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ग़ज़ल - एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब

बह्र - फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब

कोई बतलाये कहाँ गायब हुआ है इन्किलाब

एक वो भी वक्त था तनकर चला करता था वो

एक ये भी वक्त आया है छुपा है इन्किलाब

खूबसूरत आज दुनिया बन गई है कत्लगाह

जालिमों से मिल गया है अब सुना है इन्किलाब

है अगर जिन्दा तो आता क्यों नहीं वो सामने

ऐसा लगता है कि शायद मर चुका है इन्किलाब

लोग कहते हैं गलतफहमी है ऐसा है…

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Added by Ram Awadh VIshwakarma on June 5, 2020 at 7:46am — 18 Comments

उल्फ़त पर दोहे :

उल्फ़त पर दोहे :

सब लिखते हैं जीत को, मैं लिखता हूँ हार।

हार न हो तो जीत का, कैसे हो शृंगार।।१

अद्भुत है ये वेदना, अद्भुत है ये प्यार।

दृगजल जैसे प्रीत का, कोई मंत्रोच्चार।।२

क्यों मिलता है प्यार को, दर्द भरा अंजाम।

हो जाते हैं इश्क में, रुख़सत क्यों आराम।।३

हर लकीर ज़ख्मी हुई, रूठ गए सब ख़्वाब।

आँखों की दहलीज पर,करते रक़्स अज़ाब ।।४

दस्तक देते रात भर, पलकों पर कुछ ख़्वाब।

तारीकी में ज़िंदगी, लगती हसीं…

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Added by Sushil Sarna on June 4, 2020 at 10:37pm — 6 Comments

गज़ल

 221 1222 221 1222

 

उसकी ये अदा आदत इन्कार पुराना है

बेचैन नहीं करता ये प्यार पुराना है ।

 

ये हुस्न नया पाया उसने है सताने को

ये जिस्म तमन्नाएं इसरार पुराना है ।…

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Added by Ashok Kumar Raktale on June 4, 2020 at 10:30pm — 11 Comments

नदी इंकार मत करना कभी तू अपनी क़ुर्बत से (१०७ )

( 1222 1222 1222 1222 )

.

नदी इंकार मत करना कभी तू अपनी क़ुर्बत से

समुन्दर बेसहारा हो न जाये तेरी हरकत  से

हमेशा वक़्त हो महफ़िल सजाने लुत्फ़ लेने का

ख़ुदाया दूर रखना ज़िंदगी भर शाम-ए-फ़ुर्क़त से

जहाँ में हर बशर को नैमत-ए-उल्फ़त अता करना

कहीं भी रब न रह पाए कोई महरूम चाहत से

ज़रा सी गुफ़्तगू शीरीं भी करना सीख लो मीरों

हमेशा मसअले हल हो नहीं सकते हैं ताक़त…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 4, 2020 at 4:00pm — 11 Comments

चाहती हूँ

दिवस के अवसान का,भ्रम नहीं पाले कोई,

चाॅद की आमद के पीछे,

आएगी ऊषा नई ,

ऊध्व॔मुख सूरजमुखी से होड़ लेना चाहती हूँ ..एक

गहरी नींद सोना चाहती हूँ ।

अश्रुओं में बह गई है,

विगत की अंतिम निशानी,

पलकों पर सजने लगी है,

प्रीत की नूतन कहानी,जिंदगी की जीत पर ,

मन को ड़ुबोना चाहती हूँ ।

एक गहरी नींद सोना चाहती हूँ ।

मैं सृजन के शब्द होकर,

दिग् दिगंत में उड़ सकूँ,

धूप का सा आचरण ले,

कालिमा से लड़ सकूँ,

राख से जन्मे विहग के,पंख होना…

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Added by Anvita on June 4, 2020 at 12:00pm — 5 Comments

कहीं नायाब पत्थर है , कहीं मन्दिर मदीना है

कहीं नायाब पत्थर है , कहीं मन्दिर मदीना है

तेरा घर संगेमरमर का , मेरा तो नीला ज़ीना है

कोई मन्दिर पे सर टेके, कोई काबा को माने है

मैं हर पत्थर पे सर टेकूं जहाँ नेकी क़रीना है

कहीं पर धूप है तपती, कहीं सागर की लहरें हैं

अजब है रंग दरिया का, जहाँ तेरा सफ़ीना है

कोई ऐ सी में बैठा है , कोई छतरी को भी तरसे

मगर ख़ूँ एक सा बहता, बहे इक सा पसीना है

कभी मिट्टी से भी पूछो, कि जलना है या दफना दूं

कहे मिट्टी दे आज़ादी…

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Added by Dimple Sharma on June 3, 2020 at 6:30pm — 7 Comments

जीवन पर कुछ दोहे :

जीवन पर कुछ दोहे :

जीवन नदिया आस की, बहती जिसमें प्यास।

टूटे सपनों का सहे, जीव सदा संत्रास।१ ।

जीवन का हर मोड़ है, सपनों का भंडार।

अभिलाषा में जीत की, छिपी हुई है हार।२ ।

जीवन पथ निर्मम बड़ा, अनदेखा है ठौर।

करने तुझको हैं पथिक,सफ़र सैंकड़ों और।३।

जीवन उपवन में खिलें, सुख -दुख रूपी फूल।

अपना -अपना भाग्य है फूल मिलें या शूल।४ ।

मिथ्या जग में जीत है, मिथ्या जग में हार ।

जीवन का हर मोड़ है, सपनों…

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Added by Sushil Sarna on June 2, 2020 at 9:00pm — 8 Comments

अधूरे अफ़साने :

अधूरे अफ़साने :

जाने कितने उजाले ज़िंदा हैं

मर जाने के बाद भी

भरे थे तुम ने जो

मेरी आरज़ूओं के दामन में

मेरे ख़्वाबों की दहलीज़ पर

वो आज भी रक़्स करते हैं

मेरी पलकों के किनारों पर

तारीकी में डूबी हुई

वो अलसाई सी सहर

वो अब्र के बिस्तर पर

माहताब की

अंगड़ाइयों का कह्र

वो लम्स की गुफ़्तगू

महक रही है आज भी

दूर तलक

मेरे जिस्मो-जां की वादियों में

तुम थे

तो…

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Added by Sushil Sarna on June 1, 2020 at 8:00pm — 8 Comments

परम पावनी गंगा

चन्द्रलोक की सारी सुषमा, आज लुप्त हो जाती है।

लोल लहर की सुरम्य आभा, कचरों में खो जाती है

चाँदी जैसी चंचल लहरें, अब कब पुलकित होती हैं

देख दुर्दशा माँ गंगा की, हरपल आँखे रोती हैं।

बस कागज पर निर्मल होती, मीठी-मीठी बातों से।

कल्पनीय चपला जस शोभित, होती हैं सौगातों से।

व्यथित सदा ही गंगा होती, मानव के संतापों से।

फिर कैसे वह मुक्त करेगी, उसे भयंकर पापों से।

एक समय था गंगा लहरें, उज्ज्वल रूप दिखाती थी।

धवल मनोहर रात चाँदनी, गंगा…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on June 1, 2020 at 5:45pm — 5 Comments

गंगादशहरा पर कुछ दोहे

...............

गंगा जी ने जिस दिवस, धरे धरा पर पाँव

माने गंगा दशहरा, मिलकर पूरा गाँव।१।

**

विष्णुपाद से जो निकल, बैठी शंकर भाल

प्रकट रूप में फिर चली, गोमुख से बंगाल।२।

**

करती मोक्ष प्रदान है, भवसागर से तार

भागीरथ तप से हुआ, हम सबका उद्धार।३।

**

गोमुख गंगा धाम है, चार धाम में एक

जिसके दर्शन से मिटें, मन के पाप अनेक।४।

**

अमृत जिसका नीर है, जीवन का आधार

अंत समय जो ये मिले, खुले स्वर्ग का द्वार।५।

**

अद्भुत गंगाजल कभी, पड़ें…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 1, 2020 at 1:39pm — 4 Comments

उम्मीद क्या करना -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



रहेगा साथ सूरज यूँ  सदा  उम्मीद क्या करना

जलेगा साँझ होते ही दिया उम्मीद क्या करना।१।

**

जो बरसाता रहा कोड़े सदा निर्धन की किस्मत पर

करेगा आज  थोड़ी  सी  दया  उम्मीद  क्या करना।२।

**

बनाये  दूरियाँ  ही  था सभी  से  गाँव  में  भी  जो 

नगर में उससे मिलने की भला उम्मीद क्या करना।३।

**

चला करती है उसकी जब इसी से खूब रोटी सच

वो देगा छोड़ छलने की…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 1, 2020 at 5:00am — 4 Comments

दर्द

दिल मेरा यह हाल देख घबराता है

शहर का अब मजदूरों से क्या नाता है।

खून पसीने से अपने था सींचा जिसको

बुरे दौर में दामन शहर छुड़ाता है।

आया संकट कोरोना का देश में जबसे

सड़कों पर लाचार मनुज दिख जाता है।

जिसने चमकाया शहरों को हो लथपथ

आज वही शहरों से फेंका जाता है।

देख दर्द होता है दिल में अब अवनीश

दुनियां को रचता क्या एक विधाता है।

मेहनत करने वाला क्यूँ दर दर भटके

क्यूँ नेता साहब सेठ ऐंठ दिखलाता…

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Added by Awanish Dhar Dvivedi on May 31, 2020 at 10:34pm — 4 Comments

दिन दीन हो चला

एक मजदूर जननी एक मजबूत जननी



कितने आलसी हो चले हैं दिन

कितनी चुस्त हो चली हैं रातें

इधर खत्म से हो चले किस्से

उधर खत्म सी हो चली बातें

जानते थे दिन कि

अब क्यों हो चले है ऐसे

जानते थे दिन कि

कभी नहीं थे ऐसे ऐसे

सुनते थे कि दिन -दिन का फेर होता है

सुनते थे कि इंसाफ मे देर हो भी जाये

सुनते थे कि इंसाफ मे अंधेर नहीं होता है

पर दिन का एक नकाब…

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Added by amita tiwari on May 31, 2020 at 8:00pm — 2 Comments

"लोग"

लोग इससे ज्यादा

क्या करेंगे ...छीन लेंगे हॅसी

रोक लगा देंगे कहकहों पर,और

घोंट देंगें दम..

मुस्कुराहटों का।

लोग ,लगा देंगे प्रतिबंध

गति,लय और लोच पर।

कामनाओ के छतनार वृक्ष की

हर ड़ाली काट-छाॅट कर;बना देंगे बोनसाई, और

रोंप देंगे,

गमलों में ।

छीन लेंगे कलम,या फिर, काट देंगे अंगुलियां ।

क्रिया के पश्चात प्रतिक्रिया, एक

शाश्वत सत्य है; समय का पहिया

कभी तो घूमेगा प्रतिकूल, और

लौटाएगा मिट्टी को,उसकी सारी ऊव॔रा,… Continue

Added by Anvita on May 31, 2020 at 3:49pm — 10 Comments

बाल गजल(मैंने डिग्री हासिल की है..)

22 22 22 22

मैंने डिग्री हासिल की है
सब कहते हैं,नाक बची है।1

फेल अगर तुम हो जाओ, तो
लोग कहेंगे,नाक कटी है।2

गुस्से का इजहार हुआ तो,
यूं लगता है,नाक चढ़ी है।3

हो जाते जब लोग बड़े, सब
कहते,उनकी नाक बड़ी है।4

सर्दी - खांसी,नजला हो,तो
कहते,खुलकर नाक चली है।5

ऑक्सीजन से जीवन देती,
कहते,कितनी नाक भली है!6
'मौलिक व अप्रकाशित'

Added by Manan Kumar singh on May 31, 2020 at 10:58am — 5 Comments

ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)

(2122 1212 22/112)

शह्र में फ़िर बवाल है बाबा

ये नया द्रोहकाल है बाबा

एक तालाब अब नहीं दिखता

क्या यही नैनीताल है बाबा?

क्या इसे ही उरूज कहते हैं?

अस्ल में ये ज़वाल है बाबा

भूख हर रोज़ पूछ लेती है

रोटियों का सवाल है बाबा

आंख इतना बरस चुकी अब तो

आंसुओं का अकाल है बाबा

मैं अकेला ही लड़ पड़ा सबसे

देखकर वो निढाल है बाबा

क़ब्र के वास्ते जगह न रही

फावड़ा है…

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Added by सालिक गणवीर on May 31, 2020 at 8:00am — 18 Comments

करता रहा था जानवर रखवाली रातभर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२

जिसके लिए स्वयं को यूँ पाषान कर गये

दो फूल उसके आपको भगवान कर गये।१।

**

कारण से कुछ के मस्जिदें बदनाम हो गयीं

मन्दिर को लोग कुछ यहाँ दूकान कर गये।२।

**

करता रहा था जानवर रखवाली रातभर

बरबाद दिन में खेत को इन्सान कर गये।३।

**

अपनी हुई न आज भी  पतवार कश्तियाँ

क्या  खूब  दोस्ती  यहाँ  तूफान  कर गये।४।

**

दिखते नहीं दधीचि से परमार्थी सन्त अब

मरकर भी अपनी देह जो यूँ दान कर गये।५।

**

माटी भी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 30, 2020 at 9:30am — 18 Comments

अहसास की ग़ज़ल -मनोज अहसास

2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2

अपने ही पापों से मन घबराता है

सीने में इक अपराधों का खाता है

लाचारी से कुछ भारी है मजबूरी

आँखों में ताकत है देख न पाता है

उसकी मजबूरी समझूँ या अपना दुख

गुलशन से सहरा में कोई आता है?

लाख कोशिशें कर के माना है हमनें

जो होना है आखिर वो हो जाता है

दिल मे कोई भीड़ सलामत है लेकिन

तेरा चेहरा साफ नहीं दिख पाता है

क्या जाने अफसाना है या सच कोई

आखिर में जो सच की जीत बताता है

ढलता है जब सूरज अपनी भी…

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Added by मनोज अहसास on May 29, 2020 at 12:35pm — 8 Comments

ग़ज़ल-आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कम्बख्त

बह्र-फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फैलुन

मुँह अँधेरे वो चला आया मेरे घर कमबख्त

आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कमबख्त

इस समय खौफजदा लगती है दुनिया सारी

सबके सीने में समाया हुआ है डर कमबख्त

चाहता हूँ मैं उड़ूँ नील गगन मे लेकिन

साथ देते ही नहीं अब मेरे ये पर कमबख्त

बन के तूफान चला आया शहर के अन्दर

कर गया कितनों को बरबाद समन्दर कमबख्त

लाख चाहूँ मैं उसे मुट्ठी में कर लूँ लेकिन

दो कदम दूर ही रहता है मुकद्दर कमबख्त

वो भी कहता है कि…

Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on May 29, 2020 at 8:30am — 2 Comments

टिड्डियाँ चीन नहीं जायेंगी

टिड्डियाँ   

चीन नहीं जायेंगी

वह आयेंगी 

तो सिर्फ भारत

क्योंकि वह जानती हैं

कि चीन में

बौद्ध धर्म आडंबर में है

और भारत में

आचरण है, संस्कार है

यहाँ अहिंसा  

परम धर्म है

यहाँ आजादी है  

अभिव्यक्ति की

भ्रमण की, निवास की

व्यवसाय की. समुदाय की

जो चीन में नहीं है

वे जानती हैं

चीन यदि जायेंगी

तो बच नहीं पाएंगी 

आहार पाने की कोशिश में

आहार बन…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 28, 2020 at 4:59pm — 4 Comments

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