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Sushil Sarna's Blog (868)

नव वर्ष कहलायेगा.............

नव वर्ष कहलायेगा.......

ऐ भानु

तुम न जाने

कितनी सदियों को

अपने साथ लिए फिरते हो

सृजन और संहार को

अपने अंतःस्थल में समेटे

खामोशी से

न जाने किस लक्ष्य की प्राप्ति में

प्रतिदिन स्वयं की आहुति देते हो

आश्चर्य है

धरा के संताप हरने को

अपने सर पर ताप लिए फिरते हो

आदिकाल से

प्रतिदिन अपनी केंचुली बदलते हो

हर आज को काल के गर्भ में सुलाते हो

फिर नए कल के लिए

नए स्वप्न लिए भोर बन के आते हो…

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Added by Sushil Sarna on January 2, 2015 at 1:00pm — 14 Comments

साथ मेरे ज़िंदगी की …

साथ मेरे ज़िंदगी की …(एक रचना )

साथ  मेरे ज़िंदगी  की रूठी किताब रख देना

जलते चरागों में  बुझे  वो  लम्हात रख देना

रात भर सोती रही शबनम जिस आगोश में

रूठी बहारों में वो सूखा  इक गुलाब रख देना

कहते कहते रह गए  जो थरथराते से ये लब

साथ मेरी  धड़कनों  के वो जज़्बात रख देना

आज तक न दे सके जवाब जिन सवालों का

साथ मेरे  वो सिसकते कुछ जवाब रख देना

मिट गयी थी दूरियां  भीगी हुई जिस रात में

एक मुट्ठी…

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Added by Sushil Sarna on January 1, 2015 at 1:22pm — 18 Comments

करके घायल .....

करके घायल ......

करके घायल नयन बाण से 

मंद-मंद मुस्काते हो
दिल को देकर घाव प्यार के
क्योँ ओझल हो जाते हो
प्यार जताने कभी स्वप्न में
दबे पाँव आ जाते हो
कुछ न कहते अधरों से
बस नयनों से बतियाते हो
क्षण भर के आलिंगन को
तुम बरस कई लगाते हो
फिर आना का वादा करके
विछोह वेदना दे जाते हो

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 29, 2014 at 3:26pm — 14 Comments

ये शज़र आज भी......

अपने  वज़ूद  की  ख़बर   इस तरह  हम  देते हैं

मुट्ठी  में  रेत उठाकर  हम  हवा  में उड़ा देते हैं



क्या हुआ जो  इस  उम्र में  हम बे-समर हो गए

ये शज़र आज भी  गुज़री  बहारों  की हवा देते हैं



अब हंसी भी  लबों पे  पैबंद  सी  नज़र  आती हैं

जाने लोग आँखों में कैसे नमी को  छुपा  लेते हैं



रुख से चिलमन उठते ही नज़रें भी बहकने लगी

हम भी बेजुबानों की तरह पैमाने को उठा लेते हैं



जागते  रहे  तमाम  शब्  हम  उसके इंतज़ार में

बार बार  चरागों…

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Added by Sushil Sarna on December 21, 2014 at 7:00pm — 16 Comments

ख़ामोश जुबां, ख़ामोश नज़र ....

ख़ामोश जुबां, ख़ामोश नज़र ....

ख़ामोश जुबां, ख़ामोश नज़र

ख़ामोश वो सारे नज़ारे थे

ख़ामोश थी खून की चीखें सभी

ख़ामोश वो अश्कों के धारे थे

ख़ामोश जुबां, ख़ामोश नज़र

ख़ामोश वो सारे नज़ारे थे …….

खूनी चेहरों के मंजर ने

हर धर्म का फर्क मिटा डाला

क्या अपना और बेगाना क्या

हर दुःख को अपना बना डाला

हर चेहरे पे इक दहशत थी

और सपनें सहमे सारे थे

ख़ामोश जुबां, ख़ामोश नज़र

ख़ामोश वो सारे नज़ारे थे ….

बिखरे चूडी के टुकडों…

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Added by Sushil Sarna on December 19, 2014 at 12:02pm — 12 Comments

मौसम भी नीर बहायेगा ………….

मौसम भी नीर बहायेगा …



भोर होते ही

चिड़ियों का कलरव

इक पीर जगा जाएगा

सांझ होते ही सूनेपन से

हृदय पिघल जाएगा

मुक्त- केशिनी का संबोधन

इक छुअन की याद दिलायेगा

बिना पिया के राह का हर पग

अब बोझिल हो जाएगा

निष्ठुर पवन का वेग भला

कैसे दीप सह पायेगा

रैन बनी अब हमदम तुम बिन

चिरवियोग तड़पायेगा

जाने जीवन के पतझड़ में

मधुमास कब आयेगा

अश्रु बूंदों से तब तक दिल का

स्मृति आँगन गीला हो जाएगा

प्राण प्रिय तुम प्राण…

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Added by Sushil Sarna on December 15, 2014 at 11:23am — 14 Comments

आभास हो तुम ......

आभास हो  तुम  ........

आभास हो  तुम  विश्वास  नहीं हो

तुम रूठी  तृप्ति  की प्यास नहीं हो

जिन मधु पलों को मौन भी तरसे

तुम उस पूर्णता का प्रयास नहीं हो

आभास हो  तुम  विश्वास  नहीं हो 

तुम रूठी  तृप्ति  की प्यास नहीं हो .........

अतृप्त कामनाओं के स्वप्न नीड़ हो

अभिलाष कलश  के  विरह नीर हो

जिस प्रकाश  को  तिमिर भी तरसे

तुम उस  जुगनू  का प्रकाश नहीं हो

आभास हो  तुम  विश्वास  नहीं हो 

तुम रूठी…

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Added by Sushil Sarna on December 2, 2014 at 1:30pm — 17 Comments

लम्हा महकता …

लम्हा महकता … एक रचना

सोया करते थे कभी जो रख के सर मेरे शानों पर

गिरा दिया क्यों आज पर्दा  घर के रोशनदानों पर

तपती राहों पर चले थे जो बन के हमसाया कभी

जाने कहाँ वो खो गए ढलती साँझ के दालानों पर

होती न थी रुखसत कभी जिस नज़र से ये नज़र

लगा के मेहंदी सज गए वो   गैरों के गुलदानों पर

कैसा मैख़ाना था यारो हम रिन्द जिसके बन गए

छोड़ आये हम निशाँ जिस मैखाने के पैमानों पर

देख कर दीवानगी हमारी  कायनात  भी  हैरान है

किसको तकते हैं भला हम  तन्हा…

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Added by Sushil Sarna on November 18, 2014 at 2:37pm — 14 Comments

स्नेह रस से भर देना …..

स्नेह रस से भर देना …..

कुछ भी तो नहीं बदला

सब कुछ वैसा ही है

जैसा तुम छोड़ गए थे

हाँ, सच कहती हूँ

देखो

वही मेघ हैं

वही अम्बर है

वही हरित धरा है

बस

उस मूक शिला के अवगुण्ठन में

कुछ मधु-क्षण उदास हैं

शायद एक अंतराल के बाद

वो प्रणय पल

शिला में खो जायेंगे

तुम्हें न पाकर

अधरों पर प्रेमाभिव्यक्ति के स्वर भी

अवकुंचित होकर शिला हो जायेंगे

लेकिन पाषाण हृदय पर

कहाँ इन बातों का असर होता है

घाव कहीं भी हो…

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Added by Sushil Sarna on November 17, 2014 at 6:49pm — 8 Comments

परिचय हुआ जब दर्पण से

परिचय  हुआ  जब  दर्पण से ….

परिचय  हुआ  जब  दर्पण  से

तो  चंचल  दृग  शरमाने  लगे

अधरों  में   कंपन  होने  लगी

अंगड़ाई के मौसम .छाने लगे

परिचय  हुआ  जब  दर्पण से ….

ऊषा   की   लाली  गालों   पर

प्रणयकाल    दर्शाने      लगी

पलकों को  अंजन  भाने लगा

भ्रमर   आसक्ति  दर्शाने  लगे

परिचय  हुआ  जब  दर्पण से …

पलकों के  पनघट  पर   अक्सर

कुछ  स्वप्न  अंजाने  आने लगे

बेमतलब    नभ   के   तारों  से…

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Added by Sushil Sarna on November 11, 2014 at 1:30pm — 8 Comments

नैन कटीले …

नैन कटीले …

नैन कटीले होठ रसीले
बाला ज्यों मधुशाला
कुंतल करें किलोल कपोल पर
लज्जित प्याले की हाला
अवगुंठन में गौर वर्ण से
तृषा चैन न पाये
चंचल पायल की रुनझुन से मन
भ्रमर हुआ मतवाला
प्रणय स्वरों की मौन अभिव्यक्ति
एकांत में करे उजाला
मधु पलों में नैन समर्पण
करें प्रेम श्रृंगार निराला

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on November 6, 2014 at 6:18pm — 26 Comments

तन्हा प्याला .....

तन्हा प्याला  ....

रजकण हूँ मैं प्रणय पंथ का
स्वप्न लोक का बंजारा
हार के भी वो जीती मुझसे
मैं जीत के हरदम ही हारा
नयन सिंधु में छवि है उसकी
वो तृषित मन की मधुशाला
प्रणयपाश एकांत पलों का
मन में जीवित ज्यूँ हाला
गीत कंठ के सूने उस बिन
रैन चांदनी बनी ज्वाला
नयन देहरी पर सजूँ मैं उसकी
हृदय में है ये अभिलाषा
अपने रक्तभ अधरों की मधु बूँद से
जो भर दे मेरा तन्हा प्याला 

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on November 4, 2014 at 6:52pm — 16 Comments

क्षणिकाएँ...

क्षणिकाएँ...

1.घन गरजे घनघोर

तिमिर चहुँ ओर

तृण-तृण से तन बहे

करके सब कुछ शांत

मेह हो गया शांत

..........................

2. सावन की फुहार

सृजन की मनुहार

रंगों का अम्बार

आयी बहार

हुआ धरा का

पुष्पों से शृंगार

.......................

3.बुझ गयी

कुछ क्षण जल कर

माचिस की तीली सी

जंग लड़ती साँसों से

असहाय ये काया

.........................

4.हर शाख पर

शूल ही शूल

फिर भी महके…

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Added by Sushil Sarna on November 1, 2014 at 1:15pm — 18 Comments

मधु पल ....

मधु पल ....

विरह के मारे ये लोचन

नीर कहाँ ले जाएँ

पी को पीर सुनाएँ कैसे

और स्मृति से बतियाएँ

वो स्पर्श एकांत के कैसे

अंग विस्मृत कर जाएँ

कालजयी पल अधर मिलन के

हृदय विचलित कर जाएँ

वायु वेग से सूखे पत्ते

मौन भंग कर जाएँ

बाट जोहते पगले नैना

बरबस भर-भर आएं

साँझ ढले सब पंख पखेरू

अपने नीड़ आ जाएँ

घूंघट में यूँ नैनों को पी

बार बार तरसाएँ …

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Added by Sushil Sarna on October 30, 2014 at 3:00pm — 8 Comments

क्षणिकाएँ

क्षणिकाएँ

1.

थम गई

गर्जन मेघों की

दामिनी भी

शरमा गयी

सावन की पहली बूँद

उनकी ज़ुल्फ़ों से टकरा गयी

............................................

2.

साया जवानी का

अंजाम देख

घबरा गया

वर्तमान की

टूटी लाठी से

भूतकाल टकरा गया

..............................................

3.

किसकी जुदाई का दंश

पाषाण को रुला गया

लहरों पे झील की

आसमाँ का चाँद

बस तन्हा 

रह गया…

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Added by Sushil Sarna on October 25, 2014 at 2:00pm — 13 Comments

इंतज़ार रहता है …..

हुस्न को दर्पण का ...

प्रीत को समर्पण का ..

विरह को क्रंदन का ....

इंतज़ार रहता है//

भोर को अभिनन्दन का ...

बाहों को बंधन का ...

भाल को चन्दन का ...

इंतज़ार रहता है//

धड़कन को चाहत का ...

यौवन को आहट का ...

घायल को राहत का ...

इंतज़ार रहता है//.

तिमिर को प्रात का ...

वृद्ध को साथ का...

चाँद को रात का ...

इंतज़ार रहता है//

आस को विशवास का…

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Added by Sushil Sarna on October 12, 2014 at 2:53pm — 6 Comments

सच, ओर कोई नहीं.....

सच, ओर कोई नहीं.....

तन्हा बरसातों में
हिज़्र की रातों में
सुलगते जज़्बातों में
खामोश बातों में
आंसू की सौगातों में
साँसों की कफ़स में
मेरी नस नस में
चांदनी बन कसमसाती
धड़कनों से बतियाती
सच, ओर कोई नहीं
सिर्फ, तुम ही तुम हो

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 11, 2014 at 12:26pm — 9 Comments

...गुनगुनाने दो पीर को...

गुनगुनाने दो पीर को...



गुनगुनाने ..दो पीर को

प्यासे अधर अधीर को

नयनों के .इस नीर को

मधुर स्मृति समीर को

हाँ , गुनगुनाने दो पीर को ….



रांझे की …उस हीर को

भूखे ..इक ..फकीर को

मरते .हुए …जमीर को

प्यासे नदी के .तीर को

हाँ , गुनगुनाने दो पीर को ….



घायल नारी के चीर को

पंछी के बिखरे नीड़ को

शलभ की ..तकदीर को

घुट घुट मरती भीड़ को

हाँ , गुनगुनाने दो…

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Added by Sushil Sarna on August 25, 2014 at 7:00pm — 7 Comments

इक ज़माना हो जाता है …

इक ज़माना हो जाता है …

आदमी

कितना छोटा हो जाता है

जब वो पहाड़ की

ऊंचाई को छू जाता है

हर शै उसे

बौनी नज़र आती है

मगर

पाँव से ज़मीं

दूर हो जाती है

उसके कहकहे

तन्हा हो जाते हैं

लफ्ज़ हवाओं में खो जाते हैं

हर अपना बेगाना हो जाता है

ऊंचाई पर उसकी जीत

अक्सर हार जाती है

वो बुलंदी पर होकर भी

खुद से अंजाना हो…

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Added by Sushil Sarna on July 26, 2014 at 1:00pm — 12 Comments

मील का पत्थर …

मील का पत्थर …

कल जो गुजरता है....

जिन्दगी में....

एक मील का पत्थर बन जाता है//

और गिनवाता है....

तय किये गये ....

सफर के चक्र की....

नुकीली सुईयों पर रखे....

एक-एक कदम के नीचे....

रौंदी गयी....

खुशियों के दर्द की....

न खत्म होने वाली दास्तान//

दिखता है ....

यथार्थ की....

कंकरीली जमीन पर....

कुछ दूर साथ चले....

नंगे पांवों…

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Added by Sushil Sarna on July 16, 2014 at 7:00pm — 11 Comments

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"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
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