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Khursheed khairadi's Blog (52)

दीनों का बस एक गुज़ारा ठाकुरजी

दीनों का बस एक गुज़ारा ठाकुरजी

कष्टनिवारक नाम तुम्हारा ठाकुरजी

 

जग ने हमको दुत्कारा है हर युग में

रखना तुम तो ध्यान हमारा ठाकुरजी

 

साख भराऊं तुमरे सूरज चंदा से

देहातों में है अँधियारा  ठाकुरजी

 

युगों युगों से खोज रहा हूं मैं ख़ुद को

दर दर भटकूं मारा मारा ठाकुरजी

 

सप्त सिंधु है बेबस तेरी अँजुरी में

मेरे होठों पर अंगारा ठाकुरजी

 

बीच भँवर में नैया डोले टेर सुनो

टूटा चप्पू दूर…

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Added by khursheed khairadi on November 10, 2014 at 2:30pm — 7 Comments

रहे अब लाख पेचीदा सफ़र तै कर लिया है

रहे अब लाख पेचीदा सफ़र तै कर लिया है

न छोडूंगा मुहब्बत की डगर तै कर लिया है

 

ज़माना भी खड़ा है हाथ में शमशीरें लेकर

मैंने भी सरफरोशी का इधर तै कर लिया है

 

गुज़ारिश है रुको कुछ देर तन्हाई मिटादो

चले जाओ कि जाने का अगर तै कर लिया है

 

उदासी  की फटी चिलमन हटाकर फैंक दूंगा

जिऊँगा अब तबस्सुम  ओढ़कर तै कर लिया है

 

हवाओं सब चरागों को बुझादो ग़म नहीं कुछ

अँधेरे में जलाऊंगा जिगर तै कर लिया है

 

खड़ा…

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Added by khursheed khairadi on November 3, 2014 at 11:30am — 9 Comments

इक दिया चाहिए रोशनी के लिए

इक दिया चाहिए रोशनी के लिए

बालता हूं जिगर मैं इसी के लिए

 

रोटी कपड़ा मकाँ की तरह साथियों

रौशनी लाज़मी हो सभी के लिए

 

वो भटकता हुआ इक मुसाफ़िर है ख़ुद

चुन रहे हो जिसे रहबरी के लिए

 

हौसला जिंदगी को ग़ज़ल ने दिया

मैं तो तैयार था ख़ुदकुशी के लिए

 

खैरियत से रहे सब हबीबो-अदू

मैं दुआ माँगता हूं सभी के लिए

 

मैं ग़मों को गले से लगाता रहा

लोग रोते रहे जब ख़ुशी के लिए

 

दोस्ती …

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Added by khursheed khairadi on October 17, 2014 at 3:00pm — 7 Comments

नफरतों का सिलसिला चारों तरफ है

1.

नफरतों का सिलसिला चारों तरफ है

फिर चुनावों की हवा चारों तरफ है

 

दौर फिर हैवानियत का आ गया लो

आदमीयत गुमशुदा चारों तरफ है

 

है मुकर्रर दिन क़यामत का सुना था

हाँ इसी की इब्तदा  चारों तरफ है

 

छिड़ गई है जंग फिर से भाइयों में

इक महाभारत नया चारों तरफ है

 

दानवों ने शोर कितना फिर मचाया

मौनधारी देवता चारों तरफ है

 

ज़िंदगी से भागकर जायें कहाँ हम

मौत से बढ़कर कज़ा चारों तरफ…

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Added by khursheed khairadi on October 13, 2014 at 10:30pm — 7 Comments

क्या माली का हो गया, बाग़ों से अनुबंध ?

१.

क्या माली का हो गया, बाग़ों से अनुबंध ?

चित्र छपा है फूल का, शीशी में है गंध |

२.

चूल्हे न्यारे हो गये, आँगन में दीवार

बूढ़ी माँ ने मौन धर, बाँट लिए त्यौहार |

३.

मुल्ला जी देते रहे, पाँचों वक़्त अजान

उस मौला को भा गई, बच्चे की मुस्कान |

 ४.

एक तमाशा फिर हुआ, इन दंगों के बाद

जिनने फूंकी बस्तियाँ, बाँट रहें इमदाद |

 ५.

शीशाघर की मीन सा, यारों अपना हाल

दीवारों में क़ैद है, सुख के ओछे ताल…

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Added by khursheed khairadi on September 29, 2014 at 8:30am — 14 Comments

ग़ज़ल

खेतों के दरके सीने पर बादल बनकर आ रामा

होठों के तपते मरुथल पर छागल बनकर आ रामा

 

बोली लगकर बिकता है अब आशीषों का रेशम भी

निर्वसना है श्रध्दा मेरी मलमल बनकर आ रामा

 

भक्ति युगों से दीवानी है राधा मीरा के जैसी

मन से मन मिल जाये अपना पागल बनकर आ रामा

 

दीप बुझे हैं आशाओं के रात घनेरी है गम की

प्राची से उजली किरनों का आँचल बनकर आ रामा

 

छप्पन भोगों के लालच में क्यूं पत्थर बन बैठा है

भूखों की रीती थाली में…

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Added by khursheed khairadi on September 27, 2014 at 12:30pm — 9 Comments

रखे मुझको भी हरदम बाख़बर कोई मेरे मौला

रखे मुझको भी हरदम बाख़बर कोई मेरे मौला 

बड़े भाई के जैसा हो बशर कोई मेरे मौला 

 

हुआ घायल बदन मेरा हुए गाफ़िल कदम मेरे

मेरे हिस्से का तय करले सफ़र कोई मेरे मौला

 

मुझे तड़पा रही है बारहा क्यूं छाँव की लज्ज़त

बचा है गाँव में शायद शजर कोई मेरे मौला

 

उदासी के बियाबाँ को जलाकर राख कर दे जो

उछाले फिर तबस्सुम का शरर कोई मेरे मौला

 

खड़ा हूं आइने के सामने हैरतज़दा होकर

इधर कोई मेरे मौला उधर कोई मेरे…

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Added by khursheed khairadi on September 20, 2014 at 6:00pm — 6 Comments

अपनेपन की रीत पुरानी अब भी है

रास पर एक प्रयास और -

अपनेपन की रीत पुरानी अब भी है

गाँवों का जीवन लासानी अब भी है

 

जिसकी गोद सुहाती थी भर जाड़े में

उस मगरी पर धूप सुहानी अब भी है

 

जिनमें अपना बचपन कूद नहाया था

उन तालाबों में कुछ पानी अब भी है

 

बाँह पसारे राह निहारे सावन में

अमुवे की इक डाल सयानी अब भी है

 

गर्मी की छुट्टी शिमला में बुक लेकिन

रस्ता तकते नाना नानी अब भी है

 

ठाकुर द्वारे में झालर संझ्या…

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Added by khursheed khairadi on September 18, 2014 at 11:00am — 8 Comments

पंख परेवों ने खोले नव भोर हुई

रास (चौपाई +अलिपद )8-8\6=22

 

पंख परेवों ने खोले नव भोर हुई

भजनों सा चहका फिर खगरव भोर हुई

 

शबनम झाड़ी ली अँगड़ाई किसलय ने

बाग बगीचों में है उत्सव भोर हुई

 

मंदिर की घंटी से और अजानों से

सुप्त धरा का टूटा नीरव भोर हुई

 

धूप गुलाबी उबटन सी कण कण पर है

निखरा फिर धरती का वैभव भोर हुई

 

अखबारों के पन्नों में जागी दुनिया

गर्म चाय का पीकर आसव भोर हुई

 

दिन भी गुजरेगा ही रात कटी…

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Added by khursheed khairadi on September 17, 2014 at 10:30am — 5 Comments

चारसू आइने लगाना भी

चारसू आइने लगाना भी

और ख़ुद से नज़र चुराना भी

बैठकर साये में मेरे रहरौ

चाहता है मुझे गिराना भी

मेरी मौजूदगी भी नादीदा

सुर्ख़ियों में तेरा न आना भी

शौक आवारगी का किसको है

हो कहीं अपना आशियाना भी

बस्तियों को उजाड़ने वालों

सीख लो बस्तियाँ बसाना भी

हो गया एक जंग के जैसा

आजकल रोटियाँ जुटाना भी

आज ‘खुरशीद’ बालता है दिल

साथ देगा कभी ज़माना भी 

मौलिक व…

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Added by khursheed khairadi on September 16, 2014 at 10:30am — 5 Comments

नफ़रतों का जवाब मैं रक्खूं

नफ़रतों का जवाब मैं रक्खूं

ख़ार तू रख गुलाब मैं रक्खूं

 

बीत जाये इसी में उम्र तमाम

ज़ख्मों का गर हिसाब मैं रक्खूं

 

मै ग़मों की रवाँ है रग रग में

होश कैसे जनाब मैं रक्खूं

 

सामने तेरे बेहिजाब हुआ

क्या बुतों से हिजाब मैं रक्खूं

 

दर्दे-उल्फ़त पलेगा क्या मुझसे

क्यूं कफ़स में उक़ाब मैं रक्खूं

 

शमा सी वो पिघलती है हर शब

कब सिरहाने किताब मैं रक्खूं

 

पेट में भूख का शरारा …

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Added by khursheed khairadi on September 13, 2014 at 10:00pm — 5 Comments

हिंदी पखवाड़े/हिंदी दिवस को समर्पित कुछ ग़ज़ले

१.

देश की शान है अपनी हिंदी

फिर भी हल्कान है अपनी हिंदी

 

एक डोरी से जुड़ जाए भारत

एक अभियान है अपनी हिंदी

 

घर में अपने ही होकर पराई

आज हैरान है  अपनी हिंदी

 

अपना सिर क्यूं झुके जग में यारों

अपना अभिमान है अपनी हिंदी

 

सारी दुनिया में फहराया परचम

हिन्द की आन है अपनी हिंदी

 

हिंदी से हैं सभी हिन्दवासी

अपनी पहचान है अपनी हिंदी

 

जितना सीधा सरल मन है…

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Added by khursheed khairadi on September 10, 2014 at 1:30pm — 6 Comments

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