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ग़ज़ल



2121  2122  21 21  2122



हम को कौन जानता था तेरी बन्दगी से पहले

चाल - ढाल खो चुके थे हम तो आशिक़ी से पहले

बन सँवर गये नहींं हम तेेरी दोस्ती से पहले

कब था ये सलीका हमको अपनी गुमशुदी से पहलेे

कूद-फाँद की बहुत पर थाह हो नहीं सकी जाँ

ज़िन्दगी के गुर न पाये हम भी ख़़ुदक़शी से पहले

खो सको जुनूूँ-मुहब्बत आना इस डगर को यारो

अन्यथा कहोगे मरना अच्छा हर सती से पहले

खूब मयकशी की हमने साथ साक़ी थी वो…

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Added by Chetan Prakash on July 12, 2023 at 10:41am — No Comments

अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास

2×15

कोशिश इतनी भी मत कीजे यादों को झुठलाने में ।

आँखों मे आँसू भर जायेगे ज्यादा मुस्काने में।

और भी कोई चीज़ बची है क्या तेरे मैखाने में,

सारे ग़म तो मिला दिए तूने मेरे पैमाने में।

बरस हज़ारों बीत गए हो जैसे तुझको देखे बिना,

बीस साल की गिनती तो मैं गिनता हूँ अनजाने में।

कोई फैसला लिखने बैठेगा तो उससे पूछूगा,

सारी गवाही पूरी हैं या देर है उनके आने में।

इतना पता मिल जाता बस वो सही सलामत रहते हैं,

अब तो…

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Added by मनोज अहसास on July 12, 2023 at 12:02am — No Comments

अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास

1222   1222  1222   1222

वही इक ख्वाब तो अपनी निगाहों ने भी देखा था।

हमारे पास कोशिश थी,तुम्हारे पास पैसा था।

तुम्हारे हक़ में आया फैसला तो कैसा अचरज हो,

मेरी आँखों में मिन्नत थी, तेरे कदमों का रुतबा था।

कहीं से भी नहीं लगता तेरी हस्ती से अब संगदिल,

यही वो शख्स है मैं जिसके ख़्वाबों में भी रहता था।

तेरा रुख ऐसा होगा ये अगर महसूस हो जाता,

कभी भी मैं नहीं कहता तू मुझसे प्यार करता था।

रिहाई जाने कब…

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Added by मनोज अहसास on July 10, 2023 at 1:06am — 2 Comments

मैं चाँद तू चकोरा

मैं चाँद तू चकोरा मेरे बिन तू अधूरा 

जो तू मिल जाए मुझसे मैं हो जाऊँ पूरा 

तेरे बिन जीने में है क्या बात मितवा

बस तुझको दिल मेरा दे आवाज़ मितवा

तू भी भागे मेरी ओर मैं भी भागूं तेरी ओर 

बांधे तुझको मुझको है कोई अनदेखी सी…

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Added by AMAN SINHA on July 8, 2023 at 5:59am — No Comments

ग़जल ( प्रोफ. चेतन प्रकाश चेतन )

221 2122 221 2122

सावन हवा सुहानी आँखों कहीं नमी है

अब आ भी जाओ जानाँ तुम बिन नहीं खुशी है

छोड़ो भी दिल्लगी अब तन्हाई मारती है

बढ़ती है अब उदासी बदहाल ज़िन्दगी है

बादल बुझा रहा है सुन प्यास इस ज़मीं की

तू भी बसा मेरी दुनिया जो नहीं सजी है

ताउम्र तुमको चाहा मेरा जहाँ तुम्हीं हो

जाँ दिल मलो कि अब तो बेदर्द सी ग़मी है

अलमस्त जी रहे थे हम साथ-साथ जानाँ

ऐसा हुआ वो क्या हमसे जो ये बेदिली…

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Added by Chetan Prakash on July 7, 2023 at 1:34pm — 1 Comment

नज़्म - चाट

221 - 2122 - 221 - 2122 

आया है चाट वाला ले कर गली में ठेला

आते ही लग गया है बच्चों का जैसे मेला 

अम्मा से पैसे लेके दौड़ी जो बिटिया रानी 

सुनकर ही आ गया है चच्ची के मुँह में पानी

भाभी भी हो रहीं ख़ुश भय्या मँगा रहे हैं 

खाते नहीं मगर वो सबको खिला रहे हैं 

टन-टन तवा बजाता कर्छी से चाट वाला

कहता है आओ बाजी आओ जी मेरी ख़ाला

गर्मा-गरम पकौड़े चटनी है खट्टी-मीठी 

रगड़ा-मसाला खा के मुँह से…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 6, 2023 at 8:53pm — 4 Comments

ग़ज़ल : लड़ते झगड़ते रहते हैं यारो सभी से हम....

२२१-२१२१-१२२१-२१२

लड़ते झगड़ते रहते हैं यारो सभी से हम

मिलते हैं दुश्मनों से बड़ी सादगी से हम(१)

चक्कर लगाता रहता है दुनिया का एक शख़्स

आगे निकल न पाए तुम्हारी गली से हम (२)

कैसे बिताएँ वक़्त ज़रा सा भी उनके साथ

वो हैं नये समय के पुरानी घड़ी से हम (३)

मिलना है जिसका हक़ उसे धेला नहीं मिला

बाँटे गए हैं मुफ़्त में ही रेवड़ी से हम (४)

जब भी छुपाई हमने कहीं पर तुम्हारी बेंत

पीटे गए हमेशा हमारी छड़ी से हम…

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Added by सालिक गणवीर on July 5, 2023 at 5:23pm — 2 Comments

क्षणिकाएँ. . . .

क्षणिकाएँ. . . .

समझा दिया
मतलब मोहब्बत का
गिर कर
हथेली पर
एक आँसू ने
*
प्यास
एक हसीं अहसास
सुलगते  अरमानों की
*
तन से दूर
मन के पास
मन की प्यास
*
आँखों में
करतीं रास
दरस की प्यास
*
जीवन
मरीचिका
सिर्फ
प्यास ही प्यास

सुशील सरना / 5-7-23

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on July 5, 2023 at 3:08pm — No Comments

मन के जीते जीत है

मन के जीते जीत है मन के हारे हार

मन चाहे तो मिल जाए आँगन में हरिद्वार

क्यों चले बाज़ार में करने को चित्कार 

मन की बात जो मान गए हो जाए सब उपचार 

बस मन हिन मानिए पट दिखलाए सटीक 

वापस लौट के आ जाए पथ से भटका…

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Added by AMAN SINHA on July 2, 2023 at 8:16am — No Comments

हाइकु - मोर /मयूर

देख मयूर
अनुपम सौंदर्य
मन बावरा।

विश्व सौंदर्य
प्रकृति हो रमणी
नाचे मयूर।

सुंदर पंख
नागराज भी डरे
निराला मोर।

मन हर्षाता
पंख फैलाए मोर
जो इठलाता।

काला बादल
नर्तकप्रिय मोर
मन को भाता।

अनिता भटनागर 

मौलिक और अप्रकाशित 

Added by Anita Bhatnagar on July 1, 2023 at 1:00pm — No Comments

सब ही शरीफ हो गए।

अपने ही घर में देखो आज हम ज़लील हो गए।

तोहमतें लगाकर हम पर सब ही शरीफ़ हो गए।।1।।



पता ही ना चला वक्त मेरी बर्बादी का मुझको।

मेरे अपने ही दुश्मनों के कितने करीब हो गए।।2।।



जो हमारी ज़िन्दगी के थे सब राजदार कभी।

वह सब धीरे-धीरे मेरे ही देखो रक़ीब हो गए।।3।।



जो ना गए थे छोड़कर हमको यूँ वफ़ादारी में।

वो सब के सब ही मेरी तरह बदनसीब हो गए।।4।।



बचने की कोई गुंजाइश ना थी बेबस थे बड़े।

मेरे अल्फ़ाज़ ही मेरे खिलाफ जब दलील हो… Continue

Added by Taj mohammad on June 30, 2023 at 9:01pm — 1 Comment

शरारत के दिन गये - गजल (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

पढ़ लिख गये हैं और जहालत के दिन गये

लेकिन इसी के साथ रिवायत के दिन गये।१।

*

जितने  भी  संगदिल  थे  तराशे  गये  बहुत

लेकिन न इतने भर से कयामत के दिन गये।२।

*

हर छोटी बात अब तो है तकरार का विषय

इस से समझ लो आप मुहब्बत के दिन गये।३।

*

साया गया जो बाप का क्या कुछ छिना न पूछ

उस की समझ  खुली  है  शरारत के दिन गये।४।

*

बाँटा  गया  अनाज  यूँ  दो- चार - दस  किलो

उस पर कहन कि आज से गुरबत के दिन गये।५।…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 30, 2023 at 7:30pm — 2 Comments

नकाबपोश रिश्ते

पैसों के तराजू में अब तुल रहे हैं रिश्ते,

छल कपट के नकाब में पल रहे हैं रिश्ते,

छीन लेते हैं अपने ही हमारी मुस्कान,

दिल के बंद पन्ने अब खोल रहे हैं रिश्ते।



चेहरों पे अब नकाब लगाने का चलन है,

नाप तौल से रिश्ते निभाने का चलन है,

चार दिन की जिंदगी भूल गए हैं सब,

गले लगा कर गला काटने का चलन है।



दिलजलों की महफिल में एहतराम कैसा,

गुम हो रहे रिश्ते, है ये फरमान कैसा,

चांद की चांदनी से चमकते रिश्ते,

स्वार्थ के अंधकार में फिर छिपना…

Continue

Added by Anita Bhatnagar on June 30, 2023 at 7:00pm — No Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

221 2121 1221 212

मदमस्त हम न हों कभी आँखों नमी से हम

सुख दुख रहें खुशी से सदा बन्दगी से हम

हर शख़्स चाहता है ख़ुशी से हो ज़िन्दगी

तस्बीह हो ख़ुदा की बचें हर बदी से हम

हमदर्द बन रहें कभी ज़िन्दा न लाश हों

खुशहाल ज़िन्दगी जियें इन्सान ही से हम

हमको क़सम ख़ुदा की न ज़ालिम का साथ हो

खुशहाल हर कोई कि हर दम नबी से हम

हम भूल कर भी साथ न हों साज़िशों कहीं

जल्लाद हर कहीं हैं…

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Added by Chetan Prakash on June 30, 2023 at 5:06pm — 2 Comments

दोहा - पंचक

आँगन में जब शूल के, हँसते हों नित फूल
अच्छे दिन का आगमन, समझो है अनुकूल।।
*
सुख चलते हों नित्य जब, लेकर टूटे पाँव
रंगत कैसे प्राप्त हो, अभिलाषा के गाँव।।
*
दुख की तपती धूप में, जलते सुख के पाँव
कैसे फिर बोलो मिले, अभिलाषा को छाँव।।
*
गिरकर भी सँभले नहीं, जो भी जन सौ बार
कब ईश्वर भी कर सके, आ उन का उद्धार।।
*
जीया  मीठी  बातकर, जो  जीवन  पर्यन्त
या तो वो शातिर बहुत, या फिर सीधा सन्त।।
*
मौलिक -अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 30, 2023 at 3:42pm — No Comments

ग़ज़ल (जाँ फिर से नुमूदार न हों ग़म के निशाँ और)

2211 -2211 -2211 -22

जाँ फिर से नुमूदार न हों ग़म के निशाँ और 

आ चल कि चलें ढूँडें कोई ऐसा जहाँ और 

दुनिया का सफ़र मुझ पे गिराँ होने लगा है

कहती है मेरी तब्अ' कि ठहरूँ न यहाँ और 

आते हैं नज़र फिर से मुझे पस्ती के इम्कान 

लगता है कि बाक़ी हैं अभी संग-ए-गिराँ और

 

भड़की हुई आतिश न बुझे ख़ून-ए-जिगर से 

इस इश्क़ के दरिया में जले आब-रसाँ और

अब सहरा की लहरें नज़र आती हैं…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 29, 2023 at 7:18pm — No Comments

ग़ज़ल नूर की- चाहें किसी को और निबाहें किसी से हम

.

221 2121 1221 212 



चाहें किसी को और निबाहें किसी से हम

ख़ुश होईये कि हो ही गए आदमी से हम.

.

वो आते इस से क़ब्ल दवा काम कर गई

उकता गए हकीम की चारागरी से हम.

.

दीवार पर लगी हुई तस्वीर है अना

पीछे से झाँकती हुई इक छिपकली से हम.  

.

बन्दों में और ख़ुदा में अजब घालमेल है

हम से ही वो बना है, बने हैं उसी से हम.

.

सूरज नहीं हैं हम जो किसी रात से डरें

लड़ते रहेंगे सुब्ह तलक तीरगी से हम.

.

दुनिया की दौड़…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on June 28, 2023 at 5:00pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . . .

दोहा पंचक . . . .

नारी का कामुक करे, दागदार जब चीर ।

आँखों की प्राचीर से, झर- झर बहता नीर ।।

हार वही जो जीत का, लिख डाले इतिहास ।

तृप्ति संग तृष्णा करे, हरदम प्यासी रास ।।

जीवन मधुबन ही नहीं, इसमें हैं कुछ खार ।

दो पल खुशियों के मिलें, दुख की लगी कतार।।

मन को मन का मिल गया, मन चाहा मन मीत ।

मन के आँगन अवतरित, मन की होती  प्रीत ।।

वो नजरों के पास हैं, या नजरों से दूर ।

दिल के सारे खेल तो, दिल से…

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Added by Sushil Sarna on June 27, 2023 at 6:30pm — 6 Comments

दोहे - मिट्टी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

जीवन दाता ने रचा, जीवन बड़ा अनन्त

मिट्टी से आरम्भ कर, मिट्टी से दे अन्त।१।

*

मिट्टी में उपजे फसल, भरे सभी का पेट

मिले इसी से जिन्दगी, मिट्टी को मत मेट।२।

*

मिट्टी बढ़कर स्वर्ण से, सदा लगाओ भाल

केवल मिट्टी ही यहाँ , सब को सकती पाल।३।

*

जन्म, ब्याह, पूजा, मरण, कर मिट्टी की बात

कहते फिर भी लोग नित, घट मिट्टी की जात।४।

*

मिट्टी को घट बोलकर, रखते स्वर्ण सँभाल

पर मिट्टी को ही चलें, जग में चाल कुचाल।५।

*

करते पंछी पेड़ सब, मिट्टी का…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 25, 2023 at 8:31pm — No Comments

दिया दिखाते सूर्य को...

दिया दिखाते सूर्य को, बनकर वो कवि सूर ।

आखर एक पढ़ा नहीं, महफिल की हैं हूर ।।

बुद्ध ...पड़े ..बेकार ..हैं, जग की रेलम पेल ।

कि गधों के सिर ताज है, चलते उलटी रेल ।।

नवाँकुरों ..के घर हुई, उस्तादों... से रार ।

आज ग़ज़ल प्राईमरी, मीर भी गिरफ्तार ।।

छूट मिली थी जो चचा , उन्हें नहीं दरकार ।

आँखों ..के ...अन्धे हुए, घर के पहरे दार ।।

ज़ुल्म करते रहे अदब, बदल काफिया…

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Added by Chetan Prakash on June 25, 2023 at 9:30am — 1 Comment

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