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Sheikh Shahzad Usmani's Blog (338)

"उन्नति और प्रत्युत्पन्नमति" (लघुकथा)

महिमा दिखने में अतिसुंदर किंतु मासूम थी। उच्च शिक्षा के बाद उच्च स्तरीय नौकरी हासिल करना उस मध्यमवर्गीय के लिए न तो आसानी से संभव था, न ही असंभव। जब दूसरे सक्षम लोग उसको नियंत्रित या 'स्टिअर' कर मनचाही दिशा देने की कोशिश करते तो उसे लगता कि वह पश्चिमी आधुनिकता की चपेट में आ रही है, कुछ समझौते कर कठपुतली सी बनायी या बनवाई जा रही है। आज वह लैपटॉप पर चैटिंग कर आभासी दुनिया के मशविरे लेने को विवश थी; पिता को सच बताने से डरती थी, किंतु 'सहेली सी' मां को भी तो सब कुछ उसने नहीं बताया था! हालांकि…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 19, 2018 at 2:49am — 4 Comments

"असली पहचान : नई सदी, नई मुसीबतें" (लघुकथा)

"लगता है वाक़ई बहुत गड़बड़ हो गई। कुछ ज़्यादा ही नेक साहित्य पढ़ ऊल-जलूल उसूल बना कर उलझन में डाल दिया अपनी इस शख़्सियत को!" एक मुशायरे में शामिल होने के लिए मिर्ज़ा साहिब सूटकेस जमाते हुए पिछले अनुभवों से 'सबक़' सीखने की कोशिश कर रहे थे; आजकल के हालात के हिसाब से अपने कुछ फैसले वे बदलने की सोच रहे थे।

"उस दाढ़ी वाले मुल्लाजी को रोक कर ज़रा उसकी तलाशी तो लो!" उनके पिछले अनुभव की पुनरावृत्ति करते हुए देर रात ग़श्त लगाते हुए एक पुलिस वाले ने अपने साथी को निर्देश दिया था पिछली दफ़े। मिर्ज़ा जी को आवाज़…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 17, 2018 at 5:00pm — 1 Comment

"आया ...आया ... गया!" (लघुकथा)

"लो! एक और गया! .. बह गया बेचारा!"



"वो देखो! एक तो अब आ गया न!" आशावादी दृष्टिकोण वाले युवक ने तेज बहाव वाले जलप्रपात के किनारे वाली चट्टान पर खड़ी भीड़ से आसमान की ओर देखते हुए कहा। रेस्क्यू ऑपरेशन में भेजे गये इकलौते चॉपर हेलिकॉप्टर से लगभग चालीस लोगों को जलसमाधि से बचाना था। घने काले बादलों के अंधकार और रुक-रुक कर हो रही बारिश को झेलते हुए रेस्क्यू दल-सदस्य 'रस्सी की सीढ़ी' से पार्वती नदी के बीच चट्टान में फंसे चार-पांच युवाओं को ही बचाने में सफल हुए। क़रीब तीन सौ मीटर दूर किनारे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 15, 2018 at 10:30pm — 4 Comments

'तोप, बारूद और तोपची' (लघुकथा)

"अरे, भाबीजी तुम तो अब भी घर पर ही जमी हो!" मोती ने बड़े ताअज्जुब से कहा - "ऊ दिना तो तुम बड़ी-बड़ी बातें फैंक रईं थीं कि अब नईं रहने इते हाउस-वाइफ़ बनके; बहोत सह लई!"



"तो का अकेलेइ कऊं भग जाते! ई मुटिया को न तो कोनऊ फ़ादर है, न गोडफ़ादर.. कोनऊ लवर या फिरेंड मिलवे को तो सवालइ नईये, मोती बाबू!"



"तुम तो कैरईं थीं कि पड़ोसन के घरे झांक-झांक के दुबले-पतले होवे की कसरतें सीख लईं तुमने और डाइटिंग करवा रये थे मुन्ना भाइसाब तुमें!"



"दुबरो करावे को उनको मकसद दूसरो हतो!…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 11, 2018 at 6:30am — 5 Comments

'आदी की चादर' (छंदमुक्त, अतुकांत कविता)

मां, गुजराती चादर दे दे!

मैं 'फ़ादर' सा बन जाऊं!

जनता अपने राष्ट्र की

स्वामियों, बापुओं सा आदर दे दे!

अंग्रेज़ों सा व्यापारी बन कर,

तोड़ूं-फोड़ूं और मारूं-काटूं

विदेशी सूट पहन इतराऊं!

मां किसी 'गांधी' सी 'चादर' ओढ़ाकर

तस्वीरें, मूर्तियाँ मेरी सजवादे

मैं भी जिंदा लीजेंड, किंवदंती कहलाऊं!

मुग़ल, अंग्रेज़, हिटलर, कट्टर

सब से शिक्षायें ले लेकर

आतंक कर आतंकी न कहलाऊं !

मां 'धर्म' की बरसाती दे दे

बदनामियों सा न भीग जाऊं!

मां…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 9, 2018 at 6:38am — 8 Comments

'करुणा-सन्निधि' (लघुकथा)

आधुनिक भारत के आधुनिक शहर की आधुनिक सड़कों पर एक बार फिर भावुक और अहसानमंद भीड़ एकत्रित थी। आम आदमी तो भीड़ में थे ही, नेता-अभिनेता और मीडिया भी था। कुछ करुणाद्र थे, कुछ कृतज्ञ और कुछ समर्थक या पूजक और कुछ अवसरवादी ढोंगी समर्थक भी थे! दृश्य बेहद करुणामय था। कुछ तो रोये ही जा रहे थे अपने प्रिय व्यक्तित्व या आका के स्वास्थ्य और जीवन संबंधित शुभकामनाओं और प्रार्थनाओं के साथ। जबकि कुछ ऐच्छिक समाचार सुनने की प्रतीक्षा में थे।



"समर्थकों, उपासकों, अहसानमंदों और अवसरवादियों की मिली-जुली…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 8, 2018 at 12:22am — 7 Comments

'अभिव्यक्ति की आज़ादी' (लघुकथा)

"ए ऑटो वाले भैया! 'दिन्नू' तक के क्या लोगे?"



"..द..द..दिन्नू?"



"हां, भय्या 'दीनू जंक्शन'! मतलब नये नाम वाले 'डीडू यानि कि 'डीडीयू'!"



"पढ़ी-लिखी तो लगती हो आप! पूरा सही नाम 'दीनदयाल उपाध्याय' क्यों नहीं बोल पा रहीं? हम तो वहीं के चक्कर लगाते हैं न! आइए बैठिये; दस रुपये यहां से, बस!"



"भैया, पूरा नाम तो भाषण देने वाले ही कह पायेंगे! हमारे पास इतना टाइम कहां?"



"तो 'दीनसराय' कहो या फिर 'मुगलसराय' ही कहती रहो न! इसके लिए तो टाइम भी है…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 6, 2018 at 2:00am — 9 Comments

'बेटी फंसाओ या बचाओ?' (लघुकथा)

"अरे रुको! तुम हमारी मिहनत को यूं बरबाद नहीं कर सकते! हटाओ अपनी ये झाड़ू! रोको अपना खोखला मिशन!" अपने माथे की ओर की अपनी डोर में टपकती मकड़ी की चुनौती सुनकर भय्यन के हाथ से मकड़जाल की ओर जाती झाड़ू डंडे सहित नीचे गिर पड़ी।



"न तो तुम जैसे आम आदमी हमारे शिकारों को बचा सकते हो, न ही तुम्हारे तथाकथित सेवक और सरकारी या प्राइवेट रक्षक! सबको भक्षक और ग्राहक बनाना हमें बाख़ूबी आता है, समझे!" उस बड़ी सी मकड़ी ने मकड़जाल में फंसे और तड़पते 'बड़े से कीड़े' को देखते हुए भय्यन से कहा - "हमारी पहुंच और…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 5, 2018 at 9:05am — 4 Comments

'किकी-डांस चैलेंज' (लघुकथा)

"हैल्लउ! हाउ आs..यू? कैसे हैं जनाब?"



"फाइन! रॉकिंग!".. और आप सब ! कैसा लगता है अब विदेश में?"



"क्वाइट गुड! बट बेटर देन इंडिया! कुछ एक बातें तो 'अनकॉमन और पॉज़िटिव' हैं, लेकिन हम जैसे भावुक भारतीयों के लिए अधिकतर बातें 'कॉमन और निगेटिव' ही हैं पैसे, स्वार्थों की होड़ और 'तकनीक व ग्लोबलाइज़ेशन' की दौड़ में !"



"मतलब तुम सब भी हमारी तरह विदेश में भी ज़माने के साथ नाच ही रहे हो न!"



"हां, यही कह लो! लेकिन अंतर तो है! हम यहां सेहत और सुव्यवस्था के साथ…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 4, 2018 at 12:30am — 6 Comments

"दिलवाली अब किस की? (लघुकथा)

"अपनी तो बहुत ख़ैर-ख़बर हो गई! चलो, अब सुनें, वो दिलवाली का कहिन?" बिहार ने एक-दूसरे के हालात-ए-हाज़रा सुनने-सुनाने के बाद यूपी से कहा।



"दिलवाली! ... अच्छा वोss ... जो अपने को दिलवाली कहती रही? अब कहां रही वैसी!" व्यंग्यात्मक लहज़े में यूपी ने अपना रंगीन गमछा लहरा कर कहा।



"अपन दोनों से तो बेहतर ही है! खलबली और हड़बड़ी तो सब जगह है!" मुल्क के नक्शे पर राजधानी पर दृष्टिपात करते हुए बिहार ने कहा - "दिल तो उसका वाकई पहले से भी बड़ा हो गया है! न जाने कितने किस्म के दवाब, अन्याय…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 3, 2018 at 12:00am — 3 Comments

ऊपरवालों से गठजोड़ - (लघुकथा)

"जो भी हो रहा है, हमारे पक्ष में अच्छा ही हो रहा है! बस, थिंक पॉज़िटिव! तीखे बयानों, वायरल अफ़वाहों और चुनौतियों से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है!" एक वरिष्ठ ज़िम्मेदार नेता ने गोपनीय सभा में अपने साथियों से कहा - "अपने पक्ष में लहर बरकरार रखने के लिए विरोधी दलों की सत्ता वाले इलाक़ों में बदलते हालात पर गिद्धों जैसी नज़र रखो! सदैव अलर्ट रहो और हर अवसर को पकड़ कर अपने दल के पक्ष में बस तुरंत ही कुछ पॉज़िटिव सा करते रहो साम-दाम-दंड-भेद और चाणक्य जैसी नीतियों के साथ! पुलिस से भी डरने की ज़रूरत नहीं है,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 30, 2018 at 4:30am — 9 Comments

'अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय (अतुकांत कविता)

सबको तो

डस रहे हैं, फंस रहे हैं

असरदार या बेअसर?

नकली या असली?

देशी, विदेशी या एनआरआई?

मुंह में सांप

हाथों में सांप

बदन में सांप

गले पड़े सांप

सिर पर सांप

सांपों के तालाबों से!

मानव समाज में

शब्दों, जुमलों, नारों,

फैशन, गहने या हथियार रूपेण!

या प्रतिशोध लक्षित

मानव-बम सम!

पर कितना असर

जनता पर, सरकार पर?

केवल घायल लोकतंत्र

सपेरों के मंत्र

यंत्र, इंटरनेट

और सोशल मीडिया!

पनीले या…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 22, 2018 at 12:00pm — 2 Comments

रिलेशनशिप (लघुकथा)

"मां, मुझे क्षमा कर दो और घर चलो!"

"क्षमा क्यों? तुमने भी वही किया जो सभी मर्द ऐसे हालात में करते हैं! ... यह बात और है कि तुम इतनी कम उम्र में पूरे पुरूष बन गये और एक विधवा पर वैसे ही बोलों के पत्थर फैंकने लगे!"

"लेकिन मेरे बड़े भाई ने हमेशा तुम्हारा ख़्याल रखा, तुम्हारा ही बचाव किया न!"…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 21, 2018 at 11:30pm — 8 Comments

जनता जस-की-तस! (छंदमुक्त/अतुकांत कविता)

विश्वास-अविश्वास की बहस

जगहंसाई के रहस्य

फ़िल्मी रस

लोकतंत्र को डस

संस्कार तहस-नहस

रो ले , सो ले या बस हंस!

जनता जस-की-तस!

*

अचरज ही अचरज

वर्षों पुराना मरज़

डीलें संवेदनशील

अपनों को बस लील

ग़रीबों पर तरस

धन अमीरों पर बरस

फ़िल्मी रस

व्यवस्था तहस-नहस!

मतदाता जस-का-तस!

*

राज़ों का संत्रास

हिलते स्तंभों के आभास

धर्म-गुरुओं के दास

बदले राजनीति के अंदाज़

जनता पर ग़ाज़

गप्पों की झप्पी

विवादों की…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 20, 2018 at 7:58pm — 8 Comments

'स्वावलंबन, भारतीयता या आज़ादी' (लघुकथा)

अपने इस मुकाम पर वह अब अपनी डायरी और फोटो-एलबम के पन्ने पलट कर आत्मावलोकन कर रही थी।

"सांस्कृतिक परंपरागत रस्म-ओ-रिवाज़ों को निबाहती हुई मैं सलवार-कुर्ते-दुपट्टे से जींस-टॉप के फैशन की चपेट में आई और फिर आधुनिक कसी पोशाकों को अपनाती हुई वाटर-पार्क व स्वीमिंगपूलों के लुत्फ़ लेती हुई अत्याधुनिक स्वीमिंग सूट तक पहुंच ही गई!" तारीख़ों पर नज़रें दौड़ाती हुई एक आह सी भरती हुई उसने अपनी आपबीती पर ग़ौर फ़रमाते हुए अपने आप से कहा - "ओह, धन-दौलत और नाम कमाने की लालच में फैशनों का अंधानुकरण…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 14, 2018 at 7:27pm — 8 Comments

'दो सितारों का मिलन' (लघुकथा)

"हैलो! आदाब! ठीक तो हैं न! कहां तक पहुंच गईं आप? ज़रा अपनी घड़ी साहिबा पर भी इक नज़र तो डालियेगा!" शायर 'राज़' साहिब ने साहित्यिक सम्मेलन परिसर के मुख्य द्वार पर अगली सिगरेट का अगला लम्बा कश लेते हुए मोबाइल फ़ोन पर एक बार में ये सवाल दाग़ दिये!



"आदाब राज़ साहिब! मैं वहीं हूं अपनी क़लम संग, जहां मुझे इस वक़्त होना चाहिए!" दूसरी तरफ़ से चिर-परिचित सुरीली आवाज़ में सोशल मीडिया की आभासी सहेली शायरा शबाना ने आश्चर्य-मिश्रित लहज़े में कहा - "माना कि आप घड़ी नहीं पहनते, लेकिन अपने मोबाइल पर मेरे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 8, 2018 at 9:19pm — 6 Comments

'गुड टाइम, बैड टाइम' (लघुकथा)

"अब तो बता दो कि 'गुड टेररिज़्म (आतंकवाद)' और 'बैड टेररिज़्म' में वाक़ई क्या फ़र्क है?" एक धर्मावलंबी ने कहा।



"वही फ़र्क है न, जो इंसां की ज़िन्दगी में 'गुड टाइम' और 'बैड टाइम' में है; जो 'गुड ह्यूमन' और 'बैड ह्यूमन' के बीच में है!" दूसरे ने जवाब दिया।



"जी नहीं, अंतर वही है, जो 'गुड ह्यूमन' के 'बैड टाइम' और 'बैड ह्यूमन' के 'गुड टाइम' के बीच में है!" एक हारे हुए परेशां शिक्षित बेरोज़गार ने अपनी पथराई आंखों से दो बूंदे टपकाते हुए कहा - "नासमझी या दुर्भाग्य से 'गुड टाइम' किसी…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 7, 2018 at 6:30pm — 2 Comments

'समय तू ढर्रे-ढर्रे मत चल' (लघुकथा)

"मैं ... मैं समय हूँ!"



"चुप कर यह "मैं .. मैं" ! मालूम है कि तू समय है और इस सृष्टि का सब कुछ मय समय है तय समय में!" विज्ञान और तकनीक ने एक स्वर में व्यंग्य किया।



"लेकिन तू कितनी भी फुर्ती से कहीं से भी फिसल ले, तुझे अपनी हथेली में किसी कठपुतली की तरह नचा सकते हैं हम, भले मुट्ठी में तुझे क़ैद न कर सकें, समझे!" 'तकनीक' ने 'विज्ञान' के कंधों पर टांगें पसारते हुए आगे की तरफ़ क़दमताल कर अपनी हथेली दिखा कर पलटाते हुए कहा।



"इतने आत्ममुग्ध मत हो! जीत-हार,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 6, 2018 at 9:59am — 5 Comments

सोज़-ए-शहर (लघुकथा)

"इन दरख़्तों के टुकड़े हज़ार हुए कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा; कोई यहां गया, कोई वहां गया !" कटे हुए पेड़ों के शेष ठूंठों और उनकी कराहती जड़ों की ओर निहारते हुए पड़ोसी पेड़ अपनी शाखाओं का रुख़ ज़मीं की ओर करते हुए एक फ़िल्मी नग़में की तर्ज़ पर शोक-गीत गाने लगे।



"ये शहादत खाली नहीं जायेगी! दिल्ली की खिल्ली उड़वा रहे हैं दुनिया में शेख़ चिल्ली!" पास के एक ऊंचे से पेड़ ने अपना अंतिम अट्टाहास करते हुए कहा।



"नये दरख़्त कितने भी कहीं भी लगवा लें, न तो उनके बीज और जड़ों की वह गुणवत्ता…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 28, 2018 at 6:30am — 9 Comments

'नाम के काम, नाम से काम' (अतुकांत कविता)/ छंद-मुक्त कविता

विकास के नाम पर

व्यापार के दाम पर,

धनाढ्य, नेता, मंत्री,

बाबाजी सब काम पर!

इंसानियत होम कर,

अनुलोम-विलोम सा

हेर-फेर कर!

बच्चों, नारी,

ग़रीब, किसान

घेर कर!

पड़ोसियों से बैर कर,

रिश्ते-नातों को

तजकर, बेच कर!

या रिश्तों के नाम

जाम, दाम, नाम

लगाकर,

दूर के आभासी

अनजाने से

रिश्ते थाम कर,

मर्यादाओं को लांघ कर,

मानव-अंग उघाड़ कर,

येन-केन-प्रकारेण

अंग-निर्वस्त्रीकरण कर,

निज-स्वतंत्रता,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 27, 2018 at 6:00am — 2 Comments

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