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गर्मी पर 5 दोहे ....

गर्मी पर 5 दोहे ....

लू में हर जन भोगता, अनचाहा संताप।

दुश्मन मेघों का बना,भानु किरण का ताप।।

मेघों से धरती कहे, कब बरसोगे तात।

प्यासी वसुधा मांगती, थोड़ी सी बरसात।।

जंगल सारे कट गए, कैसे हो बरसात।

तपती धरती पर लिखी, पर्यावरणी बात।।

धरती पर हर ताप का, भानु ताप सरताज।

गौर वर्ण पर हो गया, स्वेद कणों का राज।।

भानु अनल से तप रहे, धरती अंबर आज।

प्यासा जीवन हो गया, बारिश का मुहताज…

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Added by Sushil Sarna on June 6, 2019 at 7:00pm — 5 Comments

गज़ल - अकेले ईद हम कैसे मनाएँ

गज़ल(ईद मनाएं)

(मफाईलुन - मफाईलुन - फ ऊलन)

न घर आएं न वो हम को बुलाएं

अकेले ईद हम कैसे मनाएं

यही है ईद का पैग़ाम लोगों

दिलों को आज हम दिल से मिलाएँ

मुबारक बाद मैं दूँ उनको कैसे

कभी वो सामने मेरे न आएं

मनाई साथ ही थी हम ने होली

सिवइयां साथ ही हम आज खाएँ

गिले शिकवे भुला दें आज के दिन

गले मिल कर मुहब्बत को बढ़ाएं

वतन से ख़त्म हो फिरका परस्ती

ख़ुदा से आज ये…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on June 5, 2019 at 9:00pm — 3 Comments

कुण्डलिया छंद-(विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में)

1-

हरियाली  कम  हो  गई, हुई  प्रदूषित  वायु।

शनै-शनै कम हो रही,अब मनुष्य की आयु।।

अब मनुष्य की आयु, धरा पर  संकट भारी।

पर्यावरण   सुधार, विश्व  में  हैं  अब  जारी।।

दिवस मनाकर एक,मुक्ति क्या मिलने वाली।

इसका सिर्फ निदान, बढ़े फिर से हरियाली।।

2-

जीवन  को  संकट  हुआ, करते  सभी  प्रलाप।

पर्यावरण  बिगड़  गया, बढ़ा  धरा  का  ताप।।

बढ़ा   धरा  का   ताप, गर्क  होता  अब  बेड़ा।

पहले  बिना  विचार, प्रकृति को  हमने  छेड़ा।।

अब भी एक उपाय, करें हम विकसित वन…

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Added by Hariom Shrivastava on June 5, 2019 at 8:12pm — 1 Comment

ईद ...

ईद ...

दीद आपकी ईद पर, है अनुपम सौगात।

ईद मुबारक कर गई , आज ईद की रात ।।

मेघों की चिलमन हटी, हुई चाँद की दीद।

भेद-भाव सब भूलकर, कहें मुबारक ईद।।

दीद आपकी दे गई, ईदी हमको आज।

धड़कन के बजने लगे, देखो दिल में साज ।।

अर्श पर्श पर आज है, ईद मिलन का राज ।

ईद मुबारक सब कहें , इक दूजे को आज ।।

तरस रही हैं दीद को,कब आएगी ईद।

आएगी जब ईद, तो कैसे होगी दीद।।

बिना आपके बे-मज़ा,…

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Added by Sushil Sarna on June 5, 2019 at 3:30pm — 3 Comments

तेरी मेरे कहीं कुछ कहानी तो है

ग़ज़ल:



तेरी मेरी कहीं कुछ कहानी भी है

प्यार में तैरती ज़िन्दगानी भी है

मत डरो देख तुम इस जमन की लहर

रासलीला तुम्हीं संग रचानी भी है

आँसुओं से नहाती रही उम्र-भर

तू ही चंपा मेरी रातरानी भी है

फूल जब मुस्कुराएँ तो समझा करो

इन बहारों में अपनी जवानी भी है

बाँध मत प्यार की बह रही है नदी

है रवाँ जिसमें उल्फ़त का पानी भी है

साथ देता हमेशा रहा…

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Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on June 4, 2019 at 7:30pm — 3 Comments

सफर बाकी है अभी

सफर बाकी है अभी 

अभी बाकी है

जिंदगी से अभिसार

कह रहा हूं

तुम्हीं से

बार-बार

सुन रही हो न

ऐ मृत्यु के आगार।…

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Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on June 4, 2019 at 7:22pm — No Comments

ज़िंदगी ... तीन क्षणिकाएँ

ज़िंदगी ... तीन क्षणिकाएँ

मरती रही ज़िंदगी
ज़िंदा रही जब तक
अमर हो गई
फ्रेम में
कैद होने के बाद

..........................
जीती रही ज़िंदगी
ज़िंदा रही जब तक
मर गई
फ्रेम में
कैद होने से पहले

..........................

वाकिफ़ थी
अपने हश्र से
ज़िंदगी
फिर भी
मिट न सकी
जीने की लालसा
अवसान से पहले

.....................

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 2, 2019 at 9:24pm — 4 Comments

इक कदम (लघुकथा)

गाड़ी रूकते ही मैं ढाबे की तरफ़़ बढ़ा। कुर्सी पर बैठते हुए छोटू को पास बुलाया।

उस से बात करने लगा, जैसे अक्सर ही मैं ऐसा   करता हूँ, ऐसा करना मेरा काम है, किसी को अच्छा या नहीं लगता।  ये जानना मेरा काम नहीं ।"

“आप इन से क्या बात करते हो?" दूसरी तरफ बैठे मालिक ने उठ कर बालो से उस  पकड़ा अंदर की ओर ले कर जाते हुए कहा

 आप को यहाँ काम के लिए रखा है, बातों के लिए नहीं।

"भाई साहिब,कुछ लेना है,आप ने।" उसने मेरी तरफ 

देखते हुए कहा

“नहीं,बात करनी है,इस और आप से।"…

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Added by मोहन बेगोवाल on June 2, 2019 at 4:30pm — 6 Comments

दर्द

ये रातें जल रही हैं,

वो बातें खल रही हैं

लगा दी ठेस तुमने दिल के अंदर

नसें अंगार बनकर जल रही हैं

मौसम सर्द है,

जीवन में लेकिन

लगी है आग,

तन मन जल रहा है।

जिसे उम्मीद से बढ़कर था माना

वही घाती बना है छल रहा है।

तुम्हारी ठोकरों के बीच आकर

बहुत टूटा हुआ हूँ, लुट गया हूँ

तेरा सम्मान खोकर, स्नेह खोकर

स्वयं ही बुझ चुका हूँ, घुट गया हूँ।

यहाँ हालात क्या से क्या हुआ है

नहीं कुछ सूझता…

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Added by आशीष यादव on June 1, 2019 at 5:02pm — No Comments

अबला सहे हर अत्याचार |

घर चलता है नर नारी से , नर का चले  सारा अधिकार |
 घर का  काम करे सब  नारी , फिर भी रहे नर से  लाचार | 
 
संग  रहे भाई  बचपन में  , बात  बात में देता ताना |
एक दिन ससुराल जाओगी , वहाँ होगा   तेरा ठिकाना |
सदा  कहा  भाई की होती , बहन का नहीं  चले बहाना |
रोकर चुप हो जाती बहना , दबा लेती आंसू की धार…
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Added by Shyam Narain Verma on June 1, 2019 at 2:30pm — No Comments

इच्छाओं का भार नहीं धर----ग़ज़ल

22 22 22 22

इच्छाओं का भार नहीं धर

रिश्तों के नाज़ुक धागों पर

पोषित पुष्पित होंगे रिश्ते

हठ मनमानी त्याग दिया कर

ऊर्जा से परिपूर्ण रहेगा

खुद में शक्ति सहन की तू भर

करनी का फल सन्तति भोगे

सो कुकर्म से ए मानव डर

देख निगाहें घुमा-फिरा के

कौन नहीं फल भोगे यहाँ पर

अब वैज्ञानिक भी कहते हैं

पाप-प्रलय-भय तू मन में भर

गा कर, लिख कर, यूँ ही पंकज

हर मन से अवसाद सदा…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 1, 2019 at 12:46pm — 1 Comment

जा रहे हम दूर-दूर

ढलते पहर में लम्बाती परछाईयाँ

स्नेह की धूप-तपी राहों से लौट आती

मिलन के आँसुओं से मुखरित

बेचैन असामान्य स्मृतियाँ

ढलता सूरज भी तब

रुक जाता है पल भर

बींध-बींध जाती है ऐसे में सीने में

तुम्हारी  दुख-भरी भर्राई आवाज़

कहती थी ...

"इस अंतिम उदास

असाध्य संध्या को

तुम स्वीकारो, मेरे प्यार"

पर मुझसे यह हो न सका

अधटूटे ग़मगीन सपने से जगा

मैं पुरानी सूनी पटरी पर…

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Added by vijay nikore on June 1, 2019 at 12:00am — 4 Comments

वफ़ा ढूंढते हो जफ़ा के नगर में यहाँ पर वफ़ा अब बची ही कहाँ है (४५ )

(१२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ )

.

वफ़ा ढूंढते हो जफ़ा के नगर में यहाँ पर वफ़ा अब बची ही कहाँ है 

बुझी है वफ़ा की मशालें दिलों से वफ़ा का नहीं कोई नाम-ओ-निशाँ है 

**

यहाँ राज करते हवस के पुजारी किसी की नहीं है मुहब्बत से यारी 

इधर बेवफ़ाओं का लगता है मेला कोई बावफ़ा अब न मिलता यहाँ है 

**

इधर पैसा फेंको दिखेगा तमाशा अगर जेब ख़ाली मिलेगी हताशा 

इधर है न…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 31, 2019 at 4:30pm — 2 Comments

आदमीं हूँ ख्वाहिशें होनी नहीं कम ऐ खुदा ...



2122-2122-2122-212

मतला:-

ख़ुश ही रहता हूँ शिकायत क्या करूँ क्या है अता।।

आदमी हूँ ख्वाहिशें होनी नहीं कम ऐ ख़ुदा।।

हुश्न-ए-मतला:-

तेरे ज़ानिब से मुझे जो भी मिला अच्छा लगा ।

मैं तो मुफ़लिस था मेरी हिम्मत कहाँ कुछ माँगता।।

मेरा दम घुटने लगा जब महफिलों की शान में ।

यार आया हूँ उठा कर दूर खुद का मकबरा।।

मेरी मैय्यत में गुलों की बारिशें अच्छी नहीं।

शाइरी के भेष में करने लगा था इल्तिज़ा।।

देख़ो उल्फ़त के…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on May 31, 2019 at 12:20pm — No Comments

चुप होना चाहता हूँ ....

चुप होना चाहता हूँ ....

नहीं नहीं

बहुत हुआ

अब मैं चुप रहना चाहता हूँ

अंधेरों सा खामोश रहना चाहता हूँ

अब मेरे पास

न तो विचार हैं

न किसी भी विचार को

अभिव्यक्त करने के लिए शब्द

पता नहीं

क्यों मैं चुप नहीं रह पाता

बावजूद ये जानते हुए भी

कि मेरे बोलने से कुछ नहीं बदलने वाला

मैं निरंतर बोले जा रहा हूँ

न जाने किसे और क्या क्या

मैं नहीं जानता

मेरा इस तरह से लगातार बोलना

किस हद तक ठीक है…

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Added by Sushil Sarna on May 31, 2019 at 12:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल- आरजू ही नहीं जब हुई मुख़्तसर

212 212 212 212

कीजिये मत अभी रोशनी मुख़्तसर ।

आदमी कर न ले जिंदगी मुख़्तसर ।।

इश्क़ में आपको ठोकरें क्या लगीं ।

दफ़अतन हो गयी बेख़ुदी मुख़्तसर ।।

नौजवां भूख से टूटता सा मिला ।

देखिए हो गयी आशिक़ी मुख़्तसर ।।

गलतियां बारहा कर वो कहने लगे ।

क्यूँ हुई मुल्क़ में नौकरी मुख़्तसर ।।

कैसे कह दूं के समझेंगे जज़्बात को ।

जब वो करते नहीं बात ही मुख़्तसर ।।

सिर्फ शिक़वे गिले में सहर हो गयी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 30, 2019 at 6:30pm — No Comments

मर्म .....

मर्म .....

कितनी पहेलियाँ हैं
हथेलियों की
इन चंद रेखाओं में
पढ़ते हैं
लोग इनमें
जीवन की लम्बाई
साँसों की गिनती
भौतिक सुख सुविधा
दाम्पत्य सुख
औलाद
सब कुछ पढ़ते है
नहीं पढ़ते
तो
प्राण बिंदु का मर्म

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 30, 2019 at 3:04pm — 1 Comment

माँ भी बोझ लगती है

बोझ उठाती हैअकेली माँ कई बच्चोँ का

कई बच्चोँ को मगर माँ भी बोझ लगती है

 

लहू से सींचकर जिसको बडा किया उसको

बहु के साथ ही रहने में मौज लगती है…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on May 30, 2019 at 3:00pm — No Comments

छंद सोरठा .......

छंद सोरठा .......

अपनेपन की गंध, अपनों में मिलती नहीं।

स्वार्थपूर्ण दुर्गन्ध,रिश्तों से उठने लगी।1।

प्रथम सुवासित भोर, प्रीत सुवासित कर गई।

मधुर मिलन का शोर, नैनों में होने लगा।2।

तृषित रहा शृंगार, बंजारी सी प्यास का।

धधक उठे अंगार,अवगुंठन में प्रीत के।3।

जागे मन में प्रीत, नैन मिलें जब नैन से ।

बने हार भी जीत, दो पल में सदियाँ मिटें।4।

वो पहली मनुहार, यौवन की दहलीज पर।

शरमीली सी हार,हर बंधन…

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Added by Sushil Sarna on May 29, 2019 at 1:23pm — No Comments

बुढ़ापा ...

बुढ़ापा ...

शैशव,बचपन ,जवानी
छूट जाती है
बहुत पीछे
जब आता है
बुढ़ापा
छूट जाता है
हर मुखौटा
हर आयु का
जब आता है
बुढ़ापा
बहुत लगती है
प्यास
बीते हुए दिनों की
तृषा की ओढ़नी में
तृप्ति की तलाश में
युगों के बिछोने पर
उड़ जाता है तोड़ कर
काया की प्राचीर को
अंत में
अनंत में
ये
पावन
बुढ़ापा


सुशील सरना
मौखिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 28, 2019 at 1:00pm — 2 Comments

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