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दोहा दशम. . . . रोटी

दोहा दशम . . . . . . रोटी

कैसे- कैसे रोटियाँ, दिखलाती हैं  रंग ।

रोटी से बढ़कर नहीं,इस जीवन में जंग ।।

रोटी के संघर्ष में, जीवन जाता बीत ।

अर्थ चक्र में गूँजता , रोटी का संगीत ।।

रोटी का संसार में, कोई नहीं विकल्प ।

बिन रोटी के बीतता ,हर पल जैसे कल्प ।।

रोटी से बढ़कर नहीं, दुनिया में कुछ यार ।

इसके  आगे दौलतें , इस जग की बेकार ।।

दो रोटी ने दोस्तो , क्या - क्या दिये अजाब ।

मुफलिस की तकदीर का, रोटी…

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Added by Sushil Sarna on April 20, 2024 at 2:11pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल: उम्र भर हम सीखते चौकोर करना

याद कर इतना न दिल कमजोर करना

आऊंगा तब खूब जी भर बोर करना।

मुख्तसर सी बात है लेकिन जरूरी

कह दूं मैं, बस रोक दे वो शोर करना।

पंक्तियों के बीच पढ़ना आ गया है

भूल बैठा हूं मैं अब इग्नोर करना।

ये नजर अब आपसे हटती नहीं है

बंद करिए तो नयन चितचोर करना।

याद बचपन की न जाती है जेहन से

अब अखरता खुद को ही मेच्योर करना।

आज को जैसे वो जीना भूल बैठे

बस उन्हें धुन अपना कल सेक्योर…

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Added by मिथिलेश वामनकर on April 13, 2024 at 10:33pm — 7 Comments

ग़ज़ल: ग़मज़दा आँखों का पानी

२१२२ २१२२

ग़मज़दा आँखों का पानी

बोलता है बे-ज़बानी

मार ही डालेगी हमको

आज उनकी सरगिरानी

आपकी हर बात वाजिब

और हमारी लंतरानी

जाने किसकी बद्दुआ है

वक़्त-ए-गर्दिश जाँ-सितानी

दर्द-ओ-ग़म रास आ रहे हैं

बुझ रही है ज़िंदगानी

कौन जाने कब कहाँ से

आये मर्ग-ए-ना-गहानी

ले के फागुन आ गया फिर

फ़स्ल-ए-गुल की छेड़खानी

कैसे मैं समझाऊँ ख़ुद…

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Added by Aazi Tamaam on April 1, 2024 at 5:30pm — 6 Comments

"ओबीओ की 14वीं सालगिरह का तुहफ़ा"

"ओबीओ परिवार के सभी सदस्यों को ओबीओ की 14वीं सालगिरह मुबारक हो"

ग़ज़ल

212  212  212

इल्म की रौशनी ओबीओ

रूह की ताज़गी ओबीओ  (1)

तुझ से मंसूब करता हूँ मैं

अपनी ये शाइरी ओबीओ  (2)

तेरे बिन है अधूरी बहुत

ये मेरी ज़िंदगी ओबीओ  (3)

मेरा दिल मेरी चाहत है तू

जानते हैं सभी ओबीओ  (4)

चाहने वाले तेरे मिले

हर नगर हर गली ओबीओ …

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Added by Samar kabeer on April 1, 2024 at 1:51pm — 12 Comments

कैसे खैर मनाएँ

तारकोल से लगा चिपकने

चप्पल का तल्ला

 

बिगड़े हैं सुर मौसम के अब

कहे स्वेद की गंगा

फागुन में घर बाहर तड़पे

हर कोई सरनंगा

दोपहरी में जेठ न तपता

ऐसे सौर तपाए

अपनी पीड़ा किसे बताए

नया-नया कल्ला

 

पेड़ों को सिरहाना देती

खुद उसकी ही छाया

श्वानो जैसी उस पर पसरे 

आकर मानव काया

जो पेड़ों को काटे ठलुआ

बढ़कर धूप उगाए

अपनी गलती से वह भी तो

झाड़ रहा…

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Added by Ashok Kumar Raktale on March 28, 2024 at 10:41pm — 5 Comments

दोहा पंचक. . . . .प्रेम

दोहा पंचक. . . . प्रेम

अधरों पर विचरित करे, प्रथम प्रणय आनन्द ।

चिर जीवित अभिसार का, रहे मिलन मकरंद ।।

खूब हुआ अभिसार में, देह- देह का द्वन्द्व ।

जाने कितने प्रेम के, लिख डाले फिर छन्द ।।

मदन भाव झंकृत हुए, बढ़े प्रणय के वेग ।

अधरों के बैराग को, मिला अधर का नेग ।।

धीरे-धीरे रैन का , बढ़ने लगा प्रभाव ।

मौन चरम अभिसार के, मन में जले अलाव ।।

नैन समझते नैन के, अनबोले स्वीकार ।

स्पर्शों के दौर में, दम…

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Added by Sushil Sarna on March 23, 2024 at 2:45pm — 4 Comments

यह धर्म युद्ध है

रण भूमी में अस्त्र को त्यागे अर्जुन निःस्तब्ध सा खडा हुआ 

बेसुध सा निःसहाय सा केशव के चरणों मे पडा हुआ 

कहता था ना लड पायेगा, वार एक ना कर पायेगा 

शत्रु का है भेष भले पर वो अपना है जो अडा हुआ 

कैसे मैं उनपर प्रहार करूँ, जिनका मैं इतना सम्मान…

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Added by AMAN SINHA on March 23, 2024 at 5:57am — 1 Comment

कुंडलिया .... गौरैया

कुंडलिया - गौरैया

गौरैया  को   देखने, हम  आ  बैठे  द्वार ।
गौरैया के  झुंड  का, सुंदर   सा   संसार ।
सुंदर लगे संसार , धरा पर  दाना  खाती ।
लेकर तिनके साथ, घोंसला खूब बनाती ।
कह ' सरना ' कविराय, धूप में ढूँढे छैया ।
उसको  उड़ते  देख, कहें  री आ  गौरैया ।

सुशील सरना / 21-3-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on March 21, 2024 at 4:00pm — 4 Comments

बनो सब मीत होली में -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

निभाकर  रीत होली में

दिलों को जीत होली में।१।

*

भरें  जीवन  उमंगों से

चलो गा गीत होली में।२।

*

सभी सुख दुश्मनी छीने

बनो सब  मीत  होली में।३।

*

बहुत विरही तड़पता है

सफल हो प्रीत होली में।४।

*

किसी को याद मत आये

गयी  जो  बीत  होली  में।५।

*

लगे अब रोग कहते हैं

दुखों को पीत होली में।६।

*

गिरा दो  रंग  बरसाकर

खड़ी हर भीत होली में।७।

*

यही अरदास है पिघलें

दिलों की शीत होली…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 21, 2024 at 6:55am — No Comments

काश कहीं ऐसा हो जाता

काश कहीं ऐसा हो जाता, 

मैं जगता तू सो जाता 

मेरी हंसी तुझे मिल जाती 

तेरे बदले मैं रो लेता 

काश कहीं ऐसा हो जाता 

तू चलता मैं थक जाता 

पैर तेरे कभी ना रुकते…

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Added by AMAN SINHA on March 19, 2024 at 6:02am — 1 Comment

दोहा पंचक. . .

दोहा पंचक. . . . .

महफिल में तनहा जले, खूब हुए बदनाम ।

गैरों को देती रही, साकी भर -भर जाम ।।

गज़ब हया की सुर्खियाँ, अलसाए अन्दाज़ ।

सुर्खी सारे कह गई, बीती शब के राज़ ।।

साथी है अब वेदना, विरही मन की यार ।

विस्मृत होता ही नहीं, वो अद्भुत संसार ।।

उसे भुलाने के सभी, निष्फल हुए प्रयास ।

मदन भाव उन्नत हुए, मन में मचली प्यास ।।

कोई पागल हो गया, किसी ने खोये होश ।

आशिक को घायल करे, मदमाती आगोश…

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Added by Sushil Sarna on March 18, 2024 at 4:03pm — No Comments

आँख मिचौली

आ जा खेले आँख मिचौली, तू मेरा मैं तेरी हमजोली 

बंद करूँ मैं आँखों को तू जाकर कहीं छूप जाए 

पर देख मुझे तू सतना ना दूर कहीं छिप जाना ना 

ऐसा न हो तू पुकारे मुझे, मैं दूर कहीं खो जाऊं 

मैं आऊँ मैं आऊँ…

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Added by AMAN SINHA on March 16, 2024 at 6:16am — No Comments

ग़ज़ल -- दिनेश कुमार ( दस्तार ही जो सर पे सलामत नहीं रही )

221--2121--1221--212

दस्तार ही जो सर पे सलामत नहीं रही

जी कर भी क्या करोगे जो इज़्ज़त नहीं रही

झूठों की सल्तनत में हुआ सच का सर क़लम 

ऐसा भी सब में कहने की हिम्मत नहीं रही

जो फ़ाइलों में पुल था बना, कब का ढह गया

सरकारी काम काज में बरक़त नहीं रही

संसार लेन देन का बाज़ार बन गया

रिश्तों में अब लगाव की क़ीमत नहीं रही

देखो तो काम एक भी हमने कहाँ किया

पूछो तो एक पल की भी फ़ुर्सत नहीं…

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Added by दिनेश कुमार on March 12, 2024 at 5:16am — 1 Comment

दोहा पंचक. . . . .

दोहा पंचक. . . .

कर्मों के परिणाम से, गाफिल क्यों  इंसान ।

ऐसे जीता जिंदगी, जैसे हो भगवान ।।

भौतिक युग की सम्पदा, कब देती आराम ।

अर्थ पाश में जिंदगी , भटके चारों याम ।।

नश्वर तन को मानता, अजर -अमर परिधान ।

बस में समझे साँस को, यह दम्भी  इंसान ।।

साथ चली किसके भला, अर्थ दम्भ की शान।

खाक चिता पर हो गई,  इंसानी पहचान ।।

कहे स्वयंभू स्वयं को , माटी का इंसान ।

मुट्ठी भर अवशेष बस,मैं -मैं की पहचान ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on March 10, 2024 at 3:13pm — 2 Comments

ग़ज़ल -- दिनेश कुमार ( अदब की बज़्म का रुतबा गिरा नहीं सकता )

1212--1122--1212--22

अदब की बज़्म का रुतबा गिरा नहीं सकता

ग़ज़ल सुनो! मैं लतीफ़े सुना नहीं सकता

ग़मों के दौर में जो मुस्कुरा नहीं सकता

वो ज़िंदगी से यक़ीनन निभा नहीं सकता

ख़ुद अपने सीने पे ख़ंजर चला नहीं सकता

हर एक दोस्त को मैं आज़मा नहीं सकता 

वो जिसकी ताल ही है मेरी धड़कनों का सबब

वही तराना-ए-उल्फ़त मैं गा नहीं सकता 

वो आसमाँ का सितारा है, मैं ज़मीं का परिंद

मैं ख़्वाब में भी क़रीब…

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Added by दिनेश कुमार on March 10, 2024 at 7:10am — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .नारी

दोहा पंचक. . . नारी

नर नारी से श्रेष्ठ है, हुई पुरानी बात ।

जीवन के हर क्षेत्र में, नारी देती मात ।।

नर नारी के बीच अब, नहीं जीत अरु हार ।

बनी शक्ति पर्याय अब, वर्तमान की नार ।।

कंधे से कंधा मिला, दे जीवन को अर्थ ।

नारी अब हर क्षेत्र में, लगने लगी समर्थ ।।

अनुपम कृति है ईश  की, इस जग का आधार ।

लगे  अधूरा सृष्टि का , नारी बिन शृंगार ।।

आसमान छूने चली, कल की अबला नार ।

देख…

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Added by Sushil Sarna on March 9, 2024 at 5:35pm — No Comments

ग़ज़ल -- दिनेश कुमार ( आप क्यूँ दूर दूर हैं हम से )

2122--1212--22

वोदका, व्हिस्की और कभी रम से

दिल को निस्बत है क़िस्सा ए ग़म से

ख़्वाब झरते हैं चश्मे पुर-नम से

हम बहलते हैं अपने ही ग़म से

उसकी मर्ज़ी ही अपनी मर्ज़ी है 

क्यूँ गिला ज़िंदगी को फिर हम से 

छूट जाता जो मोह अपनों का

बुद्ध बन जाते हम भी गौतम से

कब तलक देखें हम तेरी तस्वीर

प्यास बुझती नहीं है शबनम से

शाम होने लगी है जीवन की

रंग उड़ने लगे हैं मौसम…

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Added by दिनेश कुमार on March 9, 2024 at 8:30am — No Comments

मेरे नाम की पाति

आज गाँव से पाति आई,

माँ के चरणों की मिट्टी लायी

वैसे तो ये बस धूल है लेकिन,

इसमे अपनों की महक समाई

पाति में सबके हिस्से है,

सबके अपने-अपने किस्से है

कहीं प्रेम है, कहीं…

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Added by AMAN SINHA on March 8, 2024 at 11:09pm — No Comments

ग़ज़ल: सही सही बता है क्या

1212 1212

सही सही बता है क्या

भला है क्या बुरा है क्या

न इश्क़ है न चारागर

तो दर्द की दवा है क्या

लहू सा लाल लाल है

ये आँख में जमा है क्या

बुझे बुझे से लोग हैं

ये ज़िंदगी सज़ा है क्या

अजीब कशमकश सी है

ये दिल तुझे हुआ है क्या

सुकून है न चैन है

यूँ जीने में मज़ा है क्या

जो खाक़ हो रहे हैं हम

किसी कि बद्दुआ है क्या

जला दिया तो…

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Added by Aazi Tamaam on March 6, 2024 at 7:00pm — No Comments

है खुश खूब झकझोर डाली हवा- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२

नगर भर  चले  दौड़  काली हवा

है खुश खूब झकझोर डाली हवा।१।

*

गिरे फूल कलियाँ विवश भूमि पर

बजा  पात  कहती  है  ताली हवा।२।

*

कभी दान जीवन सभी को दिया

हुई  आज  लेकिन  सवाली  हवा।३।

*

कहाँ  से  प्रदूषण  धरा  का  मिटे

नहीं  सीख  पायी  जुगाली  हवा।४।

*

कँपा शीत में नित बढ़ी जब तपन

गयी   लौट   कुल्लू मनाली   हवा।५।

*

तनिक तो कहीं बात होती है कुछ

किसी की चली कब है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 6, 2024 at 11:04am — 6 Comments

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