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Abhinav Arun's Blog (149)

ग़ज़ल - मैं था टूटा बिखरता रहा रात भर

ग़ज़ल –

 

गिरते गिरते संभलता रहा रात भर ,

मैं था टूटा बिखरता रहा रात भर |

 

उसके रुखसार का चाँद दामन में था ,

चांदनी में निखरता रहा रात भर |

 

मुझको मंजिल नहीं बस सफ़र चाहिए ,

दो कदम चल ठहरता रहा रात भर |

 

गो कि पलकें उठीं आईना हो गयीं ,

आईनों में संवरता रहा रात भर |

 

था हकीकत या सपना यही सोचकर ,

अपनी ऊँगली कुतरता रहा रात भर |

 

अर्श तक मैं चढ़ा उंगलियाँ थामकर…

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Added by Abhinav Arun on August 18, 2013 at 5:30am — 17 Comments

ग़ज़ल - दुआओं की तिजारत हो रही है !

ग़ज़ल -
.

भुलाए पर, यहाँ तक भी न कोई ।

सताए पर, यहाँ तक भी न कोई ।



मुझे हर आइने ने झूठ बोला ,

निभाये, पर यहाँ तक भी न कोई ।



मुहब्बत से भरोसा उठ गया है ,

सताए, पर यहाँ तक भी न कोई ।



फिर औलादें ही अपनी गलियां दे,

लुटाए, पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
पतंगे खेल  कुदरत के बिगाड़ें ,
उड़ाए, पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
दुआओं की तिजारत हो रही है
कमाए पर यहाँ तक…
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Added by Abhinav Arun on July 23, 2013 at 9:30pm — 31 Comments

ग़ज़ल - तितलियाँ आती नहीं मकरंद पाने के लिए !

ग़ज़ल - 
हमने कुछ पौधे लगाए नाम पाने के लिए ।

और जंगल काट डाले आशियाने के लिए



टंग गए हर छत हर एक मुंडेर पर पिंजरे मिया,

हसरते सब मर गयीं चिड़िया चुगाने के लिए ।


 अब खबर में खेल में और ख़्वाब में बन्दूक हैं,

 कौन आगे आएगा बचपन बचाने के लिए ।



 पर्वतों ने आदमी को घर बनाता देखकर,

 बादलों को दे दिया ठेका भगाने के लिए  ।



 क्यों करें बर्दाश्त बादल, आखिरश वो फट पड़े

 हम हदों को लांघते थे मौज पाने के लिए…
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Added by Abhinav Arun on July 23, 2013 at 9:28pm — 37 Comments

ग़ज़ल - मेरे मन को भाता बस्तर !

ग़ज़ल - 

नहीं युधिष्ठिर एक यहाँ पर । 

यक्ष छिपे हर तरफ बहत्तर ।

क्यों बैठा सीढी पर थककर ,

चल कबीर चौरा के मठ पर ।

साखी शबद सवैया गा तू ,

लोभ छोड़ अब चल दे मगहर ।

रिश्ते सारे स्वार्थ के धागे ,

झूठे हैं नातों के लश्कर ।

तुम गुडगावां के गुण गाओ ,

मेरे मन को भाता बस्तर ।

सेवक कोई रहा नहीं अब ,

सबके भीतर बैठा अफसर ।

ज्ञान की पगड़ी सर पर भारी ,

मगर ज़ुबाने जैसे नश्तर…

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Added by Abhinav Arun on May 25, 2013 at 3:48pm — 14 Comments

ग़ज़ल -प्रेमिका के हाथ की तुरपाइयाँ !

ग़ज़ल :-

एक पर्वत और दस दस खाइयां |

हैं सतह पर सैकड़ों सच्चाइयां ।

हादसे द्योतक हैं बढ़ते ह्रास के ,

सभ्यता पर जम गयी हैं काइयाँ 

भाषणों में नेक नीयत के निबन्ध ,

आचरण में आड़ी तिरछी पाइयाँ 

मंदिरों के द्वार पर भिक्षुक कई ,

सच के चेहरे की उजागर झाइयाँ 

आते ही खिचड़ी के याद आये बहुत ,

माँ तेरे हाथों के लड्डू लाइयाँ …

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Added by Abhinav Arun on May 25, 2013 at 3:30pm — 22 Comments

ग़ज़ल - मंडी से आढ़त तक सबकी पर्ची कटी हुई !

ग़ज़ल - 

कुछ होनी कुछ अनहोनी का मेला  ही तो है ,

ये जीवन क्या माटी का एक ढेला ही तो है ।

साँसों की झीनी चादर पर रिश्तों के गोटे ,

भीड़ में भी होकर  हर शख्स अकेला ही तो है ।

इस घर से उस घर तक जाने में रोना हँसना ,

सब कुछ गुड्डे गुड़ियों का एक खेला ही तो है ।

सुख दुःख का संगम तट ये तन और सारा जीवन ,

आशाओं  उम्मीदों का एक रेला ही तो है ।

सूली ऊपर सेज पिया की छूने को तत्पर…

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Added by Abhinav Arun on May 20, 2013 at 3:58pm — 24 Comments

ग़ज़ल - मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए !

ग़ज़ल -

ज़िन्दगी की दौड़ में आगे निकलने के लिए ,

आदमी मजबूर है खुद को बदलने के लिए ।

सिर्फ कहने के लिए अँगरेज़ भारत से गए ,

अब भी है अंग्रेजियत हमको मसलने के लिए ।

हाथ में आका के देकर नोट की सौ गड्डियां ,

आ गये संसद में कुछ बन्दर उछलने के लिए ।

गुम गयीं…

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Added by Abhinav Arun on May 14, 2013 at 2:05pm — 55 Comments

ग़ज़ल - उसे देखे ज़माना हो गया है

ग़ज़ल
उसे देखे ज़माना हो गया है ,
मेरा बच्चा सयाना हो गया है । 
.
मेरा दिल गाँव में बसता है बेशक ,
शहर में आब - ओ - दाना हो गया है । 
.
तेरी पायल की रुनझुन बज रही माँ ,
तेरा लोरी सुनाना हो गया है । 
.
अकेला सच का परचम ढो रहा हूँ ,
मुकाबिल ये ज़माना  हो गया है…
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Added by Abhinav Arun on May 14, 2013 at 1:30pm — 21 Comments

पं.हरिराम द्विवेदी " हरि भइया " को साहित्य अकादमी का भाषा पुरस्कार !

                               गभग  आधी सदी से भोजपुरी बोली -  भाषा का परचम राष्ट्रीय  अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर कामयाबी के साथ फहराने वाले लोक कवि पंडित हरि राम द्विवेदी को उनके साहित्यिक योगदान के लिए साहित्य अकादमी ने प्रतिष्ठित 'भाषा पुरस्कार' प्रदान करने की घोषणा की है ।…

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Added by Abhinav Arun on April 24, 2013 at 9:30am — 5 Comments

हमने कौरव के हाथों पांचाली दी !

ग़ज़ल -

इस दुनिया ने जब भी कमाई काली दी ,

मेरे अंतरमन ने  मुझ  …

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Added by Abhinav Arun on April 21, 2013 at 1:58pm — 18 Comments

बनारस में एक नयी पहल " सुखनवर "

वैसे तो ग़ज़ल का अपना स्वर्णिम इतिहास रहा है , परन्तु आज हिंदी जनमानस में भी ग़ज़लों ने अपनी गहरी पैठ बना ली है । ग़ालिब , मीर , फैज़ , दाग जैसे नाम आज ग़ज़ल को पसंद करने वाले के लिए अनजाने नहीं । साहित्य में भी ग़ज़लों ने नए पुराने लेखकों को अपनी और आकर्षित किया है । आज समकालीन ग़ज़ल लेखन में एक उर्जावान पीढी सक्रिय है । बनारस में नजीर बनारसी हुए तो जयशंकर…

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Added by Abhinav Arun on April 16, 2013 at 3:00pm — 13 Comments

फागुनी दोहे " होली 2013 " -

दस फागुनी दोहे  " 2013 "

तेरी ही खातिर सजे रंग अबीर के थाल ,

तेरे आने से हुई मेरी होली लाल ।

रंग पर्व में घुल गए इंतज़ार के रंग ,

होली सच में शोभती अपनों के ही संग ।

सरसों टेसू और पलाश हैं बसंत के दूत ,

रंग रूप से कर रहे मादकता आहूत ।

लज्जा तेरा रंग है मेरा रंग संकोच ,

ऐसे में…

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Added by Abhinav Arun on March 25, 2013 at 9:30am — 14 Comments

काशीनामा - प्रसाद प्रतिमा , स्पंदन और हिंदी गौरव !

                    त बीस फरवरी २०१३ का दिन बनारस के लिए ख़ास रहा । कालजयी  "कामायनी" के रचनाकार महाकवि जयशंकर प्रसाद की काशी में अबतक कोई प्रतिमा नहीं थी , उसका अनावरण हुआ । काव्य केन्द्रित पत्रिका " स्पंदन " का प्रकाशन प्रारंभ…
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Added by Abhinav Arun on February 22, 2013 at 9:00am — 12 Comments

कविता - कंदील . मुर्दों के टीले पर !

पिछले कुछ दिनों से परेशान
परेशान है मेरा संवेदनशील हृदय 
जबसे बाज़ारों में आहट मिली है कि 
आने वाला है वैश्विक प्रेम पर्व 
सभी आतुर हैं संत वैलेंटाइन के योगदान को स्मरण करने को .
मैंने भी चाहा इस अवसर पर लिख सकूं एक प्रेम पगी कविता 
कई बार देर तक डूबा रहा स्मृतियों - विस्मृतियों की सोच  में 
बार बार खयाल आते रहे 
कि कैसे चंद्रयानी योजनाओं 
और फ़ोर्ब्स की सूची से संपन्न धनाढ्यों के देश…
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Added by Abhinav Arun on February 12, 2013 at 3:00pm — 16 Comments

लेख - अंतर्राष्ट्रीय फलक पर काशी के कवि

भारतेंदु , प्रेमचंद और प्रसाद की धरा वाराणसी साहित्य कला की दृष्टि से आज भी उर्वर है । बात लेखन की हो , चर्चा - विमर्श की या नयी ज़मीन -नयी धरा के तलाश की । कसक है तो इस बात की कि हम अपने साहित्यिक धरोहरों और समकालीन लेखन पर शोधपरक और समीक्षात्मक सिंहावलोकन नहीं कर पा रहे हैं । ऐसे में हाल में शहर वाराणसी के मध्य स्थित ऐतिहासिक "अभिमन्यू…
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Added by Abhinav Arun on February 9, 2013 at 3:35pm — 6 Comments

ग़ज़ल - शहर की रोशनी में गाँव की ढिबरी बुलाती है !

यहाँ की भागा दौड़ी में वो बेफ़िक्री ही  भाती  है ,
शहर की रोशनी में गाँव की ढिबरी बुलाती है ।



बनावट वाली राधाओं को उनके कृष्ण कब मिलते ,
वो तो मीरा के होते हैं जो उनको मन में गाती है ।


सिमटना दायरों में और बातें चाँद से करना ,
ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी  याद आती है ।


पिता की डांट से गुमसुम जो बैठी थी उदासी में ,
लिपटकर माँ के आँचल से वो बच्ची खिलखिलाती है…
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Added by Abhinav Arun on December 19, 2012 at 9:48am — 28 Comments

कविता - तख्तियां !

टूटा दूर दिल्ली के क्षितिज पर 
एक खूबसूरत तारा 
सबने मन्नतें मांगी 
कुछ टूटने से दुखी हुए 
हम भी 
कुछ ने शीशे सी चमकती सडको पर …
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Added by Abhinav Arun on December 19, 2012 at 9:03am — 5 Comments

कवि , उसकी कविता और तुम !

कवि , उसकी कविता  और तुम !
 
हाँ उन कविताओं को भी रचा था उसने उसी वेदना के साथ
जिनपर तुमने तालियाँ नहीं बजायीं
औंर  कई कविताओं को रचकर वह देर तक हँसा था खुद पर
जिन्हें सुनकर तुम झूम उठे थे
जानते हो लिखना और सुनाना दो  अलग अलग विधाएं हैं
और …
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Added by Abhinav Arun on September 23, 2012 at 9:30am — 18 Comments

ग़ज़ल - बादलों और बिजलियों की नेमतें

ग़ज़ल - बादलों और बिजलियों  की नेमतें
 
बोलते चेहरों को सुनता ही रहा ,
वो अदद एक ख्वाब बुनता ही रहा |
 …
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Added by Abhinav Arun on August 25, 2012 at 11:41am — 10 Comments

ग़ज़ल - तेरी याद माँ चाशनी है

 
ग़ज़ल - तेरी याद माँ चाशनी है
 
हवा में नमी कुछ बढ़ी है ,
मगर अब भी नीयत वही है |
 
रहा है भंवर का ये…
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Added by Abhinav Arun on August 25, 2012 at 11:30am — 17 Comments

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