For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

अपना इक मेयार बना (ग़ज़ल)

लफ़्ज़ों को हथियार बना
फिर उसमें तू धार बना

छोड़ तवज़्ज़ो का रोना
अपना इक मेयार बना

लंबा वृक्ष बना ख़ुद को
लेकिन छायादार बना

बेवकूफ़ियाँ बढ़ती गयीं
जितना बशर हुश्यार बना

शिकवा गुलों से है न तुझे?
तो कांटों को यार बना

जिसने दिखाई राह नई
वो दुनिया का शिकार बना

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by जयनित कुमार मेहता on July 9, 2024 at 7:53pm — 4 Comments

दोहा सप्तक .. इच्छा , कामना, चाह आदि

दोहा सप्तक : इच्छा ,कामना, चाह  आदि

मानव मन संसार में, इच्छाओं का दास ।

और -और की चाह में, निस-दिन बढ़ती प्यास ।1।

इच्छा हो जो बलवती, सध जाता हर काम ।

चर्चा  उसके नाम की, गूँजे आठों याम ।2।

व्यवधानों की लक्ष्य में, जो करते परवाह ।

क्षीण लगे उद्देश्य में, उनके मन की चाह ।3।

अन्तर्मन की कामना, छूने की आकाश ।

सम्भव है यह भी अगर, होवें नहीं हताश ।4।

परिलक्षित संसार में, होता वो परिणाम ।

इच्छा के अनुरूप…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 5, 2024 at 8:30pm — 8 Comments

बात का मजा जाए-ग़ज़ल

बात सुनकर ही कुछ कहा जाए,
हो न ये, बात का मजा जाए।

बोल चल देते वे ठिकाने तज,
मूल जिनका हवा-हवा जाए।

सत्य कहने का भी सलीका है,
जिसको छोड़ो, न सच सहा जाए।

जिंदगी है, खुशी-ओ-रंज भी हैं,
साथ इनके मियां जिया जाए।

काम ईमान से करे अपना,
तो वो इंसाँ भला कहा जाए।

'बाल' सच को नकारा ही जाता,
ऐसा भी क्यों समझ लिया जाए?

मौलिक अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 4, 2024 at 10:18pm — 2 Comments

दोहा एकादश. . . . जरा काल

दोहा एकादश. . . . जरा काल

दृग जल हाथों पर गिरा, टूटा हर अहसास ।

काया  ढलते ही लगा, सब कुछ था आभास ।।1

जीवन पीछे रह गया, छूट गए मधुमास ।

जर्जर काया क्या हुई, टूट गई हर  आस ।।2

लार गिरी परिधान पर, शोर हुआ घनघोर ।

काया पर चलता नहीं, जरा काल में जोर ।।3

लघु शंका बस में नहीं, थर- थर काँपे हाथ ।

जरा काल में खून ही , छोड़ चला फिर साथ ।।4

अपने स्वर्णिम काल को ,मुड़-मुड़ देखें नैन ।

जीवन फिसला रेत सा, काटे कटे न रैन ।।5

सूखा रहता…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 3, 2024 at 2:00pm — No Comments

दोहे आज के. . . .

दोहे आज के .....

बिगड़े हुए समाज का, बोलो दोषी कौन ।

संस्कारों के ह्रास पर, आखिर हम क्यों मौन ।।

संस्कारों को आजकल, भला पूछता कौन ।

नंगेपन  के प्रश्न पर,  आखिर हम क्यों मौन ।।

नर -नारी के मध्य अब, नहीं शरम की रेख ।

खुलेआम अभिसार का, देख तमाशा देख ।।

सरेआम अब हो रहा, काम दृष्टि का खेल ।

युवा वर्ग में आम अब, हुआ अधर का मेल ।।

सभी तमाशा देखते, कौन करे प्रतिरोध ।

कल के बिगड़े रंग का, नहीं किसी को बोध ।।

कर में कर को थाम कर, चले…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 27, 2024 at 9:27pm — No Comments

ग़ज़ल

2122    1212   112/22

*

ज़ीस्त  का   जो  सफ़र   ठहर   जाए

आरज़ू      आरज़ू      बिख़र     जाए

 

बेक़रारी    रहे     न    कुछ    बाक़ी

फ़िक्र   का   दौर    ही    गुज़र जाए…

Continue

Added by Ashok Kumar Raktale on June 25, 2024 at 3:30pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बालगीत : मिथिलेश वामनकर

बुआ का रिबन

बुआ बांधे रिबन गुलाबी

लगता वही अकल की चाबी

रिबन बुआ ने बांधी काली

करती बालों की रखवाली

रिबन बुआ की जब नारंगी

हाथ में रहती मोटी कंघी

रिबन बुआ जब बांधे नीली

आसमान सी हो चमकीली

हरी लाल हो रिबन बुआ की

ट्रैफिक सिग्नल जैसी झांकी 

बुआ रिबन जो बांधे पीली

याद आती है दाल पतीली

रिबन सफेद बुआ ने डाले

उड़े कबूतर दो…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on June 24, 2024 at 10:43pm — 2 Comments

जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)

1222 1222 122

-------------------------------

जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में

वो फ़्यूचर खोजता है लॉटरी में

दिखाई ही न दें मुफ़्लिस जहां से

न हो इतनी बुलंदी बंदगी में

दुआ करना ग़रीबों का भला हो …

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 22, 2024 at 3:30pm — 6 Comments

दोहा सप्तक. . . सच-झूठ

दोहे सप्तक . . . . . सच-झूठ



अभिव्यक्ति सच की लगे, जैसे नंगा तार ।

सफल वही जो झूठ का, करता है व्यापार ।।

झूठों के बाजार में, सत्य खड़ा लाचार ।

असली की साँसें घुटें, आडम्बर भरमार ।।

आकर्षक है झूठ का, चकाचौंध संसार ।

निश्चित लेकिन झूठ की, किस्मत में है हार ।।

सच के आँगन में उगी, अविश्वास की घास ।

उठा दिया है झूठ ने, सच पर से विश्वास ।।

झूठ जगाता आस को, सच लगता आभास ।

मरीचिका में झूठ की, सिर्फ प्यास ही प्यास ।।

सत्य पुष्प पर झूठ…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 18, 2024 at 9:13pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . .सागर

दोहा पंचक. . . सागर

उठते हैं जब गर्भ से, सागर के तूफान ।

मिट जाते हैं रेत में, लहरों के अरमान ।।

लहर- लहर में  रेत पर, मचलें सौ अरमान ।

मौन तटों पर प्रेम की, रह जाती पहचान ।।

छलकी आँखें देख कर, सूना सागर तीर ।

किसके  अश्कों ने  किया, खारा सागर नीर ।।

कौन बनाता है भला, सागर तीर मकान ।

अरमानों को लीलता,  इसका हर तूफान ।।

देखा पीछे पर कहाँ, जाने गए निशान ।

हर वादे को दे गया, घाव एक तूफान ।।

सुशील सरना /…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 10, 2024 at 1:00pm — 6 Comments

सीमा के हर कपाट को - (गजल)-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

कानों से  देख  दुनिया  को  चुप्पी से बोलना

आँखों को किसने सीखा है दिल से टटोलना ।१।

*

कौशल तुम्हें तो आते हैं ढब माप तौल के

जब चाहो खूब नींद को सपनों से तोलना।२।

*

कब जाग जाये कौन  सा  बदज़ात जानवर

सीमा के हर कपाट को खुलकर न खोलना ।३।

*

करना हमेशा अन्न का जीवन में मान तुम

चाहे पड़े  भकोसना  या फिर कि चोलना।४।

*

चक्का समय का घूम के लौटा है फिर वहीं

जिस में…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2024 at 5:44am — No Comments

दोहा सप्तक ..रिश्ते

दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते

रिश्ते नकली फूल से, देते नहीं सुगंध ।

अर्थ रार में खो  गए, आपस के संबंध ।।

रिश्तों के माधुर्य में, आने लगी खटास ।

मिलने की  ओझल हुई, संबंधों में प्यास ।।

गैरों से रिश्ते बने, अपनों से हैं दूर ।

खून खून से अब हुआ, मिलने से मजबूर ।।

झूठी हैं अनुभूतियाँ , कृत्रिम हुई मिठास ।

रिश्तों को आते नहीं, अब रिश्ते ही रास ।।

आँगन में खिंचने लगी, नफरत की दीवार ।

रिश्तों की गरिमा…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 7, 2024 at 8:30pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . . .दम्भ

दोहा पंचक. . . . . दम्भ

हर दम्भी के दम्भ का, सूरज होता अस्त ।

रावण जैसे सूरमा, होते देखे पस्त । ।

दम्भी को मिलता नहीं, जीवन में सम्मान ।

दम्भ कुचलता जिंदगी, की असली पहचान ।।

हर दम्भी को दम्भ की, लगे सुहानी नाद ।

इसके मद में चूर वो, बन जाता सैयाद ।।

दम्भ शूल व्यक्तित्व का, इसका नहीं निदान ।

आडम्बर के खोल में, जीता वो इंसान ।।

दम्भी करता स्वयं का, सदा स्वयं अभिषेक ।

मैं- मैं को जीता सदा, अपना हरे…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 2, 2024 at 6:56pm — No Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कहूं तो केवल कहूं मैं इतना: मिथिलेश वामनकर

कहूं तो केवल कहूं मैं इतना कि कुछ तो परदा नशीन रखना।

कदम अना के हजार कुचले,

न आस रखते हैं आसमां की,

ज़मीन पे हैं कदम हमारे,

मगर खिसकने का डर सताए, पगों तले भी ज़मीन रखना।

उदास पल को उदास रखना,

छिपी तहों में खुशी दबी है,

न झूठी कोई तसल्ली लाना,

हो लाख कड़वी हकीकतें पर, न ख़्वाब कोई हसीन रखना।

दसों दिशाएं विलाप में हैं,

बिसात बातों की बिछ गई है,

बुनाई लफ्जों की हो रही है,

हमारे आधे में तय तुम्हारा रखा है आधा यकीन…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on May 29, 2024 at 11:52pm — 8 Comments

कुंडलिया छंद

आग लगी आकाश में,  उबल रहा संसार।

त्राहि-त्राहि चहुँ ओर है, बरस रहे अंगार।।

बरस रहे अंगार, धरा ये तपती जाए।

जीव जगत पर मार, पड़ी जो सही न जाए।

पेड़ लगा 'कल्याण', तुझी से यह आस जगी।

हरी - हरी हो भूमि, बुझे जो यह आग लगी !

सुरेश कुमार 'कल्याण' 

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 29, 2024 at 8:00pm — 2 Comments

दोहा सप्तक ..रिश्ते

दोहा सप्तक. . . . रिश्ते

आपस के माधुर्य को, हरते कड़वे बोल ।

मिटें जरा सी चूक से, रिश्ते सब  अनमोल ।।

शंका से रिश्ते सभी, हो जाते बीमार ।

संबंधों में बेवजह,  आती विकट दरार ।।

रिश्ता रेशम सूत सा, चटक चोट से जाय ।

कालान्तर में वेदना,  इसकी भुला न पाय ।।

बंधन रिश्तों के सभी,  आज हुए कमजोर ।

ओझल मिलने के हुए, आँखों से अब छोर ।।

रिश्तों में अब स्वार्थ का, जलता रहता दीप ।

दुर्गंधित से नीर में, खाली मुक्ता से सीप ।।

संबंधों को…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 8, 2024 at 1:42pm — 4 Comments

कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . . 

झोला  लेकर  हाथ  में, चले  अनोखे  लाल ।
भाव  देख  बाजार  के, बिगड़े  उनके  हाल ।
बिगड़े  उनके हाल ,करें क्या  आखिर  भाई ।
महंगाई  का    काल , खा   गया   पाई- पाई ।
कठिन दौर से  त्रस्त , अनोखे दर- दर डोला ।
लौटा   लेकर  साथ , अंत  में  खाली  झोला ।

सुशील सरना /7-5-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on May 7, 2024 at 8:28pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . .मजदूर

दोहा पंचक. . . . मजदूर

वक्त  बिता कर देखिए, मजदूरों के साथ ।

गीला रहता स्वेद से , हरदम उनका माथ ।।

सभी दिवस मजदूर के, जाते एक समान ।

दिन बीते निर्माण में, शाम क्षुधा का गान ।।

याद किया मजदूर के, स्वेद बिंदु को आज ।

उसकी ही पहचान है, , विश्व धरोहर ताज ।।

स्वेद बूँद मजदूर की, श्रम का है अभिलेख ।

हाथों में उसके नहीं , सुख की कोई रेख ।।

रोज भोर मजदूर की, होती एक समान ।

उदर क्षुधा से नित्य ही, लड़ती उसकी जान…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 1, 2024 at 4:30pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . .पुष्प - अलि

दोहा पंचक. . . . पुष्प -अलि

गंध चुराने आ गए, कलियों के चितचोर ।

कली -कली से प्रेम की, अलिकुल बाँधे डोर ।।

अलिकुल की गुंजार से, सुमन हुए भयभीत ।

गंध चुराने आ गए, छलिया बन कर मीत ।।

आशिक भौंरे दिलजले, कलियों के शौकीन ।

क्षुधा मिटा कर दे गए, घाव  उन्हें संगीन ।।

पुष्प मधुप का सृष्टि में, रिश्ता बड़ा अजीब ।

दोनों के इस प्रेम को, लाती गंध करीब ।।

पुष्प दलों को भा गई, अलिकुल की गुंजार ।

मौन समर्पण कर…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 27, 2024 at 1:51pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .

दोहा पंचक  . . . .

( अपवाद के चलते उर्दू शब्दों में नुक्ते नहीं लगाये गये  )

टूटे प्यालों में नहीं, रुकती कभी शराब ।

कब जुड़ते है भोर में, पलक सलोने ख्वाब ।।

मयखाने सा नूर है, बदन अब्र की बर्क ।

दो जिस्मों की साँस का, मिटा वस्ल में फर्क ।।

प्याले छलके बज्म में, मचला ख्वाबी नूर ।

निभा रहे थे लब वहीं, बोसों का दस्तूर ।।

महफिल में मदहोशियाँ, इश्क नशे में चूर ।

परवाने को देखकर , हुस्न हुआ मगरूर…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 24, 2024 at 5:37pm — 2 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

sushil yadav posted blog posts
6 hours ago
Sushil posted blog posts
6 hours ago
vijay nikore posted a blog post

अनसुने अनकहे के बीच

                        अनसुने अनकहे के बीच.कहे अनसुने-से रहे कुछ जज़्बातउसपर अनकहे एहसासों का…See More
6 hours ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
Oct 15
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service