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दर्द

ये रातें जल रही हैं,

वो बातें खल रही हैं

लगा दी ठेस तुमने दिल के अंदर

नसें अंगार बनकर जल रही हैं

मौसम सर्द है,

जीवन में लेकिन

लगी है आग,

तन मन जल रहा है।

जिसे उम्मीद से बढ़कर था माना

वही घाती बना है छल रहा है।

तुम्हारी ठोकरों के बीच आकर

बहुत टूटा हुआ हूँ, लुट गया हूँ

तेरा सम्मान खोकर, स्नेह खोकर

स्वयं ही बुझ चुका हूँ, घुट गया हूँ।

यहाँ हालात क्या से क्या हुआ है

नहीं कुछ सूझता…

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Added by आशीष यादव on June 1, 2019 at 5:02pm — No Comments

अबला सहे हर अत्याचार |

घर चलता है नर नारी से , नर का चले  सारा अधिकार |
 घर का  काम करे सब  नारी , फिर भी रहे नर से  लाचार | 
 
संग  रहे भाई  बचपन में  , बात  बात में देता ताना |
एक दिन ससुराल जाओगी , वहाँ होगा   तेरा ठिकाना |
सदा  कहा  भाई की होती , बहन का नहीं  चले बहाना |
रोकर चुप हो जाती बहना , दबा लेती आंसू की धार…
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Added by Shyam Narain Verma on June 1, 2019 at 2:30pm — No Comments

इच्छाओं का भार नहीं धर----ग़ज़ल

22 22 22 22

इच्छाओं का भार नहीं धर

रिश्तों के नाज़ुक धागों पर

पोषित पुष्पित होंगे रिश्ते

हठ मनमानी त्याग दिया कर

ऊर्जा से परिपूर्ण रहेगा

खुद में शक्ति सहन की तू भर

करनी का फल सन्तति भोगे

सो कुकर्म से ए मानव डर

देख निगाहें घुमा-फिरा के

कौन नहीं फल भोगे यहाँ पर

अब वैज्ञानिक भी कहते हैं

पाप-प्रलय-भय तू मन में भर

गा कर, लिख कर, यूँ ही पंकज

हर मन से अवसाद सदा…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 1, 2019 at 12:46pm — 1 Comment

जा रहे हम दूर-दूर

ढलते पहर में लम्बाती परछाईयाँ

स्नेह की धूप-तपी राहों से लौट आती

मिलन के आँसुओं से मुखरित

बेचैन असामान्य स्मृतियाँ

ढलता सूरज भी तब

रुक जाता है पल भर

बींध-बींध जाती है ऐसे में सीने में

तुम्हारी  दुख-भरी भर्राई आवाज़

कहती थी ...

"इस अंतिम उदास

असाध्य संध्या को

तुम स्वीकारो, मेरे प्यार"

पर मुझसे यह हो न सका

अधटूटे ग़मगीन सपने से जगा

मैं पुरानी सूनी पटरी पर…

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Added by vijay nikore on June 1, 2019 at 12:00am — 4 Comments

वफ़ा ढूंढते हो जफ़ा के नगर में यहाँ पर वफ़ा अब बची ही कहाँ है (४५ )

(१२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ )

.

वफ़ा ढूंढते हो जफ़ा के नगर में यहाँ पर वफ़ा अब बची ही कहाँ है 

बुझी है वफ़ा की मशालें दिलों से वफ़ा का नहीं कोई नाम-ओ-निशाँ है 

**

यहाँ राज करते हवस के पुजारी किसी की नहीं है मुहब्बत से यारी 

इधर बेवफ़ाओं का लगता है मेला कोई बावफ़ा अब न मिलता यहाँ है 

**

इधर पैसा फेंको दिखेगा तमाशा अगर जेब ख़ाली मिलेगी हताशा 

इधर है न…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 31, 2019 at 4:30pm — 2 Comments

आदमीं हूँ ख्वाहिशें होनी नहीं कम ऐ खुदा ...



2122-2122-2122-212

मतला:-

ख़ुश ही रहता हूँ शिकायत क्या करूँ क्या है अता।।

आदमी हूँ ख्वाहिशें होनी नहीं कम ऐ ख़ुदा।।

हुश्न-ए-मतला:-

तेरे ज़ानिब से मुझे जो भी मिला अच्छा लगा ।

मैं तो मुफ़लिस था मेरी हिम्मत कहाँ कुछ माँगता।।

मेरा दम घुटने लगा जब महफिलों की शान में ।

यार आया हूँ उठा कर दूर खुद का मकबरा।।

मेरी मैय्यत में गुलों की बारिशें अच्छी नहीं।

शाइरी के भेष में करने लगा था इल्तिज़ा।।

देख़ो उल्फ़त के…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on May 31, 2019 at 12:20pm — No Comments

चुप होना चाहता हूँ ....

चुप होना चाहता हूँ ....

नहीं नहीं

बहुत हुआ

अब मैं चुप रहना चाहता हूँ

अंधेरों सा खामोश रहना चाहता हूँ

अब मेरे पास

न तो विचार हैं

न किसी भी विचार को

अभिव्यक्त करने के लिए शब्द

पता नहीं

क्यों मैं चुप नहीं रह पाता

बावजूद ये जानते हुए भी

कि मेरे बोलने से कुछ नहीं बदलने वाला

मैं निरंतर बोले जा रहा हूँ

न जाने किसे और क्या क्या

मैं नहीं जानता

मेरा इस तरह से लगातार बोलना

किस हद तक ठीक है…

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Added by Sushil Sarna on May 31, 2019 at 12:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल- आरजू ही नहीं जब हुई मुख़्तसर

212 212 212 212

कीजिये मत अभी रोशनी मुख़्तसर ।

आदमी कर न ले जिंदगी मुख़्तसर ।।

इश्क़ में आपको ठोकरें क्या लगीं ।

दफ़अतन हो गयी बेख़ुदी मुख़्तसर ।।

नौजवां भूख से टूटता सा मिला ।

देखिए हो गयी आशिक़ी मुख़्तसर ।।

गलतियां बारहा कर वो कहने लगे ।

क्यूँ हुई मुल्क़ में नौकरी मुख़्तसर ।।

कैसे कह दूं के समझेंगे जज़्बात को ।

जब वो करते नहीं बात ही मुख़्तसर ।।

सिर्फ शिक़वे गिले में सहर हो गयी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 30, 2019 at 6:30pm — No Comments

मर्म .....

मर्म .....

कितनी पहेलियाँ हैं
हथेलियों की
इन चंद रेखाओं में
पढ़ते हैं
लोग इनमें
जीवन की लम्बाई
साँसों की गिनती
भौतिक सुख सुविधा
दाम्पत्य सुख
औलाद
सब कुछ पढ़ते है
नहीं पढ़ते
तो
प्राण बिंदु का मर्म

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 30, 2019 at 3:04pm — 1 Comment

माँ भी बोझ लगती है

बोझ उठाती हैअकेली माँ कई बच्चोँ का

कई बच्चोँ को मगर माँ भी बोझ लगती है

 

लहू से सींचकर जिसको बडा किया उसको

बहु के साथ ही रहने में मौज लगती है…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on May 30, 2019 at 3:00pm — No Comments

छंद सोरठा .......

छंद सोरठा .......

अपनेपन की गंध, अपनों में मिलती नहीं।

स्वार्थपूर्ण दुर्गन्ध,रिश्तों से उठने लगी।1।

प्रथम सुवासित भोर, प्रीत सुवासित कर गई।

मधुर मिलन का शोर, नैनों में होने लगा।2।

तृषित रहा शृंगार, बंजारी सी प्यास का।

धधक उठे अंगार,अवगुंठन में प्रीत के।3।

जागे मन में प्रीत, नैन मिलें जब नैन से ।

बने हार भी जीत, दो पल में सदियाँ मिटें।4।

वो पहली मनुहार, यौवन की दहलीज पर।

शरमीली सी हार,हर बंधन…

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Added by Sushil Sarna on May 29, 2019 at 1:23pm — No Comments

बुढ़ापा ...

बुढ़ापा ...

शैशव,बचपन ,जवानी
छूट जाती है
बहुत पीछे
जब आता है
बुढ़ापा
छूट जाता है
हर मुखौटा
हर आयु का
जब आता है
बुढ़ापा
बहुत लगती है
प्यास
बीते हुए दिनों की
तृषा की ओढ़नी में
तृप्ति की तलाश में
युगों के बिछोने पर
उड़ जाता है तोड़ कर
काया की प्राचीर को
अंत में
अनंत में
ये
पावन
बुढ़ापा


सुशील सरना
मौखिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 28, 2019 at 1:00pm — 2 Comments

वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र

वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र

अब दरख़्तों से भी हम डरने लगे हैं किस क़दर

यूँ मचा कर शोर करते हैं परिंदे अहतिजाज

इस जगह पर ही हुआ करता था अपना एक घर'

जिस जगह हमने गुज़ारी थी महकती शाम, अब

ज़ह्र फैला उस जगह  तो कैसे हम रोकें असर

फूल भी बेनूर से क्यों दिख रहे हैं बाग में

ख़ूबसूरत से चमन कोतो खा गयी किसकी नज़र

वो पुराने दिन हमें जब याद आते हैं कभी

ढूँढने लगते हैं…

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Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on May 28, 2019 at 1:00pm — 4 Comments

रंज-ओ-ग़म हो न अगर आँखें कभी रोती क्या ?(४४)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )

.

रंज-ओ-ग़म हो न अगर आँखें कभी रोती क्या ?

बेसबब साहिल-ए-मिज़गाँ पे नमी होती क्या ?

**

ज़ख़्म ख़ुद साफ़ करें और लगाएं मरहम

ज़ख़्म क़ुदरत किसी के ज़िंदगी में धोती क्या ?

**

चन्द लोगों के नसीबों में लिखी है ग़ुरबत

ज़ीस्त सबकी ग़मों का बोझ कभी ढोती क्या ?

**

बाग़बाँ फ़र्ज़ निभाता जो तू मुस्तैदी से

तो कली बाग़ की अस्मत को कभी खोती क्या ?

**

क्यों किनारे पे कई बार सफ़ीने डूबे

इस तरह रब कभी क़िस्मत किसी की…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 28, 2019 at 12:30am — 4 Comments

ग़ज़ल:: सब ग़मों को भुला दिया जाए

सब ग़मों को भुला दिया जाए

थोड़ा सा मुस्कुरा दिया जाए

अश्क़ मैं पी चुका बहुत यारो
जामे उल्फ़त पिला दिया जाए

.

लो सियासत बदल गयी अब तो
हुक़्म उनका सुना दिया जाए

आँधियाँ तेज जब चलें, खुद को
अपने घर में बिठा दिया जाए

अब जलाकर 'अमर' बसेरा तुम
कह रहे ग़म भुला दिया जाए

"मौलिक और अप्रकाशित"  

Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on May 27, 2019 at 6:00pm — 4 Comments

विदाई से पहले : 4 क्षणिकाएं

विदाई से पहले : 4 क्षणिकाएं

क्या संभव है

अनंतता को प्राप्त करना

महाशून्य की संख्याओं को

विलग करते हुए

........................................

उड़ने की तमन्नाएँ

आशाओं के बवंडर के साथ

भेदती रही नीलांबर को

अपने कर्णभेदी

अश्रुहीन रुदन से

......................................

मैं चाहता था

तुम्हें चाँद तक पहुंचाना

अपनी बाहों के घेरे में घेरकर

गिर गया स्वप्न

फिसल कर

आँखों के फलक से

हकीकत के…

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Added by Sushil Sarna on May 27, 2019 at 11:44am — 4 Comments

सच क्या है कोई पूछे, मैं श्याम बता दूँगा-----ग़ज़ल पंकज मिश्र

221 1222 221 1222

किस्मत की लकीरों पर खुश-रंग चढ़ा दूँगा

मैं दर्द के सागर में पंकज को खिला दूँगा

ज्यादा का नहीं केवल छोटा सा है इक दावा

ग़र वक्त दो तुम को मैं खुद तुम से मिला दूँगा

कुछ और भले जग को दे पाऊँ नहीं लेकिन

जीने का सलीका मैं अंदाज़ सिखा दूँगा

कंक्रीट की बस्ती में मन घुटता है रोता है

वादा है मैं बागों का इक शह्र बसा दूँगा

आभास की बस्ती है, अहसास पे जीती है

जन जन के मनस में मैं यह मंत्र जगा…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 27, 2019 at 12:43am — 6 Comments

कितना अफ़्कार में मश्ग़ूल हर इक इन्साँ है(४३ )

कितना अफ़्कार में मश्ग़ूल हर इक इन्साँ है 

कोई बेफ़िक्र अगर है तो सियासतदाँ है 

**

ख़ाक उड़ती है जिधर देखूँ उधर सहरा-सी 

इस क़दर दिल का नगर आज मेरा वीराँ है 

**

बात गुस्से में कही फिर से ज़रा ग़ौर तो कर 

"जी ले तू प्यार के बिन " कहना बहुत आसाँ है 

**

कोई अफ़सोस नहीं गर मेरी रुसवाई का 

शर्म से क्यों हुई ख़म यार तेरी मिज़गाँ…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 26, 2019 at 9:30pm — 2 Comments

छुट्टियों में हिंदी (संस्मरण)

विद्यालयीन हिंदी विषय पाठ्यक्रमों में हिंदी साहित्य की विभिन्न गद्य या काव्य विधायें बच्चे क्यों पसंद नहीं करते/कर सकते? यह सवाल मेरे मन में अक्सर उठता है।

मैं मानता हूँ कि यदि विद्यालयीन पाठ्यक्रमों में हिंदी साहित्य विधाओं की छोटी रचनायें कहानियां आदि/अतुकांत कविताएं/ क्षणिकाएं/कटाक्षिकायें आदि सम्मिलित की जायें; योग्य हिंदी शिक्षकों द्वारा बढ़िया समझाई जायें, तो विद्यार्थी उन्हें अधिक पसंद करेंगे।

अभी विद्यालयों में हिंदी पाठ भलीभांति कहाँ समझाये जा रहे हैं? मुख्य कठिन विषयों…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 26, 2019 at 9:30am — No Comments

चाँद बता तू कौन हमारा लगता है

चौदहवीं पे कितना प्यारा लगता है।

कितना दिलकश ये नज़्ज़ारा लगता है।।

आँख मिलाए और कभी शर्माए तू।

चांद बता तू कौन हमारा लगता है।।

चांदनी हरदम पास हमारे रहती है।

चांद मगर क्यों हमसे पराया लगता है।।

तुझसे पहले आंखों में यह चुभते हैं।

तुझ पे क्यों तारों का पहरा लगता है।।

उसका अक्स जो पलकों में धर लेते हैं।

क़ैदी सा फिर चांद हमारा लगता है।।

आसिफ़ तुम दरिया बन जाते हो जो कभी।

उसमें तुम्हारा चांद…

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Added by Asif zaidi on May 26, 2019 at 12:30am — No Comments

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