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May 2012 Blog Posts

छन्न पकैया .......

छन्न पकैया .......

छन्न पकैया - छन्न पकैया, सूरज दावानल है.
सूख रहीं हैं नदियाँ सारी, सड़के रहीं पिघल हैं.
**
छन्न पकैया - छन्न पकैया,जलता आलम सारा.
थर्मा-मीटर की नलिका में, ताव मारता पारा.
**
छन्न पकैया - छन्न पकैया, बीसुर रही हरियाली.
मुरझाते फूलों के मुख से , हुई  नदारत लाली.
**
छन्न पकैया - छन्न पकैया,लस्सी,कुल्फी,मठ्ठा,
तीनो…
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Added by AVINASH S BAGDE on May 4, 2012 at 10:00am — 17 Comments

"बात इतनी बढ़ी के"

बात इतनी बढ़ी के कहर हो गयी;

हमको बचपन में क़ैदे उमर हो गयी;

*

बात कानों में घुलती शहद की तरह,

रात ही रात में क्यूँ ज़हर हो…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on May 4, 2012 at 9:30am — 21 Comments

काँटों का जीवन: शोषित और उपेक्षित

काँटे, काँटे  क्यों  बनते  हैं,

बन  सकते हैं  जब वो फूल,

एक डाल पर एक रस पीकर,

कैसे  बन   जाते  हैं  शूल?…

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Added by Neeraj Dwivedi on May 4, 2012 at 8:30am — 7 Comments

नई कविता : कूप मंडूक

पुरखों के कुँए को ही दुनिया समझना

कूप मंडूकता है



कुँए को अपना घर समझना

पाँवों में पड़ी बेड़ियाँ हैं



कुँए की दीवारों को अभेद्य समझना

खुद को खुद की नज़रों में

दुनिया का विजेता साबित करने की कोशिश है



खुद को विश्व विजयी समझना

चुनौतियों से हारकर आलस्य का जहर पीना है



खुद को कूप मंडूक समझना

बाहर की रोशनी का अहसास है



कुँए की दीवारों के बाहर दुनिया की कल्पना

कुँए से बाहर जाने वाली सुरंग है



दुनिया के बाहर… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 3, 2012 at 5:55pm — 9 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
तू खुद अनंत हो जाएगा !

जब भी करने लगती हूँ मैं खुद से दिल की बात

दिल दिखलाता है सारे सच , भूल के सब जज़्बात …



मैने पुछा अन्तः मन से ,

अपने हर एक रूप में, प्यार बहुत ही सुन्दर है

वो बोला हाँ सुन्दर है …



मैने पुछा मुझे बताओ ,

कोई ख़ास जब आता है , क्यूँ वो ही मन को भाता है

दिल बोला पिछले जन्मों का शायद कोई नाता है …



मैने कहा ऐसा लगता है

जैसे उसको मेरे सांचे मे ढाल कर

और मुझको उसके सांचे मे ढाल कर बनाया है ,

ऐसा लगता है वो जैसे हमसाया है

जो… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on May 3, 2012 at 5:37pm — 10 Comments

शोषित है तू...

मुफलिसी में दिन बिताने वाले 

पी के आंसू, घुड़कियाँ खाने वाले,

खोल आँखे, पहचान खुद को
कुछ और नहीं, सिर्फ शोषित है तू|
न किसी धर्म से है तू
न तेरी कोई भाषा,
तुझसे छलकती है…
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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 3, 2012 at 12:00pm — 18 Comments

ये साथ बिताए लम्हें, तुम्हे याद बहुत आयेंगे

ये साथ बिताए लम्हें, तुम्हे याद बहुत आयेंगे,

जब सोचोगे हो तन्हा तो तुमको तड़पायेंगे।।।।



वो फर्स्ट…

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Added by आशीष यादव on May 1, 2012 at 10:30pm — 14 Comments

मानव स्वयं सम्पूर्ण रहा है

दो चार दिनों का जीवन मेरा,

क्या पाया है  मैंने  अब तक,

मुझसे  कोई   क्या  सीखेगा,

कितनी दुनिया देखी अब तक।…

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Added by Neeraj Dwivedi on May 1, 2012 at 10:03pm — 5 Comments

क्या शहर ,क्या गाँव

मेरे लिए

क्या शहर ,क्या गाँव

जीवन तपती दुपहरी

नहीं ममता की छाँव

 

गाँव में,भाई को

मेरी देख रख में डाल

माँ जाती ,भोर से

खेती की करने

सार सम्भाल

 

शहर में,बड़ा भाई

जाता है कारखाने

गृहस्थी का बोझ बंटाने

खुद को काम में खपाने

 

कच्ची उम्र की मजबूरी

काम पूरा,मजदूरी मिलती अधूरी

हाथ में कलम पकड़ने की उम्र…

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Added by rajni chhabra on May 1, 2012 at 1:00pm — 14 Comments

विवशता ( कविता )

मजदूर दिवस को समर्पित…



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Added by dilbag virk on May 1, 2012 at 11:30am — 7 Comments


प्रधान संपादक
शतरंज (लघुकथा)

मजदूर दिवस पर विशेष 

.



मजदूर दिवस बहुत बड़ी ख़ुशी लेकर आया था. आज मजदूरों के सामने मालिकों को झुकना ही पड़ा था. अन्य सुविधायों के अतिरिक्त मजदूरों की रोजाना दिहाड़ी बढ़ा दी गई उन्हें ओवरटाईम तथा बढ़ा हुआ बोनस देने की घोषणा भी कर दी गई. मजदूर बस्ती में हर तरफ ख़ुशी का माहौल था, अपनी मांगें पूरी होने की ख़ुशी में जहाँ मजदूर मंदिरों जाकर भगवान को धन्यवाद दे रहे थे, वहीँ दूसरी तरफ मजदूर यूनियन के कुछ नेता मालिकों के घर दावत उड़ा रहे थे, क्योंकि एक बात मजदूरों से…

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Added by योगराज प्रभाकर on May 1, 2012 at 10:15am — 21 Comments

दोहा सलिला: शब्दों से खिलवाड़- १ --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
शब्दों से खिलवाड़- १
संजीव 'सलिल'
*
शब्दों से खिलवाड़ का, लाइलाज है रोग..
कहें 'स्टेशन' आ गया, आते-जाते लोग.
*
'पौधारोपण' कर कहें, 'वृक्षारोपण' आप.…
Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on May 1, 2012 at 7:35am — 4 Comments

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