2122- 2122- 2122
दिल से निकले वो तराना चाहता हूँ
इक मसर्रत का फसाना चाहता हूँ (मसर्रत =खुशी)
देख कर मुझको छलक जायें न आँसू
तेरी खातिर मुस्कुराना चाहता हूँ
जी लिया मैंने बहुत बचते हुये अब
मुश्किलों को आजमाना चाहता हूँ
बेझिझक मै पत्थरों के शह्र जाके
उनको आईना दिखाना चाहता हूँ
सुब्ह की चुभती हुई इस धूप को मैं
अपनी आँखों से हटाना चाहता हूँ
हर…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on March 21, 2014 at 6:30pm — 28 Comments
2122- 2122- 212
जब से तेरी जुस्तजू होने लगी (जुस्तजू=तलाश)
अजनबी सी मुझसे तू होने लगी
वक्त का होने लगा है वो असर
अब महक फूलों की बू होने लगी
भागता था जिस बला से दूर मैं
हर तरफ वो रू-ब-रू होने लगी
मुस्तकिल ये ज़िन्दगी होती नहीं (मुस्तकिल= स्थाई)
क्यूँ इसी की आरज़ू होने लगी
उम्र के फटने लगे हैं अब लिबास
सो दवाओं से रफ़ू होने लगी
नफरतें ही…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on March 17, 2014 at 7:58am — 16 Comments
2122/ 2122/ 2122/ 212
कातिलों के शह्र में अहले जिगर आते नहीं
भीड़ से होकर परे चहरे नज़र आते नहीं
मेरे चारों ओर किस्मत ने बना दी बाड़ सी
हाल ये है अब परिन्दे तक इधर आते नहीं
वक्त सा होने लगा है दोस्तों का अब मिजाज़
गर चले जायें तो वापस लौटकर आते नहीं
ज़ीस्त के कुछ रास्तों पे तन्हा चलना ठीक है
क्यूँकि अक्सर साथ अपने राहबर आते नहीं
नक्शे-माज़ी देखने को आते तो हैं रोज़-रोज़
खण्डहर…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on March 10, 2014 at 9:00am — 30 Comments
तेलंगाना पे भिड़े, अपनी मुट्ठी तान।
अपने भारत देश की, लगी दाँव पे आन।।
कोई तोड़े काँच को, पत्र लिया जो छीन।
आगे पीछे भैंस के, बजा रहे हैं बीन।।
मिर्चें लेकर हाथ में, करे आँख में वार।
मानवता इस हाल पे, अश्रु बहाये चार।।
हिस्सा जाता देख कर, हुये क्रोध से लाल।
बरसीं गंदी गालियाँ, ये संसद का हाल।।
चढ़ा करेला नीम पर, अपनी छाती ठोक।
शक्ति संग सत्ता मिली, रोक सके तो रोक।।
(मौलिक व…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on March 5, 2014 at 8:00am — 20 Comments
पढ़े लिखे कुछ लोग भी, दे हैरत में डाल।
बेटी भी औलाद है, फिर क्यूँ करे बवाल।।
इतनी छोटी बात भी, समझे ना इंसान।
बेटी जन्में पुत्र को, रखते कुछ तो मान।।
बेटी मेरा खून है, बेटी मेरी जान।
बेटी से ये सृष्टि है, बेटी से इंसान।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
Added by शिज्जु "शकूर" on February 22, 2014 at 5:30pm — 14 Comments
1222/1222/1222/1222
अरे नादान ये मय है जिगर को ये जला ही दे
मेरे इस दर्दे दिल के वास्ते कोई दवा ही दे
कभी जब खींच ले जाये समंदर साथ अपने तो
गुज़रती मौज कश्ती को किनारे पर लगा ही दे
तेरी आँखों में मेरे दर्द की तासीर है शायद (तासीर= असर)
उदासी भी तेरी इस बात की पैहम गवाही दे (पैहम= लगातार)
इरादों को किया मजबूत तेरे पत्थरों ने ही
तेरा हर वार मेरा हौसला आखिर बढ़ा ही दे
बचूँगा कब…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on February 18, 2014 at 7:30am — 19 Comments
इक गुलदस्ते की तरह, सजा हमारा देश।
तरह-तरह के लोग हैं, तरह-तरह के वेश।।
जाति धर्म के फेर में, उलझ गया इंसान।
प्रेम शांति का मार्ग है, सत्य यही लो जान।।
तुम अपनी पूजा करो, औ मैं पढ़ूँ नमाज।
बस इतना ही फर्क है, अपना एक समाज।।
मक्कारी औ झूठ से, जो ना आये बाज।
उसकी भाषा लो समझ, पहचानो आवाज।।
(मौलिक व अप्रकाशित)* संशोधित
Added by शिज्जु "शकूर" on February 12, 2014 at 9:30pm — 22 Comments
दोहे लिखने की मेरी पहली कोशिश है
घूम - घूम के देश मे, बाँट रहा है ज्ञान।
बातें कड़वी बोलता, सत्य उसे ना मान।।
अपना सीना तान के, करे शब्द से वार।
अन्धे उसके भक्त हैं, करते जय जयकार।।
बाँटे अपने देश को, लेके प्रभु का नाम।
उसको आता है यही, अधर्म का ही काम।।
यही देश का भाग है, यही देश का सत्य।
कोई आगे आय ना, नाग करे सो नृत्य।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
संशोधन के पश्चात पुनः दोहे…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on February 2, 2014 at 10:30pm — 16 Comments
212 212 212 212
चंद यादें ग़ज़ल बन किताबों में हैं
हसरतें तेरी ही इन निगाहों में हैं
कुर्बतें वो तबस्सुम तेरी शोखियाँ
बस यही साअतें मेरी यादों में हैं
अपने आँचल से तूने हवा दी जिन्हें
वो शरारे हरिक सिम्त राहों में हैं
जो सिवा अपने सोचें किसी और की
अज़्मतें इतनी क्या हुक्मरानों में हैं
कुछ खबर ले कोई आके इनकी ज़रा
कितनी बेचैनियाँ ग़म के मारों में हैं
साअत= क्षण,…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on February 1, 2014 at 3:45pm — 30 Comments
212/ 212/ 212/ 212
पास लाई हमें जाने कब दूरियाँ
ये लगे है कि मिट जाये अब दूरियाँ
चाँदनी भी है कंदील भी हाथ में
फिर भी क्यूँ रौशनी से अजब दूरियाँ
याद आती रहे आपको मेरी तो
मैं कहूँ है बहुत मुस्तहब दूरियाँ
मुझको शिकवा न तुझको शिकायत कोई
दरमियाँ क्यूँ ये फिर बेसबब दूरियाँ
मेरी अफ़्सुर्दगी को बढ़ाये बहुत …
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 28, 2014 at 8:30am — 13 Comments
221 2122 221 2122
शब्दों में पत्थरों को भर मारने की आदत
यूँ बेवजह तुम्हे ठोकर मारने की आदत
हमने मुहब्बतों में झेले सितम हज़ारों
दीवार पे हमें है सर मारने की आदत
ईमानो हक की बातें हैं करते आज वे ही
जिनको है भीड़ में छुप कर मारने की आदत
हालात दर्द को पैहम यूँ बढ़ाये उसपे
ऐ हुक्मराँ तेरी नश्तर मारने की आदत
उड़ना जिन्हे है वो उड़ ही जाते हैं परिन्दे
उनको नही ज़मीं पे पर मारने की…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 26, 2014 at 3:30pm — 26 Comments
क्या कहूँ साथ अपने वो क्या ले गई
आँधी थी सायबाँ ही उड़ा ले गई
मैंने बस एक ही गाम उठाया मुझे
रहनुमा बन के तेरी दुआ ले गई
काम आये सितारे अँधेरो में रात
जब चिरागों की लौ को हवा ले गई
मुझको लहरों से क्यूँ हो शिकायत भला
गल्तियों को मेरी वो बहा ले गई
जीने की कोशिशें उसकी बेजा नहीं
क्या हुआ गर खुशी वो चुरा ले गई
रात के ख़्वाब बाकी थे आँखों में कुछ
सुब्ह की बेरहम धूप उठा ले…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 18, 2014 at 7:35pm — 21 Comments
लोग कहते हैं
ज़माना बदल गया
मै कहता हूँ-
फ़क़त चेहरे बदले हैं,
व्यक्ति परक समाज तब भी था
अब भी है,
रियासतों,
शाही आनो-शान के बीच,
इंसानों के लहू से लिखी गई,
इतिहास की इबारत,
जो आज भी सुर्ख़ है
नाम बदले
मगर हालात न बदले
हुक्मरान बदले
मगर
जनता पहले भी ग़ुलाम थी
अब भी ग़ुलाम है
अंग्रेज़ों के पहले भी
अंग्रेज़ों के बाद भी
बेबसी ने ग़ुलाम…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 16, 2014 at 8:30pm — 12 Comments
2122 1122 22/112
तिश्नगी में न सराबों में है
ताब जो मेरे इरादों में है
चहचहाते हुये पंछी ये कहें
ज़िन्दगी अब भी खराबों में है
ध्यान से पहले सुनो फिर समझो
क्या हकीकत मेरे दावों में है
बादलों की ये शरारत है जो
चाँद का नूर हिजाबों में है
अब तलक तेरी ज़ुबाँ पे थी वो
बात अब मेरे सवालों में है
काम आयेगी अकीदत आखिर
ऐसी तासीर दुआओं में है
ताब=…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 10, 2014 at 8:28pm — 22 Comments
मिसरा-तरह //आखिर तुमने अपना ही नुकसान किया // पर आधारित एक तरही ग़ज़ल
22- 22- 22- 22- 22- 2
सच्चाई को जब अपना ईमान किया
सारी दुनिया को उसने हैरान किया
मुल्क़परस्ती का जज़्बा अब आम नहीं
किसने अपना सब यूँ ही क़ुर्बान किया
चुन-चुन के ग़ज़लों को बाँधा तुमने यूँ
बिखरे औराक़ सहेजे, दीवान किया
छोटी- छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढी
अपने छोटे से घर को ऐवान किया
मायूस हुआ तेरी तीखी…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 6, 2014 at 9:00am — 34 Comments
मेरे खोये हुये लम्हात के ग़म को,
हकीकत के सीने में दफ़्न,
कुछ इच्छाओं की
उन धुँधली यादों को,
मेरे सपनों की लाशों को,
अब तक ढो रहा हूँ मैं…
कई दफे
ज़िन्दगी करीब से गुज़री,
मगर,
मैं ही जी न पाया..
आज मुझे लगता है
मैंने बहुत कुछ खो दिया,
पहले जो खोया है..
उसे याद कर,
और फिर,
उन्हीं यादों में खोकर,
एक लम्बा सफर तय किया,
मगर,
आज मुझे लगा
कि मैं…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 3, 2014 at 11:07am — 38 Comments
सूखे पत्तों के ढेर में
उम्मीद का
एक अंकुर फूटा
सूखे पत्ते मानो,
लाशें हैं
लाश हारे हुये लोगों की
लाश,
पराधीनता को किस्मत समझ
डर-डर के जीने वालों की
वो अंकुर है
भाग्योदय का
कीचड़ में उतर
परजीवियों को
साफ कर
समाज से
बीमारी हटाने वालों का
जो एक ज़र्रा था कल तक
आज
ज़माना उसकी चमक देख रहा है
अपनी नन्हीं आँखें खोल
मानो, कह रहा…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on December 30, 2013 at 10:52am — 32 Comments
2122 1122 22/112
आँधी से उजड़ा शजर लगता है
वो बुलन्द अब भी मगर लगता है
सिर्फ किरदार नये हैं उसके
इक पुराना वो समर लगता है
बेकरानी में कहीं गुम शायद
इक बियाबान में घर लगता है
वो कहीं शिद्दते- तूफ़ाँ तो नही
रास्ता छोड़ अगर लगता है
पत्थरों को जो मुजस्सम करे वो
तेरे हाथों में हुनर लगता है
काँच का दिल है ज़बाँ पे पत्थर
बच के जाऊँ मुझे डर लगता…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on December 26, 2013 at 12:00pm — 34 Comments
“एक पोता भी नही दे सकी कलमुंही” वार्ड में सास की आवाज़ गूँजी,
इतने में अंदर आते हुये डॉक्टर ने जब ये सुना तो कहा- “पति के शरीर में एक्स- वाई(X-Y) क्रोमोसोम्स होते हैं, पत्नि के शरीर में एक्स-एक्स(X-X) क्रोमोसोम्स होते हैं, पति का वाई(Y) क्रोमोसोम पत्नि के एक्स(X) क्रोमोसोम से मिलता है तो बेटा होता है, पति का एक्स(X) क्रोमोसोम पत्नि के एक्स(X) क्रोमोसोम से मिलता है तो बेटी होती है l
पता नही आपके क्या समझ में आया? लेकिन इतना सच जान लीजिये आपको पोता नही मिला उसका पूरा…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on December 24, 2013 at 10:30am — 38 Comments
दिन भर के सफर का
थका हुआ सूरज, मानो..
ज़मीं की सेज़ पर,
लहरों के झूले में,
चाँदनी की चादर ओढ़े
सबकुछ भूल के,
सोने जा रहा हो,
लहराते हुये लहरो में,
मानो,
कह रहा है
मेरे दोस्तो
विदा, फिर मिलेंगे सुबह...
मैं चला
होती है रात विश्राम को,
थकान मिटाने को,
चलें सफर में
रात के साथ...
पिछला ग़म भुलाने को
चलो
सुबह एक नई शुरूआत करेंगे
-मौलिक व…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on December 18, 2013 at 10:30am — 17 Comments
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