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January 2014 Blog Posts (191)

क्षणिकाएं -- शशि पुरवार

क्षणिकाएं --



प्रतिभा --

नहीं रोक सके,

काले बादल

उगते सूरज की किरणें।



सपने --

तपते हुए रेगिस्तान

की बालू में चमकता हुआ

पानी का स्त्रोत, औ

जीने की प्यास.



आशा -

पतझड़ के मौसम में

बसंत के आगमन का

सन्देश देती है,

कोमल प्रस्फुटित पत्तियां।



संस्कार -

रोपे हुए वृक्ष में

मिलायी गयी खाद,

औ खिले हुए पुष्प।



पीढ़ी -

बीत गयी सदियाँ

नही मिट सकी…

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Added by shashi purwar on January 31, 2014 at 10:00pm — 11 Comments

गजल - बदनाम (अखंड गहमरी)

2122  2122   2122   2122

 

इस जमाने में हमे तुमकेा बुलाना भी नहीं हैं

तड़पते ही रहे मगर जख्‍म दिखाना भी नहीं है

चाँद छुप छुप जा रहा क्‍यों बादलो के संग देखो

राज की ये बात बेवफा को बताना भी नहीं है

दर्द ही हमको मिला जो दिल लगाया था किसी से

जख्‍म जो दिल पर लगे  उन्‍हे दिखाना भी नहीं है

आई फिर ना वो बहारे जो चली इस बार गई पर

दर्द फूलो का बहारो को बताना भी नहीं है

नाम भी बदनाम उसका प्‍यार में ना…

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Added by Akhand Gahmari on January 31, 2014 at 8:00pm — 11 Comments

जब जब तुम्हे सोचती हूँ

जब जब तुम्हें सोचती हूँ

मेरे ख्वाब खिल उठते हैं

सोचती हूँ रंग बिरंगी दुनिया

अपना सजीव होना|

जब जब तुमसे मिलती हूँ

बागों में फूलों का

बेमौसम खिलना होता है

पक्षी चहचहाने लगते हैं

नदिया में सागर में

जीवन बहने लगता है

तब सब से मिलती हूँ

उल्लास से|

जब जब तुमसे मिलती हूँ

जिन्दगी छलकती है

मेरी आँखों से

मेरे हाथ महकते हैं

मेंहदी के रंग से

तब मिलती हूँ जिन्दगी से

तब मैं मिलती हूँ

अपने आप…

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Added by Sarita Bhatia on January 31, 2014 at 5:04pm — 17 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
पाँच दोहे : आज के मन-भाव // --सौरभ

मन के सुख-दुख, पीर भी, कैसे पायें भाव

टिप-टिप अक्षर आज के, टेक्स्ट हुए बर्ताव       



चिट्ठी से तब भाव मन, होता था अभिव्यक्त

दिल के आँसू वाक्य थे, शब्द-शब्द थे रक्त



वह भी अद्भुत दौर था, यह भी अद्भुत दौर

अब’ कार्डों से भाव सब, ’तब’ अमराई…

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Added by Saurabh Pandey on January 31, 2014 at 4:30pm — 32 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ज्यों प्रसून जल-जन्य ( दोहावली) //डॉ० प्राची

नत-मस्तक वंदन करूँ, हे प्रभु! प्राणाधार

तमस क्षरण कर ज्ञान का, प्रभु कीजै विस्तार

कर्म रती या रिक्त मन, हो सुमिरन अविराम 

क्षणिक न विस्मृत उर करे, प्रभु तव शुचिकर नाम 

नयन मूँद - अन्तः रमे, दर्शन - तव विस्तार 

झंकृत वीणा तार पर, श्रव्य मधुर मल्हार 

क्षणभंगुर जग बंध से, मुक्त रहे चैतन्य 

नित्य पंक अस्पृष्ट है, ज्यों प्रसून जल-जन्य

प्राप्य प्रयोजन पूर्ण कर, हो विदीर्ण स्वयमेव 

विरह मिलन भव मुक्त उर,…

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Added by Dr.Prachi Singh on January 31, 2014 at 2:30pm — 18 Comments

अब तो प्रभु दर्शन दे दो ......

तरसे दरशन को ये नैना

थकी राह निहार दिन रैना,

तुम बिन इक पल मिले न चैना

अब तो प्रभु दर्शन दे दो

बीती जाये उमरिया ||



हृदय दीप सांसों की बाती

ज्योति जलाय निहारूँ झाँकी

असुअन पुष्प चढ़े दिन राती

अब तो प्रभु दर्शन दे दो

बीती जाये उमरिया ||



प्रीत तेरी रम गई ऐसी

सुधि न रही अब तन,मन,धन की

लाज शरम तजि हुई बावरिया ||

अब तो प्रभु दर्शन दे दो

बीती जाये उमरिया ||



टेर-टेर विकल भई काया …

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Added by Meena Pathak on January 31, 2014 at 2:30pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तरही ग़ज़ल... क्यों लगे शह्र जैसे खजाना हुआ -- "राज “

212    212    212    212

गाँव से दूर जब से ठिकाना हुआ

बंदिशे काम उसका बहाना हुआ

 

आस में मुन्तज़िर आँखें दर पे टिकी

उसकी सूरत  को देखे ज़माना हुआ

 

गोद में खेल जिसकी पला था कभी

गाँव वो आज कैसे बेगाना  हुआ

 

जानते हैं सभी कबसे बदली नजर

जब से गैरों के घर आना जाना हुआ

 

जो झुलाता तुझे प्यार से डाल पर

वो शज़र देख कितना पुराना हुआ

 

गाँव में क्या नहीं था तेरे वास्ते

क्यों…

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Added by rajesh kumari on January 31, 2014 at 11:30am — 30 Comments

गज़ल... बागों बुलाती है सुबह (कल्पना रामानी)

रात पर जय प्राप्त कर जब जगमगाती है सुबह।

किस तरह हारा अँधेरा, कह सुनाती है सुबह।

 

त्याग बिस्तर, नित्य तत्पर, एक नव ऊर्जा लिए,

लुत्फ लेने भोर का, बागों बुलाती है सुबह।   

 

कालिमा को काटकर, आह्वान करती सूर्य का,

बाद बढ़कर, कर्म-पथ पर, दिन बिताती है सुबह।

 

बन कभी तितली, कभी चिड़िया, चमन में डोलती,

लॉन हरियल पर विचरती, गुनगुनाती है सुबह।

 

फूल कलियाँ मुग्ध-मन, रहते सजग सत्कार को,

क्यारियों फुलवारियों को,…

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Added by कल्पना रामानी on January 31, 2014 at 10:30am — 28 Comments

तान्या : तुम बिन

दरवाज़ा तो मैंने ही खुला छोड़ा था 

कि तुम भीतर आओगे

और बंद कर दोगे /

मगर

खुले दरवाज़े से आते रहे

सर्द हवाओं के झोंके

और ठिठुरता रहा मैं /

चेतनाशून्य होने ही वाला था कि

किसी ने

भीतर आ के

दरवाज़ा बंद कर लिया /

अधमुंदी आँखों से मैंने देखा

वो तुम नहीं थे /

मगर वो गर्मी कितनी सुखद थी /

और फिर

ना जाने कैसे

कब से

पेड़ कि फुनगी पर

बैठा चाँद

चुपके से उतर कर

मेरी आँखों में…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on January 30, 2014 at 8:30pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आँखों देखी 11 - रोमांचक 58 घंटे

आँखों देखी 11 -  रोमांचक 58 घंटे

 

        मैंने आँखों देखी 9 में ऑक्टोबर क्रांति से जुड़े कार्यक्रम में भाग लेने के लिए रूसी निमंत्रण की ओर इशारा किया था. फिर, हम लोगों के समुद्र के ऊपर पैदल चलने की बात याद आ गयी. सो, पिछली कड़ी (आँखों देखी 10) में रूसी निमंत्रण की बात अनकही ही रह गयी थी. आज मैं आपको वही किस्सा सुनाने जा रहा हूँ.

        हमारे स्टेशन में उनके एक सदस्य की शल्य चिकित्सा के बाद रूसी कुछ विशेष…

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Added by sharadindu mukerji on January 30, 2014 at 8:00pm — 11 Comments

अर्थ ढूँढ़ते ठौर नया

खण्ड-खण्ड सब शब्द हुए

अर्थ ढूँढ़ते ठौर नया

 

बोध-मर्म रहा अछूता  

द्वार-बंद ज्ञान-गेह का

ओस चाटती भावदशा 

छूछा है कलश नेह का

 

मन में पतझड़ आन बसा

अब बसंत का दौर गया 

 

विकृत रूप धारे अक्षर

शूल सरीखे चुभते हैं

रेह जमे मंतव्यों पर

बस बबूल ही उगते हैं

 

संवेदन के निर्जन में  

नहीं दिखे अब बौर नया

-        बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by बृजेश नीरज on January 30, 2014 at 7:55pm — 25 Comments

यह दिल

दिल बड़ी अजीब शय है


खुश हो तो
बहकता है
चहकता है
महकता है
उछलता है
मचलता है


टूटता है तो


हो जाता बेदर्द
देता इंतहा दर्द
कर देता सर्द
खो जाता चैन
कर देता बेचैन
हर दिन हर रैन
.......................

मौलिक व् अप्रकाशित 

Added by Sarita Bhatia on January 30, 2014 at 6:02pm — 15 Comments

तीन और दोहे -- ( अन्नपूर्णा बाजपेई )

1)  बंधन बांधो नेह का पुनि पुनि जतन लगाय । 

     चुन चुन मीत बनाइये खोटे जन बिलगाय ॥ 

2) प्रेम कुटुम्ब समाइए सागर नदी समाय ।

    ज्यों पंछी आकाश मे स्वतंत्र उड़ता जाय ॥ 

3) धोखा झूठ फरेब औ फैला भ्रष्टाचार । 

    फैली शासनहीनता  है पसरा व्यभिचार ॥ 

संशोधित 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

Added by annapurna bajpai on January 30, 2014 at 1:30pm — 11 Comments

तेरी कुएँ सी प्यास

तेरी कुएँ सी प्यास

तेरी अघोरी भूख

भिखारन, तू नित्य मेरे आँगन में आती

एक धमकी

एक चुनौती

तेरे आशीष में होती

घबराकर मैं तेरी तृष्णा पालती.

तू मेरी धर्मभीरूता को खूब पहचानती

और, मेरी सहिष्णुता का गलत मतलब निकालती.

‘’दे अपना हाथ तुझे उबार दूँ.’’

तूने तड़प कर दुहाई दी

अपने कुनबे की.

भिखारन! तेरे कितने नाज़

तेरे कुकुरमुत्ते से उगते परिवार

गोंद से चिपके तेरे रीति रिवाज़

छोड़ अब माँगने की परम्परा.

काम कर, कुछ काम कर…

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Added by coontee mukerji on January 29, 2014 at 5:00pm — 18 Comments

तीन दोहे (अन्नपूर्णा बाजपेई)

क्षण भंगुर जीवन हुआ, जीवन का क्या मोल ।

भज लो तुम भगवान को, क्यों रहे विष घोल ।। 

बंद पड़ी सब  खिड़कियाँ, चाहे तो लो खोल ।

खुले हुये अंबर तले, कर लो अब किल्लोल ॥ 

* भामा माया मोहिनी, मोहति रूप अनेक ।

   माया माला भरमनी, फंसत नाहीं नेक ॥

*इस दोहे को इस तरह भी देखें :- 

ऐसी माया मोहिनी मोहती  रूप अनेक ।

केवल माला फेर के कोई न बनता नेक ॥ 

संशोधित 

अप्रकाशित एवं मौलिक

Added by annapurna bajpai on January 28, 2014 at 11:00pm — 21 Comments

वक्त की आंधी में ....

वक्त की आंधी में ....

कुछ तुमने बढ़ा ली दूरियां
कुछ हम मज़बूर हो गए
अपने अपने दायरों में
इक दूजे से दूर हो गये
चंद लम्हों की मुलाक़ात में
जन्मों के वादे कर लिए
चंद कदम चल भी न पाये
और रास्ते कहीं खो गये
वक्त की आंधी में सारे
स्वप्न गर्द में खो गये
कर न पाये शिकवा कोई
हम दो किनारे हो गये

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on January 28, 2014 at 5:00pm — 24 Comments

हसीन सपने कभी घर भी जला देते हैं

ल ला ल ला      ला ल ला ला   ल ल ला ला   ला ला 

शबाब फूलों का शबनम में मिला देते हैं 

शराब यूं ही हसी रोज बना देते हैं

दुआएं करते हैं हम जब भी अमन की खातिर

कबूतरों को भी हाथों से उड़ा देते हैं 

कभी जो आया हमें याद सुहाना बचपन

हँसी घरोंदा ही बालू पे बना देते हैं 

हुए न जब भी चरागा हैं मयस्सर हमको 

चरागे दिल को यूं ही रोज जला देते हैं 

समझ रहे हैं फकीरों को भिखारी या रब 

फ़कीर खुद ही…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on January 28, 2014 at 1:00pm — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जीवन में कितने चक्रव्यूह

जीवन में कितने चक्रव्यूह

पर घबराना कैसा  

पग-पग मिले सघन अरण्य

खूंखार  एक  सिंह अदम्य

तुझे मिटाने  की खातिर

खेले  दांव  बहु  जघन्य

अहो  प्रतिद्वंदी  ऐसा

पर घबराना कैसा   

 

करके तराश  दन्त नक्श

जाना तू उसके समक्ष

नेस्तनाबूत करने को   

उसी हुनर में होना दक्ष

कर वार उसी पर वैसा  

पर घबराना कैसा 

शत्रु  हावी हो या पस्त

तू विजयी हो या परास्त

होंसलों की डोरी पकड़…

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Added by rajesh kumari on January 28, 2014 at 12:20pm — 22 Comments

गज़ल (धूप पर बादलो का पहरा लगा हुआ है)

धूप पर बादलो का पहरा लगा हुआ है

उदासी का सबब और भी गहरा हुआ है

 

तूफ़ा से कह दो थोडा संभल कर चले

वक्त आज यहाँ कुछ बदला हुआ है

 

दुनिया का कैसा ये बाजार सजा है

जहाँ देखो हर रिश्ता बिका हुआ है

 

रात भर लिखती रही दर्द की दास्ता

रात का साया और भी गहरा हुआ है

 

देश की हालात मत पूछो तो अच्छा है

यहाँ हर इंसान इंसान से डरा हुआ है

 

देख कर खुशनुमा ये मंज़र हैरान हूँ मैं

एक फूल से सारा चमन…

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Added by Maheshwari Kaneri on January 28, 2014 at 11:30am — 12 Comments

नदी माँ है

पर्वत की तुंग

शिराओं से

बहती है टकराती,

शूलों से शिलाओं से,

तीव्र वेग से अवतरित होती,

मनुज मिलन की

उत्कंठा से,

ज्यों चला वाण

धनुर्धर की

तनी हुई प्रत्यंचा से.

आकर मैदानों में

शील करती धारण

ज्यों व्याहता करती हो

मर्यादा का पालन.

जीवन देने की चाह

अथाह.

प्यास बुझाती

बढती राह.

शीतल, स्वच्छ ,

निर्मल जल

बढ़ती जाती

करती कल कल

उतरती नदी

भूतल समतल

लेकर ध्येय जीवनदायी

अमिय भरे

अपने…

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Added by Neeraj Neer on January 28, 2014 at 10:04am — 36 Comments

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