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All Blog Posts (19,174)

आज देखा हमने तिरंगे का बस दो रंग अपने चेहरे पर !

क्यों संसद खामोश और ट्विट्टर चिल्ला रहा ,


क्या बदनसीबी थी हमारी,
हमारा ही रोकेट, हमारे ही घर को जला गया कहीं !


100 मेडल्स जीते हमने इस बार पर,
100 करोड़ की कीमत चूका गया कोई !


ये कैसी विकास गंगा बहा दी अपने देश मे ,
अपने ही लोगो का खून सूखा गया कोई !


ये कैसी छाई है…
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Added by Sujit Kumar Lucky on January 26, 2011 at 9:30am — 6 Comments

जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

हर रुख से चली यूं तो हवा अपने वतन में

सावन कभी पतझड़ न बना अपने वतन में

 

साज़िश तो बहुत रचते रहे अम्न के दुश्मन...

रिश्तों पे रही महरे-खुदा अपने वतन में

 

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी

हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में

 …

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Added by shahid mirza shahid on January 26, 2011 at 4:30am — 7 Comments

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ..

विश्व शक्ति बने और  लहराता रहे ..

गीत अपनी तरक्की के गाता रहे..
कोई छू न सके वो बुलंदी मिले..
भूल शिकवे सभी साथ मिल के चलें..
आंच आये नहीं आन पे अब…
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Added by Lata R.Ojha on January 25, 2011 at 11:30pm — 9 Comments

पिताजी की डायरी से.......

पिताजी की डायरी से.......



मनुष्य में कुछ भावनाएं स्थाई रूप से रहती हैं. उन भावनाओं में परिवर्तन धीरे धीरे आता है.एक लम्बे समय के बाद उसके स्थान पर दूसरी भावना आती है.प्राचीन काल में भारतीय भावना यही रहती थी की ईश्वर को प्रसन्न रखना है. जिसके परिणाम स्वरुप वह… Continue

Added by R N Tiwari on January 25, 2011 at 9:25pm — 1 Comment

कविता :- कहाँ गणतंत्र

कविता :- कहाँ गणतंत्र

 

फेल हुए सब मंत्र…

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Added by Abhinav Arun on January 25, 2011 at 3:51pm — 10 Comments

मोती बीए: भोजपुरी कवि (1919-2009)







मोती बीए: भोजपुरी कवि (1919-2009)…

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Added by R N Tiwari on January 25, 2011 at 11:33am — 1 Comment

ग़ज़ल : दरख़्त बदल रहा है

दरख़्त बदल रहा है

स्वयं खा फल रहा है ।१।

 

मैं लाया आइना क्यूँ

ये सबको खल रहा है ।२।

 

दिया सबने जलाया

महल अब गल रहा है ।३।

 

छुवन वो प्रेम की भी

अभी तक मल रहा है ।४।

 

डरा बच्चों को ही अब

बड़ों का बल रहा है ।५।

 

लिखा जिस पर खुदा था

वही घर जल रहा है ।६।

 

दहाड़े जा रहा वो

जो गीदड़ कल रहा है ।७।

 

उगा तो जल चढ़ाया

अगन दो ढल रहा है ।८।

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 24, 2011 at 9:30pm — 3 Comments

नहीं रहे भारत के रत्न पंडित भीमसेन जोशी

नहीं रहे भारत के रत्न…
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Added by R N Tiwari on January 24, 2011 at 10:00am — 13 Comments

ग़ज़ल

साहेबान, मुहब्बत भी ज़िन्दगी का एक खूबसूरत पहलू है. पेश है इसी रंग की एक  ग़ज़ल....


अजायबघरों में सजाएं मुहब्बत

कहीं से चलो ढूंढ लाएं मुहब्बत



तराना दिलों का बनाएं मुहब्बत

चलो साथ में गुनगुनाएं मुहब्बत…



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Added by shahid mirza shahid on January 23, 2011 at 7:00pm — 8 Comments

पिता जी की डायरी से....

पिता जी की डायरी से....



हाय भगवन क्या दिखाया ,

शांति मन में विक्रांति लाकर .

सरज का नव पुष्प कोमल , 

अग्नि ज्वाला में फसाकर,

वेड ही दिवस महिना ,

श्वेत ही वर्ण था निशा का,

शास्त्र ही दिन शेष था.

सूर्य था पश्चिम दिशा का.

उत्साह का उस दिन था पहरा ,

नयन सबही के खिले थे.

एक वर वधु के व्याह में ,…

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Added by R N Tiwari on January 23, 2011 at 6:30pm — 4 Comments

पुष्प समान समझ कर

पुष्प समान समझ कर तुमको,
    सुगंध तुम्हारी बन जायेंगे.
जग में खो दिया जो तुमको,
   शायद कुछ न फिर पाएंगे.
मस्त हवा सा चलना तेरा,
   अपलक मुझको देखना तेरा.
तेरे हस्त को न छू पाए,
   क्या फिर कुछ हम छू पाएंगे.
ये जीवन है इक कठपुतली,
  चलना इसका हाथ में तेरे.
तुमने हाथ जो नहीं हिलाए,
   कैसे फिर हम चल  पाएंगे.
नहीं जानते तेरे मन को,
  क्या देखा है…
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Added by shalini kaushik on January 23, 2011 at 9:46am — 2 Comments

लघु कथा: फूल

सिमरन दो साल के बेटे विभु को लेकर जब से मायके आई थी उसका मन उचाट था, गगन से जरा सी बात पर बहस ने ही उसे यंहा आने के लिए विवश किया था | यूँ गगन और उसकी 'वैवाहिक रेल' पटरी पर ठीक गति से चल रही थी पर सिमरन के नौकरी की जिद करने पर गगन ने इस रेल में इतनी जोर क़ा ब्रेक लगाया क़ि यह पटरी पर से उतर गई और सिमरन विभु को लेकर मायके आ गयी | सिमरन अपने घर से निकली तो देखा विभु उस फूल की  तरह मुरझा गया था जिसे बगिया से तोड़कर बिना…

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Added by shikha kaushik on January 23, 2011 at 9:00am — 2 Comments

सब अपने भी बेगाने हो गये

इस दुनिया में अब रहा न कोई अपना

अब तो सब अपने भी बेगाने हो गये ,                    

लगने लगा अब हमें कुछ ऐसा,

महफिल में भी अनजाने हो गये  |

 

आखों में ख्वाब जो दिखाया करते थे वो

 ही अब हमारे ख्यालों के नज़ारे हो गये ,

जो खाते थे  कसम  दोस्ती निभाने  की

करें क्या जब वो ही दुश्मन हमारे हो गये



विश्वास जताने वालों ही तोडा है विश्वास

तमन्नाओं के तार-तार अब हमारे हो गये

बीच मंझधार में लाके छोड़ दिया है हमको

किश्ती जो बनने चले थे… Continue

Added by Ajay Singh on January 22, 2011 at 8:30pm — 1 Comment

वो लाचार जिंदगी

घबरा जाता हूँ में

जब वो दिन याद आते हैं

पीड़ा के वो पल

टूट कर बिखर गया था में जब

वो रोज आँखें नम होना

वो हर हर बात पर आने वाली सिसकी

वो फूंक फूंक कर क़दमों को बढ़ाना

वो लाचार जिंदगी

 

रास्ते में पड़ा पत्थर जिसकी तकदीर का कोई पता नहीं

जाने कब कोई ठोकर मारकर आगे चल पड़े

जैसे उसका कोई वजूद ही नहीं

अपने अंजाम से बेखबर

 

वो छोटी छोटी चीज़ों का ध्यान रखना

वो बिस्तर पर पड़े रहकर रोज सोचते…

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Added by Bhasker Agrawal on January 22, 2011 at 3:16pm — 2 Comments

जीवन कर्म

हर  सुबह नई आशा  के साथ जागो;

 दिल में विश्वास रखो ऊपर वाले के प्रति;

गिरो अगर तो गिरकर संभालो खुद को;

जिन्दगी में जीत फिर तुम्हारी होगी!

ये मत सोचो क्या खो दिया;…

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Added by shikha kaushik on January 22, 2011 at 9:30am — 2 Comments

प्यार का गीत

Added by gaurava saxena on January 21, 2011 at 3:11pm — 2 Comments

हसीन पलों का सफ़र



पीपल के पेड़ के नीचे ,बनाया उसने आशियाँ

सिर्फ उसका , उसका ही  था वो जहाँ

जिंदगी…

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Added by anupama shrivastava[anu shri] on January 21, 2011 at 2:49pm — 2 Comments

ये हाल है तो कौन अदालत में जायेगा ?

"इंसाफ जालिमों की हिमायत में जायेगा,

ये हाल है तो कौन अदालत में जायेगा."

                      राहत इन्दोरी के ये शब्द और २६ नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ के द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट  पर किया गया दोषारोपण कि "हाईकोर्ट में सफाई के सख्त कदम उठाने की ज़रुरत है क्योंकि यहाँ कुछ…

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Added by shalini kaushik on January 21, 2011 at 1:00pm — No Comments

“तुम्हारा एहसास”

तुम साथ नहीं हो

लेकिन फिर भी

ऐसा लगता है

कि तुम यहीं हो

फुलों में, हवाओ में

पतझड़ में, बहारों में

घटाओ…

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Added by Raju on January 21, 2011 at 10:09am — 4 Comments

वो कौन है ...

वो कौन है ...

यह तो एक पहेली है
उसकी अठखेली है...
दिखता वह अनजान है
पर हम सब की जान है
यह पहेली सुलझाने को 
युगों से अनेक ऋषि-मुनि 
हुए हैं अशांत
लेकिन वह तो हमेशा से ही
दिखता प्रशांत 
चैन की बंशी बजाता है
अपनी ही चलाता है
 नमस्कार बन्धु....
बहुत ठीक है तुम अपनी ही चलाओ 
सारी दुनिया को…
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Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on January 21, 2011 at 8:30am — 6 Comments

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