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All Blog Posts (19,174)

चाह बस् इतना कि







चाह नही मुझे कि..

मिलूँ तुमसे बागों व बहारों में



चाह नही मुझे कि..

मिलूँ तुमसे नदी के किनारों पे



चाह नही मुझे कि..

छेड़ो तुम  बंसी की तान और 

झूमती आऊँ मैं 



चाह नही कि..

बैठो तुम कदम्ब की डाल और

नाच के रिझाऊँ मैं 



चाह नही कि..

थामूं तुम्हारा हाथ और

निहारूँ तुम्हारी आँखों में



चाह बस इतनी कि..

हे नाथ !! 

छू लूँ तुम्हारे…

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Added by Meena Pathak on June 17, 2013 at 4:22pm — 23 Comments

बारिश : सरिता भाटिया

काली घटाओं ने दिल्ली को यूँ घेरा है

दिन में ही देखो छाया कैसा अँधेरा है

दिल क्यों धक धक करे गोरी तेरा है

आज तो ठंडी हवाओं का यहाँ बसेरा है

होगी बारिश खूब,दिल कहे आज मेरा…

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Added by Sarita Bhatia on June 17, 2013 at 11:00am — 15 Comments

//गजल//यह बारिशों का मौसम

 

2212122221212

 

यह बारिशों का मौसम, कितना हसीन है!

धरती गगन का संगम, कितना हसीन है!

 

जाती नज़र जहाँ तक, बौछार की बहार,

बूँदों का नृत्य छम-छम, कितना हसीन है!

 

बच्चों के हाथ में हैं, कागज़ की किश्तियाँ,

फिर भीगने का ये क्रम, कितना हसीन है!

 

विहगों की रागिनी है, कोयल की कूक भी,

उपवन का रूप अनुपम, कितना हसीन है!

 

झूलों पे पींग भरतीं, इठलातीं तरुणियाँ,

लय तान का समागम, कितना हसीन…

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Added by कल्पना रामानी on June 17, 2013 at 9:30am — 14 Comments

हाइकू बरसात के

लो हँसी दूब 

बादल जो छलके 

बहुत खूब 

*

नेह की बूँद 

मन पांखुरी पर 

गिरी अब,लो 

*

मन विभोर 

कर गए बदरा 

जी सराबोर 

*

मुंह चिढाया …

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 16, 2013 at 11:04pm — 9 Comments

एक लॊकगीत

एक लॊकगीत,,,,

=================

चूल्हा चौंका झाड़ू बरतन,

गगरी पनघट औ पानी रॆ !!हाय ! मॆरी जिन्दगानी रॆ,,

अम्मा  बाबू  कॆ बदना  की,

मैं किलकारी थी अँगना की,

तुलसी छॊड़ भई सजना की,

रॊटी जलॆ तवा कॆ ऊपर,

ऎसहिँ जलॆ जवानी रॆ !!१!!हाय ! मॆरी जिन्दगानी रॆ,,,

,

वॊ बचपन की सखी-सहॆलीं,

साथ साथ मॆरॆ सब…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on June 16, 2013 at 9:00pm — 11 Comments

त्रिसुगंधि (गीत ग़ज़ल व कविताओं का संकलन) का लोकापर्ण

काठमांडू नेपाल में होटल शंकर में अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकला मंच मुरादाबाद द्वारा आयोजित दिनांक 8 जून से 11 जून तक हुई अंतराष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी में द्वारा 134 लेखकों को लेकर संपादित की गई पुस्तक त्रिसुगंधि  गीत ग़ज़ल व कविताओं का संकलन 296 पृष्ठों की इस पुस्तक का लोकापर्ण करते अतिथिगण , कार्यक्रम के अध्यक्षडॉ हरिराज  सिंह  नूर  पूर्व कुलपति इ .वी .वी, मुख्य अतिथि थे डॉ  आर के मित्तल कुलपति टी .एम .यू…

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Added by asha pandey ojha on June 16, 2013 at 8:30pm — 18 Comments

गजल

मित्रॊ,,,,

मॆरा यह किसी बह्र मॆं कहनॆ का प्रथम प्रयास

आप सबकॆ चरणॊं मॆं समर्पित है,ख़ामियां बतानॆ की कृपा करॆं,,,

================================

मुफ़ाईलुन (हजज़)

वज्न = १२२२, १२२२, १२२२, १२२२

================================



कहीं हमनॆ सुना था इस, ज़मानॆ मॆं हिफ़ाज़त है !!

यहाँ हर एक कॆ दिल मॆं, अदावत ही अदावत है !!१!!



उठा रक्खा चराग़ॊं नॆं, कभी सॆ आसमां सर पर,

सुना है आँधियॊं सॆ चल, रही उनकी बग़ावत है !!२!!



अदा कॆ साथ दॆतॆ…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on June 16, 2013 at 5:30pm — 19 Comments

पिता-मकसद

सघन वृक्ष सा विशाल अडिग,

तपन में शीतलता देता !

तुफानों से हर पल लड़ता ,

फिर भी सदा सहज वो दिखता !

अपनी इन्हीं बातो के कारण ,

वो एक पिता कहलाता !

.

कठोर सा यह दिखने वाला ,

दिल से कोमलता दिखलाता !

बेटी के दर्द से विचलित ,

डान्ट वरी माई डॉटर कहता !

पर उसकी विदाई पर वो ,

खुद को असहाय है पाता !

लाख चाहकर भी वो अपने,

अनवरत आँसू रोक ना पाता !

अपनी इन्हीं बातो के कारण ,

वो एक पिता कहलाता !

.

बात बात पर डाँट…

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Added by D P Mathur on June 16, 2013 at 9:00am — 3 Comments

चाहत-मकसद

पिता हूँ , शायद कह ना पाऊँ, 

माँ सा प्यार ना दिखला पाऊँ !

चाहत है पर मन में इतनी,

प्यार में नम्बर दो कहलाऊँ !

जीवन की हर कठिन डगर में,

साथ खड़ा हो पाऊँ !

जब जब तुम्हें धूप सताये ,

छॉव मैं बन जाऊँ !

माँ तो नम्बर एक रहेगी ,

मैं , नम्बर दो कहलाऊँ !

.

समुंद्र भले ही कोई कहे ,

आँसुओं से बह जाऊँ !

तुम्हारी एक आह पर ,

विचलित मैं हो जाऊँ !

पत्थर हूँ ,

पर ,सुनकर दर्द तुम्हारे ,

मोम सा पिघल जाऊँ…

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Added by D P Mathur on June 16, 2013 at 8:30am — 2 Comments

!!! घर की मुर्गी दाल बराबर !!!

                                                   !!! घर की मुर्गी दाल बराबर !!!

                कालिमा की घोर नाशक आभा दबे पांव क्षितिज मे अपना आधिपत्य जमाने को उतावली हो रही थी और इधर नित्य क्रिया के फलस्वरूप मुर्गे ने कुकड़ू कूं.............. कुकड़ू कूं........बांग के साथ ही जीवनमय युध्द का बिगुल फूंक दिया। सृष्टि में एक विस्मयकारी, मुग्धकारी और मनोहारी दृश्यों का सजीव प्रस्तुति प्रसारित होने लगा। मुर्गा किशोरवय था। शिकार का हर दांव-पेंच बहुत ही बारीकी से समझता था। इसीलिए आज भी…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 16, 2013 at 7:59am — 12 Comments

बैठे-ठाले ~~

देखकर लोग बहुत दंग,पूत ,

ढोल बजते औ मृदंग,पूत !



तुमसे अब कौन मुक़ाबिल है 

जीत लेते हो खूब जंग ,पूत !



एक बिल्ली थी वो भाग गई,

तुम तो निकले दबंग,पूत !

कौन तुमसे हिसाब मांगेगा ?

डाल दी है कुएं में भंग,पूत !…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 15, 2013 at 11:37pm — 4 Comments

पानी जैसा होइए

!!!-ः दोहे:-!!!

पानी - पानी हो रही, लोकतंत्र सरकार।

हर क्षेत्र में असफल है, देश विदेश करार।।1

पानी नकसिर चढ़ गया, लोक तंत्र बेहाल।

जल संसाधन लूटता, बोतल भर कर माल।।2

जल संकट से घिर गया, अब यह पृथ्वी लोक।

जन मन रंजन कर रहा, नहि भविष्य का शोक।।3

सुबह बाल रवि तेज है, प्रखर प्रचण्डहि धूप।

सलिल अंबु जीवन लिए, मिलते नहि नल कूप।।4

जल ही जीवन जान लें, नीर वारि पय तोय।

पानी बिना सृष्टि नहीं, धरा हवा नभ…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2013 at 10:10pm — 9 Comments

मासूम कली

एक कली प्यारी सी

मासूम सी

खिलना चाहती थी

वह भी

इस खूबसूरत दुनिया

देखना चाहती थी

पर लोगों को कुछ

और चाहिए था

इसलिए मार दिया उसको

आखिर क्यों

वे ऐसा कदम उठाते हैं

जन्म लेने से पहले ही

उस कली को उखाड़ फेंकते हैं

प्रश्न पूछता हूँ उनसे

क्यों वे ऐसा करते हैं

किस चीज़ की चाह है उनकी

जो लडकियां नहीं कर सकती

इतिहास के पन्नो को उठाकर…

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Added by SAURABH SRIVASTAVA on June 15, 2013 at 9:00pm — 7 Comments

क्यूं

मुझे क्यूं लगता है , तुम्हे खो दुंगा ,

तुम्हें पा लिया है ,

ये भी तो मात्र एक भ्रम है !

जाने क्यूं लगता है ,रो दुंगा ,

ये भी तो मात्र एक भ्रम है !

नदी के किनारों सा,

साथ चलते चलते ,

क्यूं समझता हूँ ,मिलन होगा !

अनवरत साथ बह पा रहा हूँ ,

ये भी तो मात्र एक भ्रम है !

जाने क्यूं समझता हूँ ,

तुम, ये, वो सब मेरा है !

शाशवत सच ये कहता है ,

जो भोग लिया वो सपना है ! ,

जो उकेर दिया भाव ,वो अपना है !

प्रकृति का मात्र यही एक क्रम…

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Added by D P Mathur on June 15, 2013 at 2:30pm — 6 Comments

कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर

आशा के सहारे इंसान अपनी सारी उम्र गुजार देता हैI यही कि अब अच्छा होने वाला है अब सब सही हो जाएगा1 मैं सोचती हूँ क्या सचमुच सब सही हो जाएगाIजिंदगी की गाड़ी पटरी पर चलने लगेगी1भगवान देता है माना पर मुझे दिया अस्त-व्यस्त बिखरा हुआI अब उसे समेटना हैI यहाँ संभालो तो वहाँ की चिंता,वहाँ संभालो तो यहाँ की चिंता क्या करूं?पता नही कब सब कुछ सही होगा,होगा की नही1 जीवन के इस करूक्षेत्र में आशा और निराशाके इस महाभारत में कहीं कौरव न जीत जाए1भगवान कृष्ण तुम कहाँ हो? सुनते क्यों नही ?पुकारते-पुकारते थक गई…

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Added by Pragya Srivastava on June 15, 2013 at 11:41am — 4 Comments

पानी जैसा होइए

!!!ःः! दोहे !ःः!!!



पानी - पानी हो रही, लोकतंत्र सरकार।

हर क्षेत्र में असफल है, देश विदेश करार।।1

पानी नकसिर चढ़ गया, लोक तंत्र बेहाल।

जल संसाधन लूटता, बोतल भर कर माल।।2

जल संकट से घिर गया, अब यह पृथ्वी लोक।

जन मन रंजन कर रहा, नहि भविष्य का शोक।।3

क्षीण बाल रवि तेज है, प्रखर प्रचण्डहि धूप।

सलिल अंबु जीवन लिए, मिलते नहि नल कूप।।4

जल ही जीवन जान लें, नीर वारि पय तोय।

सृष्टि पानी बिना नहीं, धरा हवा नभ…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2013 at 9:11am — No Comments

गीतिका : हम झुनझुना हो गए !

वो दिखे ही नहीं इन दिनों 

दूज का चन्द्रमा हो गए 

इतने बीमार हम भी नहीं 

अपनी खुद ही दवा हो गए 

हैं सु-फल आपकी दृष्टि के 

क्या थे हम और क्या हो…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 14, 2013 at 11:51pm — 13 Comments

!!! कुण्डलियां !!!

!!! कुण्डलियां !!!

तपता सूरज देख कर, मौसम है बेहाल।
तरू, उपवन, जन ताप से, नित.नित हुए हलाल।।
नित.नित हुए हलाल, निरूत्तर ठगे खडे़ हैं।
निर्वस्त्रहि भी ढाल, धर्म में डटे अड़े है।।
अब कालहु का काल, इन्द्र भगवन को जपता।
धरा करे चित्कार, जेठ सूरज सा तपता।।

के0पी0सत्यम/ मौलिक व अप्रकाशित

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 14, 2013 at 9:00pm — 16 Comments

मन की किताब के कुछ पन्ने

       मन की किताब के कुछ पन्ने

       तुमको सुनाती हूँ मैं

       कहीं पे हैं खुशियाँ खुद को समेटे

       और गम हैं देखो चादर में लिपटे

       सलवटें हजारों दर्द की पड़ी हैं

        आशा की किरण पट खोले खड़ी है

        खिड़कियों से उमंगें पवन बन के आती

        देखो झरोखों से फिर जा रही हैं

       कमरे के कोने में छिपी बैठी चाहत

       लाल सुर्ख साड़ी में मुस्कुराहट शरमा रही है

       हंसी फूलों में खिलखिला रही…

Continue

Added by Pragya Srivastava on June 14, 2013 at 8:00pm — 4 Comments

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