For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

रोना अपना-अपना

घर के आंगन के बीचो-बीच लाश पड़ी थी। सभी रो रहे थे। उसका भाई सोच रहा था ”क्या इसके बीबी-बच्चों का भार अब मुझे उठाना पड़ेगा?“ उसके मां बाप सोच रहे थे ”अब हमारा क्या होगा? हमारी देखभाल अब कौन करेगा?“ उसकी जवान बीवी सोच रही थी ”अब पहाड़ जैसा जीवन पति के बगैर अकेले कैसे काटूँगी?“ ..... और सभी ऊँची-ऊँची रो रहे थे।

Added by Ravi Prabhakar on January 4, 2011 at 8:30pm — 5 Comments

"आजादी"



बन्दी है आजादी अपनी, छल के कारागारों में।…
Continue

Added by डॉ.रूपचन्द्र मयंक on January 4, 2011 at 3:49pm — No Comments

Ghazal

इक अंधेरा टिका  कब से मीनार पर

क्या कहें इस ज़माने के किरदार पर



हाथ का भी निवाला जो छीनेगा वो

स्वप्न सोने के रख देगा  बाज़ार पर



सब है डूबे तिजारत की घुड़दौड़ में

अब नज़र कौन डालेगा  बीमार पर



रहनुमाओं के सुख, भत्ते-वेतन सभी

गाज बन कर गिरेंगे ख़रीददार पर



जुगनुओं  के  सहारे  चली  ज़िंदगी

कोई  चंदा  न उतरा था  दीवार पर



बिकती हैं जो कलम इक पुरस्कार में

वो कसीदे लिखें  आज सरकार  पर



रात भर  अध्र्य  जिसको  चढ़ाते रहे

वो  लुटेरा… Continue

Added by satyendr sengar on January 4, 2011 at 2:55pm — No Comments

तॊ नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है,,,,,,,,,,,,

. नव वर्ष तुम्हारा…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 3, 2011 at 8:46pm — No Comments

श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा...

कल मैंनॆ भी सोचा था कॊई, श्रृँगारिक गीत लिखूं ,

बावरी मीरा की प्रॆम-तपस्या, राधा की प्रीत लिखूं ,…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 3, 2011 at 8:30pm — 3 Comments

दायरे.. ©

 

दायरे.. ©



कुछ सवाल कुछ ज़वाबों के घेरे में , उलझा जीवनपथ..

सीमित दायरे , दरकता है जीवन उनमें पल-प्रतिपल..



दहकते दावानल, स्वप्नों का होता दोहन उनमें निरंतर..

पल-प्रतिपल , भसम् उठा ख्वाबों की भेंट चढा रहे हम..

चरणों में अर्पित करने लगे , सीमित दायरों भरा जीवन..

चरण उस पथिक के ,…

Continue

Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on January 3, 2011 at 8:18pm — 1 Comment

ग़ज़ल

जो  ग़ल्तियाँ हुईं थीं  उसी का  सिला है ये
बारूद  घर में रखने का  फल ही मिला है ये
 
दुनियाँ से कह रहे थे  हम  फसाना शाँति का
बस ये नहीं बताया.. कि दिल भी छिला है ये

जब जिसका मन किया है हमसे खेल कर गया
मुझको  कोई बताये  कि   कैसा   किला है ये

अपनों की  साजिशों  से  मात  बारहा  मिली
द्वापर से  चलता आया.. ऐसा सिलसिला है ये

घर फूस का बनाया  उसमें आग भी रख ली
कुर्सी की ख्वाहिशों का  फूल ही  खिला है ये

Added by satyendr sengar on January 3, 2011 at 2:54pm — No Comments

मेरा वतन

मुझको   मेरा  वतन   पुर   अमन   चाहिए

तहज़ीब  अपनी   गंग   ओ  जमन  चाहिए



ये  राम  की  ज़मीन  है  गौतम  की ये ज़मीं

नानक  भी  मिलेगा  यहीं  रहमान  भी  यहीं

सब  आ  सकें  इतना  बड़ा  ज़हन  चाहिए



झगड़े   फ़साद   लूट   न  हो  मेरे देश में

या   रब  ग़रीबी  भूख  न  हो  मेरे देश में

मिल बांट  कर के  खाने  का चलन चाहिए



तुमने  बिछा  रखी  यहाँ  कितनी बड़ी चैiसर

मुहरे  बना  दिये  हमें  इस  तरहा  बाँट कर

टुकड़े   नहीं    समूचा   इक   गगन  चाहिए



क्यूं … Continue

Added by satyendr sengar on January 3, 2011 at 2:00pm — No Comments

लघुकथा ”घर“

31 दिसंबर की सर्द रात को अपने फटे कम्बल के सहारे सर्द हवाओं के साथ संघर्ष करते हुए फुटपाथ पर लेटे हुए एक वृद्ध भिखारी ने जब  कुछ नौजवानों को सड़क पर मस्ती करते हुए देखा तो उसने सोचा ”इनका तो घर है, फिर यह घर जाकर लिहाफ की गर्मी में आराम से क्यों नहीं सोते?“

Added by Ravi Prabhakar on January 2, 2011 at 4:35pm — 8 Comments

ग़ज़ल:- आकर्षक चमकीले लोग

 

ग़ज़ल:- आकर्षक चमकीले लोग

 

आकर्षक चमकीले लोग

केंचुल में ज़हरीले लोग |

 

आत्ममुग्धता की परिणति हैं

सुन्दर सुघड सजीले लोग |

 

भूख की आंच पे चढ़ते हैं नित

खाली पेट पतीले लोग |

 

झंझावाती जीवन सागर

हम शंकित रेतीले लोग |

 

चीर हरण करते आँखों से

कुंठाओं के टीले लोग…

Continue

Added by Abhinav Arun on January 2, 2011 at 10:45am — 3 Comments

मिले सुर मेरा तुम्हारा...

 

 

नब्ज़ टटोलोगे तो कोई रोग पकड़ आएगा

 झूठ का रंग भी सच पर से उतर जाएगा

क्यों कहते हो माथे पे लगाया है चन्दन
लहू है ये ,एक दिन ,सबको पता…
Continue

Added by Lata R.Ojha on January 2, 2011 at 12:00am — 1 Comment

यह वर्ष हम सभी को हर तरह रास आये

यह वर्ष हम सभी को हर तरह रास आये--घर घर में शांति हो हर बच्चा मुस्कुराये

कठिनाइयों में अब तक गुज़रा हो जिसका जीवन…
Continue

Added by Hilal Badayuni on January 1, 2011 at 7:30pm — 9 Comments

सबसे पहले नमस्कार दो हजार दस साल को ,

सबसे पहले नमस्कार दो हजार दस साल को ,

हम नहीं भूल पाएंगे जो हुए हाल बेहाल को ,

फिर स्वागत करता हूँ  साल दो हजार ग्यारह ,

आशा नहीं विश्वास हैं रहेगा सबका पौं बारह ,

कसम से ख़ुशी का दिन हैं नया साल आया  ,

और इस ख़ुशी को दोस्तों ने दो गुण है बढाया ,

मुबारकवाद उन को जिनका जनम दिन हैं ,

बबिता जी भरत कुमार संग में बिजय जी ,

धनेश जी , ब्रजेश जी और गयासुदीन शेख ,

गोपाल जी इन्द्रजीत जी और नव सोही ,

प्रभाकर पाण्डेय ,रवि प्रभाकर के संग संजय जी… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on January 1, 2011 at 1:30pm — 3 Comments

नववर्ष की नव कामना...

 

नए वर्ष के नए पटल पर

खुशियों के नए गीत सजाएँ,

नयी धरा पर सपनों के कुछ

 नए नवेले बीज बिछाएं I

 

नव दिवस की उर्जाओं संग

न केवल नए लक्ष्य बनायें,

पुराने प्रणों…

Continue

Added by Veerendra Jain on January 1, 2011 at 12:24pm — 3 Comments

ग्रीटिंग

याद है जब एक साल तुम्हारा ग्रीटिंग मुझे नहीं पहुंचा था...

ग्रीटिंग जिसके भीतर मैं तुमको पढता था...

जिसके एक-एक हर्फ़ से अफ़साने गढ़ता था

बहुत पुरानी बात है वो भी नया साल था.......

कई दिनों तक रक्खी थीं उम्मीद होल्ड पर...

...आज भी बीता बरस सिराने जाता…
Continue

Added by Sudhir Sharma on January 1, 2011 at 2:15am — 5 Comments

नये साल का गीत: कुछ ऐसा हो साल नया -- संजीव 'सलिल'

नये साल का गीत

कुछ ऐसा हो साल नया

संजीव 'सलिल'

*

कुछ ऐसा हो साल नया,

जैसा अब तक नहीं हुआ.

अमराई में मैना संग

झूमे-गाये फाग सुआ...

*

बम्बुलिया की छेड़े तान.

रात-रातभर जाग किसान.

कोई खेत न उजड़ा हो-

सूना मिले न कोई मचान.

प्यासा खुसरो रहे नहीं

गैल-गैल में मिले कुआ...

*

पनघट पर पैंजनी बजे,

बीर दिखे, भौजाई लजे.

चौपालों पर झाँझ बजा-

दास कबीरा राम भजे.…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on December 31, 2010 at 6:25pm — 1 Comment

...वर्ष का आखिरी दिन...

बीत जायेंगे फिर
ये दिन गिन-गिन
फिर वही भागम-भाग
...जीविका की फिर वही ताक-धिन
लम्हा-लम्हा भरती
बालों में चांदी
जुड़ते यादों में फिर
अनगिनत पल-छिन
क्या खोया-क्या पाया
उस 'हिसाब' से पहले
हिसाब का 'अभ्यास' कराता
वर्ष का
आखिरी दिन...

© AjAy Kum@r

Added by AjAy Kumar Bohat on December 31, 2010 at 6:08pm — 3 Comments

में तो रुक रुक कर सुना रहा था हाल ए दिल

में तो रुक रुक कर सुना रहा था हाल ए दिल

उनको मेरी हर बात ग़ज़ल सी लगी



में तो दीवानगी में चल पड़ा था उस रस्ते पर

उनको ये कोशिश पहल सी लगी



कोई कमी तो नहीं थी जश्न तब भी था

तुम आये तो महफ़िल मुकम्मल सी लगी



मुफलिसी में गया था… Continue

Added by Bhasker Agrawal on December 31, 2010 at 5:00pm — 3 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
Oct 15
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service