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एक गज़लनुमाँ,,,,,,,,,,,,(मसाला)

एक गज़लनुमाँ,,,,,,,,,,,,(मसाला)

===============

कभी पास आनॆ का और, कभी दूर जानॆ का ॥

सलीका अच्छा नहीं मॊहब्बत मॆं तड़फ़ानॆ का ॥१॥



काबिल न थॆ हम तॊ, इनकार कर दॆतॆ हुज़ूर,

फ़ायदा क्या हुआ इतना, अफ़साना बनानॆ का ॥२॥



जिसकॊ चाहा है वॊ, किसी और का हॊ गया,

बता ऎ ज़िन्दगी क्या करूँ, मैं इस ख़ज़ानॆ का ॥३॥



वफ़ा करॆ या जफ़ा  उसकी,तबियत की बात है,

मॆरा तॊ वादा है उससॆ, फ़क्त वादा निभानॆ का ॥४॥



मँहगाई मॆं मॊहब्बत निभायॆ, क्या खाकॆ…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on February 21, 2013 at 4:00am — 20 Comments

गज़ल

जीत कर भी हार जाना होगा,
ऐसा कमाल कर दिखाना होगा |


कुछ गुजरे कुछ गुजर जाएँगे,
लम्हों का अपना अफ्शाना होगा |


रंगे खुशबु जो तलाशते हें बजार,
उन्हें भी गुलसिताँ में आना होगा |


टूटते जुड़ते ख्वाबों सी है जिंदगी,
जिंदगी है, साथ तो निभाना होगा |


अंधेरों में घिरा है सारा आलम,
तुझे भी एक चिराग जलाना होगा |

Added by मोहन बेगोवाल on February 20, 2013 at 11:00pm — 3 Comments

लघुकथा: बड़ा / संजीव 'सलिल'

लघुकथा: बड़ा
*
बरसों की नौकरी के बाद पदोन्नति मिली.

अधिकारी की कुर्सी पर बैठक मैं खुद को सहकर्मियों से ऊँचा मानकर डांट-डपटकर ठीक से काम करने की नसीहत दे घर आया. देखा नन्ही बिटिया कुर्सी पर खड़ी होकर ताली बजाकर कह रही है 'देखो, मैं सबसे अधिक बड़ी हो गयी.'

जमीन पर बैठे सभी बड़े उसे देख हँस रहे हैं. मुझे कार्यालय में सहकर्मियों के चेहरों की मुस्कराहट याद आई और तना हुआ सिर झुक गया.

*****

Added by sanjiv verma 'salil' on February 20, 2013 at 6:30pm — 5 Comments

लघुकथा

निदान

                                    गांव के बाहर मन्दिर में जोर-जोर से शंख और घड़ियाल बज रहे थे। एक सप्ताह से वहां पूजन चल रहा था। अब आरती हो रही थी। पण्डित जी ने आश्वस्त किया था कि नदी के कगार टूटने से गांव पर जो बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था वह इस पूजन से टल जाएगा।

                                    गांव वालों के पास भी कोई रास्ता नहीं था पण्डितजी की बात मानने के सिवा। जिस बात की गारण्टी सरकार नहीं दे सकती उसकी गारण्टी यदि पण्डित दे रहा हो तो बात मानने में क्या बुराई। कगार…

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Added by बृजेश नीरज on February 20, 2013 at 5:30pm — 11 Comments

न हम मंदिर बनाते हैं न हम मस्जिद बनाते

कभी काँटे बिछाते हैं कभी पलकें बिछाते हैं॥

सयाने लोग हैं मतलब से ही रिश्ते बनाते हैं॥

हमारे पास भी हैं ग़म उदासी बेबसी तंगी,

तुम्हें जब देख…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on February 20, 2013 at 4:46pm — 19 Comments

दलाली

दलाली 

जब अफसर के बेटे की एक लड़की से आँख लड़ गई,  

आँखों के जरिये वो दिल मे उतर गई, 

नाम पूछने पर लड़की ने रिश्वत बताया,

लड़के को ठंड मे भी पसीना आया,

हाथ जोड़कर लड़का…

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Added by Dr.Ajay Khare on February 20, 2013 at 3:00pm — 6 Comments

कविता

दरिया के साथ कभी बहता नहीं,

वृक्ष किनारे पे अभिज रहता नहीं ।

तमन्ना है दिये जला करूं रौशनी,

आतिश के शोले मगर सहता नहीं ।

कैसे करें, क्यों करें उस पे यकीं,

मन की बात खुल के कहता नहीं ।

शहर मेरे कैसा मौसम आ…

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Added by मोहन बेगोवाल on February 19, 2013 at 11:30pm — 2 Comments

माँ दुर्गा स्तुति. (मदिरा सवैया)

निर्मित विश्व हुआ तुम से, तुम मात शिवे सगरे जग की,

स्थावर जंगम या लघु हो,तुम मात नियामक हो सब की,

सात्विक प्रकृति साधक पूजत भाव लिए मन  ब्रम्ह सदा,

पूजत साधक  धूमवती  बगला  तुमको  यह  देश  मृदा//  

 

 स्वरचित/अप्रकाशित

Added by Ashok Kumar Raktale on February 19, 2013 at 10:30pm — 5 Comments

"प्रेम के नाम दो शब्द "

घर की रौनक ,

चौधवीं का चाँद हो !

मेरी दुआ .

मेरी फ़रियाद हो  !



तुम्ही मेरी ग़ज़ल ,

तुम्ही मेरी गीत हो !

तुम्ही मेरी हार .

तुम्ही मेरी जीत हो !



मेरी…

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Added by ram shiromani pathak on February 19, 2013 at 10:00pm — 1 Comment

लाल गुलाब और पहली डेटिंग [एक ज्ञान वर्धक कथा }

स्नेहा सिंघानिया मेरी फेसबुक मित्र थी, उनसे फेसबुक पर चैटिंग करते दो बरस बीत गयें थे, वह बहुत ही सकारात्मक व्यक्ति थी, मैं काफी दिनों से उनसे कुछ अच्छा सीखने की उम्मीद कर रहा था और मिलने का आग्रह भी | आज इलाहाबाद का यमुना तट, सरस्वती घाट और हजारो जलती रोशनियां हमारी पहली डेटिंग के गवाह बनने वाले थे | मैं अपनी आदत के मुताबिक तयशुदा समय से पहले ही आ गया था | हेलों पढ़ाकू ! सुनकर मैं चौका, वह इसी नाम से मुझे चैटिंग के दौरान संबोधित करती थी | आवाज की दिशा में मैं मुड़ा तो काले रंग का महंगा सूट…

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Added by ajay yadav on February 19, 2013 at 6:30pm — 9 Comments

कृष्ण -सुदामा मित्रता चित्रण

मित्रों संसार में मित्रता का सबसे बड़ा उदाहरण है कृष्ण और सुदामा की मित्रता का वृत्तांत | उसी करुण मित्रता के दृश्य को एक रचना के माध्यम से लिखने का प्रयास किया है | कृपया आप अवलोकित करें |



एक बार द्वारिका जाकर बाल सखा से मिल कर देखो 

अपने दुःख की करुण कहानी करूणाकर से कह कर देखो ||



हे नाथ ! दशा देखो घर की, दुःख को भी आंसू आयेंगे 

तुम्हरी , मेरी तो बात नहीं बच्चों को क्या समझायेंगे ?

भूखी , नंगी व्याकुलता के दर्शन हैं…

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Added by Manoj Nautiyal on February 19, 2013 at 5:55pm — 3 Comments

"कण -कण के वासी "

हे शिव स्नेह के सागर ,

भर दो प्रेम गागर ,

मोह माया के तम से,

मुक्त कीजै आकर!



बंधनों से मुक्त करो ;

इतनी कृपा कर दो !

मुझे मलिन संसार से ,

अब तो पृथक कर दो !…



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Added by ram shiromani pathak on February 19, 2013 at 3:40pm — 5 Comments

रक्तधार

               रक्तधार

विगत संबंधों से स्पंदन करती   

पुरानी रक्तधार

सूखी नदी-सी सूख चुकी है,

पर मात्र स्मृति किसी एक संबंध की…

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Added by vijay nikore on February 19, 2013 at 1:54pm — 29 Comments

एक गज़लनुमाँ ***तहज़ीब उधार लॆं ....

एक गज़लनुमाँ ***तहज़ीब उधार लॆं



चलॊ किसी सॆ तॊ तहज़ीब उधार लॆं ,

गल्ती अपनी-अपनी हम स्वीकार लॆं !!१!!

दूसरॊं कॆ मकान मॆं झाँकनॆ सॆ…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on February 19, 2013 at 1:30pm — 5 Comments

पापा की लाडली .... मीना पाठक

मै अपने पापा 

की  लाडली 
उनकी ऊँगली 
पकड़   कर 
मचलती इठलाती 
थोड़ी ही दूर चली थी 
कि 
काल चक्र ने 
एक झटके से 
उनके हाथ से 
मेरी ऊँगली छुड़ा दी
 
अब मैं अकेली 
इस निर्जन 
बियावान जंगल 
में 

इधर -…

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Added by Meena Pathak on February 19, 2013 at 1:30pm — 31 Comments

जब उडाये लाल मौसम हो गया///गीत

बसंत के मौसम को समर्पित एक गीत 

अनछुए पल 

मुट्ठियों में घेर कर …

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Added by seema agrawal on February 19, 2013 at 12:30pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सुषुप्त मन में

उफ्फ ये स्वप्न!!

हृदय विदारक

कैसे जन्मा

सुषुप्त मन में ?

रेंगती संवेदनाएं  

कंपकपाएँ

जड़ जमाएं  

भयभीत मन में

अतीत है या

भावी  दर्पण

उथल पुथल है

मन उलझन में

गर…

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Added by rajesh kumari on February 19, 2013 at 10:00am — 24 Comments

द्रोपदी विरह

मित्रों , सुप्रभात | यह रचना है कुरुवंश के दरबार में जब पांडव द्यूत गृह में कौरवों से हार जाते हैं और इस हार जीत के खेल में इतिहास की यह पहली घटना है जब एक नारी को भी दांव पर लगाया जाता है | द्रोपदी को दुशासन खींच कर सभा में ले आता है | और फिर द्रोपदी सभी कुरुवंशी अपने अग्रजों को धिक्कारती है | तो लीजिये यह रचना आपके अवलोकन हेतु ||

++++++++++++++++++++++++++++++++



हे कुरुवंशी राज्यसभा में सम्मानित जन मंच…
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Added by Manoj Nautiyal on February 19, 2013 at 9:37am — 5 Comments

तुम

मैं महसूस करता हूँ

जब भी

अंदर तक बिखरा

तुम्हारे कदमों की आहट

फिर से समेट देती है

मेरा अंर्तमन

चेतनशून्य से

चैतन्यता लौट आती है

मेरे…

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Added by बृजेश नीरज on February 18, 2013 at 11:31pm — 15 Comments

बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी

जब से मजबूरी मेरी बढ़ने लगी

दोस्तों से दूरी भी बनने लगी

 

उनकी हाँ में हाँ मिलाया जब नहीं 

बस मेरी मौजूदगी डसने लगी

 

कद मेरा उस वक्त से बढ़ने लगा

आजमाइस दुनिया जब करने…

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Added by नादिर ख़ान on February 18, 2013 at 10:00pm — 21 Comments

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