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"मोर्निंग वाक्"

"मोर्निंग वाक्"



मंद मंद रौशनी

शीतल पवन के झोंके

पंछियों की चहक

कलरव है या संगीत

वसुधा का अनूठा गीत

नदियों झीलों पोखरों में

बिखरा पड़ा है स्वर्ण

कमल के…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on August 11, 2012 at 11:47am — 2 Comments

उद्वेग

लिख डाली थी प्रेम कहानी कभी बड़े अरमानों से.

नहीं क्लेश किंचित था मुझको विस्फोटी सामानों से.

देश व्यथित हो गया आज जब अपनों औ बेगानों से.

टीस उठी तो कलम उठाई निकले तीर कमानों से..



मानवता का ह्रास हो रहा बिका हुश्न बाजारों में.

कर्णधार जो बनकर आये लिप्त हुए व्यभिचारों में.

अरे भान करवा दो इनको डर उपजे गद्दारों में.

अभी चमक बाकी है यारों भारत की तलवारों में..



छले गये हैं बहुत अभी तक अब न कभी छलने देंगें.

जाति-पांति के भेदभाव में देश नहीं जलने…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on August 11, 2012 at 11:00am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हमारे बुजुर्ग

बुजुर्गों के पाँव तले जन्नत का आभास होता है 

सभी रिश्तों में उनसे रिश्ता बहुत खास होता है 

जिस घर में मात कौशल्या दशरथ तात नहीं होते

वो  अपना घर नहीं होता वहां वनवास होता…

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Added by rajesh kumari on August 11, 2012 at 10:46am — 9 Comments

देशगीत (स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

जो कह गए शहीद, चलो उसको दुहराएँ |

आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||

है दिन जिसको वीर, जीत कर के लाए थे,

चट्टानों को चीर, मौत से टकराए थे |

कर लें उनको याद, जिन्होंने शीश कटाए,

आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 11, 2012 at 8:21am — 8 Comments

श्रीकृष्ण आराधना

जय श्रीकृष्ण देवकीनंदन | हूँ कर जोड़े, करता वंदन ||

दुख-विपदा से आप निवारो | मेरे बिगड़े काज सँवारो||

भगवन जग है तेरी माया | कण-कण तेरा रूप समाया ||

जगत नियंता, हे करुणाकर | तेरी ज्योति चंदा-दिवाकर ||

देवराज आरती उतारें | नारद जय-जयकार उचारें ||…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 10, 2012 at 6:45pm — 12 Comments

मेरी सखी

मेरी सखी

कभी चंचल है, कभी है गंभीर

कभी हवा सी है, कभी जैसे नीर 

कभी मोती जैसे खानेके वो

कभी चन्दन जैसे महके वो

कभी…

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Added by Ranveer Pratap Singh on August 10, 2012 at 1:20pm — 7 Comments

"श्री कृष्ण को समर्पित कुछ दोहे"

सुध-बुध सारी भूल गयी, भूली जान-अजान,

कान्हा ने जब छेड़ दी, मधुर-मुरली की तान.



मुख पर छाए लालिमा, खिले अधर मुस्कान,

कान्हां जी को कैसा लागे राधा-राधा नाम.



जिसके हरी हैं सारथि, निश्चय उसकी जीत,

जिस मन हरी बसें, उस मन प्रीत ही प्रीत.



लाज बचाई आपने, सुन अबला मन की पीर,

अबला अब सबला भयी , छोटो है गयो चीर.



दरस तुमरे पाने को, जुग-जुग जाते बीत,

भाग बढे सुदामा के, जो भये तुम्हारे मीत.



हर युग अवतार लिए, खेले क्या-क्या दांव,…

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Added by AjAy Kumar Bohat on August 10, 2012 at 8:30am — 8 Comments

कान्हा कृष्णा मुरली मनोहर आओ प्यारे आओ

कान्हा कृष्णा मुरली मनोहर आओ प्यारे आओ

व्रत ले शुभ सब -नैना तरसें और नहीं तरसाओ

जाल –जंजाल- काल सब काटे बन्दी  गृह में आओ…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 10, 2012 at 8:00am — 10 Comments

तिनका तिनका ज़िन्दगी

तिनका तिनका ज़िन्दगी
 
बिखर गए पन्ने, मेरी ज़िन्दगी की किताब से 
तिनका तिनका ज़िन्दगी, जी रहा हूँ हिसाब से…
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Added by Ranveer Pratap Singh on August 9, 2012 at 1:30pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कविता

 कैसे लिखी जाती है

कविता मुझे पता नहीं 
बस भावनाओं के
 कुछ बादल जन्म लेते हैं
 दिल की सतह पर 
और वाष्पित होकर  
मस्तिष्क में पंहुच कर 
उमड़ पड़ते हैं 
और बूँद बूँद बरसते 
हैं शब्द बनकर ,घुल जाते हैं 
मेरी कलम की स्याही में 
और उतर आते हैं 
किसी सपाट पन्ने 
पर कविता बनकर
******

Added by rajesh kumari on August 9, 2012 at 12:09pm — 8 Comments

दिल में मेरे कैद कैसे हो गए कान्हा

तुम हमारे बस हमारे हो गए कान्हा

इश्क वाले तुख्म दिल में बो गए कान्हा



तुम जिसे रखने को 'पा' भी कम पड़ी दुनिया

दिल में मेरे कैद कैसे हो गए कान्हा



याद तुझको जो कभी शैतान भी कर ले

पाप उस शैतान के सब धो गए कान्हा



जब तुम्हारे…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on August 9, 2012 at 12:00pm — 3 Comments

गिरगिट ( लघु कथा )



        चतुर चंद ने मोहल्ले के चबूतरे पर बैठकर प्रवचन देना आरंभ कर दिया था. वह गंभीरता का ढोंग धारण करते हुए बोले, “भक्त जनो! मानव के भीतर भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवों का वास है.” …



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Added by SUMIT PRATAP SINGH on August 9, 2012 at 12:00pm — 2 Comments

अमीरी

अमीरी



बचपन की अमीरी जाने कहाँ खो गयी 

सपनो की दुनिया मेरी आँखे मूँद सो गयी …

चार आने जेब में रखकर 

दुनिया लेने जाते थे 

चार आने में चार गोलियां 

संतरे वाली लाते थे 

चार चवन्नी रख गुल्लक में 

उसको रोज़ बजाते थे 

चार रुपये हो जाए तो एक 

नयी गुल्लक ले आते थे 

चार आने की खनक चार कंधो पे सो…

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Added by Ranveer Pratap Singh on August 8, 2012 at 1:30pm — 4 Comments

कीमत दर्दे दिल की अदा कर दे

कीमत दर्दे दिल की अदा कर दे,

तू खुद को मेरा खुदा कर दे,

आ जा वापस जिंदगी में फिर,

चाहे सांसों से जुदा कर दे,

गम में जीना हो न हो मरना,

ऐसा मौसम तू सदा कर दे,

तिरछी नज़रों से चला जादू,

मुझको…

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Added by अरुन 'अनन्त' on August 8, 2012 at 11:12am — 5 Comments

अ-विराम

                         

प्रगति पथ पर चलो निरंतर

न किसी का भय न कोई डर

करना है कुछ अलग सा काम

चाहे हो जाए जीवन तमाम

पर चले चलो अ-विराम

 

कांटो सी राह पर चलते है जाना

सूरज की आग में जलते है जाना

रोशन करना है जग में नाम

चाहे हो जाए जीवन तमाम

पर चले चलो…

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Added by Ranveer Pratap Singh on August 7, 2012 at 11:33pm — 5 Comments

मुक्तक

कभी  मेरी धडकनों में स्वर तुम्हारे थे 
आज  मेरे स्वरों में तेरी धडकन है  
मेरी सरगम पे बजा करती थी तुम्हारी पायल 
आज बजती है कही सरगम तो करती घायल 
-------------------------------------------------------------
मेरे  घर से निकलने की आहट पे 
द्वार में आया तुम करती…
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Added by Ashish Srivastava on August 7, 2012 at 9:00pm — 8 Comments

कुण्डलिया : धोती मुनिया फर्श को.....

धोती मुनिया फर्श को, मुन्ना माँजे प्लेट |

कल का भारत देख लो, ऐसे भरता पेट ||

ऐसे भरता पेट, और ये नेता सारे,

चलते सीना तान, लगा के जमकर नारे |

नहीं तनिक है शर्म, कहाँ है जनता सोती,…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 7, 2012 at 6:00pm — 18 Comments

दो कुण्डलियाँ...सावन की.

हरी-हरी धरती भई.....

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बदरा बरसे शान से, बिजुरी चमके जोर.
हरी - हरी धरती भई,जित देखूं उत ओर.
जित देखूं उत ओर,हुआ है दृश्य मनोहर.
दिखा  रहें  हैं  मेघ , देखिये अपने तेवर.
कहता है अविनाश,झेलिये उनका नखरा.
भीगो  उनके संग,बरसते जब तक बदरा.
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Added by AVINASH S BAGDE on August 7, 2012 at 2:00pm — 7 Comments

बदन पे आज कपडा तंग होता जा रहा है क्यूँ

यहाँ आजाद है हर सख्स थोपा जा रहा है क्यूँ

लडूं अधिकार की गर जंग रोका जा रहा है क्यूँ



हुआ है आज का हर आदमी अब तो सलामत-रौ

बदन पे आज कपडा तंग होता जा रहा है क्यूँ



नहीं बेफिक्र है लोगो जिसे हालात है मालुम

जवाँ फिर आज मूंदे आँख सोता जा रहा है क्यूँ



सलीका इश्क करने का कभी आया नहीं लेकिन

जिसे देखो दिलों में आग बोता जा रहा है क्यूँ



खुदी मसरूफ है फिर भी शिकायत वक़्त से करता…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on August 7, 2012 at 11:44am — 14 Comments

"कील चुभी वो नहीं विलग "

"कील चुभी वो नहीं विलग "

वे कहते हैं सब भूल गये

हम कहते कुछ भी याद नहीं

कारण मैंने भी किया वही

जो उसने पिछले साल किये

अब उसके भी एक आगे है

मेरे भी पीछे बाँध दिए !!

रस्में पूर्ण समाज…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 7, 2012 at 1:02am — 19 Comments

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