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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Page

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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
Apr 26
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
Apr 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन  शहादत  के  लिए।।*कर रहे ख़ून सभी रोज़ ही दौलत के लिएनेकियाँ तोल रहा कौन क़यामत के लिए।।*कर्म से मोड़ के मुँह हाल ये खुद का है कियादोष औरों को न…"
Apr 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। दोहों पर आपकी विस्तृत टिप्पणी और सुझाव के लिए हार्दिक आभार।  निश्चित तौर पर दोहे कमजोर और चित्र की मूल भावना से इतर हो गये हैं। इसका कारण यह भी है कि इनको समय नहीं दे पाया। मैं यह सोच रहा था कि पिछले माह की तरह ही…"
Apr 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. प्रतिभा बहन, सादर अभिवादन। चित्रानुरूप सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Apr 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्रानुरूपसुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Apr 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चिचानुरूप उत्तम दोहावली हुई है। पर्यावरण, युद्ध के कारण गैस बाधित आपूर्ति और लोगो का पुनः लकड़ी और कंडे जैसे संसाधनों की और लौटने की विवशता को बखुबी उकेरा है आपने। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
Apr 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहा छंद********आग बुझाने पेट की, जूझ रहा दिन-रातबुरे किये  हैं  युद्ध ने, गैस  बिना हालात।।*लकड़ी ढोता आग को, पहुँचा हर घर गैसहाल   बिगाड़े   युद्ध  से,  पूँजीवादी  तैस।।*सबको प्यारी साइकिल, ढोने को…"
Apr 18
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"सादर अभिवादन"
Apr 18
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Mar 3
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। * कहने को  आयी  देश  में  इक्कीसवीं सदी होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२। * कहने को पर्व  रंग  का, मस्ती मजाक का पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३। * रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४। * माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े टेढ़ी करो न  रोष  में  रेखा को भाल की।५। * होली में अब  न  शेष  हैं  रंगो-गुलाल वो कर दी सभी ने आज ये रंजो मलाल की।६। * मजहब की बात छोड़ के खेलोगे रंग जो लगने लगेगी आप को होली कमाल की।७। * रंगों ने साथ देह  के  मन भी रँगा है आज होली रहेगी याद 'मुसाफिर' इस साल की।८। ** मौलिक/अप्रकाशित लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' *See More
Mar 3
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह गयी हैं। देखिएगा। सादर.."
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई दयाराम जी, अभिवादन व आभार।"
Feb 26
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई तिलकराज जी, सादर अभिवादन।गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। बहुत सुंदर सुझाव दिया है।इसे मूल गजल में ले रहा हूँ। सादर..."
Feb 26
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. रिचा जी, हार्दिक धन्यवाद।"
Feb 26
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई अजय जी, गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।"
Feb 26
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई अजय जी, अभिवादन। बेहतरीन गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Feb 26
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई तिलकराज जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर सुझाव दिये हैं आपने। इससे गजल पर बारीक नजर रखने और सोचने की सीख मिली है। इसके लिए आपका आभार। शायद जल्दी में यह सुझाव बेबह्र हो गया है।  मार्गदर्शन करें - *और फिर रात ही को भूल गया (फिर उसे रात…"
Feb 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। गिरह भी अच्छी हुई है।हार्दिक बधाई।"
Feb 25

Profile Information

Gender
Male
City State
Delhi
Native Place
Dharchaula,uttarakhand
Profession
teaching

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

***

पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की

साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१।

*

कहने को  आयी  देश  में  इक्कीसवीं सदी

होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२।

*

कहने को पर्व  रंग  का, मस्ती मजाक का

पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३।

*

रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी

साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४।

*

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े

टेढ़ी करो न  रोष  में  रेखा को भाल की।५।…

Continue

Posted on March 3, 2026 at 7:30am

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में

आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१।

*

अवसर समानता का कहे सम्विधान तो

पर  लोकतंत्र  व्यस्त  हुआ  भेदभाव में।२।

*

करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को

फिर से जिला  दिया  है  उसे  ताव-ताव में।३।

*

खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में।४।

*

सम्पन्न देश हो न हो इतना तो हो मगर

जीवन…

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Posted on February 14, 2026 at 5:09pm

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

******

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये

उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१।

*

गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली

उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२।

*

घर में बहार नल से जो आयी गरीब के

पनघट हर एक गाँव  के वीरान हो गये।३।

*

भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर

सारे ही फर्ज, कौम को अहसान हो गये।४।

*

हाथों अपढ़ के देखते शासन की डोर है

पढ़ लिख गये जो देश में दरवान हो…

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Posted on February 7, 2026 at 6:23am

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२
**
अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमी
एक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।
*
आदमीयत जहाँ खूब महफूज हो
एक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२।
*
दूर नफ़रत का जंजाल करले अगर
दो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३।
*
खींचने में लगे  पाँव अपने ही अब
व्योम कैसे सहज चढ़ सके आदमी।४।
*
तब मनुज देवता हो गया जान लो
लोक मन में अगर कढ़ सके आदमी।५।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Posted on February 1, 2026 at 11:24pm

Comment Wall (18 comments)

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At 9:49pm on October 7, 2025,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।

At 10:59am on January 25, 2023, Anita Bhatnagar said…

सादर आभार आदरणीय 

At 3:37pm on December 21, 2021, KullarSaddik said…

अपने आतिथ्य के लिए धन्यवाद :)

At 8:45am on January 16, 2021, Aazi Tamaam said…

मुसाफिर सर प्रणाम स्वीकार करें आपकी ग़ज़लें दिल छू लेती हैं

At 8:39pm on December 3, 2020,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी 

At 11:39pm on November 22, 2020, DR ARUN KUMAR SHASTRI said…

प्रिय भ्राता धामी जी सप्रेम नमन
आपके शब्द सहरा में नखलिस्तान जैसे - हैं

At 8:37am on May 14, 2020, Om Prakash Agrawal said…
आदरणीय
सराहना हेतु सहृदय आभार एवं धन्यवाद
At 4:12pm on May 7, 2020, सालिक गणवीर said…
हौसला अफजाई के लिए आपका ममनून हूँ आदरणीय
At 4:04pm on August 8, 2018, babita garg said…

शुक्रिया लक्ष्मण जी

At 11:44am on March 3, 2018, Sanjay Kumar said…
बहुत बहुत धन्यवाद और आभार। कोशिश करूंगा कि कुछ योगदान कर सकूं। बस हौसला अफजाई करते रहिएगा और जहां जरूरी हो तो कुछ सिखा दीजियेगा। सादर
 
 
 

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