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ग़ज़ल ( दिनेश कुमार )

2122--1122--1122--22

मेरी क़िस्मत में अगरचे नहीं धन की रौनक़

सब्र-ओ-तस्लीम से हासिल हुई मन की रौनक़



एक दूजे की तरक़्क़ी में करें हम इमदाद

भाई-चारा ही बढ़ाता है वतन की रौनक़



किसको फ़ुर्सत है जो देखे, तेरी सीरत का जमाल

हर तरफ़ जल्वा-नुमा अब है बदन की रौनक़



मुश्किलें कितनी भी पेश आएं तेरी राहों में

जीत की शक्ल में चमकेगी जतन की रौनक़



ये परखते हैं ग़ज़लगो के तख़य्युल की उड़ान

सामईन अस्ल में हैं बज़्म-ए-सुख़न की…

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Added by दिनेश कुमार on May 17, 2023 at 10:30am — 4 Comments

क्या रंग है आँसू का

क्या रंग है आँसू काकैसे कोई बतलाएगा
सुख का है या दु:ख का है ये कोई कैसे समझाएगा
 
कभी किसी के खो जाने से, कोई कभी मिल…
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Added by AMAN SINHA on May 14, 2023 at 8:30am — 1 Comment

मातृ दिवस के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"



माँ का आँचल बाल को, सदा सुरक्षा ढाल

टलता जिसकी छाँव में, आया संकटकाल।१।

*

हीरे, मोती, स्वर्ण का, रख कितना भी तोल

माँ की ममता का नहीं, पास किसी के मोल।२।

*

माँ के आँचल के तले, मिलती ऐसी छाँव

हर्षित होकर नाचता, हर दुखियारा गाँव।३।

*

चाहे मन  से हो  स्वयं, माँ  यूँ बहुत उदास

बच्चों को देती मगर, सदा खुशी की आस।४।

*

अपने सब दुख भूलकर, देती सबको हर्ष

माता  जीवन  नींव  है, माता  ही  उत्कर्ष।५।

*

रग-रग में माँ के भरे, ममता, करुणा,…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 13, 2023 at 10:10pm — 2 Comments

क्या बात करें ?

गुफ़्तगु तो बहुत हैं मगर क्या बात करें,

ग़म ए ज़िंदगी बहुत है, मगर क्या बात करें।

कहते हैं दुःख बांटने से कम हो जाता है ,

मगर शब्द ही मुंह से न निकलें , फिर क्या बात करें।

ज़िंदगी ने सिखाया कि रोना नहीं है ,

मगर अश्क़ ही न थम पाएं , फिर क्या बात करें।

आप उनकी ख़ातिर मर-मर के जिये हैं ,

वो फिर भी न समझ पाएं , फिर क्या बात करें।

है बड़ी कुंद सी मेरी ये ज़िन्दगी ,

झूठे ही मुस्कुराये ,फिर क्या बात करें।

नाहक़ ही उन्हें कोई कुछ भी ना बताये,…

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Added by Sudhir Thakur on May 12, 2023 at 12:20pm — 1 Comment

धूल में खेले हुए (गज़ल)

धूल में खेले हुए, कितने ज़माने हो गए।

ये पता ही ना चला, कब हम सयाने हो गए।।

अब मुहल्ले में नई, दास्तान हैं बनने लगीं।

इश्क़ के किस्से सभी मेरे, पुराने हो गए।।

शब्द कुछ यूँ ही पिरोकर, इक बहर में रख लिए।

आपके होंठों से…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on May 10, 2023 at 10:19pm — 5 Comments

ज़हरीला परिवेश

बाहर तपती धूप है , हवा चले , ले रेत

मनुज न फिर भी चेतता,होता जीव अचेत

भीषण बाढ़ें कर रहीं घर संग फसल तबाह

मेहनतकश किसान का,किस विधि हो निर्वाह?

शब्दों कर्मों में नहीं दिखता सामंजस्य

धरती जो है उर्वरा, कहते ऊसर व्यर्थ

उस पर वह बनवा रहे सुखद, मनोरम 'स्यूट'

बिल्डर , माननीय मिल,जमकर करते लूट

अभिभाषण में कह रहे पर्यावरण बचाव

कटवाएँ खुद तरु,विटप, देते नित्य सुझाव

कथनी करनी में बड़ा अन्तर…

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Added by Usha Awasthi on May 9, 2023 at 4:00pm — 1 Comment

मेरी खूबसूरती श्राप है

मेरी खूबसूरती श्राप है 

मेरे पूर्व जन्म का पाप है 

जितनों को मैंने छला होगा 

ये उन सबका अभिशाप है 

घर से निकल ना पाऊँ मैं 

रास्ते पर चल ना पाऊँ मैं  

कपड़े गहनों की बात हीं…

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Added by AMAN SINHA on May 7, 2023 at 6:39am — 1 Comment

पाँच दोहे - संगत

दोहा पंचक

विषय : संगत



संगत सच्चे मित्र की, उन्नत करे चरित्र ।

ऐसे मित्रों के सदा, पूजे जाते चित्र ।।

ओछी संगत के  सदा, ओछे होते रंग ।

कटे सदा फिर जिंदगी, बदनामी के संग ।।

अच्छे बुरे हर कर्म का, संगत है आधार ।

संगत के अनुरूप ही, जीव करे व्यवहार ।।

कहाँ निभा है  आज तक, केर बेर का संग ।

संगत सज्जन की सदा, मन में भरे उमंग ।।

भला बुरा हर आचरण , संगत के आधीन ।

जैसी संगत जीव की, वैसी बजती  बीन…

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Added by Sushil Sarna on May 4, 2023 at 1:51pm — 4 Comments

मैं जिया हूँ दो दफा

मैं जिया हूँ दो दफा और दो दफा हीं मैं मरा हूँ

पर अधूरी ख्वाहिशो संग हर दफा हीं मैं रहा हूँ

चाह मेरी जो भी थी वो मेरे पास थी सदा

पर मेरे पहुँच से देखो दूर थी वो सर्वदा

 

राह जो चुनी थी मैंने पूरी तरह सपाट थी

पर मेरे लिए हमेशा बंद उसकी कपाट थी

मैंने जो गढ़ी इमारत दीवार जो बनाई थी

उसकी नींव में हमेशा हो रही खुदाई थी

 

मैं चला था साथ जिसके मंज़िलों के प्यास में

वो रहा था पास मेरे किसी दूसरे के आस में

साथ…

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Added by AMAN SINHA on May 1, 2023 at 5:30am — 2 Comments

श्रमिक दिवस के दोहे

थकन भले ही देह में, किन्तु न माने हार

स्वर्ग श्रम से नित करे, वह नीरस संसार।१।

*

लहू देह से बन बहे, जिसके पलपल स्वेद

जग में बाँटे  हर्ष  जो, सब  से  लेकर खेद।२।

*

कर्मलीन जो हर समय, दिवस रात्रि में जाग

जगने  देते  पर  नहीं, शोषक  उस का भाग।३।

*

श्रम से उस के  हो  गये, चन्द  लोग धनवान

जिसकी हालत को कहे, जग दोषी भगवान।४।

*

हिस्से में ले जी रहा, भले भूख मजदूर

गाली, लाठी, गोलियाँ, मिलें उसे भरपूर।५।

*

गुजर किया मजदूर ने,…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 30, 2023 at 11:50am — 2 Comments

गजल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

बातों में सिर्फ देश का उद्धार हो रहा

बाँकी स्वयं के वास्ते व्यापार हो रहा।१।

*

चमकेगी उनकी और सियासत पता उन्हें

बेवश युवा यहाँ  का  जो मिस्मार हो रहा।२।

*

कीमत बढ़े ही जा रही हर एक चीज की

निर्धन का जीना  रोज  ही दुश्वार हो रहा।३।

*

कुर्सी पे जब  से  बैठे  हैं  ईमानदार ढब

नेता वतन का और भी मक्कार हो रहा।४।

*

आँधी चली है देश में कैसी विकास की

लाचार अब तो और भी लाचार हो रहा।५।

*…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 28, 2023 at 9:55pm — 2 Comments

जीवन और सत्य

उषा अवस्थी

क्षमाशीलता प्रेम की नदी बहे जिस गाँव

जिसको जो भी चाहिए, मिले वहीं उस ठाँव

करुणा औ वैराग्य का जिसमें जगा विवेक

जन्म उसी का इस धरा पर सार्थक,नि:शेष

जीवन अभिनय की विधा,चले श्रॄंखलाबद्ध

इच्छाओं , आशाओं की उलझन से सन्नद्ध

जिसने तोड़ी यह कड़ी , हुआ सत्य,उन्मुक्त

पार सभी सीमाओं से जाग्रत ,शुद्ध , प्रबुद्ध

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on April 28, 2023 at 10:00am — 1 Comment

गीत -२३ (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

फागुन  बनकर  डाकिया, लाया  यह संदेश।

घर भेजो ऋतुराज को, पतझड़ जा परदेश।।

*

माघ पठाता  चैत  को, फागुन कर उपहार।

फूल शूल सब आस  में, आ  उमड़े हैं द्वार।।

हवा किरण अब गंध का, करते हैं आभार।

नूतन कोंपल  देख  कर, नाच रहा सन्सार।।

*

उमड़े झट यह देखने, सुख का गेह प्रवेश।

फागुन  बनकर  डाकिया, लाया  यह संदेश।।

*

मधुबन में मन के जहाँ, बैठा था पतझार।

नीरसता की ही सहज, नित बहती थी धार।।

फूटी कोंपल आस की, है हर्षित घर द्वार।

उल्लासों का फिर… Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 27, 2023 at 9:03pm — 4 Comments

नफ़रत का पौधा (नवगीत)

महावृक्ष बनकर लहराता

नफ़रत का पौधा

पत्ते हरे फूल केसरिया

लाल-लाल फल आते

प्यास लहू की लगती जिनको

आकर यहाँ बुझाते

सबसे ज्यादा फल खाने की…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 26, 2023 at 9:53am — 4 Comments

अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास

2122   2122    2122   212

हमने तो मुद्दत से उनका ख्वाब भी देखा नहीं

लग रहा है इस दिए में तेल अब ज्यादा नहीं

ज़िन्दगी का क्या भरोसा डगमगाते दौर में

आप तक ले जाये ऐसा तो कोई रस्ता नहीं

शायरी भी बोझ दिल का बन गयी है दोस्तो

वो कोई कैसे पढ़ेगा जो मैं लिख सकता नहीं

तुम अगर आ जाओ अब भी तो ही क्या हो जाएगा

मैं नहीं,तुम भी नहीं वो,वक़्त भी वैसा नहीं

एक सूरत लेकिन अब भी है मेरे उद्धार की

पर सिवा तेरे किसी में ध्यान भी…

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Added by मनोज अहसास on April 25, 2023 at 11:43pm — 5 Comments

चुटकुला(लघुकथा)

दोनों के ठहाकों की गूँज सुन एकत्र हुई भीड़ से आवाज आई, "मौन माहौल में ऐसी हँसी क्यूं, भाई?"
"खुद पर हँस रहा हूं।" पहले व्यक्ति ने जवाब दिया।
"कारण?" भीड़ ने जानना चाहा।
"अपने मत से मैंने ऐसी सरकार चुनी। मति मारी गई थी मेरी।"
"और तुम....?" दूसरे से सवाल हुआ।
"मैंने मत नहीं दिया था। खुश हूं।"
फिर भीड़ शराबियों की तलाश में आई पुलिस के पीछे दौड़ी जो एक अधनंगे भिखारी को नशाखोरी के आरोप में पकड़कर ले जाने लगी थी।
"मौलिक एवं अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on April 25, 2023 at 1:53pm — 2 Comments

पुश्तैनी कर्ज़

चार रुपये लिए थे, मेरे दादा ने कर्ज़ में

कल तक बाबा चुका रहे थे, ब्याज उसका फर्ज़ में

 

रकम बढ़ी फिर किश्त की, हर साल के अंत में

मूलधन खड़ा है अब भी, ब्याज दर के द्वंद में

 

चार बीघा ज़मीन थी, अपना खेत खलिहान था

हँसता खेलता घर हमारा, स्वर्ग के समान था

 

बाढ़ आयी सब तबाह हुआ, बाबा की हिम्मत टूट गयी

कल तक जो खिली हुई थी, किस्मत जैसे…

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Added by AMAN SINHA on April 23, 2023 at 8:32am — 2 Comments

दोहा मुक्तक .....

दोहा मुक्तक 

मन को जब मन में मिली , मन चाही पहचान ।
मन  में   जागे   प्यार   के, अनजाने    तूफान ।
मन  की  मोहक  कल्पना, मन के  सुन्दर तीर -
मन ही मन मुस्का रहे, मन  के  सब  अरमान ।
                      * * *
पागल  इच्छा  सो   गई,  स्वप्न  हुए  साकार ।
चातक  नैनों  को  मिला, तृष्णा  का  उपहार ।
शापित अभिलाषा हुई, मन को मिला न मीत -
क्षीण  बिम्ब  सब हो  गए, धधक  पड़े शृंगार ।

सुशील सरना / 22-4-23

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on April 22, 2023 at 2:54pm — 2 Comments

ग़ज़ल

212 212 212 212

मैं उसी मोड़ पर सोचता रह गया

वो गया याद का सिलसिला रह गया



उसके होंठो पे कुछ बात सी रह गयी

मेरे मन में भी कुछ अनकहा रह गया



देख कर सब मुझे बात करने लगे

हाय क्या शख़्स था और क्या रह गया



आज फिर आँखों में है नमी अज़नबी

आज फिर आइना ताकता रह गया



मिट गया प्यार मायूस नाकाम हो

प्यार का दर्द लेकिन बचा रह गया



कहकहों से भरी चाँद की महफ़िलें

इक चकोरा उसे टेरता रह गया



दोस्त दामन बचाकर बिछड़ते…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 21, 2023 at 8:00am — 2 Comments

असत्य स्वीकार नहीं

उषा अवस्थी

धरा पाँव जब सत्य मार्ग पर
मुश्किल पथ,आसान नहीं

सही वस्तु की ग़लत व्याख्या
इस मन का आधार नहीं

तीव्र धार की असि ग्रीवा पर
हो, असत्य स्वीकार नहीं

शान्त,अडिग,निःशंक,अकेला
"मै", लव भर का भार नहीं

दृष्टा पर अवलम्ब दृश्य
दृष्टा तो मुक्त , विकार नहीं

अकथ,अलौकिक,अतुल,अनामय
को मिथ्या स्वीकार्य नहीं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on April 19, 2023 at 10:22pm — 2 Comments

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