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-::जग मान जरा भव कालहि::-

जग मान जरा भव कालहि! 

’जग’ सागर कै बुल्ला ज्यों, तनिक छुवे मिट जाता है!

अहम ईर्षा लोभ क्षोभ जो, फॅसत निकल नहि पाता है!!

काम-’मान’ घास-पूस सो, यह चिनगी पाय दहकाता है!

मन नहि माने ’जरा’ सुनाये, तब बुध्दि योग उलझाता है!!



गृहस्थ ’भव’ स्वः विदेह जानो, राम नाम गुण गाता है!

केवल इस साधना भक्ति में, सद्गुरू ही पता बताता है!!

मित्र कुटुम्ब ’कालहि’ समान, छिन-छिन भ्रमहि कपट कहिहै!

सत्यम ज्ञान विराग लुटावहिं, जगमा न जरा भव का लहिहै!

सत्यम/मौलिकएवं…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 13, 2013 at 10:58pm — 1 Comment

मुआवजा नहीं मिला

(मौलिक व अप्रकाशित)



आया था मैं

शहर में

खोजने

रोजगार का अवसर

नहीं था गाँव मेँ

दो जून

खाने का सहारा

पाँच बीघा जमीन थी

भेंट चढ गई

सरकारी योजना के

अमले कहकर गये

बङी सङक बनेगी

मुआवजा मिलेगा

सङक बन गई

बहुत अच्छी बनी

चमकती थी

सीसे के जैसी

इंतजार किया

मुआवजे का

नहीं आये अमले

चक्कर काटे

दफ्तरों के

चप्पलें घिस गई

मुआवजा नहीं मिला।



रोटी का सहारा छिना

जमा पूँजी खत्म… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 13, 2013 at 10:51pm — 6 Comments

ओ बी ओ के समस्त साहित्यकारों से विनम्र निवेदन

साथियों, मैं एक शोध पत्र तैयार कर रही हूँ जो आगामी अखिल भारतीय साहित्यकला मंच द्वारा काठमाण्डु (नैपाल) में आयोजित (अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समारोह - 8 जून 2013 से 11 जून, 2013 तक) में पढ़ा जायेगा, इस निमित ओ बी ओ के समस्त साहित्यकारों से विनम्र निवेदन के साथ कहना है कि यदि आप सभी के माध्यम से मुझे विदेशों में रहने वाले भारतीय साहित्यकारों की  सूची, उनके द्वारा सृजित साहित्य, व उनके द्वारा सम्पादित पत्र पत्रिकाओं की सूची उपलब्ध हो सकती हो तो कृपया उपलब्ध करायें, यदि आप…

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Added by asha pandey ojha on March 13, 2013 at 10:30pm — 4 Comments

टूथ-पेस्ट की ट्यूब

टूथ-पेस्ट की ट्यूब

 

और एक दिन ऐसा भी आता है

खूब खूब दबाने से निकलता

चने के दाने बराबर

इत्ता सा टूथ-पेस्ट...

कि बने झाग थोडा सा

मुंह की बदबू दूर हो जाए

मुहलत मिले इतनी कि

शाम खदान से लौटते वक्त

ज़रूर खरीद लाना है

एक नया टूथ-पेस्ट...

 

अगली सुबह

हड़बड़ी में

वाश बेसिन के सामने

ब्रुश उठाते ही हाथ में

दिख जाता वही

पिचका

चिपटा

तुडा-मुडा टूथपेस्ट

मुंह…

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Added by anwar suhail on March 13, 2013 at 9:31pm — 4 Comments

बस यूँ ही.....काश ये हलके होते.....

बस यूँ ही.....काश ये हलके होते.....

 

बचपन के सपने

खुली आँखों के सपने

खुला आकाश 

आज़ाद पंछी

बहुत से उड़ गए

कुछ सफ़र पूरा कर

वापस पलकों पर आ गए 

 

और अब...

बंद आँखों में नींद कंहा

नींद कभी आई तो

सपने…

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Added by pawan amba on March 13, 2013 at 7:43pm — 11 Comments

कर पनीर तैयार (दोहा छंद)

अपनी गलती को प्रिये! मत समझो तुम भार।

दूध फटा तो क्या हुआ, कर पनीर तैयार॥



जीवन का उद्देश्य क्या, मिला हमें क्यों जन्म।

परमपिता को याद कर, करें निरन्तर कर्म॥



घृणा और पर डाह से, हो खुशियों का नाश।

प्रेम और सद्भाव से, मन में भरे प्रकाश॥



प्रेम और विश्वास हैं, दोनों एक समान।

जबरन ये न हो सके, चाहे जाये जान॥



दृश्य बदलते हैं प्रिये! बदलो अपनी दृष्टि।

निज नजरों के दोष से, दोषी दिखती सृष्टि॥



मेरी गलती भूलते, प्रतिदिन ही… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 13, 2013 at 7:30pm — 11 Comments

पाधारो म्हारा देश

पाधारो म्हारा देश, पलक पावणा  बिछा देंगे

तुम जवानों के सिर काट लो, हम चुप नहीं बैठेंगे,कहकर सो जायेंगे



आतंक का नंगा नाच दिखाओ ,भेदिये  जुटा  देंगे  

कोई हमारे सब्र कि परीक्षा ना ले, और हम एक बार फिर फेल हो जायेंगे



खूब रेल जलाओ ,अपहरण करो ,आतंकी रिहा करा देंगे

शोर शराबा किया तो, सम्प्रदाइकता का  आरोप लगा ,ध्यान बटा देंगे…

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Added by Dr Dilip Mittal on March 13, 2013 at 6:30pm — 9 Comments

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें (2)

 चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें (2) की द्वितीय कड़ी में सब अतिथि  blogers का स्वागत है. आप के पर्संसात्मक comments का धन्यवाद यह एक लम्बी काव्या कथा है कृपया बने रहें. कोशिश करूंगा आप को निराश न करूं. यदि रचना बोर करने लगे तो कह देना. मैं दुसरे टॉपिक्स में शिफ्ट हो जाऊंगा.

Dr. Swaran J Omcawr

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें (2)

ज्ञानी



दिग्भ्रमित!…

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Added by Dr. Swaran J. Omcawr on March 13, 2013 at 5:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल "उड़ा न देना कहीं आँख से ये तू पानी"

====== ग़ज़ल========

वो दौर और था जिसमे था आबरू पानी

नहीं उबाल रहा अब के है लहू पानी

नदी में फेंक दिए हमने आज कुछ कंकर

दिखा रहा था मेरा अक्स हू-ब-हू पानी

नया है दौर हुई रस्में यहाँ भाप मगर

उड़ा न…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 13, 2013 at 3:00pm — 8 Comments

बसन्त


सरसों तू क्यों फूली-फूली है, सरसो कि मधुमास रसी!
आमन के बिरवा बौराये गये,फगुआ बयार पगलाये रही।।
पीली-पीली सरसों हरषों ज्यों फगुआ बयार हरहराये रही।
धरती के सूनी आॅचल में बसन्त बनो मुस्कराये रही।।

भौंरे गुंजन कर गाये रहे कलियाॅ-तरूणी इठलाये रही।
पवन मलय मद गंध पिेये,बहकाय तू मस्त झूम रही।।
कोयलिया कूक फिरै वन मा,विरहणियाॅ कन्तन खोज रही।
बगिया फूलन की बेल चढ़ी, पुष्पवाण जियन को भेद रही।।
के पी सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 13, 2013 at 10:17am — 4 Comments

चलो अच्छा हुआ ये भ्रम भी टुटा मेरा ....

चलो अच्छा हुआ ये भ्रम भी टुटा मेरा

वो हमे प्यार करते थे ये झूठ निकला



चलो अच्छा हुआ धोखा जो खा ही लिया

प्यार एतबार से होता है ये भी झूठ निकला 



चलो अच्छा हुआ जो गम ही मेरे दामन में आया 

कोशिश हमेशा कामयाब होती है ये भी झूठ निकला…



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Added by Sonam Saini on March 13, 2013 at 10:08am — 14 Comments

कृष्ण कहाँ तुम मौन (दोहा छंद)

और नहीं कुछ दीजिये,हे! आगत नववर्ष।

मेरा भारत खुश रहे,सदा करे उत्कर्ष॥



ईश अलख लख जायगा,लख अंखिया निर्दोष।

मान बड़ाई ताक रख,ईश दिये संतोष॥



भूमि गगन वायू अनल,और संग में नीर।

अग्र वर्ण भगवान बन,विरचित मनुज शरीर॥



दुर्भागी तुम हो नहीं,मत रोओ हे! तात।

भाग्य सितारे चमकते,गहन अंधेरी रात॥



राम चंद्र के देश में,छाया रावण राज।

रामसिंह ही कर रहे,हरण दामिनी लाज॥



दुखियारी मां भूख से,मांग मधुकरी खाय।

बेटा बसे विदेश मे,खरबपती… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 13, 2013 at 8:49am — 23 Comments

दोहा

दोहा

तुलसी तुलसी सब कहे, दास न कहता कोए!

राम चरित मानस पढ़े, दोनहु परगट होए !!

तुलसी के जस राम हैं, सूर कहें घनशाम !!

राम रामायण दिनकर, सूर सागर सुभान!!

मोल बड़ा अनमोल है, राम चरित के बोल!

घट घट में बस जात है, दया.दान रस घोल!!

मंगल मेरी कामना, जड़. चेतन चित लाय!

मन की ऐसी भावना, मंगल दोष न जाय !!

मंगल मूरति दास की, चित बैठाये राम !

क्षण ही संकट.दोस मिटे, सुमरे जस हनुमान!!

बन बड़वानल उभरे ,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 13, 2013 at 7:30am — 10 Comments

अटक गया विचार

माथे पर सलवटें;

 

आसमान पर जैसे

बादल का टुकड़ा थम गया हो;

समुद्र में

लहरें चलते रूक गयीं हों,

 

कोई ख्याल आकर अटक गया।

 …

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Added by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 7:17am — 18 Comments

रे सजनी तुझ बिन चैन कहाँ !

रे सजनी तुझ बिन चैन कहाँ !

नगर का शोर छोड़ कर ध्याऊ !

जहाँ बजे शंख और ढोल !!

रे सजनी तुझ बिन चैन कहाँ !

प्यार का घर ममता सब छोडूँ !

फसूं मंदिर और दरगाह !!

रे सजनी तुझ बिन चैन कहाँ !

पाहन पूजूं गिरि पर चढ़ि .चढ़ि !

भूखे रहे दिन और रात !!

रे सजनी तुझ बिन चैन कहाँ !

दर .दर ढ़ूं ढ़ूं नगर .सगर में !

ढ़ूं ढ़ूं वन और रेगिस्तान !!

रे सजनी तुझ बिन चैन कहाँ !

‘सत्यम‘शिव मन में ही निहित है !

छोडो द्वेष और अभिमान !!

रे सजनी…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 13, 2013 at 6:56am — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आशंका

ज़िंदगी की राह के किनारे लगी

ऊंचे दरख्तों की झुकी डालें नंगी हैं.

एक बेचैन सन्नाटे को पछाडकर,

मैं, एक खामोश कोलाहल में,

परेशान भटक रहा हूँ.

शायद अकारण ही!

शायद आगे उस मोड़ पर

कोई तूफ़ान मिल जाए;

शायद उन कँटीली झाड़ियों के पीछे

कोई झुरमुट मिल जाए -

पर आह,

मेरे सपनों के गुलमोहर

इन राहों में बिखरे पड़े हैं.

उन्हें कुचल नहीं सकता, बटोर रहा हूँ -

आँसुओं की नमी में पलकर

वे अभी मुरझाए नहीं…

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Added by sharadindu mukerji on March 13, 2013 at 3:30am — 9 Comments

शहरों की चकाचौंध

(मौलिक और अप्रकाशित रचना)



शहरों की चकाचौंध में

फीके पङे गाँव-गुवाङ

नित नये फैशन तले

पिसता युवा समाज

पक्की चौङी सङकें यहाँ

सङकों पर रौशन लाइटें

गाङियों की चिल्ल पोँ में

खोयी घोङा-गाङी आज

ऊँचे-ऊँचे मकान बने हैं

नीचे उनके दुकान बनी हैं

गाँव पलायन करता रहता

शहरों की चकाचौंध में

नहीं जानता वो ये कि

कुछ नहीं ऐसा शहरों में

आकर्षण हो जिसके प्रति

सबसे ज्यादा होता प्रदूषण

शोर-सराबा शहरों में

शान्ति ढूँढते… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 12, 2013 at 10:42pm — 6 Comments

गोधूली वेला

(मौलिक व अप्रकाशित)



गोधूली वेला है

पर

गौ की धूली नहीं

जमाने के विकास तले

खो गयी है कहीं

गौ के खुरों की

गलीयों और

गाँव के ऊपर

उङती धूल

अब तो

नजर आती है

सिर्फ और सिर्फ

मोटरगाङियों के

टायरों की धूली

और

उनका धूम्र

चूल्हों और हारों से

उठता धूम्र भी

गाँवों से

होने लगा है गायब

नजर आता है अब

रसोई में रखा

गैस सिलेण्डर

दूध की कढावणी

और

गाय के लिए

बँटा (गर्म… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 12, 2013 at 9:03pm — 10 Comments

समीक्षा उपन्यास पहचान

समीक्षा: उपन्यास ‘पहचान’

जद्दोजहद पहचान पाने की

-जाहिद खान

किसी भी समाज को गर अच्छी तरह से जानना-पहचाना है, तो साहित्य एक बड़ा माध्यम हो सकता है। साहित्य में जिस तरह से समाज की सूक्ष्म विवेचना होती है, वैसी विवेचना समाजशास्त्रीय अध्ययनों में भी मिलना नामुमकिन है। कोई उपन्यास, कहानी या फिर आत्मकथ्य जिस सहजता और सरलता…

Continue

Added by anwar suhail on March 12, 2013 at 9:00pm — 1 Comment

जय! जय! जय! बजरंग बली!

जय! जय! जय! बजरंग बली!

हे! बजरंगी दया तुम्हारी, सदा राम नाम गुन गाया है!

तेरी ही कृपा से मैंने, प्रभु पाद सरस रस पाया है!! जय.....

तेरे अन्तरमन में ज्यों, सिया राम छवि सुख छाई है!

मन उत्कण्ठा अविकार लिये, मैंने भी अलख जगाई है!! जय.....

कृपा करो हे! पवन पुत्र, फिर वरद तुम्हारा आया है!

तेरी ही कृपा दृष्टि से, यह सम्मान पुनः मिल पाया है!!

जय जय जय बजरंग बली, जय जय जय बजरंग बली!

जय जय जय बजरंग बली, जय जय जय बजरंग बली!!

के’पी’सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 12, 2013 at 6:42pm — 4 Comments

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