For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

April 2014 Blog Posts (157)

ग़ज़ल -इक वहीँ से मुकद्दर दिला दीजिए

एक पुरानी ग़ज़ल -

२१२२    १२२१   २२१२

बेकली मेरे दिल की मिटा दीजिए

ऐ मेरे चारागर कुछ दवा दीजिए

 

कुछ तो जज्बात मेरे समझिए जरा

कुछ तो मेरी वफ़ा का सिला दीजिए

 

दिल धुआं है मगर…

Continue

Added by sanju shabdita on April 4, 2014 at 8:27pm — 26 Comments

खुश रहना

 5 हायकु

उदास हम

हो गये हैं फिर से

छले जो गये

मिले वो हमें

जिन्दगी बन कर…

Continue

Added by Akhand Gahmari on April 4, 2014 at 7:13pm — 6 Comments

पूछना उनसे

आँख कान और जुबान की सांकल खुले तो

पूछना उनसे

जिंदाबाद का नारा लगानेवालों में

कितने ज़िंदा थे यकीनन|  

पूछना आँखे खुल जाने के बाद

रोज निगली जाने वाली मक्खियों का स्वाद

पूछना वर्तनी उन गालियों का

जिसके एक छोर पर माँ तो दूसरे छोर पर

अक्सर बहने हुआ करती है|  

मगर मत पूछना जुबान से

उस मांसल देह का स्वाद

जिसकी कन्दराओं में ना जाने

कितनी माँए और बहने दुबकी होती है

मगर एक बार पूछना जरुर

इन सांकलों के खुल…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on April 4, 2014 at 2:00pm — 6 Comments

दिल तो दीवाना हुआ

दिल तो दीवाना हुआ

 

आपका इस घर मे कुछ इस तरह आना हुआ

ऐसा लगता है यह घर है आपका जाना हुआ ।

मुझको तो मालूम न था आप यूं छा जाएँगे

रेशमी ज़ुल्फों मे मुझको , यूं छुपा ले जाएँगे । 

आपकी ज़ुल्फों मे खोये  सुबह का आना हुआ

ऐसा लगता है यह घर है आपका जाना हुआ ।।

आप सावन की घटा हैं, या हैं फागुन की बहार ?

अब गले लग जाइए , मत देखिये यूं बार बार ।

नयन है मदहोश अब  तो प्यार पैमाना  हुआ

ऐसा लगता है यह घर है  आपका…

Continue

Added by S. C. Brahmachari on April 3, 2014 at 8:30pm — 6 Comments

गजल......उड़ रहा मानव नियति आवाक है.......

गजल......

अरकान--2122 2121 212

जिन्दगी की तीव्र गति आवाक है।

सोच कर दिन-रात मति आवाक है।।

बस चुनावी दौर का सुरूर अब,

उड़ रहा मानव नियति आवाक है।

चॉंद छिप कर सोचता वो क्या करे,

बादलों का खौफ रति आवाक है।

पीर के पत्थर पिघल के सो गए,

नग्न पर्वत देख यति आवाक है।

नारि तुलसी-गौतमी औ द्राैपदी,

पूॅूछती हैं प्रश्न पति आवाक है।

घोर कलियुग पाप का आधार जब,

धर्म के पथ पर जयति आवाक…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 3, 2014 at 8:09pm — 6 Comments

गरल (लघुकथा) अन्नपूर्णा बाजपेई

रमीला ने बगल मे बैठी अपनी पड़ोसन से कहा , "तुम्हें पता है खन्ना साहब के बेटे के साथ अल्का की बेटी का चक्कर चल रहा है और तो और कई बार वह रातों को भी घर नहीं आती , मैडम कहती है कि लेट नाइट स्टडीज़ के चलते वह हास्टल मे ही रुक जाती है , बेटी ने कालेज मे ही हास्टल ले रखा है । अरे यहाँ तो किसी को ये जानने की भी फुर्सत नहीं है कि बेटी कहाँ जाती है । " 

रमीला ने आगे कहा," और आज जिस खुशी मे पूजा रखवाई है बेटे की नौकरी के लिए , वह पता है मेरे पति ने सिफ़ारिश करके लगवाई है वरना इनका बेटा तो…

Continue

Added by annapurna bajpai on April 3, 2014 at 6:30pm — 22 Comments

दामन के दाग गजल

बात भी दिल की तुझे हम अब बतायें कैसे

साथ जो हमने बिताये पल भुलायें कैसे

बंद रखना तू न ओठों को बता दे इतना

बात जो दिल पर लिखी तुमने मिटायें कैसे

मौत भी करती रही है वेवफाई मुझसे

पास हम अपने बुलायें तो बुलायें कैसे

आपकी तो चाहतो में खुद जले थे ऐसे

लाश भी कोई हमारी अब जलायें कैसे

खोल कर अपने लबों को तू बता दे यारा

दाग दामन पर लगे हैं वो धुलायें कैसे

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

Added by Akhand Gahmari on April 3, 2014 at 5:17pm — 12 Comments

ग़ज़ल- सारथी || न सोना न चांदी न धन ले गई ||

न सोना न चांदी न धन ले गई 

मुहब्बत मेरी बांकपन ले गई/१  

हजारों फ़रिश्ते गये हारकर 

मेरी जान तो गुलबदन ले गई/२  

नई ताजगी है नई सुब्ह है 

चलो! मौत मेरी थकन ले गई/३ 

न मशहूर होना खुदा के लिए 

समंदर नदी की उफन ले गई/४  

चलो बेच आएं बची रूह को  

गरीबी हमारे बदन ले गई/५ 

न ताक़त रही ज़ोश भी कम गया

शिकस्ते वफ़ा सब अगन ले गई/६ 

लिबासें चमकती रहे इसलिए 

सियासत शहीदी…

Continue

Added by Saarthi Baidyanath on April 3, 2014 at 4:00pm — 27 Comments

मैं कितना झूठा था !!

कितनी सच्ची थी तुम , और मैं कितना झूठा था !!!

 

तुम्हे पसंद नहीं थी सांवली ख़ामोशी !

मैं चाहता कि बचा रहे मेरा सांवलापन चमकीले संक्रमण से !

तब रंगों का अर्थ न तुम जानती थी , न मैं !

 

एक गर्मी की छुट्टियों में -

तुम्हारी आँखों में उतर गया मेरा सांवला रंग !

मेरी चुप्पी थोड़ी तुम जैसी चटक रंग हो गई थी !

 

तुम गुलाबी फ्रोक पहने मेरा रंग अपनी हथेली में भर लेती !

मैं अपने सीने तक पहुँचते तुम्हारे माथे को सहलाता कह उठता…

Continue

Added by Arun Sri on April 3, 2014 at 11:24am — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
रात थी लेकिन अँधेरा उतना भी गहरा न था- ग़ज़ल

2122- 2122- 2122- 212

रात थी लेकिन अँधेरा उतना भी गहरा न था

सब दिखाई दे गया आँखो में जो पर्दा न था

 

झूठ की बुनियाद पर कोई महल बनता नहीं

झूठ आखिर झूठ है उसको तो सच होना न था

 

शोर था सारे जहाँ में इक लहर की बात थी

कोई दा'वा उस लहर का अस्ल में सच्चा न था

 

कहने को तो साथ मेरे कारवाँ था लोग थे

मैं वही था हाँ मगर वो दौर पहले सा न था

 

ये सफर गुज़रा बड़े आराम से तो अब तलक

आखिरश रुकना पड़ा मुझको कि…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2014 at 7:32pm — 28 Comments

सार्थक हस्तक्षेप के कवि: महेंद्रभटनागर - डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय

सार्थक हस्तक्षेप के कवि: महेंद्रभटनागर

—   डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय

      प्रोफे़सर, हिन्दी-विभाग, जयनारायणव्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर

 

 

                                हिम्मत न हारो!

                        कंटकों के बीच मन-पाटल खिलेगा एक दिन!

                                                हिम्मत न हारो!…

Continue

Added by MAHENDRA BHATNAGAR on April 2, 2014 at 10:30am — 3 Comments

ख़वाहिशें...

नन्हीं नन्हीं

ख़वाहिशें जन्मी है

जैसे पतझड़ के बाद

नन्हीं कलियाँ

नन्ही कोपले

 

बड़े आग़ाज़ का

छोटा सा ख़ाका

बड़ी उम्मीदों की

छोटी सी किरन

 

उगने दो इन्हें

पनपने दो

कल की धूप के लिए

इनके साये बनने दो

 

करो तैयारी

खूबसूरत शुरुआत कि

सजाओ बस्ती

अपने जहान कि

के फिर

मौसम ने करवट ली है

फिर क़िस्मत ने दवात दी है

फिर खुशियों ने रहमत की…

Continue

Added by Priyanka singh on April 1, 2014 at 2:32pm — 20 Comments

गजल.....जमाना धूल-गर्दिश का-

गजल.....जमाना धूल-गर्दिश का

बह्र - 1222, 1222, 1222, 1222

इशारों ही इशारों में, इशारे कर रहे हैं हम।

तरफदारी हमारी तो, हजारों मर रहे हैं हम।।

उदारी नीति पावन पर, दिशा हर बार संहारी,

गरीबी भेड़ जैसी बस, कुॅंओं को भर रहे हैं हम।।1

भिड़े हैं शेर-हाथी गर, शिवा-राणा लड़े गॉंधी,

हमें भी देखिये साहब, गधों से डर रहे हैं हम।2

कहानी जब सुनाते हैं, हमें तो नींद आती है,

उड़ा…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 1, 2014 at 10:52am — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तीर दिल पे चलाये छुप के, पर ( ग़ज़ल ) गिरिराज़ भंडारी

2122       1212      112/22

बांट के     छाव,     धूप     पीते   हैं      

ज़िन्दगी  हम…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on April 1, 2014 at 10:30am — 32 Comments

खुशबू के पल भीने से/नवगीत/कल्पना रामानी

रंग चले निज गेह, सिखाकर

मत घबराना जीने से।

जंग छेड़नी है देहों को,

सूरज, धूप, पसीने से।

 

शीत विदा हो गई पलटकर।

लू लपटें हँस रहीं झपटकर।

वनचर कैद हुए खोहों में,

पाखी बैठे नीड़ सिमटकर।

 

सुबह शाम जन लिपट रहे हैं,

तरण ताल के सीने से।

 

तले भुने पकवान दंग हैं।

शायद इनसे लोग तंग हैं।

देख रहे हैं टुकुर-टुकुर वे,

फल, सलाद, रस के प्रसंग हैं।

 

मात मिली भारी वस्त्रों…

Continue

Added by कल्पना रामानी on April 1, 2014 at 10:30am — 16 Comments

अलविदा

संध्या निश्चित है ,

सूर्य अस्ताचल की ओर

है अग्रसर ..

मुझे संदेह नहीं

अपनी भिज्ञता पर

तुम्हारी विस्मरणशीलता के प्रति

फिर भी अपनी बात सुनाता हूँ.

आओ बैठो मेरे पास

जीवन गीत सुनाता हूँ.

डूबेगा व सूरज भी

जो प्रबलता से अभी

है प्रखर .

तुम भूला दोगे मुझे, कल

जैसे मैं था ही नहीं कोई.

सुख के उन्माद में मानो

आने वाली व्यथा ही नहीं कोई.

सत्य का स्वाद तीखा है,

असत्य क्षणिक है,

मैं सत्य सुनाता हूँ…

Continue

Added by Neeraj Neer on April 1, 2014 at 9:24am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
उद्घोष

उद्घोष

(ओ.बी.ओ. की चौथी वर्षगाँठ पर ओ.बी.ओ. परिवार के सभी का अभिनंदन करते हुए)

 

गली-गली पवन चली, किलक उठी कली-कली,
महक उठे पराग बिंद, थिरक उठे अलि-अलि.

 

जाग उठा तमाल वन, जाग उठा है हर चमन,
किसी के आगमन के साथ, जाग उठा है हर सपन.

उम‌ड़ रहे जलद दल, घुमड़ रहे वे हो विकल,
कर रहे उद्घोष सब, ये किसी का जन्म पल.

(मौलिक व अप्रकाशित रचना)

Added by sharadindu mukerji on April 1, 2014 at 1:32am — 6 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अब, जबकि यह लगभग स्पष्ट हो ही चुका है कि OBO की आगे चलने की संभावना नगण्य है और प्रबंधन इसे ऑफलाइन…"
yesterday
amita tiwari posted a blog post

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन…See More
Friday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
" मान्य,सौरभ पांडे जीआशीष यादव जी , , ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह बनाए रखियगा | सौरभ जी ने एक…"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें
"आदरणीया अमिताजी, तार्किकता को शाब्दिक कर तटस्थ सवालों की तर्ज में बाँधा जाना प्रस्तुति को रुचिकर…"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति निखर कर सामने आयी है. सभी शेर के कथ्य सशक्त हैं और बरबस…"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.     करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर…"
Thursday
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय बाग़ी जी एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यगण !बहुत दुखद है कि स्थिथि बंद करने तक आ गयी है. आगे…"
May 13

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
May 13
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
May 11
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
May 11
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
May 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
May 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service