज वास्तव में एक किलो का ही लग रहा था । मैंने तराजू और बाट पर नज़र दौड़ाई । मालूम हुआ दोनों बिल्कुल नये हैं । अभी पिछ्ले महीने ही मटन लेने आया था तो पुराना तराजू और घिसे हुए बाट थे । बाट के नीचे से लगा हुआ तब रांगा भी गायब था । एक किलो मटन मानो आठ सौ ग्राम का ही लगता था | 
दुकान पर मौजूद छोटू से मैने धीरे से पूछ ही लिया, "क्या बात है जी, नया तराजू, नये बाट?.." 

छोटू दुकान मालिक की नज़र बचा कर फुसफुसाया, "सर, रमजान का महीना है ना,…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 8, 2013 at 10:52pm — 52 Comments

!!! हरिगीतिका !!!

!!! हरिगीतिका !!!



2+3+4+3+4+3+4+5= 28

चौकल में जगण-121 अतिनिषिध्द है। चरण के अन्त में रगण-212 कर्ण प्रिय होता है।

जब मेघ बरसे रात तड़फे पीर है मन वेदना।

तन तीर धसती घाव करती राह निश-दिन देखना।।

अब आव प्रियतम भोर होती भ्रमर तन-मन छेदता।

रति-सुमन हॅसकर हास करती सुर्ख सूरज देवता।।1

चिडि़यां चहक कर तान कसती बांग मुर्गा टीसते।

बन-बाग-उपवन खूब झूमें मोर-दादुर रीझते।।

घर नीम छाया धूप माया उमस करती ताड़ना।

नय नीर छलके भाव बहके…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 8, 2013 at 9:45pm — 18 Comments

आओ लोकतंत्र- लोकतंत्र खेलें (लघुकथा)

अचानक मेरे पांव ठिठक गये। कुछ बच्चे कह रहे थे, आओ लोकतंत्र लोकतंत्र खेलें। मैंने सोंचा- कई खेल सुना है, खेला भी है, मसलन- गिल्ली-डंडा, छुपा- छुपी, कबड्डी, खो- खो आदि। ये नया खेल कौन सा है- लोकतंत्र- लोकतंत्र? मैंने देखा- एक बच्चा जमीन पे लेटा हुआ है, दूसरा बच्चा उसके पास बैठा है। वह रोते हुए कह रहा है- माई- बाप सहाय लागो, मेरा बच्चा भूख से मर रहा है। मैं भी भूख से व्याकुल हूँ। आज मुझे कोई काम नहीं मिला। सहाय लागो माई- बाप सहाय लागो।

एक बच्चा आता है और उसके आगे 24 रूपये फेंक कर कहता है- ले… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on August 8, 2013 at 8:00pm — 17 Comments

तुम्हारी चूड़ियां खनकती थीं

तुम्हारी चूड़ियां खनकती थीं 

जब भी सोया अकेली रातों में

डूबता रहा  तुम्हारी बातों में 

कभी थे हाथ, तेरे हाथों  में 

हाँ! तुम  ही तुम महकती थीं 

तुम्हारी चूड़ियां खनकती थीं 

जब होती थीं तुम तन्हाई में 

विरह की सम्वेदित अंगड़ाई में 

भावों की असीम गहराई में 

साध चुप्पी, तुम बिलखती थीं

तुम्हारी चूड़ियां खनकती थीं 

मुझे याद है वे सारे पल 

वह परसों, आज और कल

जब टूटा था…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on August 8, 2013 at 5:00pm — 26 Comments

ग़ज़ल एक कोशिश

1222 1222 1222 1222

तमन्ना है मेरी दिलबर मुझे थोड़ी वफ़ा दे दो।

महक जाऊ मैं गुलशन में मुझे ऐसी फिजा दे दो।।



दिए हैं लाख दुनियां ने मुझे जो ज़ख़्म सीने पर

न हो अब दर्द मुझको यार कुछ ऐसी दवा दे दो
।।



किया है जुर्म हमने क्या मुझे भी तो पता चलता।

अगर माफ़ी न मिल सकती मुझे हमदम सज़ा दे दो।।




हुई है बेवफाई मुझ से भी अब क्या जहां…

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Added by Ketan Parmar on August 8, 2013 at 4:30pm — 33 Comments

जलते रहे चिराग हवाओं से जूझकर

जलते रहे चिराग हवाओं से जूझकर

जिन्दा रहे थे हम भी गम में यूं डूबकर

चलते रहे थे हम भी लिए दिल में आस ही

वरना ठहर से जाते कभी हम भी टूटकर

बहने लगे थे हम भी लहरों के साथ ही

अब करते भी भला क्या कश्ती से छूटकर

वो हमसफ़र थे अपने मगर फिर भी मौन थे

कटती नहीं हयात मेरे यारों रूठकर

ले जायेगा मुझे भी इक दिन वो दूर यूं

अपनों के नाम होंगे नहीं लव पे भूलकर

जब से हुई हवा ये हवादिश की ही…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on August 8, 2013 at 3:13pm — 13 Comments

मेरे जज्बात

मै अपनी तक़दीर पर कभी , रोया या नही रोया 

पर मेरे जज्बातों पर आसमा टूट के रोया |

मै क्या क्या बताऊ मे क्या क्या गिनाऊ ,

क्या नही पाया मैंने क्या नही खोया |

मेरी हर रात कटी है सो वीमारो के जैसे 

दर्द से जुदा होकर मै एक पल नही सोया |

मेरे जीने पे  जो जालिम , मातम मनाता रहा ,

मेरे मरने  पर वो जी भर के क्यों रोया |

मेरे दिल के जख्म फूलो से निखरते रहे   

मैंने कभी इनको मरहम से नही  धोया…

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Added by aman kumar on August 8, 2013 at 12:03pm — 13 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४२ (हे प्रभु)

हे प्रभु,

मैंने मन मंदिर में

आपकी मूर्ति की स्थापना तो कर दी है

मगर इसकी प्राण-प्रतिष्ठा का काम तो आपका ही है

क्योंकि मुझमें यह कला नहीं.

अब आप ही इसके देव, आप ही इसके पुजारी,

और आप ही इसके उपासक हैं.

मैं तो इक इमारत भर हूँ

जो जड़ता के स्पंदन के स्तर तक ही जीवित

और अस्तित्ववान है.

 

हे नाथ,

जब तक आप इसके मूल में प्राणाहूत हैं,

इस प्रस्तरशिला रूपी संरचना का कोई अर्थ है.

हे मालिक,

समय-समय…

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Added by राज़ नवादवी on August 8, 2013 at 8:30am — 6 Comments

कहीं बूढा कोई खटिया में बैठा खाँसता होगा ….…

August 8, 2013 at 2:33am

है बहुत मजबूर वो जमाने से भागता होगा 

नींद की ख्वाहिश में रात भर जागता होगा। 

 

रौशनी के चंद कतरे रखे थे अँधेरों से छुपा

क्या पता था कोई दरारों से झाँकता होगा। 

 

जमीं से उठते हुये ताकते रहे आस्माँ को हम

ये न सोचा था कभी वो हमें भी ताकता होगा। 

 

आज समझा अहले दौराँ की तिज़ारत देखकर 

शैतान भी इन्साँ से अब पनाहें माँगता होगा।

 

घटा घनघोर घिरती है गरजती है बरसती…

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Added by dr lalit mohan pant on August 8, 2013 at 2:30am — 16 Comments

लघुकथा : आंधी

एक गाँव था ! वहां बहुत सारे पापी रहते थे ! पाप करते और पानी से धो लेते ! धोते-धोते एकदिन सारा पानी खत्म हो गया ! पानी खत्म होने पर उन पापियों के पाप से गाँव तपने लगा ! उस तपन को पापियों ने नज़रंदाज़ कर दिया और पहले की ही तरह पाप करते रहे ! तपते-तपते आखिर एकदिन बड़ी भयानक आग उठी और उन पापियों को जलाने के लिए बढ़ने लगी ! पानी तो था नही,  इसलिए पापियों ने आग से बचने के लिए उसपर खूब सारी मिटटी डाल दी ! आग दबने लगी, पापी खुश होने लगे कि तभी बड़ी जोर से आंधी आई और सारी मिट्टी उड़ गई ! अब हवा से परवाज…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on August 7, 2013 at 7:04pm — 10 Comments

भूख का बीमा (लघुकथा)

रहीम - यार! अपन लोग की लाइफ का कोई गेरन्टी नहीं।
राम - ये सेठ लोग अक्खी दुनिया के हिस्से की गेरन्टी खुद ही ले लेना चाहता है।
-हाँ यार! देख कल अपने सेठ की गाड़ी क्या ठुकी कि बीमा का केस दायर कर दिया। अब साल्ला 4-5 लाख तो मिल ही जायेगा उसको।
-लेकिन तुझे मालूम है? कल अपन के मोहल्ले में अश्फाक मोची का इकलौता लड़का, बेचारा भूख से तड़प कर मर गया।
-काश अपन लोग के भूख भी का बीमा होता यार, तो भूख लगने या मरने पर कुछ तो मिल जाता!

मौलिक व अप्रकाशित

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on August 7, 2013 at 1:33pm — 31 Comments

राष्ट्रभक्ति गान प्रतियोगिता

राष्ट्रभक्ति गान प्रतियोगिता

विश्व हिंदी संस्थान, कनाडा तथा हिंदी की मासिक ई-पत्रिका “प्रयास” के संयुक्त तत्वावधान में भारत के स्वाधीनता दिवस के उपलक्ष्य में एक “राष्ट्रभक्ति…

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Added by Prof. Saran Ghai on August 7, 2013 at 8:00am — 4 Comments

शिव बाबा की महिमा!

शिव बाबा की महिमा

शिव बाबा की कृपा से, सब काम हो रहा है

हम माने या न माने, कल्याण हो रहा है!

खुद विष का पान करके, अमृत किया हवाले,

आशीष सबको देते, विषधर गले में डाले.

तन में भभूत लिपटे, तिरसूल को सम्हाले

आये शरण में कोई, उसको गले लगा ले. 

हम भक्त हैं उन्ही के, ये भान हो रहा है! हम माने या न माने कल्याण हो रहा…

Continue

Added by JAWAHAR LAL SINGH on August 7, 2013 at 7:17am — 18 Comments

भूल जाने का हुनर आता नहीं

दोस्त  बनकर भूल  जाने का हुनर आता नहीं

लोग  कहते  हैं के  दस्तूरे  सफ़र आता नहीं

 

जब रहम  की  आस में दम तोड़ता है आदमी

क्यों किसी के दिल-जिगर में वो असर आता नहीं

 

दरहकीकत  छांव  दे  जो इस जहाँ की धूप से

अब हमारे  ख्वाब  में भी  वो शजर आता नहीं

 

रंग-ओ-खुशबू है मगर,यह टीस है कुछ फूल को

वक्त जब  माकूल  रहता, क्यों समर आता नहीं

 

जब मुकाबिल तोप  की जद में बरसती आग हो

फिर बशीरत के, सिवा कुछ भी नज़र आता…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on August 7, 2013 at 5:54am — 7 Comments

ओस की बूँदें//ग़ज़ल//कल्पना रामानी

1222122212221222

सुनहरी भोर बागों में, बिछाती ओस की बूँदें!

नयन का नूर होती हैं, नवेली ओस की बूँदें!

 

चपल भँवरों की कलियों से, चुहल पर मुग्ध सी होतीं,

मिला सुर गुनगुनाती हैं, सलोनी ओस की बूँदें!

 

चितेरा कौन है? जो रात, में जाजम बिछा जाता,

न जाने रैन कब बुनती, अकेली ओस की बूँदें!

 

करिश्मा है खुदा का या, कि ऋतु रानी का ये जादू,

घुमाकर जो छड़ी कोई, गिराती ओस की बूँदें!

 

नवल सूरज की किरणों में, छिपी…

Continue

Added by कल्पना रामानी on August 6, 2013 at 10:00pm — 22 Comments

आकर्षण

अधरों का कम्पन
पुष्प से कोमल कपोल
मनमोहक मादक अदा
मद मस्त अगड़ाई
गीले बालों का झरना
तिरछी मदभरी पलके
केश रूपी लतिका की
ओट से निहारना
हाय !उनका अनछुआ स्पर्श

अंग अंग से टपकती कामुकता
प्रेम की बहती शीतल बयार
नसों का रुधिर वेग बेकाबू
आलिंगन को मै बेकल 
वातावरण जैसे 
अदभुत जादुई ग्रह हो
पुर्णतः पाषाण शिला सा मैंने
निःशब्द  प्रेम का आह्वान किया

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक /अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on August 6, 2013 at 7:00pm — 10 Comments

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